Friday, June 27, 2014

कौन पढ़ पाता है खुशबू यहाँ...

(Pic- Anna Aden, courtesy- Google)


अँधेरा सिर्फ तब नहीं घिरता जब दिन अपना सामान समेटता है, अँधेरा सूरज से आँख मिलाते हुए भी उग सकता है. ठीक ऐसा ही रौशनी के साथ भी है. रौशनी, मैं बार बार रौशनी दोहराती हूँ. चारों तरफ घुप्प अँधेरा है और मैं किसी मन्त्र की तरह रौशनी उच्चारती हूँ. जैसे-जैसे अँधेरा बढ़ता है मैं अपनी दाहिनी हाथ की कलाई से बायीं हाथ की कलाई को थाम लेती हूँ. साँसों की बढ़ती हुई रफ़्तार पर धीरे से कान रख देती हूँ. आँखों को मूंदते हुए रौशनी....रौशनी....रौशनी....पुकारती हूँ. अँधेरा ठहाके मारकर हँसता है. मैं कान मूँद लेती हूँ. अपनी आवाज से अपने कानों के कुँए को भर लेना चाहती हूँ.

कोई झिंझोड़ के कहता है इतनी रौशनी तो है, इतना ढेर उजाला, तुम्हें क्या चाहिए? पर मुझे तो उजाला नहीं दीखता अँधेरा ही दीखता है, गहन अँधेरा, एकदम स्याह मानो लील लेगा सब कुछ. मैं खामोश हो जाती हूँ.

मेरी हथेलियों से फिसलकर मेरे शब्द अपने अर्थ समेत कहीं गुम गए हैं. उनके भाव चिपके हुए हैं हथेलियों में, अपनी तमाम खुशबू के साथ. कौन पढ़ पाता है खुशबू यहाँ। ये शब्दों की दुनिया है. मैं शब्दों को टटोलती हूँ, मिलते नही. जिस भाषा में मैं कुछ कहती हूँ वो शब्द विहीन है. लोग मुझे अजीब ढंग से देखते हैं. मैं उन्हें. मैं इस दुनिया से भाषा में भी बिछड़ गयी. मेरी हथेलियों पर चिपकी गुम गए शब्दों की खुशबू मुझे बेचारगी से देखती है.

रात मुझे घूरकर देखती है. मैं सहम जाती हूँ. खुद को समेटकर एक कोने में रख देती हूँ. काली चाय पीने की इच्छा को भी समेट देती हूँ. तभी एक चिड़िया मेरी मेज पर आकर सर टिकाती है. मैं उसे अपने पास से उड़ा देना चाहती हूँ कि कहीं ये अँधेरे का नश्तर उसे चुभ न जाये. वो मुझे खिड़की के बाहर देखने को कहती है.…उसके चहचहाने में रौशनी का सन्देश है. उसके सन्देश से झरती हैं कुछ बूँदें. पलकों पर नमी महसूस होती है.एक ये कमबख्त मन का मानसून है कि थमता नहीं और एक ये मौसम वाला मानसून है आने का नाम नहीं ले रहा. सच है जिसका इंतज़ार करो बस वही नहीं आता बाकी सब मुंह उठाये चले आते हैं.

उस नन्ही चिड़िया का हाथ थाम लेती हूँ. मेरे खो गए शब्दों में से कुछ मुझसे टकराते हैं. जो आवाज कानों में टपकती है वो ये है 'सुनो, तुम चली तो न जाओगी.... रहोगी न साथ हमेशा?' चिड़िया चुपचाप सर हिला देती है.... खिड़की के बाहर गुम गए शब्दों का ढेर है. अब मेरी उनमे कोई दिलचस्पी नही.

हल्का महसूस हो रहा है. कहने और सुनने से मुक्ति है....


Wednesday, June 25, 2014

बड़ी बात नहीं है मोहब्बत करना...




सुनो, बड़ी बात नहीं है मोहब्बत करना, बड़ी बात तो है मोहब्बत को सांस-सांस सहना। 

बड़ी बात नहीं है अपने आंचल की खुशियों को किसी के नाम कर देना, बड़ी बात है कि फिर उन खुशियों के लिए न तो बिसूरना और न उनका जिक्र करना, खुद से भी नहीं। 

बड़ी बात नहीं है अपनी आंखों में उगा लेना ढेर सारे ख्वाब, बड़ी बात है उन ख्वाबों की मजबूत परवरिश करना। 
बड़ी बात नहीं है यूं ही किसी बीहड़, अनजाने सफर पर निकल पड़ना, बड़ी बात तो है उस सफर को जीवन का सबसे खुशनुमा सफर बना लेना। 

कोई बड़ी बात नहीं है हथेलियों पर सूरज उगा लेना, बड़ी बात है सूरज की रोशनी को धरती के अंतिम अंधेरे तक पहुंचा पाना। 

बड़ी बात नहीं है किसी का दिल जीत लेना, बड़ी बात है जीते हुए दिल पे अपनी जान हार जाना। 

बड़ी बात नहीं विनम्रता की चादर ओढ़ अपने लिए गढ़वा लेना अच्छे होने की इबारतें, बड़ी बात है तमाम रूखेपन, अक्खड़ता, बीहड़ता के बावजूद किसी की आंख का आंसू किसी के दिल की धड़कन बन पाना।

(अगड़म बगड़म )

Thursday, June 12, 2014

मुरझाई नींदों का सबब ....


मेरा भी अजीब हिसाब है। पहले खुद हर रोज नींदों की तह बनाकर सिरहाने रख लेती हूं, फिर खाली आंखों से नींद तलाशती हूं। छत, दीवार, दीवार पर लगी घड़ी, पेंटिंग, पर्दे, रैक में लगी किताबें, उलझे पड़े अखबार...दीवार पर पड़े सीलन के निशान, वो छोटा सा निशान जहां पहले शायद कील रही होगी और कील के न रहने से वो खाली पड़ा है जैसी और न जाने कितनी चीजों से गुजरती हैं आंखें। लेकिन नींद नहीं मिलती। ज्यों-ज्यों रात गहराती है कमरे की चीजें और जीवन के बीते लम्हे और भी ज्यादा साफ नजर आने लगते हैं। आंखें इन चीजों में स्मृतियों के पन्नों में ऐसे उलझती हैं कि नींद का ख्याल भी गुम हो जाता है।

सुबह को सूरज जब आंखों की तलाशी लेता है तो नींद उसे वहां मिलती नहीं। वो कमरे की तलाशी लेता है और सिरहाने से नींद बरामद करके मुस्कुराता है।' पगली ...तेरी आंखों के ठीक नीचे थी नींद और तू...? तूने रात का नियम तोड़ा है....रात में सोने का नियम...सजा तो मिलेगी?' सूरज कहता है। सजा वाली बात पर मेरा ध्यान नहीं जाता, बस नियम तोड़ने वाली बात पर जाता है। यह बात मुझे अच्छी लगती है। सूरज तलाशी लेकर जा चुका था। उसने मेरे लिए किस सजा का ऐलान किया मैंने सुना ही नहीं लेकिन अब मेरे पास मेरी रात की खोई हुई समूची नींद थी और एक प्याला चाय भी। मैंने नींद से माफी मांगी और सामने वाले आम के पेड़ पर चल रहा चिड़ियों का खेल देखने लगी।

आज चिड़ियों के खेल में रवानगी नहीं थी। उनमें वो चंचलता नहीं, शोखी नहीं, एक उदासी थी। आज उन्होंने ठीक से दाना भी नहीं खाया। एक उदास चिड़िया अपनी सहेली से कह रही थी, 'जिन पेड़ों पर हमारा आशियाना होता है, जिस पर हम चहकते हैं, उछलते हैं, खेलते हैं जिस पर हम मौसमों के गीत गाते हैं उन्हें भी इंसानों ने शमशान घाट बना डाला। किससे पूछकर वो हमारे आशियाने पर अपनी वहशियत की निशानियां टांग जाते हैं।'' पेड़ों की हर शाख उदास है इन दिनों,' उसकी सहेली ने कहा। 'सबको छाया, फल देने वाले पेड़ों की शाखों को हैवानियत का बोझ उठाना पड़ रहा है। '

'क्या हम कुछ कर नहीं सकते,' छोटी चिड़िया ने बड़ी चिड़िया से पूछा। बड़ी चिड़िया चुप रही। ' बता न  माई, सुना है संसद में सुनवाई होने पर सब ठीक हो सकता है...क्या हम सारी चिड़िया मिलकर संसद में नहीं जा सकतीं? क्या हम उनसे कह नहीं सकती कि बाद में बनाना बड़े-बड़े पुल, बाद में बनाना बड़े मॉल, बाद में लाना बड़ी कंपनियां, सबसे पहले इस धरती पर बहने वाली रक्त की धार को तो रोको, इंसानियत की चीखों को तो रोको...और अगर नहीं रोक सकते तो आओ हमारे साथ, हम मिलकर उन शिकारियों की आंखें नोच लेंगे...'

बड़ी चिड़िया दाना चुगने में लग गई लेकिन उसका दाना खाने का मन नहीं किया, फिर उसने पानी में चोंच डाली लेकिन शायद उसकी प्यास भी मर गई थी.....

मैंने वापस कमरे में जाकर देखा कि मैं नींद की जिस डाल को सहेजकर आई थी, वो अब मुरझाने लगी थी....

Tuesday, June 10, 2014

एक तुम्हारी याद....



एक तुम्हारी याद
पूर देती है जख्म सारे

जेबों में भर देती है
खुशियों की ढेर सारी आहटें

जिंदगी के कैनवास पर रचती है
उम्मीदों की मासूम लकीरें

मायूसियों को विदा कहते हुए
मुस्कुराती है
पलकें झपकाती है, गुनगुनाती है

एक तुम्हारी याद
क्या से क्या कर देती है
बंजर सी धरती पर
बारिश बो देती है…

Sunday, June 8, 2014

यह किसका प्रेम है बोलो तो?


लड़का- 'तुम इस धरती पर कब आईं....?'
लड़की-' धरती पर नदियों के आने से भी पहले, खेतों में पहली फसल की खुशबू उगने से बहुत पहले, मौसम की पहली अंगड़ाई लेने से भी पहले....'

लड़का- 'इतनी सदियों से धरती पर आकर तुमने क्या किया?'
लड़की- इंतज़ार
लड़का- 'किसका?'
लड़की- 'तुम्हारा नहीं....'
कहकर लड़की खिलखिला कर हंस पड़ी। ज्यों-ज्यों वो हंसती जाती नदियों का कोलाहल बढ़ता जाता, फूलों की गमक बढ़ती जाती, बादलों की धमक बढ़ती जाती। सूरज का ताप बढ़ता जाता.....
लड़की ने लड़के की पीठ से अपनी पीठ टिकाते हुए कहा, 'सुनो ये धरती पर नदियों के जन्म से पूर्व की कथा है। ये किसी भी राजा या रानी के अस्तित्व में आने से पूर्व की कथा है। यह बुद्ध के ज्ञान और ईसा के क्रूस पर लटकाये जाने से भी बहुत पहले की बात है। धरती एकदम खाली थी। खुशी से भी, गम से भी। तभी एक लड़की ने धरती पर पांव रखा। धरती को मानो प्राण मिले। अकेली धरती, कबसे अपनी धुरी पर घूमते-घूमते उकता चुकी थी। उसका न कोई साथी, न सहेली।

लड़की आई तो धरती ने उसे सीने से लगाया। खूबसूरत मौसम जो न जाने कबसे बिना किसी भाव के बस आते-जाते रहते थे। धरती ने उन मौसमों की चूनर में आकाश के सारे तारे टांककर एक सुंदर ओढ़नी बनाई। उसे लड़की को ओढ़ाया। लड़की मुस्कुरा उठी। यह धरती पर लड़की की पहली मुस्कुराहट थी। उसके मुस्कुराते ही मौसम भी मुस्कुरा उठे। लड़की और धरती अब सखियां थीं। लड़की कभी-कभी धरती से कहती लाओ अपना बोझ मुझे दे दो, तुम थोड़ा आराम कर लो, थक गई होगी....अपनी परिधि पर लगातार घूमना आसान है क्या...और सचमुच धरती कुछ दिन लड़की के पहलू में सिमटकर सो जाती, उन दिनों सूर्य के चारों ओर धरती नहीं, लड़की चक्कर लगाती थी। सृष्टि के कारोबार में कोई विघ्न डाले बगैर यह दोस्ती गाढ़ी हो रही थी। 

सुनो तम्हें एक राज की बात बताती हूं, लड़की अब भी कभी-कभी धरती हो जाती है, धरती कभी-कभी लड़की। 

एक रोज जब आसमान में खूब घने बादल थे....धरती भी रात के तीसरे पहर में ऊंघते हुए सफर कर रही थी लड़की की आंख से पहला आंसू टपका। वो आंसू धरती पर गिरा तो धरती पर नदियां बहने लगीं....धरती ऊंघते से जाग उठी। इसके पहले कि धरती कुछ समझ पाती धरती पर मीठे पानी का सोता फूट पड़ा। पानी ही पानी। झरने फूट पड़े। मीठे पानी वाले झरने। धरती ने उस पानी को चखा ये समंदर के पानी सा खारा नहीं था। इस पानी की मिठास ही अलग थी।
एक रोज धरती ने लड़की का हाथ पकड़ लिया और पूछा,' तू क्यों उदास रहती है? क्या तलाश रही है तू? '
लड़की खामोश...हवाएं शांत...चांद चुप, तारे टकटकी लगाये उसे सुनने को बेताब। 'मैं धरती पर किसी को तलाशते हुए आई हूं....कोई ऐसा जो मेरे होने को विस्मृत करे, कोई जिसे देखते ही आंखें तृप्त हों, जिसे सुनकर लगे कि सुना सबसे मीठा संगीत, कोई आत्मा के तमाम बंधनों से मुक्त करे...कोई जो होने को होना करे और जिसके साथ मिलकर धरती पर प्रेम रचा जा सके....

धरती ने ठंडी आह भरी...आकाश की ओर देखा, आकाश मौन रहा...उसने सिर्फ पलकें झपकायीं....'ओह...प्रेम की तलाश...?' संपूर्ण सृष्टि ने कहा, 'यानी दुःख की अभिलाषा....धरती बुदबुदाई...लड़की जा चुकी थी...दूर कहीं एक और नदी जन्म ले रही थी। ये लड़की के भीतर का प्रेम था, जिसकी चंद बूंदें भर छलकने से धरती पर नदियों का जन्म हुआ...यह धरती पर नदियों के आने की कथा है...कोई भागीरथी नहीं लाया था किसी की जटाओं से मुक्त कराकर कोई नदी, दरअसल, स़्त्री के प्रेम से जन्मी हैं सारी नदियां....कुछ समझे बुद्धू...'
लड़की ने कहानी के आखिरी सिरे में गांठ लगाते हुए कहा।
लड़का- तुम फिर शुरू हो गई? तुम और तुम्हारी कहानियां। दुनिया में हजार परेशानियां है और तुम्हारी कहानियां...जाने किस दुनिया से आती हैं। 

लड़का अचानक उठ खड़ा हुआ। उसके इस तरह अचानक उठकर खड़े होने लड़की जो उसकी पीठ पर पीठ टिकाये थी लुढ़क गई। लड़की बिना संभले हुए ही मुस्कुरा उठी। 'तुम चिढ़ गए हो ना?' वो अपनी मुस्कुराहट को चुपके से चबा रही थी।
लड़का- 'मैं क्यों चिढूंगा? क्यों चिढूंगा मैं बोलो?' ऐसा कहते हुए लड़का झुंझला रहा था।
लड़की- 'क्योंकि मेरी कहानी में इस बार तुम नहीं हो। कहीं नहीं हो....इसलिए...' लड़की ने सामने बहती नदी में कंकड़ उछालते हुए कहा। 

लड़का उठकर चल दिया। यूपीएससी के फॉर्म जमा करने की आखिरी तारीख है। उसे याद आया। वो जनता था कि लड़की से इस बारे में कुछ भी कहने का कोई अर्थ नहीं। वो फॉर्म के टुकड़े करके हवा में उछाल सकती है।
लड़की अपनी ही धुन में थी।

'बोलो चिढ़ गये न तुम....?' अब लड़के ने मुस्कुराहटें चबाईं....उसने लड़की की लंबी चोटी खींचकर उसे अपने करीब कर लिया। शरारतें गुम हो गईं सारी...सिर्फ सांसें बचीं...

'वो जो लड़की की आंख का पहला आंसू गिरा था धरती पर वो किसके लिए था बोलो तो...इन नदियों में पानी नहीं प्रेम बहता है...पता है ना? यह किसका प्रेम है बोलो तो? लड़की चुप....लड़का चुप...धरती चुप....आसमान चुप...'
कुछ देर बाद वहां न लड़का न लड़की सिर्फ नदी की चौड़ी धार बहती दिखी....जिसके किनारों पर अल्हड़ खिलखिलाहटों का जमावड़ा था, जिसके किनारे पंछियों की चहचआहट थी, फसलों की खुशबू, जिंदगी नदी के किनारों पे महक रही थी....

Monday, June 2, 2014

हत्यारे की आंख का आंसू और तुम्हारा चुंबन


सुनो,
बहुत तेज आंधियां हैं
इतनी तेज कि अगर
ये जिस्म को छूकर भी गुजर जाएं
तो जख्मी होना लाजिमी हैं
और वो जिस्मों को ही नहीं
समूची जिंदगियों को छूकर निकल रही हैं
उन्हें निगल रही हैं

ना....रोशनी का एक टुकड़ा भी
धरती तक नहीं पहुंच रहा
सिसकती धरती के आंचल पर सूरज की रोशनी का
एक छींटा भी नहीं गिरता

मायूसियों के पहाड़ ज्यादा बड़े हैं
या जंगल ज्यादा घने कहना मुश्किल है

जिंदगी के पांव में पड़ी बिंवाइयों ने रिस-रिस कर
धरती का सीना लाल कर दिया है
और उम्मीदों की पीठ पर पड़ी दरारें
अब मखमली कुर्ती में छुपती ही नहीं

हत्यारे का जुनून और उसकी आंखों की चमक
बढ़ती ही जा रही है
इन दिनों उसने अपनी आंखों में
आंसू पहनना शुरू कर दिया है
आंसुओं की पीछे वाले आले में वो अपने अट्टहास रखता है
और होठों पर चंद भीगे हुए शब्दों के फाहे
जिन्हें वो अपने खंजर से किये घावों पर
बेशर्मी से रखता है

सुनो, तुम्हें अजीब लगेगा सुनकर
लेकिन कुछ दिनों से भ्रूण हत्याएं
सुखकर लगने लगी हैं
जी चाहता है ताकीद कर दूं तमाम कोखों को
कि मत जनना कोई शिशु जब तक
हत्यारों का अट्टहास विलाप न बन जाए
जब तक रात के अंधेरों में इंसानियत के उजाले न घुल जाएं
बेटियों, तुम सुरक्षित हो मांओं की ख्वाबगाह में ही
तुम्हारी चीखों के जन्म लेने से पहले
तुम्हें मार देने का फैसला, उफफ....

सुनो, तुम तो कहते थे कि हम बर्बर समाज का अंत करेंगे
अंधेरों के आगे उजालों को घुटने नहीं टेकने देंगे

प्रिय, तुम तो कहते थे कि एक रोज यह धरती
हमारे ख्वाबों की ताबीर होगी
हमारी बेटियां ठठाकर मुस्कुराएंगी,,,,
इतनी तेज कि हत्यारे की आंखों के झूठे आंसू झर जायेंगे
और उसके कांपते हाथों से गिर पड़ेंगे हथियार

एक रोज तेज आंधियों के सीने पर हम
उम्मीदों का दिया रोशन करेंगे...
और आंधियां खुद बेकल हो उठेंगी
उस दिये को बचाने के लिए

प्रिय, आज जब हवाओं का रुख इस कदर टेढ़ा है
तुम कहां हो
इस बुरे वक्त में सिर्फ हमारा प्र्रेम ही तो एक उम्मीद है

आओ मेरी हथेलियों को अपनी चौड़ी हथेलियों में ढांप लो
आओ मेरा माथा अपने चुम्बनों से भर दो
तुम्हारा वो चुंबन
इस काले वक्त और भद्दे समाज का प्रतिरोध होगा
तुम्हारा वो चुंबन हत्यारे के अट्टास को पिघलायेगा
वो जिंदगी के पांव की बिंवाइयों का मरहम होगा
और धरती के नम आंचल में रोशनी का टुकड़ा

सुनो, सिर्फ मुझे नहीं
समूची कायनात को तुम्हारा इंतजार है
कहां हो तुम....