Wednesday, February 18, 2015

जब हम पहली बार मिले थे....



जब हम पहली बार मिले थे
खूब बारिश हो रही थी
हालाँकि धूप कहीं गयी नहीं थी
लेकिन बारिश हो रही थी

मैं भीगना चाहती थी
लेकिन भीगने से बच रही थी
तुम भीगना नहीं चाहते थे
लेकिन मुझे भीगने से बचाने की खातिर
तुम भीग रहे थे
हालाँकि एक सूखा रेनकोट
हमारे दरम्यान था
मुस्कुराता हुआ

जब हम पहली बार मिले थे
आस-पास गाड़ियों का शोर था
हालाँकि एक गहरा सन्नाटा था
हमारे दरम्यान
मैं कितना बोल रही थी
जाने क्या- क्या, जाने कहाँ कहाँ की
हालाँकि उस बोलने में
मैं अपनी चुप्पी सहेज रही थी
और अपने बोलों से
तुम्हारा मौन भी गढ़ रही थी

आखिर हम
बोलने से बचा लाये थे
सबसे खूबसूरत शब्द

जब हम पहली बार मिले थे
समंदर पर बरस रही थीं उम्मीदें
और पेड़ की शाखों पर
बरस रही थी बर्फ
वादियों में कोई धुन बरस रही थी
और ज़ेहन के दरीचे में
बरस रही थी रौशनी
हालाँकि बाहर अँधेरा बरस रहा था

जब हम पहली बार मिले थे....


पाकीज़ा सी एक याद सिनेमा की.…


स्मृतियों का कुछ पता नहीं कब किस गली का फेरा लगाने पहुंच जायें और जाने क्या-क्या न खंगालने लगें। ऐसे ही एक रोज सिनेमा की बात चली तो वो बात जा पहुंची बचपन की उन गलियों में जहां यह तक दर्ज नहीं कि पहली फिल्म कौन थी। भले ही न दर्ज हो किसी फिल्म का नाम लेकिन सिनेमा की किसी रील की तरह मेरी जिंदगी में सिनेमा की आमद, बसावट और उससे मुझ पर पड़े असर के न जाने कितने पन्ने फड़फडाने लगे।

महबूब सी आमद-
कनखियों से इधर-उधर देखता, छुपते-छुपाते, सहमते हुए डरते हुए से दाखिल हुआ सिनेमा जिंदगी में। मैंने भी डरते-डरते ही उसकी ओर देखा, और हाथ बढ़ा दिया। कैसी तो शिद्दत होती थी कयामत से कयामत टाइप फिल्मों की...जैसे नशा कोई...कोई कैसे बचता भला...आखिर प्यार हो ही गया।
लेकिन 'कयामत से कयामत' तक से पहले भी कुछ फिल्में गिरी थीं जेहन के आंगन में। अर्थ, कथा, अर्ध सत्य, सारांश, अंकुर जैसी फिल्में ही याद रह पाईं...यह बेलटेक के ब्लैक एंड व्हाइट टीवी पर देखी गई फिल्में थीं। दूरदर्शन का तोहफा। उस वक्त इन फिल्मों में क्या समझ में आता था यह तो पता नहीं लेकिन याद यही रह गई हैं...हालांकि उस बुद्धू बक्से पर कुछ भी चलते-फिरते देखने के मोह में देखा तो बहुत कुछ होगा यकीनन। ये वो वक्त था जब विज्ञापन देखने के लिए भी इंतजार होता था। शाम को दूरदर्शन खुलने के वक्त की धुन भी अच्छी लगती थी। कृषि दर्शन भी देख ही लिया जाता था कि शायद कोई लोक गीत आ जायेगा कुछ देर में। आज के जमाने के बच्चों को यह सब अजीब लग सकता है कि बुधवार को चित्रहार देखने को कैसे पूरा मोहल्ला जमा होता था और इतवार की फिल्म देखने को कैसी महफिल सजती थी। कौन सी फिल्म है, किसकी है इससे कोई खास सरोकार नहीं बस कि फिल्म है।

पाकीजा सी वो याद-
पापा सूचना अधिकारी थे। हम सरकारी आवास में रहते थे। आॅफिस और घर एक ही बिल्डिंग में। इसके चलते भी बचपन में काफी बदलाव आते गये। उनमें से एक बदलाव था लाइब्रेरी को प्ले हाउस बना पाने का, यानी गुड्डे गुडि़यों से खेलने की बजाय दुनिया भर के साहित्य से खेलना शुरू हो गया था दूसरे सिनेमा भी मुहैयया था। हर शनिवार पापा सार्वजनिक फिल्म शो करवाते थे। जाहिर है हम भी देखते ही थे। चूंकि लाइब्रेरी में सीमित फिल्में थीं ज्यादातर डाक्यूमेंटी फिल्में थीं बोर किस्म की तो जो भी रंगीन हिंदी फीचर फिल्में मौजूद थीं उन्हें बार-बार देखा। पाकीजा उन्हीं में से एक थी। एक-एक डाॅयलाॅग याद हो चुका था। मीना कुमारी का हाथ किस संवाद में कितने आराम से उठेगा और कितने सेकेंड में वो अपना चेहरा जरा सा घुमायेंगी सब रट सा गया था। यह भी कि किस जगह पर रील अटकती है और किस गाने के आखिर में गोली चलती है।

तब तो पता नहीं था लेकिन बाद में जब दोस्त मजाक में कहने लगे कि तुमको मीना कुमारी सिंड्रोम तो नहीं तो यक-ब-यक पाकीजा ही याद आती है।

एक रात तीन फिल्में-
स्कूल के दिन थे, वो जब वीसीआर लगवाकर फिल्में देखने का रिवाज शुरू हुआ था। एक रात में तीन फिल्में। शादियों में यह विशेष आकर्षण हुआ करता था। लोग खुश होकर बताते थे कि वीडियो आया है बारात में। कयामत से कयामत तक, शहंशाह, मैंने प्यार किया ये सब फिल्में वीडियो पर देखी गईं। अब तक सिनेमा अपने व्यापक फलक और मनोरंजन की ताकत से खींच तो रहा था लेकिन वो फिल्में जो मनोरंजन तो शायद नहीं करती थीं फिर भी दिमाग में अपने असर छोड़ती जाती थीं। मनोरंजन भी खंीचता ही था आखिर अंगूर, गोलमाल, चुपके-चुपके, जाने भी दो यारो...कोई भूल सकता है क्या।

जादू जो चले नहीं-
मेरे भीतर का सिनेमा प्रेम कितना गहन है यह तो अब तक पता नहीं है लेकिन हम आपके हैं कौन को लेकर जो हंगामा बरपा हुआ था, उसने अभिभूत नहीं किया था यह याद है। जबकि सीतापुर के मेले में टूरिन टाकीज में जमीन पर बैठकर देखी गई नदिया के पार की खुशबू जे़हन में ताजा ही थी। दीदी तेरा देवर दीवाना का जादू चारो ओर छाया हुआ था, जाने क्यों मुझ पर ही नहीं चल पा रहा था हालांकि माधुरी दीक्षित मुझेे तब भी पसंद थी अब भी पसंद है। हम आपके हैं कौन उन फिल्मों में से है जो हाॅल में देखी गई फिल्मों में पहली स्मृति के तौर पर दर्ज हुई। मोहल्ले की बहुत सारी आंटियां, दीदियां एक साथ देखने गयी थीं। अपने घर से सिनेमा हाॅल तक पैदल। लखनऊ के नाॅवेल्टी सिनेमा हाॅल में इस फिल्म के जाने कितने रिकाॅर्ड दर्ज हुए। साडि़यों, गहनों, बारात, शादी गाने, अंताक्षरी का कोलाज यह फिल्म जादुई नशा कर रही थी उस वक्त।

उसके बाद दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे...यह फिल्म मेरे जे़़हन में करवाचैथ के ग्लैमराइजेशन के तौर पर दर्ज है। और यह डायलाॅग कि इंगेजमेंट रिंग वाली उंगली की नस सीधे दिल से जुड़ती है। कितना सच कितना झूठ पता नहीं। शाहरुख का जादू टीवी सीरियल फौजी और सर्कस के बाद चक दे इंडिया और स्वदेश फिल्मों तक ही सिमटा रहा शायद इसलिए घनघोर रूमान लिए यह फिल्म भी कुछ खास कर न सकी मेरे तई। हालांकि काजोल तब भी पसंद थी अब भी पसंद है। इस फिल्म में सिमरन की मां का किरदार याद रह गया। मनोरंजन भरपूर होने के बाद भी जेहन में ठहरा नहीं ये सिनेमाई इश्क। दरवाजे पर घंटी लगाना मुझे बहुत पसंद है, शायद वो भी इसी फिल्म के अच्छे लगने से जुड़ा हो।

वो पहली बार-
अब तक सिनेमा परिवार का हाथ पकड़कर बाकायदा प्लान बनाकर देखने का नाम ही हुआ करता था। सिनेमा हाॅल में पहली ऐसी फिल्म जिसे बिना घर में बताये, पूछे काॅलेज से बंक मारकर ढेर सारी सहेलियों ने एक साथ देखी, वो थी 1942 अ लव स्टोरी। लखनऊ का हजरतगंज, साहू सिनेमा। हम करीब दर्जन भर लड़कियां साथ में थीं, लेकिन सब खुसुर-फुसुर करती हुई। अंदर-अंदर डरी हुई और ऊपर से मजबूत दिखती हुई। टिकट कौन ले...तू ले तू ले...कहीं कोई जानने वाला न मिल जाये यह भी डर, लेकिन पहली बार इस तरह फिल्म देखने का रोमांच भी। यह फिल्म कई मायनों में बतौर फिल्म दर्ज हुई स्मृतियों में। 17-18 बरस की उम्र में प्यार हुआ चुपके से सुनने का रूमान जेहन पर काबिज हो रहा था। इसी फिल्म के साथ अनिल कपूर अपना हीरो हो गया। ये सफर बहुत है कठिन मगर न उदास हो मेरे हमसफर...पता नहीं फिल्म में क्या था कि एक ही बार में अपना बना लिया था इसने। मेरी बहुत सी दोस्तों को नहीं भी अच्छी लगी थी फिल्म। पहली बार अकेले, काॅलेज बंक करके घर में बिना बताये फिल्म देखने के रोमांच को समेटे जब घर लौटी तो घर में किसी का न होना बहुत अच्छा लगा। कैसेट रिकाॅर्डर पर रिपीट में फिल्म के गाने सुने...चाय पी और मनीषा कोईराला और अनिल कपूर को याद किया।

यह इस रूप में भी पहली फिल्म थी कि फिल्म की कहानी में दिमाग बार-बार उलझ रहा था। अब फिल्म के तमाम पक्षों पर सोच पाना संभव हो पा रहा था। सिनेमा सिर्फ मनोरंजन भर होने की हद के पार जा चुका था।

काॅलेज कैम्पस और हाय मेरा हीरो-
सिनेमा अपनी पर्तों के साथ खुल रहा था। अब हम काॅलेज में फिल्मों पर उन की कहानियों पर चर्चा करते थे। हालांकि ज्यादातर चर्चाओं में ज्यादा समय शाहरुख खान, सलमान की चहेतियां हाय, ही इज सो क्यूट के चक्कर में धम्म से गिर पड़ती थीं फिर भी जे़हन में उथल-पुथल शुरू हो चुकी थी। मैं देखती थी कि काॅलेज में फिल्मों का काफी असर था। टीवी का भी। अक्सर काॅलेज के कैम्पस या कैंटीन ब्वाॅयफ्रेंड के झूठे-सच्चे किस्सों या शाहरुख, सलमान के लुक्स की चर्चा से उफनाये रहते थे। यहीं से हम आॅड मैन आउट फील करना शुरू कर चुके थे। दोस्तों को लगता था कि मुझमें ही कोई दिक्कत है जो सबको पसंद है वो मुझे पसंद क्यों नहीं...और उनका वो लगना अब तक कायम है।

हालांकि जिस वक्त हाय मेरा हीरो वाला दौर सहेलियों में भयंकर उफान पर था तो मैं भी सोचती थी अक्सर कि मेरा फेवरेट हीरो कौन है...और जाने कैसे शेखर कपूर का चेहरा ही आंखों के आगे घूम जाता था। शायद स्कूल के दिनों में देखे गये धारावाहिक उड़ान के उस डीएम सीतापुर का नशा चढ़ गया था। शेखर कपूर अब भी मेरे पसंदीदा हैं....बतौर हीरो भी और निर्देशक भी।

फिल्मची दोस्त की संगत-
इस बीच ज्योति से दोस्ती हो चुकी थी। वो बड़ी फिल्मची ठहरी। जाने क्या-क्या तो उसे पता होता था। अब सिनेमा का दूसरा ही संसार खुलने लगा था, काॅमर्शियल सिनेमा, पैरेलल सिनेमा, हाॅलीवुड, ईरानी फिल्मों का, जापानी फिल्मों का संसार, मराठी, बंगाली फिल्मों का संसार...बहुत सी फिल्में उसने हाथ पकड़कर खींच के दिर्खाईं बीच-बीच में समझाते हुए...कितनी ही ग्रे फिल्में देखते वक्त वो मेरा हाथ भी थामती और डांटती भी कि देखो चुपचाप. हालांकि जिन फिल्मों को देखकर बाहर निकलते हुए यह संकोच खाए जाता था कि कोई जानने वाला दिख न जाए....उन्हीं पर बाद में लेख लिखना, बहसें करना अच्छा भी लगता था। यह सिनेमा के संसार में शायद ग्रो करना था। मुझे याद है बैंडिट क्वीन देखने के बाद महीनों एक भयावहता घेरे रही थी।

वो तंग पाॅकेट और सिनेमा की भूख और बहानेबाजियां-
सिनेमा अब सिनेमा हाॅल में देखने में ही अच्छा लगता था और पाॅकेट मुंह फाड़े खड़े रहती थी। इसका तोड़ निकाला हमने माॅर्निंग शो। सुबह-सुबह साढ़े नौ बजे फिल्म देखने के लिए बिना नाश्ता किए हुआ भागना। आखिर दस रुपये का टिकट जो होता था। दूसरी मुश्किल होती थी घर में मां को क्या बताया जायेगा। मां बहुत स्टिक्ट थीं। फिल्म देखना उनके लिए एकदम फालतू काम तब भी था अब भी है....तो उनसे झूठ बोलने की हिम्मत...सही बहाना बनाने का दिमाग दोनों नहीं थे अपने पास। तो यह ठीकरा भी दोस्तों के सर...आंटी...एक जरूरी सेमिनार है...प्रतिभा को ले जाएं...टाइप बहाने। बाद में लगने लगा काॅलेज बंक करना आसान आॅप्शन है घर में मां से झूठ बोलने के मुकाबले...बहरहाल, बहाने भी चलते रहे और फिल्में भी देखी जाती रहीं।
आता न जाता बने फिल्म समीक्षक-
एक दिलचस्प किस्सा जरूरी है, कि किस तरह मेरे जैसे अनाड़ी को अखबार ज्वाइन करते ही फिल्मों की समीक्षा की जिम्मेदारी दे दी गई। आजकल के ट्रेनी तो काफी अपडेट रहते हैं मेरे जैसी लड़की...फिल्म समीक्षा करने चल पड़ी। फस्र्ट डे फस्र्ट शो बड़ा मजा आता था। पहली समीक्षा लिखी और फिल्म को खूब पानी पी पीकर कोसा...दूसरी में भी...तीसरी में भी...जल्दी ही यह मेरा और एडीटर दोनों का सरदर्द होने लगा। एडीटर जो कहना चाहते थे वो सीधे कह नहीं सकते थे कि इस तरह आलोचना मत करो भाई, फिल्म समीक्षा फिल्म प्रमोशन के लिए भी करवाई जाती है, और मेरी दिक्कत ये कि कैसी-कैसी फिल्में झेलनी पड़ती हैं...बाद में इस बात की गंभीरता भी समझ में आई कि क्यों अक्सर अखबारी फिल्मी समीक्षाएं गड़बड़ होती हैं क्योंकि एक बेहद गंभीर काम को बेहद हल्का जो समझ लिया जाता है।
जरूर मेरे ही भीतर कोई कैमिकल लोचा है कि अब तक अगर एक आध अपवाद को छोड़ दें तो मार्केट में धूम मचाती फिल्मों का रुख करना अक्सर सजा सी मालूम होती है अब तक।

बदलता सिनेमा बदलता समाज-
ब्लैक एंड व्हाइट टीवी के जरिये सिनेमा के संसार से जुड़ने के बाद से संसार और सिनेमा के संसार में बहुत अंतर आते देखा है। फिल्ममेकर्स में भी बदलाव आते देखा है, दर्शकों में भी। आस्था, क्या कहना, जैसी फिल्मों पर दर्शकों का गुस्सा, सरोगेट मदर जैसे मुद्दों पर बनी फिल्मों को नकार दिया जाना, हम दिल दे चुके सनम तक मंगलसूत्र के महिमामंडन में फंसी फिल्मों का कभी अलविदा न कहना से बाहर आना, इस सच तक भी कि किसी से प्यार न होने के लिए उसका बुरा होना जरूरी नहंीं, किसी से प्यार होने के लिए उसका बहुत अच्छा होना और पति होना, कुंवारा होना जरूरी नहीं...

नये संसार में खुलती खिड़कियां-
इस बीच मुझ जैसी अनाड़ी लड़की को हिंदी ब्लाॅग जगत का पता मिला। वहां से साहित्य और सिनेमा के संसार की तमाम खिाडकियां खुलीं। बना रहे बनारस ने बहुत सारी फिल्मों के पते दिये, उन पर आये लेखों ने फिल्मों को देखने की नज़र भी दी। नये-नये दोस्तों ने कई देशों की, भाषाओं की फिल्मों से दोस्ती करायी, अब तोहफे में फिल्में मिलने लगी थीं और गुरु दत्त, श्याम बेनगल, मणिरत्नम, मझााल सेन, रितुपर्णो घोष, रित्विक घटक, सत्यजीत रे, बिमल राॅय, बासु भट्टाचार्या के अलावा अब्बास किरोस्तामी, जफर पनाही, माजिद मजीदी, अकीरा कुरोसावा, आन्द्रेई तारकोवस्की के नाम का संसार भी खुलने लगा था।
अनुराग कश्यप, विशाल भारद्वाज के अलावा जहां भी कुछ नया गढ़ा जा रहा था वहां पहुंचना अच्छा लगने लगा है अब। करन जौहर, रोहित शेट्टी वगैरह आते हैं गुदगुदाते हैं गुजर जाते हैं लेकिन कोई खोज जारी रहती है। फेसबुक पर कोई स्टेटस देखकर टैगोर की कहानी पर बनी कश्मकश ढूंढती हूं, देखती हूं या फिर कोई डाक्यूमेंटरी....

इंटरनेट का संसार आज सामने लहरा रहा है...जिन खोजा तिन पाइयां...कितना कुछ ढूंढा...पाया...ढूंढ रही हूं और हर दिन महसूस होता है कि दुनिया भर के सिनेमा के जादुई संसार में कितना कुछ रचा जा चुका है, चंद बूंदें ही समेट पाई हूं बस....जितनी बूंदें समेटती हूं उतनी ही प्यास बढ़ती जाती है सिनेमा की...लेकिन एक बात तो तय है कि मैं पहली दर्शक हिंदी सिनेमा की ही हूं....




Friday, February 13, 2015

प्यार हम अपना लुटा देंगे...तुम आओ तो सही...

ये किसकी आहटों से धरती सज गई है...किसने अपना दुपट्टा ऊंचे आसमान में लहराकर किया है अपने प्रेम का ऐलान, किसने अपने मौन में छुपा रखी है अपनी शदीद निष्ठा, किसने सारे वादों की गिरहें खोल दी हैं बस प्रेम की गिरह को थाम रखा है।

किसके होने से मौसम सारे निखरने लगे हैं, सुबहें मुस्कुराती हुई दाखिल होती हैं, और जाने को राजी ही नहीं होती। किसके प्रेम की ऊष्मा से पिघल जाती हैं तमाम मीठी सी नाराजगियां भी और किसको गले लगाने को बेताब है समूची कायनात...किसने प्रेम के इस दिन को चुना धरती पर आने का और दुनिया के कोने-कोने में प्रेम बनकर बरस जाने का...किसकी आमद में फिज़ाओं में रंग भर उठे हैं, ये कौन है जो कोयल की कूक में चहक रहा है, आम की बौर में महक रहा है।

मोहब्बत की नज़्म बनकर हम सबकी गुनगुनाहटों में ढली, हमारे इंतजार में रची-बसी प्यारी अदिति...रहने दो लंदन को यह भरम कि तुम वहां रहती हो, तुम भी जानती हो कि तुम हम सबके दिल में रहती हो...आज तुम्हारे जन्मदिन पर ढेर सारी शुभकामनाएं, प्यार, दुलार, आशीर्वाद देते हुए बहुत खुश हूं कि जिंदगी में तो तुम पहले ही आ चुकी हो कुछ ही दिनों में घर में भी आ जाओगी एक प्यारे से रिश्ते में बंधकर...

तुमको हम दिल में बसा लेंगे...तुम आओ तो सही... सुनते हुए चित्रा जी की आवाज़ सोचती हूं कि दिल में तो हम कबका बसा ही चुके हैं...

प्यार हम अपना लुटा देंगे तुम आओ तो सही,
ख्वाब के थाल सजा देंगे तुम आओ तो सही...

हैप्पी बर्थ डे, हैप्पी वैलेन्टाइन डे प्यारी अदिति!

आखिर ये किसका प्यार हैं...


ये किसके विरह में
जल उठे हैं पलाश के जंगल

ये किसकी उदासियों पर डाल देते हैं
शोख रंगों की चूनर

किसके इंतजार की खुशबू में
महकते रहते हैं दिन-रात

किसकी तलाश में
गुम रहते हैं बरसों बरस

आखिर किसकी मुस्कुराहटों का
इन्हें इंतजार है...

आखिर ये किसका प्यार हैं...


Thursday, February 12, 2015

घायल रूह पर बसंत के फाहे...


सबसे सख्त वक़्त में सबसे नाज़ुक एहसासों को सहेजना जरूरी होता है। यह बात या तो कुदरत को पता है या स्त्री को। सो दोनों पूरी शिद्दत से सहेजे हुए हैं बसंत...
कहना...कहना...कहना...सिर्फ कहना। चारों तरफ एक शोर सा बरपा है। हर कोई कुछ कह रहा है। कुछ नहीं बहुत कुछ. सुन कौन रहा है पता नहीं, लेकिन कहे जाने का शोर बरपा है....किताबों की आमदों का शोर, सियासत का शोर और तो और सम्मान पुरुस्कार भी शोर मचा रहे हैं...इन सब शोर से बहुत दूर अगर कोई प्रेम के तराने गा रहा है तो वो है बसंत...यूं जब देश तमाम तरह की सियासी सरगर्मियों में उलझा हो ऐसे में प्रेम के तराने गाने वाले बसंत की बात कुछ बेमौसम बरसात सी लग सकती है लेकिन यकीन मानिए ऐसे ही वक्त में यह बात बेहद लाजि़म है...

लाजि़म है कि सख्त मौसम में रानाइयों की बात हो...शायद इसीलिए लहलहाते पीले फूलों वाले खेतों के आसमान पर सतरंगी दुपट्टे लहराते नज़र आ रहे हैं...ओस की बूंदें खुद तराने गा रही हैं। सबसे सख्त वक्त में सबसे नाज़ुक एहसासों को सहेजना जरूरी होता है। यह बात या तो कुदरत को पता है या स्त्री को। सो दोनों पूरी शिद्दत से सहेजे हुए हुए हैं बसंत...

बसंत जिसकी आहटों ने समूची धरती पर मुस्कुराहटें बिखेर दी हैं... जिसने सूरज की किरनों में मोहब्बत की रोशनी घोल दी है... जिसकी आमद के इस्तेकबाल में समूची कायनात सजदे में झुकी हुई है... जो घायल जिस्मों और रूहों पर अपने एहसास के फाहे रखता है...

वो पलकें बंद करके अपने चेहरे पर अपनी उंगलियां फिराती है...उसे अपने कंधे पर कोई स्पर्श महसूस होता है। मद्धम मुस्कुराहटों के बीच से उठकर वो अपना कंधा टटोलती है...पलाश...मुस्कुराता मिलता है। बसंत की शरारत, पलाश...।

सरसों के फूलों वाली पीली चूनर को सर से ओढ़ते हुए वो चुपके से बुदबुदाती है तुम बाज नहीं आओगे...वो हंसते हुए उसकी पीली चुनर की किनारी पकड़कर साथ चल पड़ता है। धरती की हर स्त्री प्रेयसी है उसकी...। धरती का हर कोना उनके प्रेम की गमक में डूबा हुआ है।

सचमुच, धरती की समस्त स्त्रियां बसंत की प्रेयसियां हैं। शदीद मोहब्बत से भरी, छलकती हुई, बहकती हुई, महकती हुई...और ये कम्बख्त बसंत हजार नखरे करता है, इतराता है। आता है पलाश में ढलकर, चांद रातों के साथ नदी में बहते हुए किसी के आंचल में टिक जाने को, किसी के जे़हन में टंक जाने को।
कितनी मासूम सी है यह अनभिज्ञता कि हम बसंत को कैलंेंडर के पन्नों में तलाशते फिरते हैं। उसके आने को तलाशते हैं गेहूं की कच्ची बालियों में, पीली सरसों में, आम की बौर में...

पलाश के पेड़ के नीचे बैठकर फूलों के खिलने के इंतजार में अब स्त्री नेे अपनी तलाश को रखना छोड़ दिया है। वो समझ चुकी है कि दरअसल, बाहर का यह बसंत तो उसके भीतर की ही चमक है, ख्वाहिश है, आरजू है, हौसला है, मोहब्बत है...कि जब वो झूम के मुस्कुराती है तो यह धरती फूलों से भर उठती है। स्त्री और प्रेम एक-दूसरे के पूरक हैं। बसंत का आना तो सिर्फ एक बहाना है।

प्रेम का जीवन में होना ही है असल में बसंत का होना...और बिना प्रेम के भी कोई जीवन हुआ भला। ये बासंती बयार, ये ये गुनगुनी धूप, ये मौसम की लरज...ये उल्लास हमारे भीतर के बसंत का उत्सव है। कुदरत हमारे भीतर के मौसमों के आगे सजदा करती हुए अपनी शाखें झुका देती है। कि अचानक आसमान पांव तले आ जाता है...और धरती पर फूल ही फूल खिल उठते हैं...मुस्कुराहटों के फूल...दुनिया इसे बसंत का आना कहती है...स्त्रियां इसे प्रेम का उत्सव कहती हैं।
कहां, थे तुम इत्ते दिन...अब वो नहीं कहतीं ऐसा कि वो जानती हैं कि बसंत कहीं नहीं जाता, हमेशा हमारे भीतर पैबस्त रहता है। बस कि ये उसके उत्सव का समय है...और इस उत्सव के सारे साजो-सामान इकट्ठा किए हैं कुदरत ने। रंग सारे प्यार के, सुर सारे मनूहार के, रूप दमकता हुआ, नदियों के पानी में आईना देखकर मुस्कुराती, खिलखिलाती अल्हड़ हसीनाएं किसी व्यक्ति के होने न होने से बेजार बस कि प्रेम में डूबी दिन-रात। कभी सूरज को बिंदियां बनाकर लगातीं, कभी बदली का घूंघट ओढ़ती, कभी खिलखिलाते हुए अपने दुपट्टे जोर से हवा में उड़ा देतीं तो आसमान सतरंगी हो उठता...किसी परचम से लहराते उन दुपट्टों पर लिखा होता
प्रेम...यह खुद को शिद्दत से महसूस करने का, अपने आपको छू लेने का वक्त है...अपने प्रेम को अंजुरियों में भर-भरकर उछालने का मौसम हैं....मोहब्बत जर्रे-जर्रे में सांस ले रही है...उन आफताब हुए जर्रों को गले लगाने का मौसम है...

यह असल में कुदरत का सजदा प्रेम के लिए...स्त्री के लिए...बसंत स्त्री के कंधे से टिककर इठला रहा है. जबसे स्त्रियों ने जान लिया है कि प्रेम न कहीं से आता है, न कहीं जाता है वो तो शाश्वत उनके भीतर सांस लेता है...लेता ही रहता है...तबसे दुःख, अवसाद, पीड़ा, विरह सबने अपनी पोटली बांध ली है...इंतज़ार शब्द अब ऊंघने लगा है कि जो कहीं जाता ही नहीं उसका इंतजार कैसा...

चौराहों पर फागुन की आमद के इंतजामात किये जा रहे हैं....बच्चों की खिलखिलाहटों से गलियां, चैबारे, काॅलोनियां गुलज़ार हैं...कि अभी-अभी एक बदली का टुकड़ा गुजरा है बालकनी से होकर... किसी हसीना ने आंखों में काजल लगाया है...उफफफ....कितनी खुशबू बिखरी है चारों ओर...मोहब्बत की खुशबू...ओ रे बसंत...तू अब कहीं नहीं जा सकता...कि तुझे हमने अपने भीतर सहेज जो रखा है...सुना तूने?

(डेली न्यूज़ खुशबू में प्रकाशित )


Wednesday, February 11, 2015

वादा कोई, कहीं नहीं था सचमुच ...


तुम्हारी खामोशियों में ज़ब्त
तमाम वादों की शिकन
दर्ज है तुम्हारे माथे पे सदियों से

दर्ज है लकीरों से खाली पड़ी हथेलियों पे
तुम्हारे अनकिये वादों की
गुमसुम जुम्बिश

तुम्हारे दूर जाते क़दमों की आहटों में
दर्ज है थकन
लौट के न आने की

हर रोज शाम के साथ उतरती है
एक उधड़े हुए वादे की याद
चाय की प्याली में
घुल जाती है, चुपचाप

सप्तपदी के वचनों से मुक्त रात
अपने दोनों घुटनों में सर डाले
समेटती है वादियों में गूंजती
तमाम उदासियाँ

तुम्हारी खामोशियों से
जिंदगी में भर उठा है सन्नाटे का शोर

वादा कोई, कहीं नहीं था सचमुच
बस एक बोझ था, तन्हाई का

टूट्ने के लिए
वादा किया जाना ज़रूरी नहीं...

(सुना है आज प्रॉमिस डे है )



Tuesday, February 10, 2015

सुनो अरविन्द!



इस जीत के जश्न से कान हटाओ जरा और सुनो कि ये जीत क्या कह रही है? यह जीत किसकी जीत है. और ये हार किसकी है आखिर? अरविन्द केजरीवाल या आम आदमी की जीत और मोदी या भाजपा की हार के रूप में इसे देखना इस जनादेश को बहुत कम करके आंकना होगा। ये जीत अब तक लोगों को वर्गों में, जातियों में, धर्म की संवेदना में बांटकर, उकसाकर, उन्हें मौजूं मुददों से भटकाकर वोटो से अपनी झोली भरने वाली सारी राजनैतिंक पार्टियों के खिलाफ है. ये जीत नेताओं की जोड़-तोड़  की राजनीति और अपनी असफलता को कभी दूसरी पार्टियों के सहयोग न मिलने, कभी जनता पर पूर्ण बहुमत न होने के आरोपों का मुहतोड़ जवाब है.

जाति-धरम, मंदिर-मस्जिद जैसे मुद्दों की आड़ में अब कोई पार्टी खुद को ढँक नहीं पाएगी. इस मतदान के सुर को सभी राजनैतिक पार्टियों को ठीक से सुनने की ज़रुरत है. सबसे ज्यादा आम आदमी पार्टी को. वाम को भी समझना होगा कि सिर्फ विचारधाराओं की खेती करने से बात नहीं बनेगी.  यूँ भी आम की बात ही तो वाम है.... तो अगर पार्टी के टैग पर न जाएँ समाज के अंतिम आदमी का हाथ पकड़कर चलने के विचार पर जाएँ तो वाम की  खुशबू आती मिलेगी।

लेकिन ध्यान रखना होगा कि जो जनता इतने बड़े आवेग से आपके साथ खड़ी है,  वो कल आपके खिलाफ भी जा सकती है. यह व्यक्ति के मोह और पार्टी के प्रति बरसों की वफादारी वाला जनादेश नहीं है. यह जनादेश एक सन्देश है कि लो कितना बहुमत चाहिए, अब काम करके दिखाओ. दिल्ली के वोटर ने पूरे देश के वोटर को भी सन्देश दिया है कि  मुद्दों पर वोट दो, मुद्दे जो जिंदगी की राह आसान करें न की हमें आपस में बांटें और नेताओं की झोलिया पहले वोट से फिर नोट से भरे. 

जनतंत्र की बुनियाद यही है. असल जनतंत्र की ताक़त दिल्ली ने पहचानी है. ज़ाहिर है, ये जीत सारे वर्ग, समूहों, धर्मों, जातियों के लोगो ने मिलकर रची है. अरविन्द ने हारकर भी भारतीय राजनीति में सकारात्मक बदलाव की शुरुआत कर ही दी थी. किस तरह एक नेता भी आम आदमी ही होता है , उससे भी गलतियां हो सकती हैं और जिन्हे स्वीकार करने में कोई अहंकार आड़े नहीं आता. आरोप-प्रत्यारोप, इसकी टोपी उसके सर वाली राजनीति से इतर आत्मवलोकन, स्व-सुधार की ओर बढ़ने की राजनीति जनता की पसंद बनी. बिजली, पानी, महंगाई, सफाई, रोजगार जैसे मुद्दे तमाम महंगे चुनावी प्रचार और हमला बोल राजनीति से आगे निकल गये. 

इस जनादेश में छुपी जनता की आवाज को सुनना होगा कि वो क्या चाहती है. आम आदमी पार्टी शायद इसे सुन पा रही है इसीलिए अरविन्द कहते हैं कि उन्हें डर भी लग रहा है. ये डर ही उन्हें सही रस्ते पे बनाये रखेगा ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए. क्योंकि जनता जब जाग जाती है तो वो अपने मतदान से आपको मौका देती है लेकिन याद रहे वो ये मौका इसी आक्रामकता के साथ छीन भी सकती है.

मोदी को भी जनता ने यही सोचकर चुना कि  खाली बोलो नहीं, ज़रा काम करो. बहुमत चाहिए? लो हमसे लो और अब चुपचाप काम करो. काम नहीं तो वोट नही. केंद्र और दिल्ली की सरकारों को बहुमत ही  नहीं जनता की चेतावनी भी मिली है, जो इसे नहीं समझेगा उसे इसकी कीमत चुकाने को तैयार रहना होगा। ये जनता से सबक लेने वाली राजनीति का दौर है… 

जीत अपने साथ जिम्मेदारी लेकर आती है.… जश्न पार्टी कार्यकर्ताओं का हक़ है लेकिन पार्टी के नेताओं के लिए यह जश्न का नहीं अपने कंधे चौड़े करने और जनता के द्वारा दी गयी जिम्मेदारी को ठीक से निभा पाने की ओर कदम बढ़ने का वक़्त है.... 

ये भावुक वोटर का प्यार नहीं है अरविन्द ये एक जागरूक वोटर की जिम्मेदारी है तुम्हारे कन्धों पर....