Monday, January 26, 2015

जीवन कहीं खारिज न कर दे...


तकरीबन महीने भर बाद स्कूल खुले हैं। सरकारी स्कूल। शिक्षकों के लटके हुए चेहरे, टालमटोल, नये सिरे से बहानों की खोजबीन, छुट्टियां और बढ़ जाने के चमत्कारी संदेश का इंतजार कितना कुछ बयान करता है। एक तरफ बेहतर शिक्षा को लेकर तमाम पड़ताल, कवायद, प्रशिक्षण आदि की बात हो रही है, चिंताएं सामने आ रही हैं, दूसरी ओर शिक्षकों का अपने काम को लेकर यह रवैया।

क्यों इन शिक्षकों के भीतर उत्साह नहीं स्कूलों के खुलने का? क्यों मन में आतुरता नहीं अपने बच्चों से मिलने की, उनके सर पर हाथ फिराने की, उनके घर-परिवार के बारे में जानने की? क्यों उकताहट नहीं इत्ती लंबी छुट्टियों से? क्यों मन में उत्साह  नहीं अपने काम से वापस जुड़ पाने का। ये सवाल मुझे बहुत बेचैन करते हैं। शायद मेरे हिस्से भी ऐसे ही उकताये हुए शिक्षक आये होंगे इसीलिए बहुत छोटी उम्र में जब कुछ भी समझ नहीं बनी थी ये तय कर लिया था मन में चुपचाप कि शिक्षक नहीं बनूंगी. हालांकि आगे चलकर जब 'मास कम्युनिकेशन' के छात्रों के साथ पढ़ाने के बहाने रू-ब-रू होने का मौका मिला तो मेरी बचपन की वो राय एकदम बदल गई।

पिछले कुछ बरसों से सरकारी स्कूलों से जुड़ने का, उन्हें देखने, समझने, महसूस करने का मौका मिल रहा है। ऐसा लगता है सामने नन्ही-नन्ही कोरी हथेलियां हैं, ढेर सारी चमक लिए हुए आंखें...उन हथेलियों में लकीरें खींचनी हैं, उन आंखों में सपने बोने हैं...जिस प्यार से बच्चे अपने शिक्षक को देखते हैं, जिस तरह उन पर भरोसा करते हैं वो असाधारण होता है। जीवन को सार्थकता मिलने के अवसर सामने होते हैं...जिंदगी भर को किसी के दिल में बस जाने के अवसर...सीखना सिखाना तो बाद की बात है पहली शुरुआत तो रिश्ता बनने से होती है। उत्तराखंड में कुछ ऐसे शिक्षकों से मिली हूं जिन्होंने अपने बच्चों से बढ़कर अपने स्कूल के बच्चों को प्यार दिया। अपने काम से उन्हें प्यार है...स्कूल आने-जाने के वक्त का हिसाब किताब सब औंधे मुंह पड़े होते हैं...शिक्षक मस्त मगन बच्चों के साथ खेल रहे होते हैं...सीख रहे होते हैं, सिखा रहे होते हैं। छुट्टी होने पर भी न बच्चे घर जाना चाहते हैं न शिक्षक। अपने वेतन का कुछ हिस्सा बच्चों के ऊपर खर्च करना उन्हें खाने की थाली से पहला कौर भोग के तौर पर चढ़ाने जैसा लगता है। किसी को लगता है कि हमारे काम के एवज में बच्चों की मुस्कुराहटें, उनके माता पिता का हम पर हुआ विश्वास सब कुछ दे देता है सरकारी वेतन तो हमें बोनस में मिलता है। उन्हें न किसी तरह की ड्यूटी लगने से शिकायत है, न काम की अधिकता से बस एक ही चिंता कि हमारे बच्चे कैसे प्राइवेट स्कूलों से भी अच्छी शिक्षा पा लें। रोज पढ़ाने के नये ढंग ढूंढना, उनके मिड डे मील को और स्वादिष्ट और पौष्टिक बनाने की चिंता।

दूसरी तरफ स्कूल जाने के नाम पर बहाने बनाने वाले शिक्षक। महंगी गाडि़यों से स्कूलों में जाकर, उतरकर, हाजिरी की औपचारिकता, कम स्कूल जाना पड़े इसकी सेटिंग, सिफारिश, बच्चों से की दूरी बनाकर रखना, उनके प्रति स्वभाव में हिकारत, स्कूल के मिड-डे मील से पैसा बचा पाने की जुगत, काम की अधिकता, ड्यूटी लग जाने की चिडचिड़ाहट....मामला साफ है। जिन्हें अपने काम से प्यार नहीं...उनमें ही उकताहट होगी। जिन्हें काम से प्यार होगा वो अभावों में भी खुश रहेंगे।

दुनिया में शिक्षक होने से बड़ा वरदान कोई नहीं। दुनिया-जहां की समस्याएं बच्चों की निश्छल मुस्कुराहटें दूर कर देती हैं। तमाम योग, साधनाएं सब व्यर्थ हैं बस कि आप किसी मासूम को दिल से गले लगाइये, उसकी आंखों में आपके लिए जो प्यार जागेगा, जो भरोसा जागेगा उसमें जीवन की सार्थकता होगी...लेकिन ऐसा होगा तब जब हम उस सार्थकता के योग्य होंगे। हमारी अयोग्यता के चलते ही जीवन हमें खारिज कर देता है....हम सिर्फ सांसों में बचते हैं, जीवन में नहीं। नौकरी एक बोझ, काम सरदर्द बनने लगता है और नतीजा सब गड़बड़।

बस एक बात जे़हन में आती है कि ये सारे उकताये हुए, शिकायतों से भरे शिक्षक क्या एक बार नहीं सोचते कि जब उनके पास यह नौकरी नहीं थी तो वे कितने बेसब्र थे इसे पाने के लिए। मैं यह नहीं कहती कि शिक्षकों की समस्याओं पर बात नहीं होनी चाहिए, यह भी नहीं कि उन्हें किसी देवता की तरह देखा जाए। मैं तो सिर्फ एक व्यक्ति के तौर पर शिक्षकों के जीवन के आसपास मंडराते सुख और सार्थकता के उस भाव की बात करना चाहती हूं, जिसे अक्सर वे उपेक्षित कर रहे होते हैं।

Friday, January 23, 2015

हम ख़ुदा तुमको बना लेंगे, तुम आओ तो सही



तुमको हम दिल में बसा लेंगे, तुम आओ तो सही
सारी दुनिया से छुपा लेंगे, तुम आओ तो सही

एक वादा करो अब हमसे ना बिछड़ोगे कभी
नाज़ हम सारे उठा लेंगे, तुम आओ तो सही

बेवफा भी हो, सितमगर भी, जफापेशा भी
हम ख़ुदा तुमको बना लेंगे, तुम आओ तो सही

राह तारीक है और दूर है मंजि़ल लेकिन
दर्द की शम्में जला लेंगे, तुम आओ तो सही...

- मुमताज़ मिर्जा

Thursday, January 22, 2015

घर उगने का इंतजार



रोज सुबह
उगता है एक घर
सूरज के साथ,
कभी टहनियों पर
जा टिकता है,
कभी रास्तों पर साथ चलता है
कभी किसी मोड़ पर
छूट ही जाता है बस.

कभी किसी आंख में
बस जाता है
तो कभी किसी आवाज में ही
बना लेता है ठिकाना
कभी तो श्मशान के
किनारे धूनी सी रमा लेता है
घर, जहां मिलता है
वजूद को विस्तार ,
जहां हर सपने को
मिलता है निखार
जहां दु:ख की वीणा को
सुख के राग से
झंकृत किया जाता है
जहां पहुंचकर
जिस्म को अलगनी पर
टांगकर
रूह को कैसे भी विचरने को
आजाद छोड़ दिया जाता है,
ईंट, पत्थरों से घिरी दीवारों में
लौटकर रोज
आवाजों के वीतराग
में डुबो देती हूं खामोशियां
और अगली सुबह
सूरज के साथ
घर के उगने का
इंत$जार होता है.