Friday, October 31, 2014

गुलों में रंग भरे.… हैदर


कभी कभी चुप्पी का अपना सुख होता है… 'हैदर' फिल्म देखने के बाद एक लम्बी चुप में सिमट जाने को जी चाहता है… एक लम्बी चीख के बाद की थकन में कोई नशा सा महसूस होता है. बाकियों की तरह मैंने भी 'हैदर' रिलीज़ के साथ ही देख ली थी. अपनी चुप के साये में बैठे हुए फिल्म पर आने वाले लेख, प्रतिक्रिया, बातचीत को देखते हुए, सुनते हुए.…

बाद मुद्दत किसी हिंदी फिल्म पर इतनी बातचीत सुनी। फिल्म के बहाने न जाने कितनी बातें, कितने मुद्दे, कितनी नाराजगी। बहुत सारी रिव्यू,अनुभव. एक बात तो तय है कि सिनेमा हॉल से बाहर निकलने के साथ फिल्म ज़ेहन में खुलने लगती है. दर्शक हॉल से खाली हाथ बाहर नहीं आता. विशाल से उनके दर्शकों को बहुत उम्मीदें भी होती हैं, अपेछाचायें भी. जो कि विशाल की असल कमाई है और उस कमाई में दर्शकों की नाराजगी भी इज़ाफ़ा ही करती है.

विशाल के पास एक गहरा रूमान है…जो उनकी फिल्मों को अलग ही रंग देता है. किसी दोस्त (शायद अशोक) की एक लाइन भूलती नहीं कि अच्छे से अच्छे कवि को हैदर देखते हुए विशाल से ईर्ष्या हो सकती है. विशाल की कविताई फैज़ को सजदा करना नहीं भूलती। एक अच्छा फ़िल्मकार सिर्फ अच्छा रचता नहीं अच्छे रचे जा चुके को सलाम भी करता चलता है. विशाल अपने रूमान में जिंदगी की तल्खियाँ नज़रअंदाज नहीं करते। वो जानते हैं 'हंसी बड़ी महंगी' है, सो उस महंगे होने की कीमत चुकाने को वो तैयार रहते हैं. रंग उन्हें पसंद हैं लेकिन उन रंगों तक पहुँचने के लिए वो बेरंग रास्तों से गुजरने से परहेज नहीं करते। जिंदगी के ग्रे रंग से खेलते हुए, उसकी परतों को उधेड़ते हुए वो एक लाल सूरज उगाने की रूमानियत से लबरेज नज़र आते हैं. हर बार वो हिंदी सिनेमा को एक नया रंग देने की कोशिश करते हैं.

चूंकि मैं विशाल से मिली भी हूँ तो थोड़ा सा जानती हूँ शायद कि वो अपना काम प्यार से करते हैं, वो महत्तवकांछा से ग्रसित नहीं हैं न ही अपने बारे में कोई मुगालता है उन्हें. उनकी ईमानदारी उन्हें, संकोची और शर्मीला बनाती है…

होंगी उनकी तमाम फिल्मों में तमाम कमियां भी, लेकिन मुझे विशाल स्याह अंधेरों में से फूटती एक चमकती हुई उम्मीद की मानिंद लगते है. उनकी फिल्म पर बात करते हुए लोग झगड़ पड़ते हों, कश्मीर मुद्दे पर तमाम लेख पढ़े जाने लगे हों, किताबें खुलने लगी हों, तमाम पहलू सामने आने लगे हों,फिल्म लगातार अपने लिए स्वस्थ आलोचना कमा रही तो ये क्या कम है.… 

कश्मीर की वादियां, शाहिद, तब्बू और गुलज़ार साब के गीत तो बोनस से लगते हैं फिल्म में.

Wednesday, October 29, 2014

'मौत ज़िंदगी का अंत नहीं होती...' - रेहाना जब्बारी


(बना रहे बनारस से साभार)

रेहाना जब्बारी का माँ के नाम आख़िरी संदेश और वसीयत

रेहाना जब्बारी के बारे में दुनिया को पहली बार 2007 में पता चला. तब उनकी उम्र महज 19 साल थी. उन्हें हत्या के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था. रेहाना का कहना था कि ईरान के ख़ुफ़िया मामलों के मंत्रालय के पूर्व कर्मचारी 47 वर्षीय मुर्तज़ा अब्दुलाली सरबंदी ने उनका बलात्कार करने की कोशिश की और वो अपना बचाव भर कर रही थीं.
रेहाना को बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपील की गई. प्रयास किए गए. सोशल मीडिया पर उन्हें मौत की सज़ा से बचाने के लिए अभियान चलाया गया. लेकिन सब बेअसर रहा. ईरान सरकार पर इन सबका कोई असर नहीं पड़ा.

ईरान के क़िसास क़ानून के अनुसार जिस परिवार के व्यक्ति की हत्या हुई है वो चाहे तो हत्या के अभियुक्त की फांसी माफ़ कर सकता है. ऐसे में संबंधित व्यक्ति को कारावास की सज़ा होती है या अन्य प्रकार का हर्जाना देना होता है. मृतक के परिवार का मानना है कि रेहाना ने ये हत्या साजिशन की थी. ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयतुल्लाह ख़ुमैनी भी रेहाना का मृत्युदंड माफ कर सकते थे लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

2007 से 2014 तक चले इस मुक़दमे के बाद शनिवार, 25 अक्टूबर, 2014 को रेहाना को तेहरान की एक जेल में फांसी दे दी गई. माना जा रहा है कि रेहाना ने कुछ महीने पहले अपनी माँ के नाम एक ऑडियो संदेश भेजा था जिसे उन्होंने अपनी वसीयत भी बताया था. नेशनल काउंसिल ऑफ़ रेज़िसटेंस ऑफ ईरान ने उस संदेश का अंग्रेज़ी अनुवाद उपलब्ध कराया है. यह हिन्दी अनुवाद उसी के आधार पर किया गया है.

पढ़ें, रेहाना जब्बारी का संदेश उनकी माँ के नाम

प्यारी शोले

मुझे आज पता चला कि अब मेरी क़िसास की बारी है. मुझे इस बात कि दुख है कि आपने मुझे यह क्यों नहीं बताया कि मैं अपनी ज़िंदगी की किताब के आख़िरी पन्ने तक पहुँच चुकी हूँ. आपको नहीं लगता कि मुझे ये जानना चाहिए था? आप जानती हैं कि मैं इस बात से कितनी शर्मिन्दा हूँ कि आप दुखी हैं. आपने मुझे आपका और अब्बा का हाथ चूमने का मौक़ा क्यों नहीं दिया?

दुनिया ने मुझे 19 बरस जीने का मौक़ा दिया. उस अभागी रात को मेरी हत्या हो जानी चाहिए थी. उसके बाद मेरे जिस्म को शहर के किसी कोने में फेंक दिया जाता, और कुछ दिनों बाद पुलिस आपको मेरी लाश की पहचान करने के लिए मुर्दाघर ले जाती और वहाँ आपको पता चलता है कि मेरे साथ बलात्कार भी हुआ था. मेरा हत्यारा कभी पकड़ा नहीं जाता क्योंकि हमारे पास उसके जितनी दौलत और ताक़त नहीं है. उसके बाद आप अपनी बाक़ी ज़िंदगी ग़म और शर्मिंदगी में गुज़ारतीं और कुछ सालों बाद इस पीड़ा से घुट-घुट कर मर गई होतीं और ये भी एक हत्या ही होती.

लेकिन उस मनहूस हादसे के बाद कहानी बदल गयी. मेरे शरीर को शहर के किसी कोने में नहीं बल्कि कब्र जैसी एविन जेल, उसके सॉलिटरी वार्ड और अब शहर-ए-रे की जेल जैसी कब्र में फेंका जाएगा. लेकिन आप इस नियति को स्वीकार कर लें और कोई शिकायत न करें. आप मुझसे बेहतर जानती हैं कि मौत ज़िंदगी का अंत नहीं होती.

आपने मुझे सिखाया है कि हर इंसान इस दुनिया में तजुर्बा हासिल करने और सबक सीखने आता है. हर जन्म के साथ हमारे कंधे पर एक ज़िम्मेदारी आयद होती है. मैंने जाना है कि कई बार हमें लड़ना होता है. मुझे अच्छी तरह याद है कि आपने मुझे बताया था कि बघ्घी वाले ने उस आदमी का विरोध किया था जो मुझपर कोड़े बरसा रहा था लेकिन कोड़ेवाले ने उसके सिर और चेहरे पर ऐसी चोट की जिसकी वजह से अंततः उसकी मौत हो गयी. आपने मुझसे कहा था कि इंसान को अपने उसूलों को जान देकर भी बचाना चाहिेए.

जब हम स्कूल जाते थे तो आप हमें सिखाती थीं कि झगड़े और शिकायत के वक़्त भी हमें एक भद्र महिला की तरह पेश आना चाहिए. क्या आपको याद है कि आपने हमारे बरताव को कितना प्रभावित किया है? आपके अनुभव ग़लत थे. जब ये हादसा हुआ तो मेरी सीखी हुई बातें काम नहीं आयीं. अदालत में हा़ज़िर होते वक़्त ऐसा लगता है जैसे मैं कोई क्रूर हत्यारा और बेरहम अपराधी हूँ. मैं ज़रा भी आँसू नहीं बहाती. मैं गिड़गिड़ाती भी नहीं. मैं रोई-धोई नहीं क्योंकि मुझे क़ानून पर भरोसा था.

लेकिन मुझ पर ये आरोप लगाया गया कि मैं जुर्म होते वक़्त तटस्थ बनी रही. आप जानती हैं कि मैंने कभी एक मच्छर तक नहीं मारा और मैं तिलचट्टों को भी उनके सिर की मूँछों से पकड़कर बाहर फेंकती थी. अब मैं एक साजिशन हत्या करने वाली कही जाती हूँ. जानवरों के संग मेरे बरताव की व्याख्या मेरे लड़का बनने की ख़्वाहिश के तौर पर देखा गया. जज ने ये देखना भी गंवारा नहीं किया कि घटना के वक़्त मेरे नाख़ून लंबे थे और उनपर नेलपालिश लगी हुई थी.

जजों से न्याय की उम्मीद करने वाले लोग कितने आशावदी होते हैं! किसी जज ने कभी इस बात पर सवाल नहीं उठाया कि मेरे हाथ खेल से जुड़ी महिलाओं की तरह सख्त नहीं हैं,ख़ासतौर पर एक मुक्कबाज़ लड़कियों के हाथों की तरह. और ये देश जिसके लिए आपने मेरे दिल में मुहब्बत भरी थी, वो मुझे कभी नहीं चाहता था. जब अदालत में मेरे ऊपर सवाल-जवाब का वज्र टूट रहा था और मैं रो रही थी और अपनी ज़िंदगी के सबसे गंदे अल्फ़ाज़ सुन रही थी तब मेरी मदद के लिए कोई आगे नहीं आया. जब मैंने अपनी ख़ूबसूरती की आख़िरी पहचान अपने बालों से छुटकारा पा लिया तो मुझे उसके बदले 11 दिन तक तन्हा-कालकोठरी में रहने का इनाम मिला.

प्यारी शोले, आप जो सुन रही हैं उसे सुनकर रोइएगा नहीं. पुलिस थाने में पहले ही दिन एक बूढ़े अविवाहित पुलिस एजेंट ने मेरे नाखूनों के लिए मुझे ठेस पहुँचायी. मैं समझ गयी कि इस दौर में सुंदरता नहीं चाहिए. सूरत की ख़ूबसूरती, ख़्यालों और ख़्वाबों की ख़ूबसूरती, ख़ूबसूरत लिखावट, आँखों और नज़रिए की ख़ूबसूरती और यहाँ तक कि किसी प्यारी आवाज़ की ख़ूबसूरती भी किसी को नहीं चाहिए.

मेरी प्यारी माँ, मेरे विचार बदल चुके हैं और इसके लिए आप ज़िम्मेदार नहीं है. मेरी बात कभी ख़त्म नहीं होने वाली और मैंने इसे किसी को पूरी तरह दे दिया है ताकि जब आपकी मौजूदगी और जानकारी के बिना मुझे मृत्युदंड दे दिया जाए तो उसके बाद इसे आपको दे दिया जाए. मैं आपके पास अपने हाथों से लिखी इबारत धरोहर के रूप में छोड़ी है.

हालाँकि, मेरी मौत से पहले मैं आपसे कुछ माँगना चाहती हूँ, जिसे आपको अपनी पूरी ताक़त और कोशिश से मुझे देना है. दरअसल बस यही एक चीज़ है जो अब मैं इस दुनिया से, इस देश से और आपसे माँगना चाहती हूँ. मुझे पता है आपको इसके लिए वक़्त की ज़रूरत होगी. इसलिए मैं आपको अपनी वसीयत का हिस्सा जल्द बताऊँगी. आप रोएँ नहीं और इसे सुनें. मैं चाहती हूँ कि आप अदालत जाएँ और उनसे मेरी दरख़्वास्त कहें. मैं जेल के अंदर से ऐसा ख़त नहीं लिख सकती जिसे जेल प्रमुख की इजाज़त मिल जाए, इसलिए एक बार फिर आपको मेरी वजह से दुख सहना पड़ेगा. मैंने आपको कई बार कहा है कि मुझे मौत की सज़ा से बचाने के लिए आप किसी से भीख मत माँगिएगा लेकिन यह एक ऐसी ख़्वाहिश है जिसके लिए अगर आपको भीख माँगनी पड़े तो भी मुझे बुरा नहीं लगेगा.

मेरी अच्छी माँ, प्यारी शोले, मेरी ज़िंदगी से भी प्यारी, मैं ज़मीन के अंदर सड़ना नहीं चाहती. मैं नहीं चाहती कि मेरी आँखे और मेरा नौजवान दिल मिट्टी में मिल जाए. इसलिए मैं भीख माँगती हूँ कि मुझे फांसी पर लटकाए जाने के तुरंत बाद मेरे दिल, किडनी, आँखें, हड्ड्याँ और बाक़ी जिस भी अंग का प्रतिरोपण हो सके उन्हें मेरे शरीर से निकाल लिया जाए और किसी ज़रूरतमंद इंसान को तोहफे के तौर पर दे दिया जाए. मैं नहीं चाहती कि जिसे मेरे अंग मिलें उसे मेरा नाम पता चले, वो मेरे लिए फूल ख़रीदे या मेरे लिए दुआ करे. मैं सच्चे दिल से आपसे कहना चाहती हूँ कि मैं अपने लिए कब्र भी नहीं चाहतीं, जहाँ आप आएँ, मातम मनाएँ और ग़म सहें. मैं नहीं चाहती कि आप मेरे लिए काला लिबास पहनें. मेरे मुश्किल दिनों को भूल जाने की आप पूरी कोशिश करें. मुझे हवाओं में मिल जाने दें.

दुनिया हमें प्यार नहीं करती. इसे मेरी ज़रूरत नहीं थी. और अब मैं इसे उसी के लिए छोड़ कर मौत को गले लगा रही हूँ. क्योंकि ख़ुदा की अदालत में मैं इंस्पेक्टरों पर मुक़दमा चलावाऊँगी, मैं इंस्पेक्टर शामलू पर मुक़दमा चलवाऊँगी, मैं जजों पर मुक़दमा चलवाऊँगी और देश के सुप्रीम कोर्ट की अदालत के जजों पर भी मुक़दमा चलवाऊँगी जिन्होंने ज़िंदा रहते हुए मुझे मारा और मेरा उत्पीड़न करने से परहेज नहीं किया. दुनिया बनाने वाली की अदालत में मैं डॉक्टर फरवंदी पर मुक़दमा चलवाऊँगी, मैं क़ासिम शाबानी पर मुक़दमा चलवाऊँगी और उन सब पर जिन्होंने अनजाने में या जानबूझकर मेरे संग ग़लत किया और मेरे हक़ को कुचला और इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि कई बार जो चीज़ सच नज़र आती है वो सच होती नहीं.

प्यारी नर्म दिल शोले, दूसरी दुनिया में मैं और आप मुक़दमा चलाएंगे और दूसरे लोग अभियुक्त होंगे. देखिए, ख़ुदा क्या चाहते हैं. ..मैं तब तक आपको गले लगाए रखना चाहती हूँ जब तक मेरी जान न निकल जाए. मैं आपसे बहुत प्यार करती हूँ.

रेहाना
01, अप्रैल, 2014

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Saturday, October 11, 2014

जंगल से उठती धुन और चीड़ों पर चौदहवीं का चांद...


 





एक सर्पीली सी राह थी...पगडंडडियों का सफर...चीड़ों का जंगल और सर पर चौदहवीं का चांद. चांदनी छलकने को बेताब...चांद इतना करीब...कि मानो हाथ बढ़ाने भर की देर...आगोश में उतरने को बेताब...आप चौदहवीं के चांद को गौर से देखिएगा, उसमें एक अलग सा ही एटीट्यूड होता है...वो पूनम के चांद में नहीं होता। तेरस के चांद में भी नहीं...सिर्फ चौदहवीं के चांद में।

निर्मल वर्मा की जानिब से चीड़ों पर चांदनी को इस कदर बूंद-बूंद पिया है कि उन घने चीड़ के जंगलों में जब चांद को देखा तो निर्मल वर्मा को आवाज देने का जी चाहा। कदमों की आहट से भी चीड़ों के जंगल में पसरी नीरवता...महकते सन्नाटे को भंग करना किसी हिमाकत सा मालूम होता।

न...कोई बात नहीं...सिर्फ मौन....एक गहरा मौन...शायद इसीलिए उन वादियों में, उस घने जंगल में न कोई नेटवर्क था और न उसकी कोई चाह। अपनी देह पर रेंगती चांदनी और मन के भीतर चहलकदमी करते मौन के साथ सुकून उतर आया था। आत्मिक...ऐन्द्रिक...सुख।

कोई नदी आंखों के कोटरों में करवट लेती है...चांद इतने करीब मैंने कभी नहीं देखा था, उसे अपने इतने करीब कभी महसूस नहीं किया था। जाने क्यों लगा कि ये चांद 'सिर्फ' मेरे लिए ही उगा है...'सिर्फ मेरे लिए...' ये 'सिर्फ' कितनी मुश्किलें पैदा करता है इस बात से नावाकिफ नहीं हूं....इसके जोखिम इतने घने हैं कि अक्सर उनमें पूरी उम्र उलझ जाती है...फिर भी बार-बार इस 'सिर्फ' में उलझने से बच नहीं पाती...

जंगल से कोई धुन उठती है...एक खुशबू....आगोश में लेने को तत्पर...कि बचने की कोई गुंजाइश भी नहीं...और ख्वाहिश भी नहीं...खुद को उस समूचे मंज़र के हवाले करते वक्त कितना हल्का महसूस हुआ था...जीवन की वो तमाम दुश्वारियां जिनके लिए बिसूरते-बिसूरते सूरतें खराब कर लीं, कितनी दयनीय हो चली थीं।

खुद को दोशाले में समेटकर मद्धम कदमों से निशब्द की ओर बढ़ना...

न बोलने वाला मौन नहीं...न होने वाला मौन...कोई आंतरिक संवाद भी नहीं...ऐसे मौन परिमार्जन होते हैं...मन के कमरे में जमी खर-पतवार को उखाड़ फेंकते हैं। मेरा 'मैं'....उस जंगल में विलीन हो चुका था...और वो जंगल अपनी तमाम खुशबू और समूचे चांद के साथ व्यक्तित्व में पैबस्त था।

एक गाढ़ा रूदन उभरता है...बहुत गहरा...बाहें पसारने का जी चाहता है...चाँद को छू लेने का जी चाहता है. चांद को छू लेने की इच्छा को मुक्त करते हुए उस रूदन के कांधे से टिकना मुफीद लगता है। इच्छाओं को मुक्त करना ही श्रेष्ठतम है...लेकिन श्रेष्ठतम जानते हुए भी इच्छाओं में उलझते रहते हैं...बार-बार...आंखों की नदी गालों को पार करते हुए गर्दन को सहलाने लगती है.

इच्छा...मुक्ति...इच्छा...मुक्ति...इच्छा...मुक्ति...स्क्रीन पर उभरती छवियों की तरह उभरते हैं और गुम होते हैं...फिर उभरते हैं फिर गुम होते हैं...दर्शक दीर्घा में मैं और वो चौदहवीं का चांद....

तभी कंधे पर किसी का हाथ महसूस होता है....चौंक के मुड़ती हूं...देखती हूं...वो कोई स्मृति थी....मुस्कुराती हुई सी...इच्छा से मुक्ति का अभी वक्त नहीं आया है शायद...अभी आसक्तियों के महासागर में और हिचकोले खाने हैं...समझ जाती हूं...चांद मुस्कुरा रहा है... करीब बैठा हुआ....मैं हाथ बढ़ाकर उसे छू लेने की इच्छा को मुक्त नहीं कर पायी आखिर...उसे छूने को हाथ बढ़ाती हूं तो वादियों से कोई मीठी धुन उठती है...

आधी रात को उस घने बियाबान में अपनी इच्छा को जोर से भींच लेती हूं...मुक्त नहीं कर पाती...चांद जो आसमान से उतरकर चीड़ों पर टंगा हुआ था हथेलियों में सिमट आता है...मैं ओस की चादर लपेटे हथेलियों में चौदहवीं का चांद लिए सो जाती हूं....

(तस्वीरें- सुभाष रावत )


Thursday, October 9, 2014

जिंदगी खुलकर खिलती है, मुस्कुराती है...


बड़े सादा हैं तेरे लफज कि इन लफजों में
जिंदगी खुलकर खिलती है, मुस्कुराती है....

बड़े से कोरे कागज पर ढेर सारे अक्षरों का ढेर जमा है। बड़ा सा ढेर। एक-एक कर अक्षरों को गिराने का खेल सुंदर लगता है। काफी अरसे से ऐसा मालूम होता है कि अक्षर जैसे ही शब्द बनेंगे, किसी न किसी अर्थ का लिबास ओढ़ेंगे और बहुत भारी हो जायेंगे। इतने भारी कि उनका बोझ जीवन के कंधों पर उठाना मुश्किल होगा। कागज की सादगी दिल लुभाती है। जीवन के विस्तार सा फैला कागज, एकदम साफ, सुथरा, सादा कागज...कोरे कागज की सादगी पे जां निसार करने का जी चाहता है। सारे अक्षर एक-एक कर लुढ़क चुके हैं बस कि तीन अक्षर दो मात्राओं के साथ मुस्कुरा रहे हैं...सा द गी...कोरे कागज की सादगी....उन अक्षरों में समा गई और वो अक्षर शब्द बनकर मुस्कुराते हैं। जीवन के कोरे कैनवास पर सादगी के रंग बिखरते हैं...

सादगी कितना आकर्षण है इसमें। कितनी पाकी़ज़गी। सादगी फूलों की, नदियों की, पहाड़ों की, फिजाओं की, जंगलों की, खेतों की, खलिहानों की, मेहनत की, संघर्ष की...सादगी बच्चों की मासूम मुस्कुराहटों की, शरारतों की, सादगी दुआ में उठे हाथों और सजदे में झुकी पलकों की... उफफफ...किस कदर जादू है इन तीन लफजों में...कि जिंदगी इनके हवाले से ही जिंदगी मालूम होती है बाकी तो सब गढ़ा हुआ कोई खेल सा लगता है।

एक रोज यूं ही नदी किनारे टहलते हुए खुद से पूछा था ये सवाल कि क्या है जो हमारे हर सवाल का जवाब कुदरत के पास मौजूद होता है? हर जख़्म का मरहम? क्यों हर रोज उगने वाला सूरज, चांद, हवायें, चिडि़यों की चहचहाआहट हमें बोर नहीं करती। जवाब था सादगी, स्वाभाविकता। हम जितने स्वाभाविक हैं उतने ही सादा हैं। और सादगी कभी बोर नहीं करती। काट-छांटकर तैयार किये गये पार्क हों या मेकअप की धज में रचे व्यक्तित्व...सब जगह एक ऊब है, लेकिन तेज धूप में हल चलाते किसान हों, खेतों में धान रोपती स्त्रियां, झुर्रियों वाली बूढ़ी दादी की मुस्कुराहट हो या किल्लोल करते बच्चे...सब हमें लुभाते हैं... क्योंकि यहां सौंदर्य अपनी सादगी के साथ आता है। ठहरता है।

सब जानते हुए भी जाने कब कैसे समय की गति के साथ तालमेल करते-करते हम सादगी से दूर निकल आये। हम रच बैठे एक झूठी बेमानी दुनिया। मुखौटों से सजी हुई। जहां मुस्कुराहटें भी ड्यूटी पर तैनात एयरहोस्टेस जैसी मालूम होती हैं और विनम्रता भी मैनजेमेंट के स्कूलों के सेलेबस का कोई पाठ लगती है। शब्द अर्थ से भरे लेकिन भाव से खाली और इन सबका हश्र यह है बावजूद तमाम कम्युनिकेशन मीडियम के, हजार फोन, फेसबुक, व्हाटसएप्प, वेबसाइट्स, हजारों दोस्तों, मोटे पैकेजेस, लंबी गाडि़यों के बावजूद लोग लगातार अकेलेपन से जूझ रहे हैं।

हो सकता है कि किसी को यह नाॅस्टैल्जिक फीवर यानी अतीत प्रेम का बुखार मालूम हो लेकिन सच में अक्सर अपनी बेचैनियों में बचपन की स्मृतियों को खंगालती हूं तो कुएं की जगत पर चाचियों, मामियों की खिलखिलाहटों में घूंघट का सौंदर्य जाग उठता था। सर्द रातों में अलाव के गिर्द जमा मजमा बिना किसी साइकोलाॅजिस्ट की काउंसलिंग के मन पर जमी तमाम काली पर्तों को उखाड़ फेंकता था। वो जीवन की सादगी भरे लम्हे थे, उनमें ताकत थी, हमें संभाल पाने की। लेकिन जाने किस सफर के मुसाफिर निकले हम कि सादगी भरी पगडंडियों के सफर को छोड़ फलाई ओवर्स पर भागने लगे।

ये सिर्फ बाहरी भागमभाग का मुआमला नहीं, ये विकास से किसी बैर की बात भी नहीं लेकिन इस सब के बीच खुद से छूट जाने की बात हो। जो सादगी हमारा गहना थी, जिसके सौंदर्य से हम खिल जाते थे, जिस सादगी के साये में हमारा व्यक्तित्व लगातार निखरता था, जिसकी आंच में हम सिंककर हम मजबूत होते थे अनजाने ही वो सादगी हमसे दूर होने लगी।

आज न जाने कितने उपाय ढूंढते फिरते हैं मन की शांति के...कितने ठीहे, कितने योग, कितने पैकेज लेकिन ये कस्तूरी को वन में ढूंढने जैसा ही है।

हमने सबसे सुंदर पहाड़ काटे वहां अपना सीमेंट का घर बनाने को, सबसे सुंदर जंगल काटे घर के अंदर नकली जंगल उगाने को। जीवन में एक नकलीपन भर लिया...लेकिन इन सबसे दूर...धूप अब भी अपने सौंदर्य पर इठलाती है, गुलाबी हवाओं की रूमानियत अब भी इश्क की रंगत बढ़ाती है...सादगी अब भी मिलती है किसी अल्हड़ मुस्कुराहट में।
कुम्हार की माटी सी सादगी...मौसम की करवट सी सादगी...मोहब्बत के आंसू सी सादगी...नन्हे के हाथों की आड़ी-टेढ़ी लकीरों सी सादगी...जीवन इनसे दूर कहीं नहीं है...मत जाओ काबा, मत जाओ गिरजा...इबादत बस इतनी कि अपने भीतर की सादगी पे आंच न आने देना...
सादा होना, सरल होना...। इतना कठिन भी नहीं सरल होना, इतना जटिल भी नहीं सादा होना, बस कि उस जरूरत को महससूना जरूरी है। मौसम अंगड़ाइयां ले रहा है...सुबहें पलकों में ढेर सारे ख्वाब सजा के जाती हैं, नन्ही ओस की बूंदें शाम को आॅफिस से घर जाते वक्त कांधों पे सवार होकर गुनगुनाती हैं...कितने बरसों से वो बूढ़ा उसी मोड़ पर बांसुरी बजाता मिलता है...दिन भर की अकराहट को उठाकर फेंकने को रास्ते में बिखरी जिंदगी की तमाम सादगियां इस कदर काफी हैं कि और कोई चाहत भी नहीं।

हां, उसी मोड़ पर फिर ठिठकते हैं कदम जहां महबूब से हाथ छूटा था...उस लम्हे की सादगी में इश्क की पाक़ीज़गी अब तक सांस लेती है... किसी कैफेटेरिया में नहीं, किसी सिनेमा हाॅल में नहीं, किसी आलीशान पार्क में भी नहीं यूं ही भीड़ भरी सड़क पर एक रोज दो दिलों की आहटें टकरा गई थीं...वो लम्हे अब भी उन्हीं सड़कों पर मुस्कुराते हुए दौड़ते फिरते हैं...ये उन लम्हों की सादगी की तासीर ही है कि सौंदर्य का फलसफा कभी ब्यूटी पार्लर के बाहर टिका ही नहीं...वो तो उस अनमोल सी सांवली सूरत पे अटका हुआ है, जिसने बिना कोई जतन किये अपने भीतर की सादगी को महफूज रखा है...न जाने क्या है इस सादगी में....कैसा आकर्षण....कैसा खिंचाव...कि जीवन के कोरे कागज से जब सारे अक्षर झाड़ कर गिरा दिये तब भी ये तीन अक्षर वहां रह ही गये...मुस्कुरारते...गुनगुनाते...जिंदगी का कोरा कागज....खिलखिला दिया...जिंदगी की इस सादादिली पे कौन न फिदा हो जाये भला...

(प्रकाशित)