Thursday, August 25, 2016

मैं सुख में सिर्फ रो सकती हूँ- सिल्विया प्लाथ




सत्रहवाँ साल, सिल्विया प्लाथ का ख़त उसकी माँ के नाम

२७ अक्टूबर १९३२ को अमेरिका में जन्मी सिल्विया ज़िन्दगी से इस कदर भरपूर थी कि क़ायनात के ज़र्रे-ज़र्रे में धड़कती ज़िन्दगी को पी लेना चाहती थी, जी लेना चाहती थी...वो इस कदर जीना चाहती थी कि महज़ इकतीस बरस की उम्र में ही अपनी ज़िन्दगी गँवा बैठी। जो लोग सुसाईड करते हैं वो ज़िन्दगी से हारे हुए नहीं होते, असल में वो ज़िन्दगी से बहुत ज़्यादा भरे होते हैं...शायद किसी लम्हे में कोई तालमेल बिगड़ जाता है और वो ज़िन्दगी में रत्ती भर भी आयी कमी को सह नहीं पाते...क्या जाने ये सच हो भी, न भी हो...लेकिन सिल्विया प्लाथ का यह ख़त देखकर मालूम तो ऐसा ही होता है। ये ख़त सिल्विया ने अपनी माँ को सोलह साल पूरे होने पर लिखा था, तारीख ठीक ठीक नहीं मिलती इसकी- प्रतिभा 


माँ,
मुझे सत्रहवें साल की इस खुशबू को, उमंग को सहेजकर रखना है। हर दिन बेशकीमती है। मुझे यह सोचकर ही अजीब लगता है कि जैसे जैसे मैं बड़ी होती जाऊँगी, धीरे-धीरे ये लम्हे बीत जायेंगे...यह मेरी ज़िन्दगी का सबसे सुंदर समय है...
अगर मैं अपने पिछले बीते हुए सोलह बरसों की बात करूँ तो मैंने सुख और दुःख दोनों को ही देखा है। लेकिन अब दोनों की ही कोई कीमत नहीं। मैं अब तक अपने बारे में अनजान ही हूँ। शायद हमेशा ही रहूँगी। लेकिन मैं आज़ाद महसूस करती हूँ...बिना किसी भी ज़िम्मेदारी के बंधन के...


मैं चाहती हूँ कि ज़िन्दगी मुझे बहुत प्यार करे। मैं इन लम्हों में बहुत खुश हूँ। अपनी डेस्क पर बैठी हूँ। खिड़की से बाहर घर के चारों ओर लगे पेड़ों को देख रही हूँ, गली के दोनों ओर लगे पेड़ों को भी। मैं हमेशा चीज़ों को देखना और महसूस करना चाहती हूँ, ज़िन्दगी को छूना चाहती हूँ, उसमें रच बस जाना चाहती हूँ। लेकिन इस तरह भी नहीं कि खुद को महसूस न कर सकूँ....
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माँ, मुझे बड़ा होने से डर लगता है। मुझे शादी करने से डर लगता है। मुझे तीनों वक़्त खाना बनाने से दूर ही रखना, मुझे रोज़मर्रा के जो काम होते हैं उनसे उकताहट होती है।
मैं आज़ाद रहना चाहती हूँ। मैं पूरी दुनियाँ के बारे में जानना चाहती हूँ...मुझे लगता है कि मैं चाहती हूँ कि मुझे ख़ुदा की लाडली लड़की के तौर पे जाना जाये। सोचती हूँ कि अगर मैं इस देह में न होती तो? लेकिन मैं तो अपनी देह को, अपने चेहरे को, अपनी साँसों को भी बहुत प्यार करती हूँ।

मुझे मालूम है कि मैं बहुत लम्बी हूँ और मेरी नाक मोटी है, फिर भी मैं आईने के सामने इतराती हूँ, बार-बार देखती हूँ कि मैं कितनी सुंदर दिखती हूँ। मैंने अपने दिमाग में अपनी एक छवि बनाई है कि मैं खूबसूरत हूँ। क्या यह गलत है कि मैं अपने बारे में इस तरह सोचती हूँ? ओह, कभी-कभी लगता है कि क्या बेवकूफ़ी की बातें मैंने लिखीं, कितनी नाटकीय।

वैसे परफ़ेक्शन क्या है...क्या कभी भी मैं वहाँ पहुँच सकूँगी? शायद कभी नहीं। मेरी कवितायें, मेरी पेंटिंग्स, मेरी कहानियाँ...सब अधूरी अभिव्यक्तियाँ....

एक वक़्त आएगा जब मुझे खुद का सामना करना होगा...करना ही होगा। अभी भी सोचती हूँ...कैसी होगी मेरी आने वाली ज़िन्दगी, कैसा होगा मेरा कॉलेज...मेरा करियर? एक अनिश्चितता है...जिससे डर भी लगता है, जाने मेरे लिए क्या बेहतर होगा, मुझे पता नहीं। मुझे तो आज़ादी पसंद है। मैं बंदिशों की निंदा करती हूँ। हाँ, मुझे मालूम है कि मैं उतनी भी समझदार नहीं हूँ। मेरे सामने रास्ते खुले हुए हैं लेकिन वो किधर जा रहे हैं, किन मंज़िलों की तरफ, मैं नहीं देख पा रही हूँ...

लेकिन मैं सब भूलकर खुद को बहुत प्यार करती हूँ। जानती हूँ, अभी तो मेरी ज़िन्दगी की शुरुआत ही है, लेकिन मैं मजबूत हूँ...

माँ, तुम मुझसे पूछती हो न कि मैं क्यों अपना जीवन लिखने में जाया कर रही हूँ,
क्या मुझे इसमें आनंद आता है
क्या इसका कोई फ़ायदा भी है
इन सबसे ऊपर क्या इससे कुछ कमाई भी होगी
अगर नहीं, तो इस सबका क्या फ़ायदा?

माँ, मैं लिखती हूँ सिर्फ इसलिये
कि मेरे भीतर एक आवाज़ है
और वो आवाज़ हमेशा नहीं रहेगी...

सच कहूँ माँ, मैं सुख में सिर्फ रो सकती हूँ।

तुम्हारी प्यारी और खुश बेटी
सिवी

चलने से पहले....



जब चलना चाहती हूँ तो ठहर जाती हूँ
देर तक ठहरी रहती हूँ
टटोलती हूँ
अपने कदमों को

अपने चलने की इच्छा को
क़दमों के चलने की इच्छा से मिलाती हूँ
बैठ जाती हूँ

जब मैं चलना चाहती हूँ
तब आहिस्ता-आहिस्ता बटोरती हूँ आहटें
उस सबकी जो चल रहा होता है
सिर्फ स्कूटर या गाडियों की नहीं
चल रहे दिशाभ्रम की
उन बातों की जिनमें चलना शामिल है
उस हवा के चलने को महसूसती हूँ
जो छूकर गुजरी नहीं ज़माने से
उन ख्वाबों की
जिनमें हम दो कदम ही सही
साथ चले थे
उन उम्मीदों की जिनसे झरता रहता है
तुम्हारा उम्र भर साथ चलने का वादा
टप्प टप्प टप्प...

जब मैं चलना चाहती हूँ
तो देखती हूँ
किस कदर ठहर गया है सब कुछ
घडी भी चलती सी नहीं लगती उस वक़्त
उसकी सुइयां एक दुसरे में उलझकर
सुस्ता रही हों जैसे
दीवार पर रेंगती छिपकली
भी घंटों एक ही जगह रुकी रहती है
एक ही तरह से
नाक के पास ले जाती हूँ हथेली
कि सांस भी चल रही है क्या
जिन्दगी का तो पता नहीं

ये भागदौड़ के चक्कर में
चलना कबका छूट गया था
और ये जान सकना भी कि
चलना और भागना दो अलग बातें हैं...

चलने से पहले ठहरना जरूरी था...


Monday, August 22, 2016

मैं तुमसे कम भी नहीं हूँ



अदबी ख़ुतूत- हार्पर ली का पत्र अपनी प्रशंसिका के नाम 

मशहूर अमेरिकन लेखिका हार्पर ली से उनकी प्रशंसिका ने उनकी एक तस्वीर मांगी। वो कोई फेसबुक या ट्विटर का जमाना तो था नहीं की फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजते ही उनकी तमाम तस्वीरें झोली में आ गिरें। और प्रशंसिका तो अपनी प्रिय लेखिका की तस्वीर सहेजना चाहती थी, वो भी उनके हस्ताक्षर वाली। ली के पास भी उस वक़्त कोई तस्वीर थी नहीं, लेकिन लेखक अपने पाठक के प्रति उदार न हुआ तो काहे का लेखक। ली ने उस प्रशंसिका को तुरंत एक ख़त लिख भेजा, देखिये न छोटे से इस ख़त में कितनी खूबसूरत बात है- प्रतिभा 
06/07/206

प्रिय जेरेमी,

इस वक़्त तो मेरे पास कोई ऐसी तस्वीर नहीं है जो मैं तुम्हें भेज सकूँ। लेकिन मैं तुम्हें कुछ लाइनें लिखकर भेज रही हूँ-

जब तुम बड़ी होगी, यह सच खुद भी याद रखना और सबको बताना भी, कि तुमसे कभी किसी का दिल न दुखे। कभी किसी को ये मत जताना कि तुम इस दुनिया की बहुत महत्वपूर्ण व्यक्ति हो। गरीब या अमीर किसी को भी नहीं लेकिन प्रिय, किसी की भी आँख में झांकना और कहना, ‘हो सकता है मैं तुमसे बेहतर नहीं हूँ, लेकिन निश्चित रूप मैं तुमसे कम भी नहीं हूँ।’

हार्पर ली

Thursday, August 18, 2016

भीतर बाहर की यात्राओं के सुर तलाशती है “आज़ादी मेरा ब्राण्ड“



कोई भी यात्रा साहित्य क्यों लिखा जाना चाहिए, क्यों पढ़ा जाना चाहिए? आखिर कौन सी हैं वो जरूरी चीजें जो एक यात्रा के दौरान लिए गये नोट्स को, अनुभवों को यात्रा साहित्य बनाते हैं। क्या बाहर को चलना ही यात्रा है या बाहर चलने की शुरुआत पहले भीतर चलने से होती है। वो कौन सी चीजें हंै जो एक पर्यटक को यायावर से अलग करती हंै। अनुराधा बेनीवाल की पुस्तक “आजादी मेरा ब्राण्ड“ इन्हीं सवालों के आसपास से गुजरती है। यह किताब विदेश यात्राओं के दौरान हुए अनुभवों से गुजरते हुए भारतीय समाज के दरवाजे पर स्त्री चेतना को लेकर बंद कुंडियों को खटखटाती है। वो सवालों के जवाब नहीं परोसती बल्कि ढेर सारे सवालों को जन्म देती है।

कई लिहाज से यह पुस्तक महत्वपूर्ण है। एक तो यह पुस्तक ऐसे वक्त मंे आई है जब सूचनाओं और अभिव्यक्तियों का एक खुला समंदर हमारे इर्द-गिर्द लहरा रहा है इसके बावजूद यात्रा साहित्य में अब तक स्त्री यायावरों की जगह बहुत ज्यादा नहीं है। समूचे यात्रा साहित्य को देखें तो भी स्त्रियों के नाम ज्यादा सुनने में नहीं आते हैं।

जिस देश में एक लड़की दुपट्टे संभालने की कला में प्रवीणता हासिल करते हुए, बढ़ते कद के साथ झुकती गरदन और धीमी होती आवाज़ ताकीदों के साथ बड़ी होती हो, जहां एक बड़ी उम्र की लड़की को घर से अकेले भेजने पर अव्वल तो पाबंदियां ही हों लेकिन अगर भेजना ही पड़े तो उसकी सुरक्षा के लिए साथ में चार साल के भाई को भेजने का रिवाज हो, अगर पाबंदियों में जरा नर्मी आये तो शाम को सूरज ढलने से पहले वापस लौट आने की हिदायत रहती हो उस देश में स्त्रियों द्वारा लिखे गये यात्रा साहित्य की कमी को समझा जा सकता है। ऐसे में आजादी मेरा ब्राण्ड एक जरूरी किताब लगती है।

अनुराधा हरियाणा के रोहतक जिले के खेड़ी गांव में 1986 में जन्मी एक स्त्री है। उसकी यात्रा न तो किसी काम के सिलसिले में की गई यात्रा है न जिंदगी की मुश्किलों से भागकर कहीं चले जाने की जिद से जन्मी है। एक तथाकथित आदर्श और सफल ;सैट्ल्ड जिसे कहती है दुनिया) लड़की को आखिर वो कौन सी चीज है जो खलबला के रख देती है...जिसकी तलाश में वो बिना ज्यादा रुपया, पैसा या साधन के एक बैकपैक के साथ निकल पड़ती है। वो खोज है अपने होने की। एक स्त्री किस तरह सामाजिक ढांचे में पलती है, बड़ी होती है, सफल भी होती है लेकिन अपने बारे में, अपनी भावनाओं के बारे में लगातार अनभिज्ञ रहती है। संभवतः यही खलबलाहट उसे रास्तों पर उतारती है और एक शतरंज की नेशनल चैंपियन बैकपैकर बन जाती है। जेब में यूरोप का नक्शा, थोड़े से पैसे और ढेर सारा उत्साह उसे यायावरी को उन्मुख करता है। वो जानती है कि अगर आपको दुनिया को देखना, समझना और महसूस करना है, धरती के कोने-कोने से बात करनी है तो महंगे होटलों में रुकने, महंगा खाना खाने जैसी सुविधाभोगी आदतों से निकलना होगा। कम खर्च में ज्यादा घूमने के तरीके खोजने होंगे और यह किताब बताती है कि किस तरह

घूमने के दौरान आई आर्थिक तंगी से जूझने के लिए कई बार वहीं किसी भी तरह का काम करके (क्योंकि कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता) पैसे भी कमाने होते हैं और अगर कभी कैमरा-वैमरा खो जाए तो खुद को समझाना भी होता है कि जो अनुभव साथ हैं, वो कैमरे में दर्ज तस्वीरों से कहीं ज्यादा कीमती हैं।

सामान्य से काफी अच्छा जीवन जीते हुए, सफलता के उच्चतम पायदानों पर खड़ी होने के बावजूद अगर कोई लड़की अपने भीतर की उथल-पुथल को सहेज पाती है, उसे सींच पाती है और एक रोज उसी उथल-पुथल का हाथ थामकर निकल पड़ती है दुनिया घूमने तो उस उथल-पुथल की आवाज को सुना जाना जरूरी है। इस किताब से गुजरते हुए कई बार वो आवाज सुनाई देती है, कभी किताब के पन्नों से, कभी अपने भीतर से। अनुराधा लिखती है-

“मैं पैदा हुई, काॅलेज गई, शतरंज खेली, नेशनल चैम्पियन बनी, अंग्रेजी में एम. ए. किया, लाॅ किया, पत्रकारिता की पढ़ाई की, प्रेम विवाह कर घर बसाया। कहने को परफेक्ट लाईफ। और क्या चाहिए होता है एक लड़की को...कुछ नहीं न? लेकिन वह क्या था जिसे ढूंढने को मैं भीतर से उबल रही थी। मैं आजाद देश की आजाद नागरिक होकर भी कौन सी स्वतंत्रता की बात सोच रही थी?“ अनुराधा बेनीवाल की किताब आजादी मेरा ब्राण्ड को उसकी इसी उहापोह के बरअक्स पढ़ा जाने पर तमाम सवालों के जवाब भी मिलते हैं और बहुतेरे सवाल भी। यह किताब एक अकेली औरत की घुम्मकड़ी के अनुभव हैें।

यह किताब यूरोप के तमाम देशों की यात्राओं की किताब है जो पाठक को कई यात्राओं में ले जाती है। लंदन, ब्रसेल्स, पेरिस, एम्सटर्डम, बर्लिन, प्राग, ब्रातिस्लावा, बुडपोस्ट, इंसब्रुक और बर्न घूमते हुए अनुराधा के जे़हन में हिंदुस्तान का समाज, उस समाज में स्त्रियों के लिए खड़ी चुनौतियां, सामाजीकरण किस तरह स्त्रियों की सोचने और महसूसने को प्रभावित करता है आदि बातें लगातार चलती रहती हैं। पेरिस में जूही और हरेन्द्र से हुई उसकी मुलाकात उसे यह सोचने पर भी मजबूर करती है कि देश की सीमाओं को पार करके, खुलेपन के नाम पर दूसरे देशों की संस्कृतियों को अपनाने के बावजूद भारतीय पुरुष सामाजीकरण के उस वर्चस्व के शिकंजे में ही कैद हैं जहां दूसरी स्त्री प्राप्त करने की वस्तु और अपनी पत्नी छुपाकर रखने की चीज है। खुद आधुनिकता और खुलेपन की तलाश में कई स्त्रियों से संबंध रखने वाला पुरुष किस तरह अपनी पत्नी के बारे में मानसिक कसावट में है, किस तरह फेसबुक पर परफेक्ट फैमिली के इश्तिहार चिपकाती स्त्रियां भीतर ही भीतर घुट रही हैं, बेचैन हैं। देश चाहे हिंदुस्तान हो या पेरिस।

अनुराधा कहती हैं कि “कैसे निकल जाऊं घर से, यों ही? घरवाले जाने देंगे? अकेले कैसे जाऊं? कितना सेफ है यों ही अनजान जगहों पर जाना? हथियार लेकर जाऊं? टिकट-विकट की बुकिंग कैसे होगी? कहां रहूंगी? क्या खाऊंगी? जैसे सवाल अगर आपके मन में हैं तो आपका मन अभी तक सच में घूमने का नहीं हुआ है। जब होगा, तब ये सवाल नहीं होंगे।”

जैसे ही हम यात्रा के लिए कदम बाहर निकालते हैं बहुत सारे डर खुद-ब-खुद ढेर हो जाते हैं। तमाम सवाल सिरे से ख़ारिज हो जाते हैं। अनुभवों का एक अलग ही संसार जन्म लेता है। ऐसा संसार जिसमें एक यात्री होते हुए तो परिष्कार होता ही है सुधी पाठक के तौर पर भी भीतर कुछ आंदोलित होता महसूस होता है। किस तरह एक यात्रा न सिर्फ दूसरे देशों की संस्कृतियांे, वहां के रहन-सहन और लोगों के व्यवहार से जोड़ती है और किस तरह अपने देश और समाज में जड़े जमा चुकीं कुछ रवायतों पर प्रश्न उठाना सिखाती है यह इस पुस्तक को पढ़ते हुए महसूस किया जा सकता है। तमाम देशों की संस्कृतियों के बीच यात्राएं ही वो पुल हैं जो हमें भौगोलिक, सांस्कृतिक, आर्थिक सीमाओं को तोड़ती हैं। एक-दूसरे से सीखने को उद्यत करती हैं और हमें असल में मानवीय होना सिखाती हैं।

लेकिन इस सबके लिए जरूरी है एक यायावर मन होना। एक घुम्मकड़ को अपने भीतर होने वाली खलबली को समझना होता है, उसे सहेजना होता है, खाद पानी देकर सींचना होता है। दुनिया घूमने की इच्छा असल में मात्र घूमी हुई जगहों पर टिकमार्क करना, फेसबुक अपडेट या कुछ लिखकर वाहवाही पाने से ऊपर होती है। तब ही यात्रा अपना असल काम करती है, वो यात्री को बाहर के रास्तों पर चलाते हुए भीतर ले जाती है, भीतर की तमाम जड़ताओं को धीरे-धीरे तोड़ना शुरू करती है। यही जड़ताएं यात्रा वृत्तांत को पढ़ते हुए भी टूटती हैं। संभवतः यही वजह है कि एक यात्री, देश, धर्म जाति, संप्रदाय जैसी बंदिशों से लगातार आजाद होता जाता है। इस पुस्तक में भी सबसे पहले एक स्त्री होने की तमाम उन वर्जनाओं के टूटने की आवाज़ सुनाई देती है जो हिंदुस्तान में स्त्री की परवरिश से लेकर उसकी मृत्यु तक लगातार पैबस्त रहती है। एक स्त्री की आजादी सिर्फ उसके पहनावे, बोली, देर रात घूमने किसी के साथ भी सो सकने से ही नहीं तय होती है बल्कि एक व्यक्ति के तौर पर अपने इमोशंस, अपनी हारमोनल जरूरतों के प्रति सहज होना आजादी का असल मतलब है।

एक झलक देखिए तो किस तरह एक यात्रा में अपने भीतर की तमाम गिरहों का अंदाजा मिलता है।

“जितनी गिरहें जिं़दगी की हैं, आजादी की उससे ज्यादा ही होंगी। एक को खोलिए तो दूसरा सामने एंेठा रहता है। ये सब सामाजिक सभ्यता के निर्माण की गांठे हैं, जिनसे जीवन को भले स्थायित्व मिला लेकिन पग-पग पर उसकी चाल को झटका लगा। अब मुझे नहीं मिल सकी कभी। वह ऐसी कोई बड़ी बात न थी। उसे मेरा समाज, मुझे दे सकता था। उसे मेरे आसपास के लोग मुझे दे सकते थे। परिचित और अपरिचित दोनों तरह के लोगों से वह मुझे मिलनी चाहिए थी केवल चल सकनेे की आजादी। टैम बेटैम, बेफिक्र-बिंदास, हंसते-सिर उठाए सड़क पर निकल सकने की आजादी। कुछ अनहोनी न हो जाए, इसकी चिंता किए बगैर, अकेले कहीं भी चल पड़ने की आजादी। घूमते-फिरते थक जाएं तो अकेले पार्क में बैठकर सुस्ता सकने की आजादी। नदी किनारे भटकते हुए हवा के साथ झूम सकने की आजादी जो मेरे मनुष्य होने के अहसास को गरिमा भी देती है और ठोस यकीन भी।“

जैसा कि पुस्तक की भूमिका में स्वानंद किरकिरे कहते हैं कि इस पुस्तक की भाषा इसकी जान है। लेखिका कोई साहित्यकार नहीं है और बेहद सादा तरह से अपने अनुभवों को दर्ज करती चलती हैं, इसी सादगी, साफगोई के चलते किताब सिर्फ बुकशेल्फ में नहीं दिल में जगह बनाती है। यह बात भी समझ में आती है कि दिल से महसूस किये हुए को दर्ज करना असल में इतना मुश्किल भी नहीं, बस कि हमें अपने महसूस करने और लिखने के बीच के संबंध को ईमानदारी से निभाना आता हो, बगैर भाषाई परिमार्जन की परवाह किये बगैर विधा की फिक्र किए। यह किताब कभी डायरी की शक्ल लेना हुआ नज़र आता है, कभी संस्मरण की, जैसा कि किताब के आवरण पर दर्ज भी है कि ”एक हरियाणवी छोरी की यूरोप-घुम्मकड़ी के संस्मरणों की श्रंृखला।“ यानी किस तरह साहित्य की विधाएं एक-दूसरे को आत्मसात् करती चलती हैं यह किताब इसका उदाहरण भी है।

अनुराधा जानती है कि आजादी न लेने की चीज़ है न देने की। छीनी भी तो क्या-आजादी, वो तो जीने की चीज है। सो वो जीने निकल पड़ी है ये कहते हुए कि “आज मैं घूमने निकली हूं, दुनिया घूमने, अकेेले, बिना किसी मकसद के, एकदम अवारा, बेफिक्र, बेपरवाह। आज मैं जीने निकली हूं। मैं अपनी खुशियां, अपने ग़म, अपनी हंसी, अपने आंसू खोजने निकली हूं...“

इस पुस्तक को पढ़ते हुए पाठक भी किसी यात्रा पर निकल पड़ते हैं अपने भीतर उस खलबली की आवाज को फिर से सुन पाने की यात्रा में जिसे दुनियादारी और तथाकथित समझदारी ने कहीं दबा दिया था...

पुस्तक-आज़ादी मेरा ब्राण्ड
लेखिका-अनुराधा बेनीवाल
मूल्य- रु 199
प्रकाशक-राजकमल प्रकाशन


Sunday, August 14, 2016

आज़ादी लेकिन एक वर्जित शब्द हो गया...-देवयानी भरद्वाज


चौराहे पर तिरंगा बेच रहे बच्चे के हाथ में
झंडा मुस्कराया
बच्चे ने कहा भारत माता की जय
और हाथ से गिरा सिक्का उठाने बीच सड़क की ओर भागा

खाली पड़ी इमारत में
बस्तर के जंगल में
राजमार्ग के पास खेत में
लहुलुहान मिली किशोरी के पिता को
जब डाक्टरों ने कहा
थाने में रपट लिखना फिर आना
अस्पताल की ईमारत पर लहराता झंडा मुस्कराया

सोलह बरस के बाद
इरोम ने अनशन तोडा
आज़ाद भारत की सरकारें
कुछ और मगरूर हुई
राजभवन की दीवार पर गाँधी ने ऐनक सरकाया
झंडे के साथ वे भी मुस्कराए

आंबेडकर के चरणों में
कमल का फूल अर्पित किया गया
झंडा मुस्कराया

बुलडोज़र उठा कर ले जा रहे थे
रंभाती हुई गायों को
किसी को उसके निवाले की लिए पीटा
कोई अपने रोज़गार के लिए पिटा
दारू की बोतल में पानी बेचने वाला
सबके हिस्से का माल ले कर हो गया फरार
लाल किले पर फहराया गया तिरंगा
सबकी सफ़ेद पोशाकों पर
लाल छींटे चमक रहे थे
आसमान में झंडा मुस्करा रहा था

सब तरफ है जश्न-ए-आज़ादी
आज़ादी लेकिन एक वर्जित शब्द हो गया
जनता की आँखों में धूल है

जिनकी आँखों में नहीं धूल
उनके लिए त्रिशूल है
झंडा है कि मुस्करा रहा है...

Thursday, August 11, 2016

तुम चाहकर भी वो सब वापस नहीं ले सकते...

अदबी ख़ुतूत : ग्यारहवीं कड़ी 




सिमोन का ख़त नेल्सन के नाम
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मरिया पोपोवा को फ़्रेंच लेखिका सिमोन का ये ख़त जब मिला तो उन्हें जैसा महसूस हुआ वैसा ही कुछ मुझे भी हुआ। सिमोन की किताब ‘द सेकेण्ड सेक्स’ पढ़ते हुए चीज़ों को देखने और समझने का नज़रिया नहीं बल्कि नज़र मिलती है। सिमोन को जाना तो सार्त्र को भी जाना, दोनों के लिखे पढ़े को भी और उनके गरिमामय रिश्ते को भी। उनके बीच की ख़तो-किताबत से भी गुज़रना हुआ। लेकिन अदबी ख़ुतूत के लिए ख़त खंगालते हुए जो ख़त हाथ लगा वो सिमोन ने अपने प्रेमी नेल्सन एल्ग्रेन को लिखा। १९४७ में सिमोन जब शिकागो की यात्रा पर थीं, वहीं उनकी मुलाकात अमरीकी लेखक नेल्सन से हुई। उनके दरम्यान प्यार पनपा जिसे उन्होंने कई बरस तक दूरियों के बीच सहेजा। १९५० में नेल्सन ने इस रिश्ते से खुद को अलग कर लिया और उन्होंने अपनी पूर्व पत्नी से १९५३ में पुनः विवाह कर लिया। यह ख़त सिमोन ने १९५० में रिश्ते के टूटने की तकलीफ से गुज़रते हुए लिखा था।

मैं दुःख के सूखे और गुस्से के ठंडेपन में हूँ, मेरी आँखों में एक आँसू तक नहीं, इतनी सूखी आँखें...लेकिन मेरा दिल...उफ्फ्फ...जैसे सब कुछ बिखर गया है...

(.......)

मैं दुखी नहीं हूँ। हालाँकि आश्चर्यचकित हूँ। खुद से बहुत दूर हूँ और तुम्हारे बहुत बहुत बहुत करीब हूँ। मैं तुम्हें सिर्फ दो बातें बताना चाहती हूँ, इसके बाद मैं तुमसे कुछ भी नहीं कहूँगी, वादा करती हूँ। पहली बात कि मुझमें उम्मीद बहुत है, मैं तुमसे एक बार ज़रूर मिलना चाहती हूँ। कभी, किसी रोज़, कहीं...लेकिन याद रखना मैं तुमसे कभी खुद नहीं कहूँगी मिलने को। इसमें मेरा कोई गुरूर नहीं है, लेकिन मैं चाहती हूँ कि यह मुलाकात तब हो, जब तुम्हें इसकी ज़रूरत महसूस हो, तुम्हें इच्छा हो तो मैं उस पल का इंतज़ार करूंगी। जब तुम्हारी इच्छा हो मुझे बताना।

इसका यह अर्थ नहीं कि मैं यह मानने लगूँगी कि तुम फिर से मुझसे पहले की तरह प्यार करने लगो या मेरे साथ अन्तरंग हो। नहीं, ऐसा नहीं होगा लेकिन मैं यह भी मान नहीं पा रही हूँ कि मैं अब तुम्हें देख नहीं पाऊंगी, कि मैंने तुम्हारे प्यार को खो दिया है और अब तुम्हारा प्यार ‘है’ नहीं रहा बल्कि ‘था’ हो गया है।

जो भी हो नेल्सन, तुमने मुझे बहुत दिया है। और जो तुमने मुझे दिया उसका मेरी जिन्दगी में बहुत महत्व है। तुम चाहकर भी वो सब वापस नहीं ले सकते। तुम्हारा साथ, तुम्हारा एहसास मेरे लिए बहुत कीमती था प्रिय, मैं अब भी वो प्रेम की ऊष्मा, वो ख़ुशी महसूस कर रही हूँ जो तुम्हारी तरफ देखते हुए मेरे दिल में उतरती जाती थी। मुझे उम्मीद है कि हमारी दोस्ती, हमारे रिश्ते की वो नाज़ुकी, वो ऊष्मा कभी ख़त्म नहीं होगी। मुझे यह कहते हुए बहुत अजीब लग रहा है लेकिन सच तो यही है कि मैंने तुम्हें बेपनाह प्यार किया। जब मैं तुम्हारी बाँहों में होती थी तो किस कदर अपने आपको भुला दिया करती थी।

लेकिन मेरे प्यार की वजह से तुमको चिंता में पड़ने की ज़रूरत नहीं है। न ही मेरे प्रेम के बारे में सोचते हुए किसी ड्यूटी की तरह मुझे ख़त लिखने की। तुम लिखना तब, जब सच में तुम्हारा दिल करे लिखने को यह जानते हुए भी कि तुम्हारे ख़त मुझे किस कदर ख़ुशी से भर देंगे...

ओह, सारे शब्द किस कदर मूर्खतापूर्ण लग रहे हैं। तुम बहुत करीब महसूस हो रहे हो, मुझे भी अपने करीब आने दो प्रिये। बिलकुल वैसे ही जैसे हम पहले करीब हुआ करते थे, मुझे अपने दिल में छुप जाने दो...

तुम्हारी
सिमोन

(प्रस्तुति- प्रतिभा कटियार )

Sunday, August 7, 2016

आज के समाज मेँ प्रतिभा के हीर-रांझा


सुभाष राय
सम्पादक, जन्संदेश  टाइम्स.

प्रतिभा कटियार की कहानी 'मिस्टर एन्ड मिसेस हीर रांझा' समाज मेँ कहीँ बहुत गहरे घट रहे या घट सकने वाले एक सँरचनात्मक बदलाव की कहानी है । यह अपने कथ्य मेँ हीर -रांझा की पारम्परिक कथा को आज के परिप्रेक्ष्य मेँ एक क्रांतिकारी प्रस्थापन से लैस करती है। प्रतिभा कहती हैँ कि रांझा को पराये घर मेँ ब्याह दी गयी हीर के लिये रोते हुए जंगलोँ मेँ भटकने का अनुभव तो था लेकिन बीवी बनकर घर मेँ तकरीर करने वाली हीर को कैसे सहेजना है, इसका कुछ पता नहीँ था। ऐसे मेँ जिस तरह कहानी आगे बढती है, जिस तरह रांझा एक सेल्फ असर्टिँग पुरुष की तरह हीर को समझने की जगह उस पर खुद को थोपना शुरु करता है, किसी को भी लग सकता है कि ये हीर-रांझा जल्दी ही टूट जायेँगे, बिखर जायेँगे लेकिन ऐसा होता नहीँ है।

 रांंझा को यह देखकर आश्चर्य होता है कि हीर उसकी परम्परावादी जकडन मेँ उलझी माँ को भी एक दिन बदल कर रख देती है, एक अर्थ मेँ उसे जीना सिखा देती है। स्त्री अपने लिये जो स्पेस चाहती है, उसकी चिंता पुरुष कहाँ करता है, उसका मन क्या कहता है, इसे कब देखता है। सच तो यह है कि वह प्यार मेँ भी उसे मुक्त नहीँ करता बल्कि जकडे रहता है। हीर यह पसन्द नहीँ करती पर रांझा को उसके तर्क समझ मेँ नहीँ आते। पाठक की यह आशंका कि यहाँ सब -कुछ चकनाचूर हो जाने वाला है, सही साबित नहीँ होती और अचानक एक दिन रांझा को हीर की बातेँ सही लगने लगती हैँ, उसकी समझ बदलने लगती है। हीर तो शादी के बाद भी हीर ही रही पर रांझा का पुरुषवादी सोच अचानक एक छोटी सी घटना से जिस चमत्कारी ढंग से बदलता है, वहाँ कहानी अपनी सहजता मेँ एक झटका खाती दिखायी पडती है। 

लगता है प्रतिभा उसके कान पकडकर घुमा रहीँ हैँ लेकिन इसका कहानी के समूचे प्रभाव पर ज्यादा असर नहीँ पडता है। हीर-रांझा को जंगलोँ से शहर मेँ लाकर भी प्रतिभा उन्हेँ हीर-रांझा बनाये रखती हैँ, यही इस कहानी की विशेषता है।...मैँ हीर हूँ, शादी के बाद भी हीर ही बनी रहना चाहती हूँ,... तुम मुझे पत्नी बनाने पर तुले रहते हो, पत्नी तलाक दे सकती है, पति तलाक ले सकता है, धोखा दे सकते हैँ एक दूसरे को लेकिन हीर-रांझा नहीँ।

 ये प्रतिभा के हीर-रांझा हैँ, ढूँढने पर शायद कठिनाई से मिलेँ लेकिन ऐसे जीवन की सार्थकता से इंकार नहीँ किया जा सकता, जहाँ दोनोँ के लिये एक ही समतल हो मगर स्त्री न श्रद्धा होकर रह जाय, न विश्वास से परे चली जाय। दोनोँ एक दूसरे को बान्धेँ नहीँ मुक्त करेँ।


Friday, August 5, 2016

कोई कशिश तो शुरू से ही तुम्हारी ज़ानिब खींचती थी...

अदबी ख़ुतूत : दसवीं कड़ी 



सफ़िया का पत्र जाँ निसार अख़्तर के नाम

(सफ़िया: उर्दू के प्रसिद्धतम शायर मजाज़ की बहन और जाँ निसार अख़्तर की पत्नी )
15 जनवरी, 1951

अख़्तर मेरे,
पिछले हफ़्ते तुम्हारे तीन ख़त मिले और शनिवार को मनीऑर्डर भी वसूल हुआ। तुमने तो पूरी तनख़्वाह ही मुझे भेज दी। तुम्हें शायद तंगी में बसर करने में मज़ा आने लगा है। यह तो कोई बात न हुई दोस्त। घर से दूर रहकर वैसे ही कौन सी सुविधाएं तुम्हारे हिस्से में रह जाती हैं जो मेहनत करके जेब भी खाली रहे? ख़ैर, मेरे पास वो पैसे, जो तुमने बंबई से रवानगी के वक़्त दिये थे, जमा हैं।

अच्छा अख़्तर अब कब तुम्हारी मुस्कुराहट की दमक मेरे चेहरे पर आ सकेगी, बताओ तो? बाज़ लम्हों में तो अपनी बाहें तुम्हारे गिर्द समेट करके तुमसे इस तरह चिपट जाने की ख़्वाहिश होती है कि तुम चाहो भी तो मुझे छुड़ा न सको। तुम्हारी एक निगाह मेरी ज़िन्दगी में उजाला कर देती है। सोचो तो, कितनी बदहाल थी मेरी ज़िन्दगी जब तुमने उसे संभाला। कितनी बंजर और कैसी बेमानी और तल्ख़ थी मेरी ज़िन्दगी, जब तुम उसमें दाखिल हुए। मुझे उन गुज़रे हुए दिनों के बारे में सोचकर ग़म होता है जो हम दोनों ने अलीगढ़ में एक-दूसरे की शिरकत से महरूम रहकर गुज़ार दिये ।
अख़्तर मुझे आइंदा की बातें मालूम हो सकतीं तो सच जानो मैं तुम्हें उसी ज़माने में बहुत चाहती थी। कोई कशिश तो शुरू से ही तुम्हारी ज़ानिब खींचती थी और कोई घुलावट ख़ुद-ब-ख़ुद मेरे दिल में पैदा थी मगर बताने वाला कौन था कि यह सब क्यों?
आओ, मैं तुम्हारे सीने पर सिर रखकर दुनियाँ को मगरूर नज़रों से देख सकूंगी।

तुम्हारी अपनी
सफ़िया


(प्रस्तुति - प्रतिभा कटियार)

कोई कशिश तो शुरू से ही तुम्हारी ज़ानिब खींचती थी...

अदबी ख़ुतूत : दसवीं कड़ी 



सफ़िया का पत्र जाँ निसार अख़्तर के नाम

(सफ़िया: उर्दू के प्रसिद्धतम शायर मजाज़ की बहन और जाँ निसार अख़्तर की पत्नी )
15 जनवरी, 1951

अख़्तर मेरे,
पिछले हफ़्ते तुम्हारे तीन ख़त मिले और शनिवार को मनीऑर्डर भी वसूल हुआ। तुमने तो पूरी तनख़्वाह ही मुझे भेज दी। तुम्हें शायद तंगी में बसर करने में मज़ा आने लगा है। यह तो कोई बात न हुई दोस्त। घर से दूर रहकर वैसे ही कौन सी सुविधाएं तुम्हारे हिस्से में रह जाती हैं जो मेहनत करके जेब भी खाली रहे? ख़ैर, मेरे पास वो पैसे, जो तुमने बंबई से रवानगी के वक़्त दिये थे, जमा हैं।

अच्छा अख़्तर अब कब तुम्हारी मुस्कुराहट की दमक मेरे चेहरे पर आ सकेगी, बताओ तो? बाज़ लम्हों में तो अपनी बाहें तुम्हारे गिर्द समेट करके तुमसे इस तरह चिपट जाने की ख़्वाहिश होती है कि तुम चाहो भी तो मुझे छुड़ा न सको। तुम्हारी एक निगाह मेरी ज़िन्दगी में उजाला कर देती है। सोचो तो, कितनी बदहाल थी मेरी ज़िन्दगी जब तुमने उसे संभाला। कितनी बंजर और कैसी बेमानी और तल्ख़ थी मेरी ज़िन्दगी, जब तुम उसमें दाखिल हुए। मुझे उन गुज़रे हुए दिनों के बारे में सोचकर ग़म होता है जो हम दोनों ने अलीगढ़ में एक-दूसरे की शिरकत से महरूम रहकर गुज़ार दिये ।
अख़्तर मुझे आइंदा की बातें मालूम हो सकतीं तो सच जानो मैं तुम्हें उसी ज़माने में बहुत चाहती थी। कोई कशिश तो शुरू से ही तुम्हारी ज़ानिब खींचती थी और कोई घुलावट ख़ुद-ब-ख़ुद मेरे दिल में पैदा थी मगर बताने वाला कौन था कि यह सब क्यों?
आओ, मैं तुम्हारे सीने पर सिर रखकर दुनियाँ को मगरूर नज़रों से देख सकूंगी।

तुम्हारी अपनी
सफ़िया


(प्रस्तुति - प्रतिभा कटियार)

Tuesday, August 2, 2016

मिस्टर एंड मिसेज हीर रांझा



कहानियां आसपास से खूब गुजरती रहती हैं, कागज पे नहीं बैठतीं. मेरी तरह आवारा हो गयी हैं. बाद मुद्दत एक कहानी कागज़ पे बैठी तो 'हंस' पत्रिका ने उसे जगह दी. शुक्रिया सम्पादक मंडल का और उन तमाम पाठकों का जो मेरे हंस तक पहुँच सकने से पहले अपनी प्रतिक्रियाएं दूर-दूर से भेज रहे हैं - प्रतिभा कटियार

रांझा उस रोज़ फिर से ऑफिस देर से पहुँचा। सुबह साढ़े आठ वाली बस छूटने से सब गड़बड़ हो जाता है. साढ़े आठ वाली वही बस, जिसमें उसे हीर मिली थी. पहली बार. कई बरस पहले।

उस वक़्त हीर कंडक्टर से छुट्टे पैसों के लिए लड़ रही थी. राँझा उसकी पहली नज़र पे मर मिटा था. वैसे नज़र मिलते ही मर तो हीर भी मिटी थी. चार दिन दोनों रोज सुबह उस बस में एक-दूसरे को देखते रहे. रांझा हीर से पहले वाले स्टॉपेज पर उतर जाता। पांचवे दिन हीर भी उतर गयी रांझे के पीछे। थोड़ी दूर तक पीछा किया।

फिर रांझा रुक गया. उसने पूछा,' कुछ कहना है?'
'हाँ कहना है.' वो बोली।
रांझा बोला 'तो कहो'
हीर जोर से हंसी। बहुत ज़ोर से. जेठ की वो चटख सुबह अमलताश और गुलमुहरों सी गमक उठी. रांझे के दिल की धड़कने बेकाबू हो रही थीं. उसने इस तरह पहले कभी महसूस नहीं किया था. उसे लग रहा था कि अभी उसका दिल उछलकर बाहर आ जायेगा।

'चल जा तू, तुझसे संभलेगा नहीं, ' कहकर हीर वापस हो ली.

रांझा उसे जाते हुए देखता रहा. उसका जी चाह रहा था उसे रोक ले. उसके क़दमों में गिर पड़े, उसके कंधे पर सर रखकर खूब रोये। लेकिन एटीट्यूड भी कोई चीज़ होती है। वो उसके पीछे नहीं गया. ऑफिस पहुंचा तो देर हो चुकी थी. बॉस की डांट पड़ी लेकिन उसे सुनाई नहीं दी. दोस्तों ने उसे पुकारा लेकिन वो आगे बढ़ता गया. फाइलें निपटायीं लेकिन उनमें क्या निपटाया खुद रांझे को पता नहीं था.

सारा दिन रांझा अगली सुबह का इंतज़ार करता रहा. 'चल जा तू, तुझसे नहीं संभलेगा' रांझे के कानों में किसी राग सा झनझनाता रहा. वो मुस्कुराता भी और दर्द से तड़पता भी. एक ही वक़्त में इतना सुख और इतना दर्द वो पहली बार महसूस कर रहा था. फिल्मों में तो दिखाते हैं कि ऐसे मौकों पे सिर्फ सुख ही होता है. हालाँकि उसे 'चल जा, तुझसे नहीं संभलेगा' थोड़ा बुरा भी लग रहा था लेकिन वो बुरा लगने को इग्नोर मार रहा था.

घर पहुंचा तो बदन बुखार में तप रहा था. अम्मा ने दवा दी, खाना दिया और अगले दिन की छुट्टी लेने को कहा, रांझा छुट्टी के नाम पर उठ खड़ा हुआ. 'नहीं अम्मा, हरारत ही तो है. ठीक हो जाऊँगा सुबह तक.' अब वो अम्मा को क्या बताएगा कि ये बुखार सुबह साढ़े आठ वाली बस पकड़ने पर ही उतरेगा। इसलिए जाना तो पड़ेगा।

अगले दिन बस में हीर किसी से सीट के लिए लड़ती मिली। वो उसे एकटक देख रहा था. रांझा उतरा नहीं। वो हीर के स्टेशन पर ही उतरा। हीर मुस्काई, 'मुझे पता था' उसने कहा.
'क्या ' रांझा सकपकाया।
'यही कि तू आएगा। '
रांझे का दिल हीर के क़दमों में गिर पड़ने को उछाल मार रहा था. वो हीर के पीछे चलने लगा.

'क्या चाहिए' हीर ने पूछा।
रांझे के मन में आया कह दे 'तुम' लेकिन उसने कहा 'कुछ नहीं'
'तो पीछे क्यों आया ?' हीर ने पूछा।
'कल तू क्या बोलने वाली थी,' रांझे ने हिम्मत दिखाई।
'क्या ?' हीर ने अनजान बनते हुए कहा.
'वही, कि मुझसे नहीं संभलेगा' हीर हंस दी ।

रांझा घबरा गया. हीर की हंसी जादुई थी. कल की हंसी अब तक उस पर तारी थी. लेकिन आज हीर की हंसी में वो नदियों का सा वेग नहीं थी. आधे खिले पलाशों सी मादकता थी.
उफ्फ्फ ये तो कल वाली हंसी से भी क़ातिल थी. रांझे को यक़ीन हो गया उसका मरना अब तय था.

'तेरे को सच्ची नईं पता?' हीर मुस्कुराई। इस बार उसकी आँखों की कोरों पर कोई बदली अटकी थी. रांझा उस बदली को अपनी आँखों में उतार लेना चाहता था. हीर ने उसकी पलकों पर अपनी हथेलियाँ रख दीं. शहर के बीचोबीच तूफ़ान उठा. पांच दिन पहले के दो अजनबी उस तूफ़ान को संभाल पाने में एकदम नाकामयाब होते रहे.

'मुझसे न संभलेगा तो किससे संभलेगा' रांझा कहते हुए छलक ही पड़ा.

दोपहर शुरू होने के पहले ही शहर बदलियों से घिर गया. सारे दिन बेमौसम बरसात में शहर भीगता रहा.

एक रोज जब रांझा सीसीडी में हीर को कॉफी पिलाकर लौट रहा था तो हीर ने कहा, 'सुनो, इस बार हमें न बिछड़ना है, न मरना है, न रोना है. बस हंसना है. जीना है समझे तुम?'
'हाँ' रांझे ने उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा.

दोनों ने वॉटसअप नंबर सेव किये और प्यार की पींगे बढाने लगे. रांझा फिल्म देखते हुए उसका हाथ चूमना चाहता तो हीर हाथ झटक देती। वो एकदम रुआंसा हो जाता। तब हीर उसे बच्चे की तरह लाड करती। फिल्म छूट जाती कहीं दोनों की उँगलियाँ उलझ जातीं आपस में और भीतर कोई तूफ़ान उछालें मारता।

जैसा कि हमेशा से होता आया है हीर और रांझे का सुख दुनिया की नज़र में आ गया. रांझा सरकारी नौकरी में था. आई ए एस की तैयारी करते-करते, नैया क्लर्की पर आकर अटकी थी. लेकिन आज के ज़माने में सरकारी नौकरी वाले क्लर्क की हैसियत भी कम नहीं होती सो ठसक तो थी ही हालाँकि अन्दर आई ए एस न बन पाने की कुंठा भी थी. उधर हीर का मास्टर्स पूरा हो चुका था और वो कोई जॉब करने के मूड में नहीं थी. हीर की मम्मी तलाकशुदा थी और रांझे के घर में पिता की हालत एकता कपूर के सीरियल वाले मर्दों जैसी थी. सो दोनों माओं ने मिलकर रिश्ता तय कर दिया। हीर की माँ ने बड़े गर्वीले अंदाज में कहा 'जी, हम तो जाति-पाति मानते नहीं, ये सब काफी ओल्ड फैशन बातें है.'

रांझे की माँ कौन सी कम थी उसने भी सुनाया, 'हमारे यहाँ तो पिछली पीढ़ी में ही ये सब बंधन टूट गए. इसकी बुआ ने भागकर मुसलमान से शादी की थी'. इसके पिताजी बहुत आज़ाद ख्याल हैं. है न जी? आज़ाद ख्याल पिताजी खुद ही आज़ाद नहीं लग रहे थे धीरे से ‘हाँ’ में ‘हाँ’ मिलाकर मुस्कुरा दिए.

मने आज़ाद ख्याल होना आसान है, आज़ाद होना मुश्किल। खैर... रांझा ब्याह के हीर को ले आया घर. सेल्फ़ी ले लिवाकर हनीमून शनीमून निपट गया। फेसबुक अपडेट हो गया 'रांझा गॉट मैरिड विद हीर'. लाइक शाइक का ढेर लग गया और राँझा वापस नौकरी पे चला गया. काम धाम संभाला, भूली बिसरी दोस्ती यारी याद आई. जिंदगी पटरी पे आई.

लेकिन पटरी पे चले तो साली काहे की जिंदगी। हीर को घर का काम एकदम पसंद नहीं था. न झाड़ू, न पोंछा, न बर्तन, न खाना। इधर नयी शादी का बुखार उतरा उधर सासु माँ के प्रेम का. हीर सबेरे दस्सस बजे सो के उठे, रांझा जा चुका होता था तब तक. उठते ही सासु जी का चेहरा फूला मिलता। हीर उठती, इधर-उधर टहलती, अख़बार-शखबार पढ़ती, रसोई में जाती, जो मिलता खाती और कोई किताब खोलकर बैठ जाती। उसे पढ़ने का बहुत शौक था. शादी होकर ससुराल आई तो साथ में किताबों का ढेर ही सबसे ज्यादा लायी। जाने क्या पढ़ती रहती हर वक़्त। कभी कोई फिल्म देखने चली जाती, कभी कोई नाटक। उसे पढ़ना पसंद था तो उसने घर के पास वाली लाइब्रेरी ज्वाइन कर ली. इस बीच उसने रांझे से नए लैपटॉप और किंडल की भी मांग कर दी.

हीर को गाने का भी शौक था. वो अक्सर दूर किसी पहाड़ी गांव में बच्चो के लिए संगीत का एक स्कूल खोलने की फैंटेसी को जिया करती थी. खेतों में, गलियों में , पहाड़ी पगडंडियों पर बच्चों की खिलखिलाहटों के सुर में संगीत और संगीत के सुर में खिलखिलाहटो का फ्यूजन उसके जेहन पर दबे पांव दस्तक देता. अक्सर वो ऊपर वाले कमरे में हारमोनियम के साथ घंटों बंद रहती. हालाँकि नयी बहु की आमद पर बहू द्वारा गाना सुनाने वाले नियम को उसने फुग्गे की तरह सुई चुभा दी थी. मुंह दिखाई पे सासू माँ कहती रहीं लेकिन हीर ‘मुझे नहीं आता गाना’ कहने की बजाय ‘मेरा मन नहीं गाना गाने का’ कहकर मना कर आई. रांझे से ज़रूर कोई शिकायत हुई होगी तो उसने समझाया कि ‘कह देती गला ख़राब है, क्यों बोला मन नहीं है.‘ हीर सेब कुतर रही थी उस वक़्त. बड़ा सा टुकड़ा मुंह में पूरा धकेलते हुए बोली, ‘क्योंकि मन नहीं था मेरा, गला तो ठीक था एकदम....सुनोगे सुर लगाऊं....?’ उसने झूठ मूठ की मासूमियत ओढ़ते हुए जवाब दिया.

‘अरे यार, गज़ब हो तुम. बोल देतीं तो क्या बिगड़ जाता?’ रांझे ने भरसक मिठास अपनी आवाज में बचाए रखने की कोशिश की.

‘बिगड़ जाता न रांझा जी, नयी बहु कोई कार्टून नहीं है जिसका रिमोट किसी के हाथ में हो. क्यों उसे आये या न आये गाना पड़ेगा, वो आदत टूटनी ज़रूरी है, उसकी इच्छा उसके मन की भी कोई कद्र है की नहीं.’

‘अब इसमें कौन सी बुराई है, गाना-वाना तो अच्छी बात है न ?’ रांझा उलझने लगा था.

‘बुराई गाने में नहीं है रांझा जी,’ उसने अपना मुंह रांझे के करीब ले जाते हुए कहा.

‘बुराई उस दबाव की है जो रीति बनकर किसी भी व्यक्ति या रिश्ते में शामिल होता है. मैंने कहा न मेरा मन नहीं है. जब होगा सुना दूँगी. उन्हें भी यह सुनने की आदत होनी चाहिए कि मन भी कोई चीज़ होती है. उसकी भी अहमियत है भई.’

‘और इस तरह तुम समाज बदल दोगी?’ न चाहते हुए भी रांझा चिडचिडा हो गया था.

‘समाज बदले न बदले खुद को तो बचा लूँगी शायद. और लोगो को भी न सुनने की आदत होनी चाहिए न? हीर ने अपनी बाहें रांझे के गले में डाल दी थीं.

मुंह दिखाई पे शुरू हुआ तकरारों का यह सिलसिला धीरे-धीरे फलने-फूलने लगा. रांझा तो समझ जाता लेकिन सासू माँ बिफरने लगीं. रोज ऑफिस से लौटने पर कोई नयी फ़ाइल खुली मिलती, जिसे रांझा जैसे तैसे इग्नोर मारता.

इसी बीच एक दुर्घटना घट गयी. हीर प्रेग्नेंट हो गयी. खूब हंगामा किया उसने इस बात पर कि रांझे ने इस बात का ख्याल क्यों नहीं रखा. रांझा बोला 'तुमको नहीं चाहिए बच्चा तो तुमको ख्याल रखना चाहिए न......' हीर गुस्से में बमक गयी एकदम.

'पति नहीं हो तुम समझे? रांझा हो रांझा। जो हमको नहीं पसंद उसका ख्याल तुमको क्यों नहीं रखना चहिये?' रांझा हड़बड़ा गया.

अचानक उसे ब्रह्मास्त्र मिला, 'और जो मुझे पसंद है उसका ख्याल कौन रखेगा?'

'अरे मैं रखूंगी और कौन रखेगा लेकिन ख़याल रखने के नाम पर खाना बनाना, बर्तन धोना मत ले आना बीच में प्लीज़। ख्याल रखना इन सबसे काफी बड़ी चीज़ होती है’
'खाना बर्तन न लाऊँ, बच्चा न लाऊँ तो क्या लाऊँ बीच में?' रांझा हथ्थे से उखड गया.
'तो तुम मुझसे खाना बनवाने, बर्तन धुलवाने को ब्याह के लाये थे?'
'ये क्या बात हुई यार. प्यार किया, शादी की, ये सब होगा ही न?'
'नहीं। कोई ज़रूरी नहीं है. मैंने सोचा था कि हमारे प्यार के बीच घर, घर के काम काज, बच्चा इसलिए नहीं आएगा क्योंकि ऐसा ही होता है। वो सब हमारी अपनी इच्छा से होगा.’ हीर का मूड एकदम ऑफ हो चुका था.

‘ऐसा लगता है कि इस तरह की बातें भी फैशन ही हो चुकी हैं आजकल. घर के कामों से आज़ादी ही क्या असल में आज़ादी है? बच्चे पैदा नहीं करने क्योंकि पालने में मेहनत लगती है. गज्ज़ब आज़ादी है. मुझे तो समझ में नहीं आती ये आज़ादी’ रांझे ने सिगरेट सुलगा ली.

न रांझे, रसोई से आजादी वाली बात ही नहीं है, न बच्चा पालने की दिक्कत है लेकिन सिर्फ इन्हीं सीमाओं में कैद होकर नहीं रहना है. ‘बच्चे पल जाते हैं इसलिए कभी भी पैदा नहीं करना, जब मन से, हालात से तैयार होंगे हम दोनों तब लायेंगे बच्चा. पता नहीं यार, लेकिन मुझे इस तरह खुद को तयशुदा फ्रेम में देखे जाना ठीक नहीं लगता. लगता था तुम समझोगे मेरी बात.’ हीर की आवाज में उदासी और हताशा उतर आई थी.

रांझे की तो मानो पतंग ही कट चुकी थी. लड़ना फिर भी आसान था लेकिन हीर की उदास आवाज उसे तोड़ के रख देती. वो हैरान परेशान. उसे पराये घर ब्याह दी गयी हीर के लिए रोते हुए जंगलों में भटकने का अनुभव तो था लेकिन बीवी बनकर घर में तकरीर करने वाली हीर को कैसे सहेजना है, इसका कुछ पता नहीं था.

बहरहाल, हीर ने खुद डॉक्टर से अप्वाइंटमेंट लिया और अबॉर्शन करा आई. उदास रांझे ने इत्ता कहा, 'माँ को मत बताना। उन्हें दुःख होगा ' हीर ने कहा, 'बताऊँगी क्योंकि झूठ बोलने वाला कोई काम नहीं किया है मैंने।'

रांझे ने पाँव पटके, बाइक की चाबी उठाई और निकल गया अँधेरी सड़क पे.

हीर ने सिगरेट सुलगाई, थोड़ी देर तक चाँद को निहारा। उसे घुटन महसूस हुई. वो छत पे चली गयी टहलने।

कुछ दिन अबोला रहा, घर में अब काम करने के लिए, खाना बनाने के लिए सुनीता आने लगी थी इसलिए वक़्त पे खाना नाश्ता मिलने लगा था. एक रोज हीर ने अच्छे मूड में शाम की चाय के वक़्त कहा, 'सुनीता को हम महीने के ढाई हज़ार देते हैं. इन्हीं कामों में मुझे झोंकने को आप दोनों माँ बेटे पिले पड़े थे. है न? मने बस इत्ते से ही ख्वाब देखे थे आप लोगों ने अपनी बीवी और बहू के लिए ?' वो पकौड़ा कुतरते हुए मुस्कुराई। कनखियों से उसने रांझे को देखा। रांझा खामोश रहा.

रांझे की माँ ने ज़रूर कहा, 'बात तो सही कही तूने बेटा। हम औरतों को पता भी नहीं चलता कि इन छोटे-छोटे और चौबीस घंटे उलझाये रखने वाले काम हमारा कित्ता खून पीते हैं. कैसे हम उम्र के आखिरी मोड़ तक पहुँचते-पहुँचते कटखनी औरतें बनने लगती हैं.'

रांझा अम्मा की बात सुनकर चौंका। 'अम्मा ये तू कह रही है? तू जो हमेशा कामवाली बाई लगाने के खिलाफ रही. तू जो मेरा जीना हराम किये रही कि दिन भर हीर घर में पड़ी-पड़ी या तो पढ़ती रहती है या टीवी देखती है या घूमने चली जाती है.'

' हाँ, क्योंकि मुझे पता नहीं था कि जीना क्या होता है. तेरे पापा की ख़ुशी, घर सँभालने तेरा ख्याल रखने को ही जिंदगी मानते-मानते आज मैं कैसी हो गयी हूँ? हर किसी में खोट निकाळती हूँ. सारे दिन घर के काम करती हूँ और शाम को घरवालों पर चिड़चिड़ाती हूँ.' कहते-कहते अम्मा की आँखें भर आयीं।

'बहू मुझे जीना सिखा रही है. अब हम दोनों जाती हैं नाटक देखने। कभी-कभी तेरे पापा के साथ फिल्म भी देख आई हूँ. ' अम्मा ने आँखें मटकाते हुए कहा.

'ये हो क्या रहा है घर में' रांझा एकदम सकते में आ गया. हीर मुस्कुराई।
'राँझा जी, जिंदगी काटनी नहीं है हमने जीनी है, समझे आप.'
'मने जो घर के काम कर रही हैं, बच्चे संभाल रही हैं वो जी नहीं रहीं।' रांझा कटाक्छ की मुद्रा में आ चुका था.
'क्या पता जी रही हैं या उन्हें लग रहा है कि जी रही हैं। रांझा जी, बात घर के काम की नहीं है, बात है इच्छा की. उस स्पेस की जहाँ मन न होने की भी जगह हो. कोई भी काम किसी एक के लिए जन्म जन्मान्तर की बाध्यता क्यों है भला? तुम्हारा मन होता है कभी-कभी तो बनाते हो न मटन, पापा भी कभी चाय बना देते हैं, ऐसे ही हम भी बना देते हैं कभी. ये बहुत मामूली वजहें हैं लेकिन इनको समझने में वक़्त लगता है। मैंने अपनी माँ को देखा है, पापा से जब-जब नाराज़ होती थी घर में काम करने की उनकी गति बढ़ जाती थी, बर्तनों की चमक, फर्श की चमक, सजा संवरा घर बढ़िया खाना, फरमाइशें किस कीमत पर? एक समूचे व्यक्तित्व की कीमत पर ? क्यों ?

'लेकिन जो औरतें नौकरी करती हैं वो हेल्पर रखती ही हैं. ' रांझे को बहस से अब ऊब होने लगी थी.

'यानि अगर हम घर के काम से राहत चाहती हैं तो बाहर काम करना ज़रूरी है?' हीर का धीरज अब चुकने लगा था.
'अरे भाई तो करोगी क्या? घर में काम नहीं बाहर काम नहीं? करना क्या है ? बच्चे भी नहीं चाहिए वो भी कामवाली बाई से ही पैदा करा लो.'
‘वैसे आइडिया बुरा नहीं है,’ उसने रांझा को देखकर धीरे से आँख दबाई । अम्मा ने देख लिया। वो फिस्स से हंस दीं.

‘देख रहा हूँ ये पढाई लिखाई इमर्श-विमर्श कुछ अलग ही रंग दिखा रहा है. इसीलिए घर की औरतों को ज्यादा पढ़ाना-लिखाना नहीं चाहिए। चार किताबें पढ़ ली और लगीं बिगुल फूंकने।‘ रांझे के भीतर का मर्द जाग चुका था. हीर हर वक़्त बहस नहीं करती। खासकर उस वक़्त तो हरगिज़ नहीं जब रांझे का बीपी हाई हो, यानि वो गुस्से में हो. ये एक अबोला करार है. हीर एकदम शांत रही.

रांझा बड़बड़ा रहा था, 'मुझे इतना बता सकती हो कि करना क्या चाहती हो तुम औरतें? आखिर किस तरह की आज़ादी है ये कि अच्छा खासा घर चलाना जिसमें अब तक मजा आता था, वो भी बोझ लगने लगा.'

हीर शांत थी, चाय के कप उठाते हुए बोली 'जब खाली जगह बनेगी तो यह भी पता चलेगा कि क्या करना है, अभी तो सोचना भी मुनासिब नहीं इस बारे में। कितनी औरतों को ये आज़ादी है कि वो अपनी मर्जी से जी सकें' अपने मन के काम कर सकें'

'ये आज़ादी तो हम पुरुषों को भी नहीं है यार. तुम्हारे पास ये आज़ादी है कि नौकरी करने का मन नहीं है तो न करो, पति तो कमायेगा ही लेकिन मेरे पास नहीं है ये आज़ादी, समझती हो इस बात को' रांझा गुस्से में हांफने लगा था.

'हाँ राँझा जी, है इस बात का अंदाजा। और इसीलिए औरतें बराबर बाहर काम करती हैं. जब तुम्हारा मन न हो मुझे बताना, मैं कमाऊँगी तुम आराम करना, पक्का प्रॉमिस' हीर मुस्कुराई। 'यही तो फायदा है दो लोगो के होने का। और ये किसने कहा कि हमें घर के काम और बच्चों से एलर्जी है. अरे नहीं यार. घर के काम भी करेंगे, बच्चे भी संभालेंगे लेकिन तब जब हमारा खुद का मन होगा। किसी मशीन की तरह नहीं। आएगा बच्चा भी लेकिन गलती से नहीं दोनों की भरपूर इच्छा से, जब मन से तैयार होंगे दोनों ही तब' वो शरारत से मुस्कुराई। 'चलो न मुझे लौंग ड्राइव पे ले चलो, कित्ते दिन हो गए.' हीर ने इसरार करते हुए माहौल को हल्का किया।
'अम्मा ?' रांझा ने सवालिया लहजे में सवाल को अटकाकर छोड़ दिया।

अम्मा जो इतनी देर से चुपचाप बैठी सुन रही थीं बेटे बहु की बातें, बोलीं 'तुम दोनों जाओ. बहू ने मेरी और तेरे पापा की टिकट कराई है शाम की फिल्म की. अभी वो आते होंगे।'

रांझा बाइक निकालने लगा. सारे रस्ते हीर उसे छेड़ती रही वो मुंह फुलाए रहा. हालाँकि 'आएगा बच्चा जब दोनों का मन होगा' ये सुनकर उसे थोड़ी गुदगुदी भी हो रही थी और राहत भी महसूस हो रही थी.

एक रोज़ रांझा ऑफिस से परेशान हाल वापस आया. हीर उस वक़्त घर पे नहीं थी. सास के साथ मार्किट गयी थी. उसका बुझा मन और बुझ गया. पापा टीवी पे कोई सीरियल देख रहे थे.

'पापा, ये दोनों कब आएँगी?' रांझे ने पूछा।
'पता नहीं' पापा ने टीवी से आँख हटाये बगैर जवाब दिया।
'चाय पीने की बहुत इच्छा हो रही थी, दिन भर बाद घर आओ तो चाय भी खुद ही बनाओ' रांझा भुनभुनाया।
चाय का पानी चढ़ाते हुए उसे जाने क्यों हीर की बहुत याद आने लगी. एकदम रोना आने लगा. बहुत दिन बाद उसका जी चाहा हीर की गोद में छुप जाये।

पापा को चाय देकर वो बाहर आ गया. बेसब्री से हीर का इंतज़ार करने लगा. सच ही तो कहती है हीर, हम हमेशा से घर के हर छोटे बड़े काम के लिए औरतों के भरोसे ही क्यों होते हैं? आज अगर अम्मा घर पे होतीं या हीर होती तो बिना कहे उसके लिए चाय बना देतीं लेकिन पापा भी तो थे घर पर. वो भी तो जानते हैं कि दिन भर बाद आया हूँ, चाय पीने की इच्छा है, क्यों न बना दी चाय उन्होंने मेरे लिए. उनका मन होगा तो बनाएंगे। लेकिन औरतें मन हो न हो बनाएंगी ही.

जाने प्यार का बुखार था या कुछ और इस समय रांझा को हीर की सारी बातें ठीक लग रही थीं. उमस भरी शाम को नहाकर ही कुछ हल्का किया जा सकता था. वो नहाकर कमरे में जाकर कुछ पढ़ने लगा.

हीर और माँ लौट आये थे. माँ पापा से बात कर रही थीं. सुनीता कुछ दिन से छुट्टी पर है तो खाना माँ और हीर मिलकर ही बनाती हैं, हीर कमरे में आई, रांझे को सोया समझकर चुपचाप कपडे बदल के चली गयी. रांझा सोने का बहाना बनाये लेटा रहा. उसका जी चाहा कि उसे पुकारे, आवाज़ दे, लेकिन वो चुप रहा. हीर खाना बनाकर नहाने चली गयी. रांझा सोचता रहा ‘क्यों ये मुझे मना नहीं लेती। कित्ते दिन हो गए ठीक से बात तक नहीं हुई.’ अम्मा ने खाने की आवाज़ दी तो वो राजा बेटा की तरह वो डाइनिंग टेबल पर जाकर बैठ गया. भरवां करेला, दाल फ्राई, रोटी, चावल, सूखी भिन्डी टेबल पर लगा था. हीर बनाये भले न लेकिन उसे बहुत अच्छा खाना बनाना आता है. पहला निवाला खाते ही उसे महसूस हुआ. पापा ने बोल ही दिया, बेटा बहुत अच्छा खाना बनाती हो, सुनीता के हाथ में ये स्वाद कहाँ?'

' हाँ ये तो है, लेकिन अगर कोई तारीफ के बदले ये उम्मीद कर रहा है कि हीर रोज किचन संभालेगी तो भूल जाए,' अम्मा ने हलके फुल्के ढंग से अपनी बात रख दी. हीर खिलखिला दी.

रांझा सोच रहा था, ये वही अम्मा हैं?

रात हीर ने सिगरेट मांगी तो रांझे का मुह बिगड़ गया. 'क्या तुम रोज़ पीने लगी हो?'
'रोज़ तो नहीं, कभी-कभी.' हीर ने सिगरेट के लिए उसकी टेबल तलाशते हुए जवाब दिया।
'लेकिन तुम तो मेरे साथ पीती थी न ?' उसे थोड़ी बेचैनी होने लगी थी.
'तो, अब मैं बड़ी हो गयी हूँ राजा जी, कभी-कभार अकेले भी निपटा लेती हूँ. व्हाट का अ बिग डील?' हीर को सिगरेट मिल गयी थी. उसने शरारत से आँखें चमकाते हुए कहा. सिगरेट सुलगाई, दो कश लिए और सिगरेट रांझे के होंठों में दबा दी.

'मुझे पता है तुम्हें इसकी ज़रुरत है. अब बोलो क्यों परेशान हो? ऑफिस में कुछ हुआ क्या?'

रांझा हीर के सामने एकदम खुली किताब की तरह हो जाता है, वो किसी एक्स-रे मशीन की तरह उसे अंदर तक खंगाल लेती है. 'तो क्या वो ये जानती है कि मैं उसे चूमना चाहता हूँ.' रांझे ने उसके चेहरे की ओर देखा। वो खिड़की से बाहर देख रही थी.

'मेरे ऑफिस में जो मंजरी मैम हैं न उन्होंने अपने हसबैंड को डिवोर्स दे दिया' रांझे ने सिगरेट का कश लेते हुए भीतर की कश्मकश को बाहर निकाला।
'अरे वाह, ये तो बहुत अच्छी बात है.' हीर ने पलटकर रांझे की ओर देखते हुए कहा.
हीर के जवाब से रांझा एकदम हैरान था. 'तुम क्या हो यार. तुमको हर उलटी बात सही लगती है'
‘इसमें उल्टा क्या है?'औरत ने मर्द को तलाक़ दिया ये, या तलाक हो रहा है ये?' हीर ने गंभीरता के साथ पूछा।
'दोनों ही' रांझे ने सपाट जवाब दिया।
'नहीं दोनों ही बातें ठीक हैं यार. समझदार औरत है, तलाक़ देने का फैसला आसान नहीं होता। इसके बाद उसका जीवन मुश्किल ही होगा फिर भी उसने ये रास्ता चुना है तो उसके साहस की तारीफ करनी होगी।'
'तुम्हें कैसे पता कि गलती किसकी थी? ' रांझे के भीतर वाले पुरुष को दिक्कत हो रही थी.
'मुझे कुछ नहीं पता फिर भी यकीं है उसके फैसले पर.'
'तुम बायस्ड हो और कुछ नहीं ' रांझा चिढ गया.
'यही बात तुम्हारे साथ भी हो सकती है न?' आज हीर हार मानने को राज़ी नहीं थी.
' तुम्हारे हिसाब से सारी औरतें ऐश करें, मर्द कमाएं भी, घर भी सम्भालें, गाली भी खाएं और तलाक़ भी' रांझे का गुस्सा उफनाने लगा था.
''कुतर्क करना है तो सो जाओ. बात करनी है तो सुनना भी सीखो और समझने को भी तैयार रहो.' हीर ने सख्ती से कहा.
'कुतर्क क्या है '
'कुतर्क ही है'. हीर किताबें उठाने लगी.
'अब ये क्या है' उसे किताबें उठाते देख रांझा विचलित हो गया. आजकल हीर स्टडी रूम में देर तक पढ़ती है और कभी कभार वही सो भी जाती है।
'पढूंगी थोड़ी देर' हीर ने जवाब दिया।

रांझे को आज हीर की शाम से ही तलब थी. उसे इस तरह जाते देख वो रुआंसा हो गया.
'प्लीज़ मत जाओ' रांझे ने कहा.
हीर रुक गयी. रांझे ने हाथ बढ़ाया जिसे हीर ने थाम लिया।
'मुझे छोड़कर मत जाना कभी, मैं बहुत डर गया हूँ' रांझे ने सुबकते हुए कहा.
'मैं हीर हूँ. शादी के बाद भी हीर ही बनी रहना चाहती हूँ. उसी की कोशिश करती रहती हूँ. तुम मुझे पत्नी बनाने पे तुले रहते हो, पत्नी तलाक़ दे सकती है, पति तलाक़ दे सकता है, धोखा दे सकते हैं एक-दूसरे को लेकिन हीर रांझा नहीं।'

'मैं समझ गया मेरी प्यारी हीर, सब समझ गया. ' वो सुबकते हुए हीर के सीने में धंस गया.
हीर ने उसके बालों पर उँगलियाँ फिराते हुए माथा चूम लिया।

सुबह रांझा ऑफिस पहुँचने में फिर से लेट हो गया.

('हंस' पत्रिका के अगस्त 2016 के अंक में प्रकाशित )