Saturday, July 30, 2016

जहाँ भी रहना चाहो, मुझे साथ ही गिन लेना..


अदबी ख़ुतूत : ख़त इमरोज़ के अमृता के नाम :

ये ख़त उन दिनों के हैं जब अमृता और इमरोज़ के दरम्यान कुछ नाराज़गी के बादल घिर आये थे। इमरोज़ अमृता को आशी कहकर पुकारते थे और अमृता उन्हें जीती कहती थीं। ख़तों के संबोधन इन्ही नामों से हैं।
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३/११/६०

सुनो,
टू लव समबडी इज़ नॉट जस्ट अ स्ट्रॉन्ग फ़ीलिंग। इट इज़ अ डिसीज़न, अ ज़जमेंट।
मैं आज भी सिर्फ तुम्हें ही बता सकता हूँ और बता रहा हूँ कि मैं कितना बेआराम हूँ और किसी की समझ में नहीं आ सकता।
चाहे तुम्हें इस समय मेरा कुछ भी सुनाई न दे पर मैं किसे बताऊँ।चाहे हक कहीं दूर जा बैठा है, बेमायनी होकर शायद इस ख़त की तरह बेजान।
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१२/११/६०

वो दिन
वो रातें
वो तुम
वो मैं
वो तुम्हारी बातें
वो मेरी अमानतें
वो मेरे लम्हे
क्या पता था मेरा जीती ही ले जाएंगे
मेरा चैन मेरा हौसला सब कुछ ले जायेंगे
पर मैं तुम्हारी तरह ख़ामोश नहीं रहूंगा
मैं अपना सब कुछ ले जाने वाली को दिलेरी की हद तक, हिम्मत की हद तक, ज़िन्दगी की हद तक, नज़र की हद तक, तसव्वुर की हद तक खोजूंगा।
खोजकर ले आऊँगा।

नसीब के लिए भटकने वाला
जीती
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१४/११/६०

स्टूडियो साफ़ कर रहा हूँ
छोटी मेज पर रखी हुई तुम्हारे पोर्ट्रेट को पोंछते हुए हाथ रुक गए। आँखें ठहर गयीं।
तस्वीर की तरफ देखता ही रहा जिसे बनाकर कितना गर्व का अनुभव करता था।
पर आज आर्टिस्ट खुद, उस तस्वीर का क्रिएटर, तस्वीर के आगे, अपने क्रिएशन के आगे झुक गया।
अब मैं उस तस्वीर से आँखें नहीं मिला पा रहा।
पर मैं रोज उसे पूजता हूँ। मेरी पूजा न जाने कब क़ुबूल होगी।
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२१/११/६०
तस्सवुर की खिड़की से तुम्हें देख रहा हूँ।
तुम ख़ामोश हो, सर झुकाए हुए।
तुम तो तब भी मुझसे सब बातें कर लिया करती थीं, जब मैं तुम्हारा कुछ भी नहीं लगता था,
अब तो मैं तुम्हारा कुछ हूँ
जन्म से तुम्हारा सारा अपना
सिर्फ कुछ दिनों से कुछ ग़ैर
यह ख़ामोशी एक अँधेरे की तरह मेरे तसव्वुर पर छा जाती है। कई बार कितनी कितनी देर तक खिड़की में से कुछ दिखाई नहीं देता। कब तुम नज़र भरकर मुझे देखोगी और कब मेरी रोशनी मेरी तरफ देखेगी।
कब मैं और मेरा तसव्वुर रोशन होंगे।
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२१/११/६०
मेरे प्यार,
इस चुप के अँधेरे में मैं और नहीं रह सकता। २८ तारीख, सोमवार सवेरे साढ़े दस बजे मैं तुम्हारे पास आ रहा हूँ। तुम्हें अपनी रोशनी को खुद लेने के लिए आ रहा हूँ।
अपनी ख़ुदी भी तुम्हारे बगैर बेजान सी लगती है। बेमानी लगती है।
जो कुछ भी हूँ, अच्छा बुरा तुम्हारा हूँ।
तुम जो कुछ भी हो मेरी हो।
मेरी अमानत, मेरी खूबसूरत शाम।
जहाँ भी रहना चाहो, मुझे साथ गिन लेना।
अलग अब कोई नहीं रहेगा।

तुम्हारा समय
जीती
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आशी,
तुम्हारी नज़्में, तुम्हारी कहानियां, तुम्हारे उपन्यास, तुम्हारी फाइलें, तुम्हारी साड़ियाँ, तुम्हारी कमीजें, तुम्हारी चूड़ियाँ, तुम्हारे पर्स, तुम्हारी तस्वीरें, तुम्हारा जीती, अधूरी बनियान (बुनी हुई) हम सब अधूरे आ रहे हैं।

सवेरे साढे दस बजे डीलक्स से हम नई दिल्ली स्टेशन पर पहुँच रहे हैं। तुमसे मिलने के लिए, देखने के लिए इंतज़ार करेंगे। खुद आकर हमें ले जाना। जब तक तुम नहीं आओगी हम वहीं स्टेशन पर तुम्हारा इंतज़ार करेंगे।
मैं जीतीए कभी तुम्हारा सारा अपना, अब एक अजनबी तुम से मुख़ातिब है।
कभी तुमने बम्बई आते समय तीन दिन मांगे थे, आज मैं मांग रहा हूँ।
चाहे तीन दिन दो
चाहे तीन पहर
चाहे तीन घंटे
या चाहे तीन मिनट ही

जीती

(उमा त्रिलोक जी की किताब खतों का सफ़रनामा से साभार)

प्रस्तुति - प्रतिभा कटियार

Thursday, July 28, 2016

शिक्षा का सफर और सफर में शिक्षा



एक पूरा दिन स्कूल में बिताने की योजना आखिर पूरी हुई। देहरादून से पहाड़ी रास्तों पर होते हुए करीब 18 किलोमीटर की दूरी तय करके मैं सीआरसी मंजू नेगी के साथ ठीक साढ़े सात बजे राजकीय प्राथमिक विद्यालय व राजकीय माध्यमिक विद्यालय सरखेत पहुंच चुकी थी। सारे रास्ते बादलों की आंखमिचैली चलती रही। जगह-जगह रास्ते टूटे मिले, चारों ओर से पानी की कलकल की आवाजें थीे। ये वही रास्ते थे जो एक समय में आग में जलते और सूखे मिला करते थे। पहाड़ों पर जीवन सिर्फ मनोरम नहीं होता, मुश्किल भी बहुत होता है। सरखेत तक का रास्ता मेरे लिहाज से ठीकठाक मुश्किल था। रास्ते टूटे हुए मिले, कहीं सड़कों पर ही नदी बहती मिली। कई बार लगता कि अब आगे कोई रास्ता हो ही नहीं सकता कि तभी एक पगडंडी नजर आती। रास्ते में दो गाड़ियां गिरी हुई मिलीं। हम स्कूल पहुंचे तो स्कूल के ठीक बगल से कलकल करती बरसाती नदी, स्कूल के सर पर मंडराते बादल, प्रार्थना में लीन बच्चे देख रास्तों की सारी मुश्किलें एक पल में ही गुम हो गईं।

हां, मन में यह बात जरूर चल रही थी कि शिक्षक रोज इन्हीं रास्तों से स्कूल आते-जाते हैं यह आसान तो न होता होगा। बिना इन स्कूलों तक पहुंचे यहां की भौगोलिक चुनौतियों को समझा जा सकना मुश्किल है। स्कूल का मैनेजमेंट पहली नज़र में ही पूरी तरतीब में नजर आया। हर क्लास में बढ़िया फर्नीचर है, कक्षाओं में भरपूर रोशनी है, बच्चों के लिए बुक बैंक है जिसमें काफी किताबें हैं और जिनका रख-रखाव बच्चे ही करते हैं।

बच्चों के साथ हिंदी की कक्षा में मौलिक कहानी बनाये जाने की प्रक्रिया चल रही थी। जल्द ही मैं भी उस प्रक्रिया में शामिल हो गई। शु़़रू-शुरू में संकोच करते बच्चे जल्द ही खुल जाते हैं। कहानी और कविता में क्या अंतर है इस पर वो अपनी तरह से बात करते रहे। बच्चे मुक्त हैं, खुलकर बोलते हैं।

घंटी बजी और इंटरवल हुआ। यही वो वक्त था जब शिक्षिकाओं से बिना उनके काम में दखल दिये इत्मिनान से बातचीत की जा सकती थी। बच्चे मिड-डे मील खा रहे थे, और मैं भी। आलू न्यूट्रीला की स्वादिष्ट सब्जी और भात। मेरी कोशिश होती है कि चाहे जरा सा ही लेकिन मिड-डे मील चखूं जरूर। देखें तो हमारे बच्चे क्या और कैसा खा रहे हैं। खाना स्वादिष्ट और साफ सुथरा था।

भात खाते हुए हमारी बातचीत विस्तार लेती है। यहां पर दो अलग-अलग प्राथमिक व माध्यमिक विद्यालयों में छह शिक्षिकाएं हैं जो देहरादून से ही आती हैं। एक वैन शिक्षिकाओं ने तय की है जिससे वो आती हैं। कुछ अपनी एक्टिवा से भी आती हैं। बरसात में काफी दिक्कत होती है। उन्होंने बताया कि बीती रात एक साथी अध्यापक की गाड़ी पलट गई। अब मुझे समझ में आया कि रास्ते में जो पलटी हुई गाड़ी मिली थी वो किसी शिक्षक साथी की थी। पता चला पिछले सप्ताह एक महिला शिक्षिका की स्कूटी पलट गई थी। जिन बातों को सुनते हुए मेरा मन घबरा रहा था, वो उन्हें बेहद सहज ढंग से कह रही थीं। “मैडम गाड़ी तो पलटती रहती हैं। काफी शिक्षकों की पलट चुकी है। हर बरसात में 7 या 8 शिक्षकों की गाड़ी तो पलट ही जाती है।“ खुद लज्जावती सकलानी मैडम ने बताया कि वो पिछले साल तक स्कूटी से आती थीं फिर एक रोज उनकी गाड़ी पलट गई और काॅलर बोन टूट गई इसलिए अब स्कूटी से नहीं आतीं। इस बातचीत में एक बात समझ में आ रही थी कि ये शिक्षिकाएं इन मुश्किलों के लिए इस कदर अभ्यस्त हैं कि उन्हें इसमें कुछ भी खास बात नहीं लगती।

18 किलोमीटर की दूरी से आना और जाना एक सामान्य बात है, वो कहती हैं और टीचर तो इससे भी दूर जाते हैं। उन्हें आने में एक से डेढ़ घंटा लगता है और इतना ही वापस जाने में। दिल्ली या मुंबई या अन्य मैदानी इलाकों में रहने वालों को अठारह किलोमीटर को समझने के लिए एक बार पहाड़ों को समझना होगा कि यह पहाड़ के 18 किलोमीटर हैं मैदान के नहीं।

बात यहीं खत्म नहीं होती जरा बच्चों की भी बात करते हैं। यहां बच्चे डोमकोट, टिमली मानसिंह, तक्षिला, धनकू का सेरा आदि अलग-अलग गांवों से आते हैं। इन गांवों की दूरी 2 किलोमीटर से 7 किलोमीटर के दरम्यिान है। यह दूरी बच्चे पैदल पूरी करते हैं। स्कूल आने के लिए कुछ बच्चे एक नदी और पहाड़ पार करते हैं और कुछ सिर्फ पहाड़। डोमकोट गांव से स्कूल की दूरी तकरीबन 7 किलोमीटर की है, जहां से काफी बच्चे आते हैं और यह खड़ी चढ़ाई वाला गांव है। एक तरफ से बच्चों को आने में डेढ़ घंटे का समय लगता है। माध्यमिक से निकलने के बाद इन बच्चों को आगे की पढ़ाई के लिए मालदेवता के जिस इंटर काॅलेज में जाना है वो और भी दूर है। बहरहाल, ये दूरियां हमें आपको तो लग सकती है , न बच्चों को दूरियों से कोई शिकायत है न शिक्षकों को।

शिक्षिकाओं की चिन्ता टूटे रास्ते नहीं, स्कूल की शहर से दूरी नहीं, आने-जाने में लगने वाला समय नहीं बल्कि गर्मी की छुट्टियों में बच्चों के लिए आये अनाज का उनमें ठीक से वितरण करना है, कमजोर बच्चों के लिए इतवार को अतिरिक्त कक्षाएं लगाना है, उनकी चिंता है कि किस तरह बच्चों को पढ़ाई में इतना मजबूत बनाया जा सके कि आगे चलकर उन्हें कोई दिक्कत न हो। सीआरसी मंजू नेगी शिक्षकों का हौसला बन खड़ी रहती हैं, वो सुझाव देती हैं कि बच्चों से खूब लिखवाना चाहिए इससे उनमें आत्मविश्वास भी आता है सीखना पक्का होता है।

इस बीच छुट्टी की घंटी बजी और बच्चे बस्ते समेटने लगे। एक वैन इंतजार कर रही थी, जिसमें पास के स्कूलों के सभी शिक्षक इकट्ठे जाते हैं। वक्त पर स्कूल पहुंचने के लिए घर से छह बजे निकले ये शिक्षक अपने काम को लेकर कोई शिकायत नहीं करते, उन्हें चिंता है तो बस इतनी कि उनके बच्चे ठीक से पढ़ जाएं, कुछ बन जाएं।

शिक्षा के सफर में कितने ही बादल आयें, कितनी ही सड़कें टूटें, नदियां उफनायें, शिक्षा मजे में है...बच्चों की काॅपियों में दर्ज हो रहे हैं उनके सुनहरे ख्वाब...शिक्षिकाओं के आंखों में चमक रहा है सुकून कि बच्चे पढ़ रहे हैं...


Tuesday, July 26, 2016

आसमान से तुम्हारी याद बरस रही है....



अदबी ख़ुतूत : आठवीं कड़ी :
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दोस्तो,
कई बार यूँ लगता है कि ये जो अदबी ख़ुतूत हम पढ़ रहे हैं अगर ये दुनिया के मशहूर लोगों के ख़त न होते तो इससे क्या फर्क पड़ता। इन्हें पढ़ते हुए क्या यूँ नहीं लगता कि ओह ऐसा ही तो मेरे मन में भी चल रहा था। कई दोस्त पूछते हैं कि आपके ख़तों की पोटली में क्या किसी आम आदमी को भी जगह मिलेगी कभी? तो दोस्तों, मेरे लिए ये ख़त नाम नहीं हैं, भावनाएं हैं। इन्हें चुनते वक़्त लिखने वाले के कद पर बाद में ध्यान जाता है, ख़त के मजमून पर पहले। चलिए, फिर भी शिकायत दूर करते ही हैं आपकी। इस बार जो ख़त है वो १९७६ में किसी प्रेमी ने अपनी प्रिया को लिखा था। उसने अपना नाम छुपा लिया, और प्रेमिका का भी। ख़त उजागर कर दिया। ये ख़त काफी पहले ‘कथादेश’ पत्रिका के प्रेम विशेषांक में प्रकाशित हुए थे जिसका संपादन कथाकार देवेन्द्र ने किया था। (कब यह अंक आया था यह याद नहीं, किसी को याद हो तो बता सकते हैं ) उसी पत्रिका से ये ख़त चुराकर रख लिया था आज आपसे साझा कर रही हूँ। मेरी भूमिका इन ख़तों को आप तक पहुँचाने वाले डाकिये से ज्यादा नहीं है...
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22.8.76
प्रिय ....
ऐसा पहली दफ़ा हो रहा है कि मैं अपने शहर को छोड़कर किसी और तथा अजनबी शहर को छोड़कर किसी और अजनबी शहर की बारिश में हूँ। वहाँ की बारिशें इतनी अधिक प्यारी और पुरख़ुलूस हो रही हैं कि मेरे ज़ेहन में उसका अक्स ताज़िन्दगी बना रहेगा। वहाँ की बारिश में भीगना, छोटी सी पहाड़ी का बादलों से घिर जाना, रात में बारिश की बौछारों की धुंधलाती बत्तियों का जो नूर होता है, वह सब मेरे साथ चलता रहता है। यहाँ भी।
आज भी पहले की तरह चाहा यही था कि हल्की-फुल्की बारिश में नहाते और हवा की जाने किन-किन बातों पर सिर हिलाते दरख़्तों की कतारों के बीच से गुज़रती गीली सड़क पर पीली बत्तियों की रोशनियों के रिफलेक्शंस देखूंगा और इसी बहाने अपने भीतर के छूटे शहर को जी लिया जायेगा। यह एक छोटा सा मगर बहुत अजीज़ सा सुख था, जिसे अंधेरे में अकेले चलते हुए चुपचाप जीना चाहता और यकीनन उसे मैंने जिया भी। लेकिन आखिरकार उस सुख ने अपनी कीमत मांग ही ली। दरअसल, रात को दफ्तर से अपने कमरे तक पहुंचने के लिए मैंने कार नहीं ली। पैदल चलना चुना। मगर, थोड़ी देर में मैंने पाया कि एक शदीद बारिश के बीच में हूं। ग़ालिबन बारिश ने मुझे इतना अकेला देखकर घेरने की ठान ली हो। घर (?) तक के रास्ते के बीच मैं नहा-नहा गया। कमरे में देह सुखाने के लिए पंखा चलाया और देर रात तक खिड़की से पलंग सटाकर बारिश को आसमान से घटते एक जादू की तरह देखता रहा। बारिश को देखना और सुनना दोनों ही मेरे लिए एक चमत्कार था। इसी की वजह है कि आज दिन भर से धीमी-धीमी आंच में तप रही है अपनी देह। जैसे जूड़ी ताप में भीतर ही भीतर से सुलगता जान पड़ता है शरीर।
इस समय पूरे शरीर को चारों तरफ से लपेटकर लेटे-लेटे, तुम्हें यह ख़त लिख रहा हूँ। ख़त लिखते हुए काफ़्का की याद हो आयी। वह जीवन भर हल्के-हल्के बुख़ार में तपता रहा था। अपनी ही देह की धीमी आंच में तपते हुए उसने लिखे थे अपनी मिलेना को ख़त। तुम ही सोचो, काफ़्का को कहाँ पता होगा कि उसके द्वारा बुख़ार में लिखे गये ख़तों से एक दिन समूचा वर्ल्ड लिट्रेचर उसी तरह धीमी-धीमी आंच में तप उठेगा। दरअसल, आज सारे विश्व साहित्य को काफ़्का का बुख़ार चढ़ चुका है। मार्क्सवादी लेखक चाहे इसे न मानें लेकिन काफ़्का ने जो अपने अकेलेपन की आंच से अभिशप्त रहकर लिखा, वह कालातीत है। वह इतना डूबकर लिखता था कि उसे पढ़ते हुए अपनी आत्मा भी तपने लगती है। मुझे ऐसी ठिठुरन से भरी बारिश की रात में उसे पढऩा, उसे छूने की तरह जान पड़ता है। जब वह ख़त लिखता था तो शायद उसे इस बात का यकीन रहता होगा कि वह उसकी मित्र मिलेना को मिले या न भी मिले। मुझे तो लगता है उसका नाम ही उसके न मिलने का संकेत था। वह हिन्दी जानता होता तो अपनी मिलेना के नाम का अर्थ निकाल लेता। अर्थात जो मिले-ना वही मिलेना। मैं तुम्हें उसी मिलेना के बरअक्स रखकर अकसर सोचता हूँ। तुम्हारा नाम आगे से ....के बजाय मिलेना ही लिखा करूंगा। कभी-कभी इच्छा होती है कि तुम्हें काफ़्का की सारी किताबें भेंट कर दूँ। तुम्हारे जन्मदिन पर ताकि तुम जान पाओ कि आत्मा के भीतर भी बुख़ार होता है, उसे नापने के लिए अभी कोई थर्मामीटर नहीं बना है। शायद मिलेना ही उस थर्मामीटर की तरह थी, जिसमें वह अपना बुख़ार देखा करता था।
मुझे अक्सर ही एक सवाल कौंध-कौंध कर कोंचता रहता है कि वस्तुत: काफ़्का मिलेना को क्या देना चाहता था? अपना प्यार या कि अपना बुख़ार? वह देना चाहता था या कुछ लेना चाहता था? कहीं ऐसा तो नहीं कि उसे जो बुख़ार था वह मिलेना का ही बुख़ार था?और क्या मैं तुम्हें मिलेना के बरअक्स रखकर अपना बुख़ार देने की हिमाकत तो नहीं कर डालूंगा? और यह देह इसी तरह धीमी-धीमी आंच को लपट में लिपटी देह के चारों ओर खामोश खड़े लोग देखते रहेंगे कि कैसे सब कुछ किस तरह राख बनता है। घेरकर खड़ी भीड़ को पता भी नहीं चलेगा कि कौन सी वह चिंगारी थी, जिसने किसी लम्हे में लपट का रूप ले लिया। मैं जब यहां के घने जंगलों से गुजरता हूं तो लगता है, ये सारे हरे-भरे पेड़ एक दावानल के बीच हैं। वह दावानल मेरे भीतर है- मैं वाकई उस जंगल को स्वाहा कर देना चाहता हूं, जो मेरे भीतर है और भटका रहा है। वह हरा नहीं, सूखा जंगल है। एक चिंगारी मेरे भीतर है जो कभी भी लपट बन सकती है। पर यह भी तय है कि तब जंगल ही नहीं मैं भी स्वाहा हो जाऊंगा। हो सकता है कभी वह हरा हो उठे लेकिन बारिश बाहर होती रहती है। वह शहर को भिगोती है, मकान को भी भिगोती है, देह को भी लेकिन आत्मा को नहीं। वह उसी तरह धीमी-धीमी आंच में तपती रहती है। शायद लेखक बनने और बने रहने के लिए यह जरूरी भी है। जरूरी है कि वह अपनी आत्मा में इसी तरह झुलसता रहे। जले नहीं, सिर्फ झुलसता रहे।
मैं चाहता हूं कि तुम जान सको झुलसना क्या होता है। और उसके बगैर लेखक होना संभव हो सकता है?...मरते हुए भी मरने से बचे रहना लेखक बनना है क्योंकि मर जाना तो मुक्त हो जाना है लेखक सिर्फ मरने की यातना के भीतर जाने को बाध्य है। वह निरंतर एक दावानल में और दावानल के साथ है। काफ़्का इसका सबसे बढिय़ा उदाहरण है। काफ़्का का मृत्युबोध मिलेना का भय था। लेकिन वह काफ़्का की ताकत। यह कैसी विचित्र बात थी कि कि प्यार करने वालों के बीच मृत्यु और उसका बोध एक सूत्र बनाये हुए था। मुझे हमेशा लगता है कि एक दिन तुम मेरे मृत्युबोध से डर जाओगी और पीछे रह जाओगी और मैं मृत्यु से भिड़ता हुआ, मृत्यु से आ जाऊँगा। हम दोनों के बीच फिर भी एक अनाम से सेतु बना रहेगा। मैं तुम्हें ढूंढता रहूंगा। जो मिलेना वही होगी तुम। एक अलभ्य और एक अप्राप्य। पता नहीं क्यों ऐसा होता है कि ज्यों ही रात होती है-मैं मृत्यु पर बहुत बेकली से सोचने लगता हूँ। क्या ऐसा तो नहीं कि सचमुच ही मृत्यु कहीं मेरी प्रतीक्षा नहीं कर रही हो. या ऐसा भी हो कि मैं मृत्यु के साथ ही रह रहा होऊं इस कमरे में। मैं उसे धक्का देकर बाहर नहीं कर सकता, इस कमरे से. मृत्यु को धक्का देकर बाहर कर दूं तो निश्चय ही वह मेरी तरह भीगेगी और बाद इसके, मेरी ही तरह एक धीमी आंच में तपने लगेगी।
पश्चिम के लिए मृत्यु एक ठंडापन है। एक बर्फ सी ठंडी चीज, जिसमें सब कुछ जम जाता है। मगर भारतीयों के लिए मृत्यु को धक्का देकर बाहर कर दूँ तो निश्चय ही वह भी मेरी ही तरह एक धीमी आंच में तपने लगेगी। पश्चिम के लिए मृत्यु एक ठंडापन है। एक बर्फ सी ठंडी चीज, जिसमें सब कुछ जम जाता है। मगर, भारतीयों के लिए मृत्यु एक आग है। स्वाहा हो जाना है। हां, उस भीतर के सूखे जंगल को भी, जो मेरे भीतर है। हरा हो जाने की प्रतीक्षा में और हरियाली का अर्थ है, मिलेना। हरियाली का अर्थ वाकई मिलेना है? क्या वह हमेशा मिलेना ही रहती है? काफ़्का की मिलेना की तरह। मेरे ख्याल से बाहर की बारिश, भीतर होने लगे तो हरियाली आ सकती है। पर बारिश है कि हो तो रही है और सिर्फ बाहर भर हो रही है....
तुम्हारा
.....

प्रस्तुति: प्रतिभा


Wednesday, July 20, 2016

रास्ते मुश्किल सही मंजिलें खुशगवार रहें...


हम जिस सफर पर उस रोज देहरादून से निकले थे उसकी दूरी का ठीक-ठीक पता नहीं था। चलने की धुन में दूरियां नापने का जी भी तो नहीं करता। लेकिन उस रोज जिस सफर पर निकले थे उसमें मौसम की तल्खियां साथ थीं। सर पर झर झर झरती धूप को तो हमने अपना ही लिया था लेकिन थोड़ी ही दूर जाकर पता चला कि यह सिर्फ धूप का मामला नहीं है। जंगलों में लगी आग की तपिश भी हमें घेरने लगी। देहरादून के करीब ही है मालदेवता, केशरवाला संकुल में आता है। हम यहीं के स्कूलों की ओर निकले थे।

मालदेवता का पुल पार करते ही एक पहाड़ी सड़क से होते हुए हमें उस स्कूल तक पहुंचना था। पुल पर रुककर हमने सूखता हलक तर किया, सूखी नदियों को बेबसी से निहारा। ये वही नदी है जिसके किनारों पर कल कल बटोरने जिसमें पांव डालकर बैठने हम आया करते थे। उदास मन से हम आगे के सफर पर चल पड़े। बस जरा सी दूरी तय करते ही धुंआ नजर आने लगा, जल्द ही आग भी। पहले छोटी-छोटी आग मिली, टुकड़ों में फिर बड़ी लपटें उठती दिखीं। हवा के रूख के साथ लपटों का लहराना अचम्भित कर रहा था। अभी-अभी जिस सड़क से हम गुजरे थे उसे लपटें घेर रही थीं। एक मोर उस आग में झुलस के मर गया था और भी न जाने कितने पंछी झुलसे होंगे पता नहीं। मैं थोड़ा आगे जाकर आग की तस्वीरें लेना चाहती हूं फिर ठहर जाती हूं। बकरियों का रेवड़ दिखता है तभी, कुछ औरतें उन्हें हांक रही थीं। उन्हें देखकर लगा कि उन्हें इस आग की आदत थी...वो बेफिक्र आगे बढ़ी जा रही थीं। जाहिर है हम भी आगे बढ़े।

पहाड़ों पर कितनी ही मुसीबतें आयें ये अपनी खूबसूरती का कुछ न कुछ हिस्सा बचा ही लेते हैं। थोड़ी ही देर में हम आग के दायरे से बाहर निकल आये। सुनसान सर्पीली सड़क पर हमारी बाइक दौड़ती जा रही थी। दूर-दूर तक कोई बस्ती नहीं, कोई मानुस नहीं। जी में यही ख्याल आता रहा कि यहां कोई स्कूल होगा क्या? कौन आता होगा यहां पढ़ाने और कौन पढ़ने। एक जगह कुछ घर दिखे लेकिन कोई व्यक्ति नहीं दिखा जिससे कनफर्म किया जा सके कि हम सही रास्ते पर हैं भी या कहीं और ही आ गये हैं। हम अंदाजे से आगे बढ़ते गये तभी एक पहाड़ी लड़का हमें दिखा उसे हमने पूछा भैया, ये बिजौली गांव इधर ही है क्या...उसने हाथ के इशारे से आगे की तरफ जाने को कहा। मैं सारे रास्ते यही सोच रही थी कि हम अपने घरों से निकलकर सब्जी मण्डी या आसपास के बाजारों में जाने को कितना बड़ा काम समझते हैं, यहां रहने वाले लोगों को तो नमक भी चाहिए तो कितनी दूरी तय करके शहर जाना पड़ता होगा। हालांकि यह तो फिर भी सड़क से जुड़े हुए गांव हैं वो गांव भी याद आते हैं जहां पैदल का ही रास्ता है सिर्फ। बहरहाल तकरीबन 18 किलोमीटर के पहाड़ी रास्ते के सफर के बाद आखिर हम पहंुच गये थे राजकीय प्राथमिक विद्यालय बिजौली।

थोड़े सी ढलान से उतरकर हम स्कूल के सामने आ खड़े होते हैं। मानो किसी ख्वाब के दर पर खड़े हों। स्कूल में मध्यान्ह भोजन का वक्त था। बच्चे खाना खाकर खेल रहे थे। पहाडि़यों से घिरा वो स्कूल किसी अलौकिक दृश्य सरीखा मालूम हो रहा था। कुछ पल स्कूल के बाहर खड़े होकर समूचे आनंद को दूर से महसूस करती हूं। मैं वहां पहुंचकर उस आनंद को बीच में तोड़ना नहीं चाहती। मैडम भी बच्चियों के साथ रस्सी कूद रही हैं। बच्चे मैडम से घबराये हुए नहीं हैं, मस्त हैं। हमारे भीतर पहुंचते ही गुड माॅर्निंग मैम का समवेत स्वर आह्लादित करता है। सारे बच्चों को छूने का मन करता है मानो इनको छू भर लेने से कितना कुछ ठीक कर लूंगी अपने भीतर।

अंदर संजीता गैरोला मैडम मिलती हैं। उनकी मुस्कान सफर की सारी थकान कम करने के लिए काफी थी। खुश होती हैं वो कि कोई उनके बच्चों से मिलने आया, इतनी दूर कौन आता है। बातों ही बातों में हम पूछते हैं किस तरह की चुनौतियां आती हैं यहां, वो अपनी मुस्कुराहट के साथ कहती हैं, चुनौती तो कोई नहीं है, न ही कोई समस्या। सब मजे में है। जितने बच्चे गांव में हैं सब स्कूल आते हैं, जितने स्कूल में आते हैं वो लगभग रोज आते हैं। सौ प्रतिशत नामांकन और उपस्थिति होती है। समुदाय के लोग काफी सहयोग करते हैं, हमारी बात को सुनते हैं और समझते हैं। जैसे शुरू में बच्चे नहाकर नहीं आते थे, या नाखून कटे नहीं या नाक बहाते हुए आते थे धीरे-धीरे बच्चों और समुदाय दोनों से बात की और खुद भी बच्चों को सफाई में मदद की अब कोई दिक्कत नहीं। सब बच्चे हमारे बहुत अच्छे हैं। बहुत मन से पढ़ते हैं, सीखते हैं। “हमारे“ शब्द को जिस लरज से संजीता और अनीता मैडम कहती हैं दिल को छू जाता है। हम यह उम्मीद ही कैसे कर सकते हैं कि जिनके मां-बाप दिन भर मजदूरी या किसानी करके लौटते हैं वो बच्चे को घर पर पढ़ायेंगे, यह जिम्मेदारी तो हमारी ही है। संजीता कहती हैं।

अनीता कहती हैं, बच्चों को सबसे पहले खुद पर आत्मविश्वास होना जरूरी है इसके बाद उनके कुछ भी सीखने की गति बढ़ जाती है। बच्चे कक्षाओं में लौट चुके हैं, बच्चे आत्मविश्वास से भरे हैं, बातचीत में शर्माते नहीं। कोई बच्चा अपने दोस्त को अंग्रेजी की कोई कविता सुना रहा है, कोई बच्चा काॅपी में चित्र बना रहा है...जेहन में आने वाले कल का एक सुंदर चित्र सा बनता है...दो कमरे के इस स्कूल में 14 बच्चे हैं। बच्चे कक्षाओं में आ चुके थे और हम उनके समय को चुराना नहीं चाहते थे। सो हम निकले इस वादे के साथ कि जल्द ही फिर लौटेंगे। एक मिनट रुककर शांत मनोरम पहाडि़यों से घिरे स्कूल को आंखों में भर लेना चाहती हूं।

लौटते वक्त बाइक ढलान पर दौड़ रही थी और मन में यह ख्याल कि क्यों जाते हैं लोग मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे...जो सुकून बच्चों की खिलखिलाहटों में हैं वो किस इबादत में है भला। लाओ अपने सारे चढ़ावे, सारी मन्नतें, व्रत, उपवास सब इन स्कूलों को मजबूत बनाने में लगाओ। बच्चों को प्यार करना, समझना, उनके साथ प्यार और सम्मान से पेश आना सीखो। इस देश का भविष्य कैसे न जगमगायेगा फिर। वापसी में मौसम बहुत नर्म हो चला था...

(दो माह पुराना लेख )


Thursday, July 14, 2016

तुम तैयार रहना प्रिये ... वॉल्तेयर



अदबी ख़ुतूत : सातवीं कड़ी 

जैसे-जैसे आसमान मेहरबान हो रहा है, जैसे-जैसे धरती लहक रही है, मोहब्बत की खुशबू बिखरती जा रही है। बारिश की इन बूंदों के बीच किसी के प्यार भरे ख़तों को छूना कोई जादू जगाना सा है अपने भीतर।सैकड़ों बरसों पहले महसूस किए गये कुछ अहसास किस कदर रूमानियत से भर रहे हैं। बाहर पेड़ भीग रहे हैं, सड़कें भीग रही हैं, खेत भीग रहे हैं, पेड़ों की पनाहों में परिंदे भीग रहे हैं भीतर मन भीग रहा है...किसी तलब सा उगता है इश्क का ज़ायका लबों पर...कोई खत खुलता है सामने...


फ्रेंच लेखक, दार्शनिक वॉल्तेयर (1694-1778) ने यह खत अपनी प्रेमिका को जेल से लिखा था।वॉल्तेयर के पिता ने उन्नीस बरस की उम्र में उसे नीदरलैंड में फ्रेंच राजदूत के साथ काम करने की व्यवस्था की। वहीं उसे एक ग्रामीण निर्धन स्त्री की बेटी से इश्क हो गया। उनका यह इश्क न राजदूत महाशय को रास आ रहा था न उस किशोरी की मां को। उन दोनों को अलग रखने की कोशिश में उसे जेल भेज दिया। लेकिन इश्क तो साहब इश्क ठहरा, कौन सी जेल की दीवारें रोक पातीं उसे...सो बहुत जल्द इश्क के कद के आगे जेल की दीवारें बौनी हो गईं और वॉल्तेयर वहां से निकल भागे। उसके बाद उन्होंने जो ख़त अपनी महबूबा को लिखा वो पेशे ख़िदमत है...
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The Hague 1713

प्रिय,
यहां मैं एक कैदी हूं. वो मेरी जिंदगी तो ले सकते हैं लेकिन मेरा प्यार....वो कैसे ले सकते हैं मुझसे? वो भावनाएं जो मैं तुम्हारे लिए महसूस करता हूं...उसे कोई ले सकता है क्या..?

हां मेरी प्यारी, मेरी जान, आज रात मैं तुम्हें देख सकूंगा, चाहे इसके लिए मुझे कुछ भी क्यों न करना पड़े। ख़ुदा के लिए मुझसे उस टूटे हुए लहजे में मत बात करना जो तम्हारे पिछले खतों से महसूस हुआ। तुम्हें जीना है और सावधान रहना है। देखो, तुम्हें अपनी मां से भी सतर्क रहने की जरूरत है। वो तुम्हारी सबसे बड़ी दुश्मन है, अब मैं क्या कहूं प्रिय, असल में तुम्हे हर किसी से सावधान रहने की जरूरत है।

तुम तैयार रहना प्रिये, जैसे ही चांद निकलेगा मैं तुमसे मिलने निकल पड़ूंगा। कोई गाड़ी का प्रबन्ध करूंगा। उसके बाद हम हवा से भी तेज गति से गा़ड़ी चलाते हुए यहां से चले जाएंगे।

अगर तुम मुझे प्रेम करती हो तो खुद को मजबूत करो, अपनी तमाम शक्ति और चेतना को एकत्र करो। ध्यान रहे, तुम्हारी मां को इस बारे में भनक भी नहीं लगनी चाहिए। कोशिश करना कि अपनी कुछ तस्वीरें साथ रख लेना। याद रखो प्रिय दुनिया का कोई भी ज़ुल्म, कोई भी सितम मुझे तुमसे दूर नहीं रख सकता। नहीं, किसी में इतनी शक्ति नहीं कि मुझे तुमसे, तुम्हारे प्यार से दूर कर सके।

हमारा प्यार तो एक वरदान है और हम इसे अंतिम सांस तक जियेंगे। प्रिये, ऐसा कुछ भी नहीं है जो मैं तुम्हारे लिए नहीं कर सकता, लेकिन जो कुछ भी मैं तुम्हारे लिए कर सकता हूं तुम उस सबसे कहीं ज्यादा की हकदार हो...ओह...मेरी जान...मेरा प्यार...

तुम्हारा ही...
वॉल्तेयर

(अनुवाद और प्रस्तुति- प्रतिभा)

Thursday, July 7, 2016

तुम्हारे साथ होना है जीवन में होना... बीथोवन




आज जब हम अपनी भावनाओं को ठीक ठीक महसूस कर पाने से पहले ही पाने प्रिय तक उड़ेल पाने में समर्थ हैं, एक क्लिक पर सात समन्दर पार झट से पहुंचा पाते हैं अपना हाल-ए-दिल उस वक़्त में आइये महसूस करते हैं १८१२ यानि १०४ साल पहले एक प्रेमी की उस पीड़ा को जो अपनी प्रेमिका से दूर है और लम्हा लम्हा उसके लिए तरस रहा है. खतों में खुद को भरसक उड़ेल देने की इच्छा के बावजूद बार बार कुछ बच जाना और फिर-फिर लिखने बैठ जाना...वो आंसू, वो तड़प, वो मिलन की इच्छा और एक अदद ख़त. ये ख़त है सिम्फनी के जादूगर लुडविग बीथोवन का उसकी प्रेमिका के नाम...ख़त तो मिला लेकिन प्रेमिका का नाम नहीं...क्या फर्क पड़ता है...ये एक ही ख़त है जो तीन अलग अलग टुकड़ों में लिखा गया...

अदबी ख़ुतूत : छठवीं कड़ी :

६ जुलाई, 1812 सुबह
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मेरी ख्वाब परी, मेरा खुद का वजूद, आज सिर्फ कुछ शब्द लिखूंगा, वो भी पेन्सिल से. वही तुम्हारी दी हुई पेन्सिल. कल तक मेरा सामान यहाँ से बंध जायेगा. इन सब प्रक्रियाओं में कितना वक़्त जाया जाता है न?

हमारा प्यार क्यों इन सबके बगैर नहीं रह सकता, बिना कोई अपेछा किये, बिना कोई मांग एक दूसरे से किये. क्या इन चीज़ों के बगैर हम महसूस नहीं कर रहे कि किस कदर तुम सिर्फ मेरी हो और मैं सिर्फ तुम्हारा. ओह, यूँ कुदरत की खूबसूरती में डूबते जाना अपने मन मस्तिष्क को एकाग्र कर अनुभूत करना प्रेम. प्रेम अपने इर्द-गिर्द सब कुछ चाहता है, जो कि वाजिब भी है. इसलिए मेरे लिए तुम्हारे होने से ही कुछ भी होने के मायने तय होते हैं, और मैं जानता हूँ कि तुम्हारे लिए भी मेरा साथ कितना ख़ास है. कभी न भूलना प्रिय कि तुम्हारे साथ होना ही जीवन में होना है. तुम्हारे साथ न होने के उस दर्द को तुम समझ सकती हो न, जो मैं सह रहा हूँ इन दिनों?

हमें अब जल्दी ही मिलना चाहिए. देखो न कैसी मुश्किल है कि मैं तुमको वो सब आज नहीं पहुंचा पा रहा हूँ जो मैंने पिछले दिनों जिन्दगी में महसूस किया है, जहाँ मेरा दिल तुम्हारे बेहद करीब था. मेरा अंतर्मन तुम्हें वो एक-एक एहसास देने के लिए बेचैन है. ऐसे कई लम्हे थे जब मैंने तुम्हारी कमी को शिद्दत से महसूस किया. जब मुझे लगा कि मैं कुछ कह नहीं पाऊँगा.

मेरी प्रिय, तुम जानती हो न कि सिर्फ तुम ही मेरी जिन्दगी का अनमोल खजाना हो. जैसे मैं तुम्हारे लिए हूँ. बाकी तो ईश्वर ही जानता है कि उसने हम दोनों के लिए क्या सोचा है...

तुम्हारा वफादार
लुडविग
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सोमवार, शाम, ६ जुलाई

ओ मेरी प्रिय, मैं समझ रहा हूँ कि तुम सह रही हो. अभी मैंने महसूस किया कि ये ख़त मुझे जल्दी से पोस्ट कर देने चाहिए. क्योंकि डाक भी तो सोमवार से गुरुवार के बीच ही निकलती है.

ओह प्रिये, ये क्या जिन्दगी है. कहाँ तुम हो, कहाँ मैं हूँ. तुम मुझमें हो, मैं तुम में हूँ लेकिन हम साथ नहीं. मुझे जल्द ही कुछ करना होगा कि मैं तुम्हारे साथ रह सकूँ.

तो, तुम्हारे बिना...कुछ भी नहीं. जब मैं खुद को इस ब्रह्मांड के बरक्स देखता हूँ तो सोचता हूँ कि कौन हूँ मैं? वो कौन हैं जिसे लोग महान कहते हैं...और फिर...प्रिय सब ईश्वर के बनाये पुतले ही लगते हैं मुझे. यह सोचकर रोना आता है कि तुम मेरे बारे में अब कोई भी खबर शनिवार की सुबह ही पा सकोगी. तुम मुझे जिस तरह बेइंतिहा प्यार करती हो उसके बारे में सोचते हुए मेरा प्यार और...और...और बढ़ता जाता है, मजबूत होता जाता है. अपनी भावनायें कभी मत छुपाना मुझसे.

शुभ रात्रि प्रिय, मैंने अभी अभी पानी पिया है और अब मुझे सो जाना चाहिए. ओह ईश्वर, हम कितने पास, कितने दूर...

तुम्हारा
लुडविग
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७ जुलाई, सुबह

गुड मॉर्निंग प्रिय,

मैं अभी बिस्तर में ही हूँ और तुम्हारे खयालों से घिरा हुआ हूँ. मेरी प्रिये, यहाँ वहां हर जगह तुम ही तुम हो ये सोचकर खुश हूँ, लेकिन फिर उदास भी हो जाता हूँ हमारे बीच की दूरियों के बारे में सोचकर. इंतजार है कब किस्मत हमारी सुनेगी, कब हम साथ होंगे. या तो मैं तुम्हारे साथ रह सकता हूँ या मैं रह ही नहीं सकता. हाँ, अब मैंने फैसला कर लिया है बहुत हुआ इधर उधर भटकना. जब तक मैं तुम्हारी बाँहों में नहीं पहुँच जाता, तुम्हारी बाँहों में अपना घर महसूस नहीं करता मैं अपने भीतर का यह तूफ़ान ख़त में लिखकर तुम्हारे पास भेजता रहूँगा. मेरे ख़त तुम तक मेरे एहसास पहुंचाते रहेंगे और तुमको यकीन दिलाते रहेंगे कि सिर्फ और सिर्फ तुम ही मेरे लिए ज़रूरी हो, मेरी समस्त भावनाएं सिर्फ तुम्हारे लिए हैं. कोई और कभी मेरे दिल तक नहीं पहुँच सकता. कभी नहीं, कभी भी नहीं. हे ईश्वर, क्यों दो प्यार करने वालों को दूर रहना पड़ता है. और यहाँ मेरी जिदंगी..एकदम बिखरी और उलझी हुई

तुम्हारे प्यार ने मुझे दुनिया का सबसे खुश और सबसे उदास व्यक्ति एक ही समय में एक साथ बनाया है. प्रिये मैं चाहता हूँ की यहाँ से रोज डाक निकले और तुम तक रोज एक ख़त मैं पहुंचा सकूँ. अब मैं लिखना बंद करता हूँ ताकि ये ख़त पोस्ट कर सकूँ.

ओह, शांत हो जाओ प्रिये..मुझे प्यार करो...महसूस करो आज...तुमसे मिलने की बेकरारी मेरे आंसुओं में छलक रही है, इसे महसूस करो मेरी जिन्दगी. तुम मेरा सब कुछ हो. मुझे यूँ ही प्यार करती रहो..करती रहो...बगैर मेरे प्यार पे कोई शुबहा किये.

तुम्हारा प्रेमी
लुडविग

(प्रस्तुति- प्रतिभा कटियार)