Wednesday, July 29, 2015

'लव इस नॉट अ च्वाइस'

डू यू लव मी ?
अपनी देह के तमाम घाव बिसरा कर, रेंगकर सूख चुके खून की पपड़ियों के बीच बेहद विश्वास से भर कर वो उससे पूछती है. विश्वास, हाँ यही तो होता है इकलौता सिरा प्रेम का, वो उसकी आँखों में लबालब था.

डू यू लव मी ?
वो फिर से पूछती है. उस पोखर का पानी उसकी आँखों में है जिसमें पांव डाले वो चांदनी रात में एक दूसरे की हथेलियों की लकीरों को बहा दिया था. उस पोखर के भीतर प्रेम का समंदर उमड़ आया था. उस झरने के नमी थी उसकी आवाज में जिसके किनारे किल्लोल करते वक़्त खुद से बिछड़ जाने को बेचैन हो उठी थी वो. अपनी देह के तमाम जख्मों पर वो एक मरहम लेने लौटी थी.
डू यू लव मी ?

वो एक बार फिर पूछती है.प्रेमी का मौन से वो आशंकित है. इस बार उसका सवाल खाली नहीं जाता। वो उसकी आँखों में आँखें डालकर कहता है'नहीं'.
बस अगले ही पल एक गोली वो अपने सीने में उतार लेती है.… 

वो प्रेमी जो उसकी खुशबू के पीछे बौराया फिरता है उसे उसी प्रेम के समंदर वाले पोखर में डुबो देता है. जिसकी साँसों की गर्मी से वो पिघल जाया करता था अब अपनी सांसों को बचाने के लिए उसकी एक एक चीज़ को ठिकाने लगाता फिरता है.… अपनी पत्नी और बच्चे के साथ सामान्य जीवन में लौटना उसकी च्वाइस है. हालाँकि प्रेमिका जानती थी कि'लव इस नॉट अ च्वाइस'....

(दिन में'मसान'के ट्रेलर देखकर ही उस फिल्म को देख पाने की हिम्मत नहीं जुटा पायी सो'बिफोर द रेन्स' देखने लगी. नंदिता दास और राहुल बोस को अरसे बाद स्क्रीन पर देखना अच्छा लगा. लेकिन प्यार के ऐसे अंजाम से दिल उदास भी है. फिल्म के और भी पहलू हैं लेकिन फ़िलहाल तो आसमान में टंगे बादलों और भारी बारिश की चेतावनी के बीच ' बिफोर द रेन्स ' ही आँखों से बरस रही है)

Monday, July 27, 2015

चाय वाकई अच्छी है


जिंदगी अपनी रफ़्तार से चलते-चलते दो कदम पीछे को लौटती है. मुस्कुराती है, निगाह भर देखती है खुला आसमान। उसमे बनने-बिगड़ने वाली आकृतियां। धान के खेतों के बीच से गुजरते हुए उसकी खुशबू को साँसों में जज्ब करते हुए बचपन का जाने कौन सा टुकड़ा स्मृतियों से बाहर आकर खड़ा हो जाता है.

वही छोटी फ्रॉक वाली कोई लड़की, कटोरा भर धान के बदले आइसक्रीम देने वाले भैया की साइकल के पीछे भागती। बच्चों के रेले में अपना छोटा सा गिलास हाथ में लिए भैंस के पास पहुँचने की होड़ में, कि झाग वाला दूध जो भैंस के थन से सीधे गिलास में गिरता है लेने की हड़बड़ी, दूध से मूंछें बनाकर मुस्कुराना। तेज़ गर्मियों से बचने के लिए दादी का पल्लू थामे मिटटी वाले घरों में दोपहर बिताना, दादी के सोते ही चुपके से निकल भागना। चारा काटने वाले मशीन में पूरा लटक जाने के बाद भी उसे हिला तक न पाने की चिड़चिड़ाहट, अमिया चुराने, खेतों से बाकी बच्चों के साथ 'सीला' (खेतों में गिरे अनाज के दाने) बीनना, सर पर अनाज के गठ्ठर को रखकर चलने की ज़िद और फिर एक छोटा सा गठ्ठर रख दिए जाने की ख़ुशी। रस्ते भर गर्दन का लचर पचर हिलना और बाकी लड़कियों का मजाक उड़ाना।

चाची, बुआ जिज्जी के साथ कुँए से पानी लेने जाना। रस्सी डालना और डाँटा जाना कि 'गिर जइहो बिट्टा, नगीचे मत जाओ' कलशी के पानी में गड़प से गिरने की आवाज सुनने को वही कुँए की जगत पे बैठ जाना। घूंघट की आड़ से झांकती मुस्कुराहटों को खिलखिलाहटों में बदलते देखना, ठीक उसी वक़्त सूरज का डूबने के बहाने छू लेना उन तमाम खिलखिलाहटों के रेवड़ को, सुरमई आँखों को. फिर वो एक साथ कई कलशे लेकर लौटता झुण्ड और मेरी जिद पर धर दी जानी छोटी सी कलशी सर पर बहुत कम पानी वाली। चूल्हे पर रोटी बनाना सीखने की ज़िद और हाथ जला लेना, त्योहारों पर जानवरों की पीठ पर रंग के गोले बनाकर सजाना उन्हें, नई घंटी पहनाना। खूब सारा लुका छुपी और कभी छुपे ही रह जाना और बाकी बच्चो का खेल ख़त्म करके घर चले जाना।

बस दो कदम पीछे लौटने पर स्मृतियों की कितनी नाज़ुक परतें खुलती हैं, कि तभी कोई आवाज देता है चाय तैयार है.… मुस्कुराती आँखों से बादलों में छुपे उस सूरज की बदमाशी पर मुस्कुराती हूँ जो मुझ जैसी आलसी को भी सुबह जल्दी उठाकर बुलाता तो है लेकिन बादलों में छुप जाता है.

चाय वाकई अच्छी है, मैं दोस्त से कहती हूँ... ये दिन की अच्छी शुरुआत है.…
(ऊधमसिंह नगर, डायरी )

Monday, July 13, 2015

बारिश, शोर, तन्हाई...


सारी रात सिरहाने बारिश शोर करती रही। अब जबकि रात बीत चुकी है.

महसूस होने के लिए होना जरूरी नहीं होता लेकिन होने के लिए होना ही होता है। बिना हुए महसूस तो हुआ जा सकता है लेकिन हुआ नहीं जा सकता। और जो जगह होने से भरती है वो महसूस करने से नहीं भरती। लेकिन इसके ठीक उलट बिना महसूस हुए होने का भी क्या अर्थ है। कि हथेलियों में हथेलियां हों लकिन कोई जुम्बिश ही न हो। साथ वाली कुर्सी खाली होने पर ज्यादा भरी लगती र्है कई बार और एक साथ दो प्याली चाय पीना भी। अपनी हरारत को अपनी खामोशियों में पीने से बेहतर जीना कोई नहीं। शब्द झूठे हैं कि उनमें कुछ भी नहीं। कुछ भ्रम जिन्हें टूटना ही है एक दिन। महसूस होना टूटता नहीं। कभी-कभी टूटता भी है लेकिन महसूस  होने को होना ही तोड़ सकता है बस।

अजीब बात है कि इंतजार को तोड़ता है इंतजार का टूटना ही। लेकिन शायद इंतजार अपने अस्तित्व में ही खिलने का आदी हो। न होने में होने का सुख बेहतर है, होकर न होने की दुविधा से। इत्ती बड़ी दुनिया में सब तो हैं ही फिर भी कितने तन्हा हैं सब के सब। सच तो यह है कि जिस तनहाई से निकलने की कोशिश में हम हाथ पांव पटकते हैं असल ठौर वहीं है। उसी तनहाई में हमारा केन्द्र है। हमारी जिंदगी के संगीत के सम। जिंदगी के सम से भटककर जिंदगी की लय को तलाश करना फिजूल है।
बारिश इन दिनों मगन होकर नाचती फिर रही है। उसकी लडि़यों को हथेलियों पे लेना अच्छा लगता है लेकिन ऐसा भी लगता है कि इस तरह लडि़यां टूट जाती हैं बारिश की। हर अच्छी लगने वाली चीज की तरफ हाथ बढ़ाने की फितरत भी अजीब है। इस फितरत में बहुत टूटन है


Saturday, July 4, 2015

कॉपीराइट वाली मुस्कान..



लड़का हर शाम उसकी पलकों की जाग को नींद की चादर ओढ़ाकर सुभीते से  विदा लेता। उसके सिरहाने अपनी खुशबू  रखता और बेहद आहिस्ता से रुखसत होता। वो सारी रात चाँद से, बारिश से या हवाओं से गुज़ारिश करता कि लड़की की जाग पर वो जो नींद की चादर ओढ़ाकर आया है, उसे सब मिलकर सहेजे रखें । लड़की की सदियों की जाग का उसके पास कोई उपाय नहीं था,  कुछ प्रयास थे जिन्हें वो करते रहना चाहता था. लड़का कभी उसके सिरहाने सारी रात बैठकर उसे सोते हुए देखना चाहता तो लड़की उसे वापस भेज देती ये कहकर कि ' तुम्हारे होने से तुम्हारे होने का एहसास टूटता है'. लड़का एहसास बचाना ज़रूरी समझता और चला जाता।

लड़की की जाग पर स्मृतियों की पहरेदारी थी. वो नींद की चादर के भीतर करवटें बदलती रहती और स्मृतियों की चुभन को महसूस करती रहती. लड़के की कोशिश नाकाम हुई ये सोचकर उसका दिल न टूटे इसलिए सुबह वो लड़के को अपनी गहरी मुक्कमल नींद का यक़ीन दिलाती।

लड़की को रात को प्यास लगती लेकिन वो अपनी प्यास को नींद की चादर में समेटे रहती। वो अपनी जाग तो समेट सकती थी लेकिन नींद की चादर से बाहर निकलने पर सिरहाने रखी लड़के की खुशबू के बिखरने का जोखिम वो नहीं ले सकती थी.  लड़का हर रोज नींद की चादर ओढाते हुए उसके कान में कहता कि सुबह की पहली किरण से पहले वो उसकी पलकों को अपनी हथेलियो से ढँक लेगा। लड़की उन हथेलियों को अपनी पलकों पर महसूस करने के लिए सारी रात अपनी प्यास को समेटे रहती।

नींद बाहर होती तो ज़रूर आती, नींद तो भीतर थी अधूरी उचटी,  उखड़ी,  बेचैन नींद। हर नींद अपने भीतर इतने किस्से लिए होती कि नींद अपने ही भीतर समाये किस्से सुनने को उठ बैठती। आँखें कड़वी होने लगती लेकिन किस्से खत्म ही न होते।

नाना जी की कहानियों से लम्बे किस्से. दुनिया की सबसे सुन्दर राजकुमारी के किस्से और उस खतरनाक राछस के किस्से। आधी रात तक किस्सों के बीच की हुंकार और  खिंचते जाते किस्से. किस्से ख़त्म नहीं होते, जाने कब.… नींद झरती किस्से की जगह हम  माँ की गोद में लुढक जाते. जाने वो किस्सा सपना थे या नींद। जो भी था लेकिन नाना जी मुस्कुराहट सच्ची थी बिलकुल लड़के के मुस्कुराहट की तरह. उसकी नन्ही सी कोमल सी मुस्कान, जिसके एक सिरे पर कोई झरना ठहरा हुआ मालूम होता और दूसरी तरफ फूलों की घाटी।

लड़की ध्यान से याद करती नाना जी की मुस्कराहट को. जो अक्सर चाय में चीनी कम होने की शिकायत करते वक़्त खिलती थी, या गुलगुले खाने की फरमाइश के वक़्त। लड़की को लड़के की और  नाना जी की मुस्कुराहट एक जैसी लगती।

वो अपनी बात को कन्फर्म करने माँ के पास जा पहुँचती। नाना जी की मुस्कान को कागज पे उतारती और लड़के की मुस्कान को भी. उसे दोनों एक सी लगतीं। नाना जी नींद के लिए किस्सों की चादर ओढाते थे और लड़का अपनी नींद की चादर ओढ़ाकर नए किस्से गढ़ने लगा था.

लड़की अपनी जाग में विचरती थी लेकिन ठीक सुबह की पहली किरण के उगने से पहले नींद पलकों पे रख लेती। उसे अपनी पलकों पर लड़के की हथेलियों की छुअन से जागना इतना अच्छा लगता था कि वो सारी उम्र सोने और जागने के खेल में जिंदगी बिता देना चाहती थी.

कभी हथेलियों की छुअन सूरज की किरण से हार भी जाती थी लेकिन तब वो सूरज की किरण की ओर से मुंह फेरकर तब तक सोयी रहती जब तक लड़के की आहटें उसके कानों तक न आ पहुंचतीं। ये जाग का और नींद का एक खेल था.

एक रोज हथेलियों को पलकों पे महसूस करने के इंतज़ार में दोपहर हो गयी. लड़की उसी नींद की चादर के भीतर अपने दोनों घुटनों के बीच अपना सर फंसाये लेटी रही. कितने बुलावे आये वो नींद की चादर से बाहर न निकली. उसकी पलकें इंतज़ार में थीं. बिना पलकों पर एक छुअन उगे उसका दिन उग ही नहीं सकता था. बुलबुल, मैना, तोता, कबूतर सब आये लेकिन लड़की धुन की पक्की थी और वादे की भी. लड़का जिंदगी के ट्रैफिक जाम में फंसा रहा और लड़की नींद की चादर के भीतर अपनी प्यास में सुलगती रही.

मौसम उसके माथे पर हाथ फेरकर जाते रहे लेकिन लड़की न उठी. मौसम बीते, बरस बीते न लड़की की सुबह हुई न लड़की की नींद की चादर हटी.

एक रोज आषाढ़ की तेज़ बारिश वाली रात में कोई मुसाफिर वहां ठहरने को रुका। किसी ने उसे सोने को जगह तो दे दी लेकिन ताकीद के साथ कि इस घर में नींद नहीं आ सकेगी उसे. मुसाफिर ने कहा उसे नींद नहीं थोड़ी बर्फ चाहिए, उसकी हथेलियों में बहुत जलन है। पडोसी बर्फ लाने गया. मुसाफिर बेसब्र बेचैनी में घर में भटकने लगा. वो किसी गहन पीड़ा में था. बेचैनी में उसने लड़की की नींद की चादर खींच ली और उसे कहा मुझे बर्फ चाहिए। बहुत जलन हो रही है. लड़की अपनी उनींदी जाग में बुदबुदाई प्यास.... मुसाफिर  ने बिना उसकी और देखे उसे जगाने के लिए उसकी पलकों को छुआ.

लड़की ने आँखें खोलीं, 'कितनी देर कर दी तुमने आने में',

नींद की उस उधड़ी चादर के बीच लड़की की प्यास टूट चुकी थी. लड़की ने पलकों पर उस छुअन को महसूस किया, मुस्कुराई और बुदबुदाई नाना जी की मुस्कान बहुत अच्छी थी, तुम्हारी तरह. एक बार मुस्कुराओ न, आषाढ़ की मूसलाधार बारिश के बीच उस मुसाफिर लड़के ने भीगी हुई पलकों से मुस्कुराते हुए कहा, कितने बरस हुए मुस्कुराये। लड़की ने अपने प्यासे  होंठों पर पानी की बूँद महसूस की. लड़के ने अपनी हथेलियों की जलन कम होते महसूस की.

जिंदगी का ट्रैफिक जाम अब भी वैसा ही था, लेकिन लड़का सारे  ट्रैफिक सिग्नल तोड़ चुका था. लड़की एक गहरी नींद में जा चुकी थी लड़का एक लम्बी जाग में उसके सिरहाने मुस्तैद था.…

नाना जी की मुस्कान पे लड़की का कॉपीराइट अब भी था।

Friday, July 3, 2015

तुम्हारी मनमर्जियां मेरी अमानत हैं...


मेरे पल्लू के कोने में
नहीं बंधी है कोई नसीहत
तुझे देने को मेरी लाडो

विरासत में मिली
संस्कारों और रीति रिवाजों वाली भारी भरकम ओढनी को
मैंने संदूक में संभालकर नहीं रखा था
उसे तार-तार करके फेंक आई थी
बहत दूर
कि उसके बोझ से मुझे ही नहीं
समूची धरती को मुक्ति चाहिए थी

कोई हिदायत नहीं मेरी मुठ्ठियों में
तुम्हारे लिए
न नियम कोई , न ताकीद
कि अपने नियम तुम खुद बनाओ
कोई रास्ता नहीं बताऊँगी मैं तुम्हें
कि इस पर चलो और इस पर न चलो
अपना सही और गलत खुद तुम तय करो

मजबूती से करो प्रतिवाद
अपने से बड़ों से भी
कि उम्र में बड़ा होना
नहीं होता बड़ा होना

तुम्हारे गिरने पर संभाल लूंगी दौड़ के
ऐसा कोई वादा नहीं है मेरे पास
तुम्हारे लिए
लपक कर तुम्हें चूम लेने की
अपने सीने में समेट लेने की
पलकों में छुपा लेने की हसरत को
भींच लिया है मैंने अपने ही भीतर
सहना, हरगिज नहीं
जरा भी नहीं
जिंदगी सहने का नहीं
जीने का नाम है
घूरकर देखना इस तरह कि
हिमाक़त करने वाले
सोचने से भी बाज़ आये हिमाकतों के बारे में

शर्म, संकोच, विनम्रता, मधुरता ये शब्द हैं मात्र
इन्हें सिर्फ विवेक से हांकना मेरे लाडो
कि विनम्रता कोई संजीवनी बूटी भी नहीं
मत फ़िक्र करना किसी के कहने सुनने की
कि तुम्हारी मनमर्जियां मेरी अमानत हैं

जानती हूँ दिल तोड़ना हम स्त्रियों को नहीं आता
पर अपना दिल टूटने से बचाना भी होगा

तुम्हारी माँ के पास कुछ भी नहीं
तुम्हें देने को
सिवाय इसके कि
वो तुम्हारे क़दमों की ताक़त है
तुम्हारे पंखों की जुम्बिश
तुम्हारे खुद पर किये गए यकीन का ऐतमाद
तुम्हारे प्रतिवाद का स्वर की खनक
कभी कुछ भी गलत न सहने की हिम्मत
नाइंसाफ़ियों के मुंह पर तुम्हारा जड़ा हुआ तमाचा
तुम्हारी तमाम आवारगी में तुम्हारा साया
खिलखिलाहटों पे नज़र का काला टीका...

Wednesday, July 1, 2015

जब बारिशें आएं तो...



जब बारिशें आएं तो रेनकोट और छतरियों को पर धकेल देना, तमाम नसीहतों को दीवार की खूँटी पे टांग देना, निकल पड़ना बारिश के संग बरसे फूलों से भरी सड़क की ओर. घने बनास के जंगल टोकरियों में भरे भरे बादल लिए खड़े मिलेंगे, उन बादलों की नाक पर ऊँगली रखकर पूछना ज़रूर कि , 'आप कैसे हैं जनाब?' उनके जवाब के इंतज़ार में ठिठकना मत कि कुछ सवाल जवाब के लिए होते भी नहीं, शरारत भर होते हैं बस. कोई नदी मिलेगी राह में उफनाती, गले लगाने को बेताब, उतार लेना उस नदी को अपने भीतर, उसके भीतर उतरने की तुम्हें न चाह होगी न ज़रुरत। 

कोई आवाज़ मिलेगी भीगी सी, प्यार में डूबी, और कहना कुछ भी बेकार है जानां कि तब रुकने से रोक न सकोगे तुम खुद को. और अपनी इस भूल के बदले जीवन भर आसमान से बरसती बूँदें तुम्हें जलाएंगी। ये ही तुम्हारे इश्क़ का ईनाम होगा। 

हर बूँद के सीने में आंच होती है और हर लौ के सीने में नमी....