Saturday, December 31, 2016

चलो चलें जिंदगी की ओर...


सुनो, 

जब पास से गुजरे शोर का सैलाब तुम कानों को बंद कर निकल जाना किसी जंगल की ओर. बोलने से बचना प्रिय कि बोलना महसूसने के आड़े ही आता है हर बार. सुनना तुम चुपचाप, पत्तियों पर झरती ओस की पदचाप। साँसों में भर लेना समूचा हरा और जबान पे पिघलने देना कुहरीली रातों का स्वाद।

किसी खेत की मेड पे रख देना खुद को मिलने देना जिंदगी का सुर सांस लेने से. जाती हुई घोड़ागाड़ी पर लपक के चढ़ जाना, घोड़े की टापों की आवाज के बुँदे पहन लेना हंसना जी भर के,
और रो भी लेना जब जी चाहे।

बच्चों की खिलखिलाहटों को जोर से लपेट लेना, जिंदगी के हर लम्हे को सीने से लगा लेना कि नया और कुछ भी नहीं सिवाय हमारी महसूसने की शिद्दत के. ढूंढते फिरते हो जो जिंदगी उम्र भर यहाँ वहां, वो वहीँ है एक कड़क चाय में. हथेलियों पे बैठे मौसम में.गलबहियां डाले स्कूल जाते बच्चों को देखने में, खेतों में आगे जाते-जाते मुड़कर देखती कमसिन मुस्कान में...

Monday, December 26, 2016

बर्फीले रास्तों में तुम्हारी याद का जादू...



इजाडोरा डंकन का नाम है, जरा संभल के लेना, सांसें अपनी संभाल के रखना. ये वही इज़ाडोरा है जिसके नृत्य ने न सिर्फ यूरोप बल्कि समूची दुनिया की साँसों को अपनी भंगिमाओं में कैद कर लिया था. १८ वीं सदी की इस अमेरिकन डांसर की समूची दुनिया दीवानी थी. इजाडोरा के नृत्य की अपनी ही शैली थी जिसके ज़रिये वो अपने चाहने वालों के दिलों पर राज़ किया करती थी. वो जब स्टेज पर होती थी तो किसी की तरफ नहीं देखती थी...वो खुद में गुम होती थी और नृत्य को जी रही होती थी. लेकिन एक रोज़ १९०४ की बात है जब वो बर्लिन में एक परफोर्मेंस दे रही थी उसकी नजर जा टकराई गार्डन क्रेग Gordon Craig से. वो कमाल का थियेटर आर्टिस्ट था और मशहूर अभिनेत्री एलन टेरी Ellen Terry का बेटा था. गार्डन ने अपने संस्मरण में इस परफौर्मेन्स का जिक्र करते हुए कहा था कि उसे देखते हुए वो किस तरह सुध-बुध खो बैठा था. परफोर्मेंस के बाद दोनों की मुलाकात ड्रेसिंग रूम में हुई. इस मुलाकात के बाद का एक ख़त आइये पढ़ते हैं जो इज़ा ने क्रेग को लिखा था. क्रिसमस वाले दिन..

क्रिसमस डे 1904/सेंट पीट्सबर्ग            
ग्रैंड होटल, द यूरोप

मेरे प्यारे,

भी-अभी सुबह यहाँ पहुंची हूँ....क्रिसमस की सुबह
मुझे यह अकेला कमरा, बिलकुल पसंद नहीं. ऐसा लग रहा है कि यहाँ की सारी कुर्सियां मुझे घूर रही हैं, डरा रही हैं. यह बिलकुल भी ऐसी जगह नहीं है जहाँ मेरे जैसा कोई खुश दिल वाला व्यक्ति रह सके. यह जगह उपन्यासों के ऐसे कोनों की मानिंद लगती है जहाँ अकसर घटनाएँ रहस्यमय तरह से आकार लेती हैं.

सारी रात ट्रेन सिर्फ पटरियों पर नहीं दौड़ रही थी बल्कि वो बर्फ के विशाल मैदानों से गुजर रही थी...खूबसूरत देश जो बर्फ की चादर ओढ़े खड़े थे उनके बीच से ट्रेन का गुजरना अद्भुत मंजर था...(इन सुन्दर द्रश्यों के बारे में वाल्ट विटमैन पहले ही कितना प्यारा लिख चुके हैं.) और इन सबके बीच चमकता हुआ चाँद. खिड़की के बाहर जैसे सुनहरी किरणों की बारिश हो रही हो...इस तरह सफ़र में होना, इन द्रश्यों से गुजरना, इन्हें महसूस करना कितना सुखद था.

मैं लगातार बाहर देख रही थी और तुम्हारे बारे में सोच रही थी. तुम जो मुझे सबसे ज्यादा अज़ीज़ हो, मेरे बेहद करीब हो. जानते हो क्रेग, मैं सारे रस्ते तुम्हें याद करती रही और कुदरत के मार्फत तुम तक अपने प्रेम के एहसास भेजती रही, उम्मीद है तुम्हें मिले होंगे...

अब मुझे जाना चाहिए, अपनी आँखों का काजल धो लेना चाहिए...और नाश्ता करना चाहिए. है न?

मेरा प्यार देना उस गली को जिसमें तुम्हारा घर है, गली नम्बर ११, और मेरा प्यार देना अपने प्यारे घर को, वही मकान नम्बर ६. और मेरा प्यार देना तुम अपने आपको भी...मेरा प्यार किस तरह छलक रहा है,कितना नाटकीय और ओल्ड फैशन लग रहा है न इस तरह से प्यार का इज़हार करना...पर प्यार है तो है...

मुझे ख़त लिखना...अब मैं नहाने जाती हूँ...

तुम्हारी
इज़ाडोरा

Saturday, December 17, 2016

तुम्हारी याद स्थगित है इन दिनों...



सुनो, अब मुझे तुम्हारी याद नहीं आती
न, ज़रा भी नहीं

अब मेरी पलकों में
याद की कोई बदली नहीं अटकी रहती
न भीतर मचलता है
रोकी हुई सिसकियों का कोई तूफ़ान
मुस्कुराती हूँ जी भर के
और तुम्हारी याद को कहती हूँ, 'फिर कभी'

अब मैं फूलों की पंखुरियों में
तुम्हारा चेहरा नहीं तलाशती
न ही हवाओं की सरगोशियों में
तुम्हारी छुअन को महसूस करती हूँ
अब मैं परिंदों को नहीं सुनाती
तुम्हारे और मेरे प्यार के किस्से
उन लम्हों की दास्ताँ
जो हमने साथ जिए थे

अब बारिशों को देख
तुम्हारे साथ भीगे पलों को याद नहीं करती
न दिसम्बर की सर्द रातों में
तुम्हारी हथेलियों की गर्माहट याद करती हूँ

सुनो, अब मुझे तुम्हारी याद नहीं आती
जरा भी नहीं

रसोई में कुछ भी बनाते समय
अब नहीं सोचती तुम्हारी प्रिय चीज़ों के बारे में
न घर से निकलने से पहले
चुनती हूँ तुम्हारी पसंद के रंग
मौसम कोई भी हो,
तुम्हारा यह कहना कभी याद नहीं करती
कि 'सारे मौसम तुम ही तो हो...
प्रेम की आंच में धधकती गर्मियां हों,
बौराया बसंत, या शरारती शरद..'

देखो न, मैने कितनी आसानी से तुम्हारी याद को
चाँद की खूँटी पे टांग दिया है

तुम कहते थे 'सिर्फ याद न किया करो
कुछ काम भी किया करो.'
तो अब काम करती हूँ हर वक़्त
कि तुम्हें याद करने का काम स्थगित है इन दिनों

मुझे सब पता है देश दुनिया के बारे में
पड़ोस वाली आंटी की बेटे के विवाहेतर सम्बंध से लेकर
भारत में नोटबंदी और
अमेरिका में ट्रम्प की जीत तक के बारे में
मुझे सब्जियों के दाम पता हैं आजकल
सच कहती हूँ, इन सबके बीच तुम्हारी याद कहीं नहीं

हालाँकि घर से ऑफिस और ऑफिस से घर के बीच
किसी भी मोड़ पे तुम्हारा चेहरा दिख जाना
मुसलसल जारी है
फिर भी मैं तुम्हें याद नहीं करती...

जिन रास्तों ने पलकों से छलकती तुम्हारी याद को सहेजा था
वो अब मुझे देखकर मुस्कुराते हैं
उनकी चौड़ी हथेलियों पर मुस्कुराहट रख देती हूँ
जाने कैसे वो मुस्कुराहट तुम्हारा चेहरा बन जाती है
मैं तो तुम्हें दिन के किसी भी लम्हे में याद नहीं करती
फिर भी...



Friday, December 16, 2016

चाँद बेचारे को कॉफ़ी नहीं मिलेगी..


एक पूरा और चमकता हुआ चाँद कर भी क्या लेगा, तब जबकि आपके सामने दो कप हों कॉफ़ी से भरे हुए और आपके पास चाँद को देखने की फुर्सत ही न हो. दोनों कपों से बारी-बारी से कॉफ़ी पीने के बाद भीतर का खालीपन मुस्कुराता है...यूँ खाली होने को जी कब से बेचैन था. एक ऐसा निस्सीम खालीपन जिसमें कोई मिलावट न हो. न सुख की, न दुःख की, न व्यस्तता की, न कुछ छूट जाने की खलिश की, न पुकार कोई, न इंतजार, न उलाहना, न अतिरेक से भरा कोई लम्हा. कप से छलकती कॉफ़ी मुस्कुराकर ताकीद करती है, तुम मत छलकना, तुम डूबते जाना, और गहरे...और गहरे...

बाद मुद्दत हथेलियाँ खाली हैं, बाद मुद्दत माथे पे सलवट कोई नहीं...शब्द ख़ामोशी के साथ सुरमई शामों के कांधों से टिककर बुझे हुए सूरज की आंच टटोल रहे हैं...वो अब अर्थ नहीं तलाशते. जानते हैं...अर्थ से भर दिए गये शब्द जबरन भावनाओं से भर दिए गये इंसानों जैसे होते हैं. जबरन अर्थ का बोझ ढोते शब्दों के कंधे झुक चुके थे, बिलकुल जबरन ठूंस दी गयी भावनाओं से झुके इंसानों की तरह. इंसान भले ही न झटक पाए हों भावनाओं का बोझ लेकिन शब्द ये सलीका सीख गए हैं. वो मुक्त हो गए हैं...

कोई भी शब्द तोड़ लो किसी भी भाषा के वृक्ष से, कोई फर्क नहीं पड़ेगा उसे कहीं भी रख दो, कैसे भी...रुदन को हटाकर हंसी रख दो,...दिन को हटाकर रात रख दो...कोई फर्क नहीं पड़ेगा...सिवाय इसके कि सूरज रात को चमकने लगेगा और चाँद दिन को खिलखिलाने लगेगा...

जब भीतर इतना खालीपन हो तो आसपास का शोर बाधा नहीं बनता, वो महकने लगता है, लोग बोल रहे होते हैं, हम सुन नहीं देख रहे होते हैं...उनके बोले को नहीं, उन्हें नहीं अपने भीतर के खालीपन को...कित्ती शिद्दत से तलाश थी इस होने की...कब तक रहेगा पता नहीं..बस कि जो है उसे जी रही हूँ...खुली हथेलियाँ आसमान को सौंप रखी हैं...लकीरों से खाली हथेलियाँ...

सुना है मेरे शहर को कुदरत ने कोहरे की चुनर से ढँक लिया है...मैं देर रात कोहरे की उस खुशबू को महसूस करती हूँ...सोए हुए शहर की चादर उठाकर धीरे से उसमें आँख मूंदकर लेट जाने की आदत..ऊंघते शहर में वो बेसब्र जागती आँखें...सब याद आता है...

पहाड़ों पर कोहरा नहीं, खिलखिलाती धूप है...खुली धुली सी रात है...इन ठन्डी रातों में दूर तक पैदल चलते जाने का लोभ मैं कभी नहीं छोड़ पाती...यूँ बरसती रातों में घूमते-फिरने का लोभ भी कब छोड़ पायी हूँ...जाने क्यों लोभी होना बुरा कहा गया होगा, मैंने जब लोभ शब्द उठाया तो बड़ा मीठा लगा मुझे...बिलकुल उसी तरह जैसे मीठा लग रहा है इस वक़्त का खाली मन...बाद मुद्दत सुकून है...चाँद बेचारा दूसरे कॉफ़ी के कप को लालच से देख रहा है...मैं उसे मुंह चिढाकर कॉफ़ी खत्म कर देती हूँ...रात के सीने में खूब रौशनी है...


Thursday, December 1, 2016

प्रार्थनाएं हमेशा एकांत मांगती हैं- ब्रिटनी स्पियर्स


आज 2 दिसम्बर को ब्रिटनी स्पियर्स का जन्मदिन है. 1981 को जन्मी ब्रिटनी स्पीयर्स को हम एक पॉप सिंगर, अभिनेत्री और डांसर के रूप में तो जानते ही हैं. पिछले दिनों टाइम मैगजीन में प्रकाशित उनका एक ख़त मिला जो उन्होंने अपने बच्चों ज्यादे और प्रेस्टन को लिखा था. यह ख़त बहुत पुराना नहीं है, लेकिन इसमें कुछ है जो एक स्थापित व्यक्तित्व को अलग ढंग से देखने, महसूसने की सलाहियत देता है- प्रतिभा 

4 मई 2016
प्यारे ज्यादें और प्रेस्टन,

तुम दोनों मेरी सर्वश्रेष्ठ कृतियाँ हो. उस दिन जब मैंने तुम्हारी मासूम, पवित्र प्यारी आँखों को पहली बार देखा था तबसे मैं चमत्कारों पर यकीन करने लगी. ओह, कितना खूब्सूरत तोहफा ईश्वर ने मुझे दिया है. तुम्हारी प्यारी मासूम दुनिया में शामिल होकर मुझे हर रोज़ यह एहसास होता है. मैं एक माँ के तौर पर तुम्हारे लिए प्रार्थना करती हूँ कि ईश्वर तुम्हें दुनिया के तमाम संघर्षों का सामना करने की शक्ति और इच्छा प्रदान करें.

तुम्हें पता है मेरे बच्चों, ईश्वर हमारे पास दबे पांव, चुपचाप आते हैं. मैं कामना करती हूँ कि तुम उसके आने की खामोश आहटों को सुन सको और अपनी आत्मा की आवाज़ सुनने के सही मायने समझ सको.

हमेशा खुद पर बहुत यकीन करना मेरे बच्चो, और यह बात समझना कि इस जिन्दगी में असंभव कुछ भी नहीं. मैं दुआ करती हूँ कि तुम खुली आखों से सपने देखो, ढेर सारे सपने, और जिन्दगी की बेइंतिहा संभावनाओं तक पहुँच सको. आशा करती हूँ कि जिन्दगी की तमाम कीमती रहस्यों से तुम वाकिफ हो सको, अपने व्यक्तित्व की फैलती हुई चमक को लेकर तुम कभी संकोच मत करना.

मेरे बच्चो, तुम यह बात समझोगे कि प्रार्थनाएं हमेशा एकांत मांगती हैं. समझोगे तुम कि एकांत में ही हम असल में ईश्वर से जुड़ पाते हैं और तब तुम जानोगे कि तुम कभी अकेले नहीं हो. ईश्वर हमेशा तुम्हारे साथ है.

मैं तुम्हारी ख़ुशी के लिए दुआ करती हूँ, चाहती हूँ प्यार से जीते हुए जिन्दगी की तमाम बुलंदियों तक पहुँचो.

तुम्हारी माँ
ब्रिटनी