Tuesday, March 18, 2014

चूंकि मैं ये सवाल उठाता हूँ ....


वे चाँद पर जायेंगे
और उससे भी आगे उन ऊंचाइयों तक
जिन्हें दूरबीनें भी नहीं पकड़ सकतीं

लेकिन ज़मीन पर
आख़िरकार कब कोई भी भूखा नहीं होगा
या किसी से ख़ौफ़ नहीं खायेगा
या कब लोग यहाँ-वहाँ धक्के नहीं खायेंगे
दुत्कारे नहीं जायेंगे
उनके हक़ मारे नहीं जायेंगे?
चूंकि मैं ये सवाल उठाता हूँ
कम्युनिस्ट कहा जाता हूँ

- नाज़िम हिक़मत

Sunday, March 16, 2014

रंगों का घर बदलना, सांसों का जिंदगी बन जाना...




बहुत...बहुत...बहुत दिन हुए थे...दुनिया की हर चीज अपने ठिकाने पर धरे-धरे उकताने लगी थी। आसमान टंगे-टंगे, धरती घूमते-घूमते, बात बनते-बनते, रात ढलते-ढलते, सूरज उगते-उगते. शाखों पर फूल भी अनमने से खिलते और बिखर जाते। लयबद्ध....क्रमबद्ध...कितना उबाऊ  होता है इस तरह चलते जाना...

ये जिंदगी का कौन सा रंग हुआ भला...रंग का रंग में ठहर जाना, जिंदगी का सांस में ठहर जाना...उफफ...ऐसी ही किसी उब भरी दोपहरों में एक रोज जिंदगी ने अंगड़ाई ली और मुस्कुराकर कहा, हरा...अब हरा नहीं रहेगा...सारे रंगों ने चैंककर हरे को देखा, वहां हरा नहीं था...खुशबूू थी कोई...दूर तक फैले हरे-हरे खेत और महकती हुई गेहूं की बालियों की खुशबू...वो खुशबू गुलाबी रंग की थी। धरती धानी चुनर ओढ़े इठला रही थी। पलाश ऐसे खिलखिलाकर हंसते हुए मिलते रास्तों में कि मानो हंसी का दौरा पड़ा हो...आम की बौर की महक ने धरती को दीवाना बना रखा है। उफफ ये महकते दिन...ये रंगों के ज्वार के दिन हैं। कुदरत के सारे रंग खुशबुओं में ढल चुके हैं। शाखों पर महकते हैं गुलाबी रंग के नाजुक से दिन और आसमान ने टपकती हैं दूधिया चांदनी...जब फागुन रंग चढ़ता है न तो कुदरत ऐसे ही बौरा जाती है...हरे रंग के खेतों पर आसमानी चुनर फैल जाती है।हथेलियों में समाने को व्याकुल होते हैं जिंदगी के सारे रंग कि बस हरा हरा नहीं रहता...वो कभी गुलाबी, कभी लाल, कभी पीला होने लगता है।

कभी कहा था उसने कि जब रंग अपने घर बदलने लगें तो समझो जिंदगी अब संास नहीं रही वो आस होने को है। रंग जब नाम बदलने लगें तो समझो कि मुश्किलों की विदा का मौसम है, रंग जब शक्ल बदलने लगें तो समझो कि मोहब्बतों का मौसम है...मौसम गुजरने वाला नहीं, ठहरने वाला। जिंदगी की कूची में ढेर सारे रंग थे। उम्र की दीवार पर जिंदगी के रंगों की कलाकारी देखते ही बनती थी। कि लाल को हाथ लगाओ तो हरा हाथ में लग जाता था, नीले की चाह करो तो गुलाबी आकर ठहर जाता था हथेलियों पर...कि रंग सारे थे पर अपने रंग से बाहर...अपने नाम से, अपने रूप से बाहर, अपने होने से बाहर।

किसी रोज एक नन्हे से बच्चे ने कुदरत की कारीगरी वाली गीले रंगों की तस्वीर पर अपनी शरारत उड़ेल दी। उसने उन गीलों रंगों पर अपना हाथ फिरा दिया। रंग सारे एक हो चले। ढूंढों नीला तो मिलता लाल, तलाशो पीला तो उंगलियों में धानी चिपका मिलता। सिर्फ रंग नहीं, आक्रतियां भी उलझ गयीं आपस में। ढूंढो नीले रंग का आसमान तो नज़र आता लाल रंग का समंदर...जिंदगी मुस्कुरा रही थी नन्हे की उस दिलफरेब शरारत पर। कि जहां कुदरत की सीमाएं भी टूटने को, बिखरने को आतुर हों वहीं जिंदगी के रंग उगते हैं। ये वही मौसम है...जिंदगी के रंग बिखरने का, इंद्रधनुष कितना ही रूठ ले अब रंग उसकी झोली में वापस आने वाले नहीं। कि रंगों को पंख लग चुके हैं। वो उम्मीदों की झांझर बांधे गेंहूं के धान के खेतों में नाचते फिरते हैं...खाली पड़ी शाखों पर उम्मीदों के रंग बिखरने को हैं, कहीं कोपलों ने अपनी आमद दर्ज करा भी दी है और कहीं उन शाखों पर मुस्कुरा रहा है इंतजार।

रेत को मुट्ठियों में भरकर देर तक रोकने की चाहत में उसे जर्रर्रर्र से गिरते देखा है क्या? जिंदगी वैसी ही है...वो जर्रर्रर्र से गिरना है जिंदगी का सबसे पक्का रंग जो कहता है स्थायी कुछ भी नहीं...जो है उसे जी भर के जी लेना ही है जिंदगी का सुर्ख रंग...उसके ठीक पास ही कहीं रहता है उम्मीदों वाला गुलाबी रंग और उम्मीदों वाले गुलाबी रंग का पक्का दोस्त है जिंदगी के प्रति सकारात्मक रुख बनाये रखने वाला काला मजबूत रंग...न...काले को निराशा के रंग के रूप में देखना बंद भी कीजिये...काला अब द्रढ़ इच्छाशक्ति का प्रतीक बन चुका है।

सच में ये रंगों के घर बदलने का मौसम है...उसने अपने घर के दरवाजे पर लिखा और चुपचाप भीतर जाकर सो गई। सुबह दरवाजे पर अनगिनत रंगों वाली रंगोली सजी थी...दोस्त ने पूछा ये रंगों के घर बदलने का क्या अर्थ है...वो मुस्कुराई...उसने धीरे से कहा ये सांसों के जिंदगी बन जाने वाली बात है...रंगों के घर बदलने का अर्थ है सांसों का जिंदगी बन जाना...कुदरत ने मुस्कुराकर उसके कहे का सजदा किया...! अमराइयों की खुशबू फिजाओं में बिखर रही थी.... 


Sunday, March 9, 2014

स्त्री के लिए एक कमरा....


वर्जीनिया वुल्फ के कमरे से बाहर आते हुए दूर-दूर तक कोई कमरा नजर नहीं आता।

एक कमरा। एक स्त्री के लिए एक कमरा? कैसी अजीब सी बात लगती है ना सुनने में? भला एक स्त्री के लिए एक कमरे के अलग से होना का क्या अर्थ है। जरूरत ही क्या है ऐसी कोई? अरे जनाब, जिस जमाने में दो कमरे के मकान में पूरा परिवार बसर करता हो, भला किसी स्त्री के लिए एक कमरे की बात का भी क्या औचित्य हो सकता है? तो यहां मेरा तात्पर्य कम से कम ईंट और गारे से बने कमरे भर से नहीं है, उससे भी हो सकता है लेकिन उतना ही नहीं। मेरा तात्पर्य है एक स्त्री के जीवन के 24 घंटों में से उसके लिए एक टुकड़ा स्पेस होने से। ऐसा स्पेस जहां वह खुद को महसूस कर सके। अपनी तमाम चिंताओं, परेशानियों को उतारकर रख सके। तमाम हिदायतों और नसीहतों से पीछा छुड़ा सके। रियाज कर सके, लिख सके, खेल सके, गप्पें मार सके, खुलकर हंस सके या रो भी सके।

आमतौर पर इस तरह के स्पेस की स्त्रियों के जीवन में कोई जरूरत भी है यह उन्हें सारी उम्र पता नहीं चल पाता। यूं एक कमरे साॅरी स्पेस की जरूरत तो पुरुषों को भी है ही फिर स्त्रियों के लिए ही इसकी पैरवी की बात क्यों? सवाल तो वजिब है, लेकिन अपने भीतर ही इसका जवाब भी छुपा है। जिस समाज में हम जी रहे हैं पुरुषों के लिए अपना स्पेस क्रिएट करना कोई मुश्किल काम नहीं है, मुश्किल है स्त्रियों के सामने जिन्हें एक ही वक्त पर पाॅवर प्वाॅइंट प्रेजेंटेशन भी बनाना होता है, और बच्चे का दूध भी। एक ही वक्त पर आॅफिस में कोई मीटिंग काॅल करनी होती है और घर में शाम के डिनर की तैयारी भी करवानी होती है। भागकर मेटो पकड़नी होती है और बुखार में तपती देह को इग्नोर करना होता है।

सारी जिंदगी दौड़ते-भागते जूझते हुए छोटे से घर के सपने को पूरा करने की जद्दोजेहद के बाद भी जब उन्हें खुद का दामन थामना होता है तो इस पूरी समूची दुनिया में एक कोना नजर नहीं आता। वाॅशरूम में नल चलकर अपनी सिसकियों को बहा देने के सिवा कोई नया आॅप्शन अब तक ईजाद नहीं हो सका है।

यह बात और है कि अब इसकी जरूरत महसूस करने वाली स्त्रियों की संख्या बढ़ रही है। रूस की कवियत्री मरीना अपनी डायरी में लिखती है कि एक सतही फूहड़ व्यंग्य लिखने वाले लेखक भी अपने लेखन के लिए एक कमरा, मेज और समय का जुगाड़ कर लेते हैं जबकि स्त्रियों के लिए यह बेहद अप्राप्य है। कथाकार शिवानी के उपन्यासों के बनने की प्रक्रिया में हल्दी, तेल लगे कागज हों या ममता कालिया के एक पत्नी के नोट्स से गुजरना हर जगह उस एक कमरे की कमी नज़र आती है।
इस एक कमरे की तलाश सिर्फ लिखने, पढ़ने की दुनिया से जुड़ी स्त्रियों की बात भर नहीं है। यह एक कमरा दरअसल स्त्रियों को उन्हें उनके करीब ले जाने, अपने आपको समझने, महसूस करने, अभिव्यक्त कर पाने की आजादी की तलाश है। भले ही जिंदगी की दौड़ भाग ने उन्हें यह महसूस कर पाने की इजाजत भी न दी हो लेकिन अब उनका अंतर्मन इस भाग-दौड़ में भी यह कमी महसूस करने लगा है। आज की स्त्री ने अपने कोने की तलाश शुरू कर दी है।
पिछले बरस की ही तो बात है जब मेरी एक दोस्त ने बताया कि उसने वक्त से पहले रिटायरमेंट सिर्फ इसलिए लिया कि वो कुछ समय अपने लिए जीना चाहती थी। 35 बरस की शादी के बाद भी उसके लिए अपने संभ्रात पति को यह बता पाना आसान नहीं हो पाया कि उसके लिए उसके अपने स्पेस के मायने क्या हैं।

सदियों से स्त्रियों की दुनिया से यह कमरा गुम है। वो कई कमरों के मकान में भले ही रह लें लेकिन उनकी जिंदगी में उनका कमरा, उनके 24 घंटों में से एक लम्हा जो उनका हो नदारद ही है। शायद इसी कमी से जूझने के लिए वो गोल घेरों के बीच नज्में गाने लगीं। उनकी बतकहियों के किस्से मशहूर होने लगे। मशहूर होना लगा कि स्त्रिया ंतो चुप ही नहीं रह सकतीं....कभी कोई नहीं समझ पाया कि स्त्रियां दरअसल चुप ही तो हैं सदियों से। और अब उन्होंने उस चुप के दरवाजे पर दस्तक दी है। वो निकल पड़ी हैं अपने कोने की तलाश में। वक्त के किसी हिस्से पर वो अपने होने की मुहर लगाने को व्याकुल हैं। दौड़ती भागती जिंदगी में से कुछ लम्हे चुराकर वो अपना होना तलाश रही हैं, इस बड़ी सी जिंदगी में एक कोना तलाश रही हैं। ये उनके अपनी ओर बढ़ते कदमों की आहट है....ये तलाश उनकी खुद को महसूस करने की तलाश है।
(Published- 8 March 2014 )

http://epaperhindi.absoluteindianews.com/epapermain.aspx?ednm=11

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आईना आंख चुराता क्यों है...


जबसे पहनी है अपने होने की महक
आईना आंख चुराता क्यों है...

अभी-अभी वो लड़की मेरे पहलू से उठकर गयी है। उसकी खुशबू, उसकी सांसों में रची-बसी हिम्मत और उसकी आरजुओं की खनक सब बिखरा पड़ा है यहीं। वो लड़की जिसने अभी-अभी जीना सीखा है। अपनी सांसों की लय को अपनी हथेलियों में थामा है। वो लड़की जिसकी आंखों में ख्वाबों का कारवां है। ख्वाब जो उसके खुद के हैं। हिम्मत जो उसके चेहरे को संवारती है वो हिम्मत उसकी खुद की है, उसे किस राह पर चलना है और किस पर नहीं यह चुनाव उसकी खुद की समझ है। यह लड़की कौन है आखिर...? यह आज के दौर की लड़की है। सोच से, समझ से, हिम्मत से भरी हुई लड़की। जूझने का माद्दा लिये मुस्कुराहटों से भरपूर यह लड़की आपको कहीं भी नज़र आ जायेगी। इसका यह अर्थ नहीं कि पहले की लड़कियों में हिम्मत नहीं थी, सपने नहीं थे बस कि अब उसने पहरेदारी में सपने देखने से इनकार कर दिया है, एक मुट्ठी आसमान से अब उसका काम नहीं चलता। उसे भरपूर उड़ान के लिए पूरा आसमान चाहिए। इस पूरे आसमान को हासिल करने के लिए वो संघर्ष की आंच में खुशी से तपने को तैयार है। इसके लिए उसे लंबी चैड़ी डिग्रियों की, मोटी तनख्वाह वाली नौकरी की, मोटी-मोटी किताबों की दरकार नहीं, उसने बस खुद को पहचाना है।

सचमुच अभी जो लड़की कुछ देर पहले मेरे साथ बैठकर चाय पी रही थी और बता रही थी कि किस तरह उसने वो करने के लिए जो वो खुद करना चाहती थी घर छोड़ दिया। श्रद्धा यही नाम बताया था उसने। वैसे नाम कुछ भी होता क्या फर्क पड़ता उसकी कहानी में। कहानी कहो या जिंदगी एक ही बात है, एक समय के बाद जिंदगी कहानी सी ही तो लगने लगती है। घर छोड़ना जरूरी था क्या? यह सवाल उसके कानों में झूल रहा था। जाहिर है बहुतों ने पूछा होगा, उसने उन्हें क्या जवाब दिया क्या नहीं मुझे नहीं पता लेकिन जो जवाब उसने खुद को दिया था वो दिलचस्प था, कि लड़कियों की आजादी सिर्फ उनके ब्वाॅयफ्रेंड या उनकी पसंद की शादी भर से जुड़ी बात नहीं है। जैसा कि आमतौर पर समझ लिया जाता है। बल्कि यह उससे काफी आगे की बात है। नहीं है मेरा कोई ब्वाॅयफ्रेंड, नहीं करनी मुझे किसी से शादी बावजूद इसके जीना है अपनी मर्जी का। तलाशने हैं अपने रास्ते। कि बने बनाये रास्तों पर चलना ऊब देता है। वो जिंदगी ही क्या जिसके होने न होने का किसी को फर्क ही न पड़े।

श्रद्धा फिलहाल उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव के स्कूल में बच्चों को पढ़ा रही है। मां-बाप से छुपती फिर रही है कि अगर उन्होंने उसे ढूंढ लिया तो जबरन कहीं ब्याह देंगे। और उसके बाद श्रद्धा की जिंदगी भी किसी रोबोट सी हो जायेगी जिसके लिए वो कतई तैयार नहीं थी। उसने बच्चों की हथेलियों को थामा और अपनी जिंदगी की नई राह पर कदम रख दिया। हां, यह श्रद्धा की आंख का ही सपना है कि हर बच्चे का बचपन खिलखिलाता हुआ हो। वो स्कूल में पढ़ाने की बात नहीं करती, जीने की बात करती है। अभी श्रृद्धा ने छवि राजावत जैसी सफलता नहीं हासिल की है। उसकी मुट्ठी में यूएन में जाकर अपनी शख्सियत का झंडा गाड़ आने जैसी खबरें नहीं हैं, अभी उसके पीछे लोगों के विश्वास का काफिला नहीं है लेकिन उसकी आंखों में चमक है उस रास्ते पर चल पाने की जो उसने खुद तलाशा है। आसमान के सूरज ने जरूर अपनी गठरी बांध ली थी लेकिन श्रद्धा के इरादे पूरी बालकनी में बिखरे पड़े थे।

श्रृद्धा के जाते ही उसके जैसी तमाम मुस्कुराहटें मेरी आंखों में तैर गईं। ये कैसी बयार है फिजाओं में....बड़ी-बड़ी डिग्रियों वाले खेतों में बड़ी-बड़ी नौकरियों के सपने नहीं पलते। जीवन की सार्थकता की तलाश उगती है। तयशुदा राहों का सफर रास नहीं आता कि आजादी का स्वाद भाता है। आजादी जो सृष्टि को नया रूप रंग दे, जो जिंदगी को असल मायने दे, जो मुस्कुराहटों की वाजिब वजह बने।

चलते-चलते श्रद्धा मेरे दरवाजे पर आत्मविश्वास का एक गुच्छा टांग गई थी। डरती नहीं हूं किसी से, खुश हूं कि मर्जी का जी रही हूं। कितना लंबा सफर तय किया है इन मर्जियों ने। मर्जियां जो किसी ने गढ़ी नहीं हमारे जेहन में, जो किसी सोशल कंडीशनिंग से नहीं आती, परिपक्व समझ से आती हैं। मर्जियां जो काॅर्पोरेट के आलीशान एयरकंडीशंड आॅफिसों से इतर मुट्ठी भर सपने जीने की राह पर चलना चाहती हैं।

श्रद्धा अकेली नहीं है, कम ही सही लेकिन और भी स्त्रियां हैं जिन्होंने जिंदगी की लग्जरी को नहीं जिंदगी को अपना ध्येय बनाया। जो अपने व्यक्तित्व को विस्तार देने में खुश हैं। जो नहीं मानती किसी ऐसे नियम को जो उनकी हदें तय करते हों। कि अब वो अपने नियम खुद बनाने में यकीन जो करती हैं। नहीं करती परवाह कि उनके जीने से किसके और कितने नियम टूटते हैं...अपने आंचल को उसने कमर में कस लिया है...उसके आत्मविश्वास की खुशबू से ये जहां महक रहा है...सुना तुमने ये जो चारों ओर फिजाओं में खुशबू बिखरी हुई है ना ये नये दौर की स्त्रियों के आत्मविश्वास की महक है..

(डेली न्यूज़ में ५ मार्च २०१४ को प्रकाशित )


Tuesday, March 4, 2014

लम्हा-लम्हा झरती तुम्हारी याद .…


सुनो, वो जो धनिया के बीज बोये थे न, जिनके उगने का कबसे इंतज़ार था, वो उग आये हैं. इस बार घर लौटा हूँ तो वो मुस्कुराते हुए मिले, जाने क्यों उन्हें मुस्कुराते हुए देख तुम्हारी मुस्कुराहट याद आयी.

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बिल्ली का बच्चा जिसे गली के कुत्तों से बचाया था उस ठण्ड की रात में, और जिसे घर लाने पर शालू नाराज हो गयी थी, वो लौटा नहीं कई दिनों से.…अनहोनी कि आशंका से मन घबराता है यार. अब तुम मोह और दर्द के रिश्ते को मत समझाना। समझता हूँ मैं, पर मुझे उसकी मासूम आँखें याद आती हैं.… वो ठीक होगा न? हमेशा की तरह कह दो न कि सब ठीक है.… तुम्हें पता है तुम्हारे कहते ही सचमुच ठीक सा महसूस होने लगता है धीरे-धीरे....
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सुनो, तुम उदास हो न? बादलों का कोई टुकड़ा अभी गुजरा है करीब से, वो तुम्हारी उदासी का गीत गुनगुना रहा था. मुझे पता है इस वक़्त तुम अपनी चुप्पियाँ उतार फेंकने को व्याकुल होगी। दिन भर की थकन को चाय में घोलकर पी जाने की तुम्हारी इच्छा। जिंदगी को बूँद-बूँद जीने की तुम्हारी इच्छा, समूची धरती पर प्रेम बनकर बिखर जाने की तुम्हारी इच्छा, हर आँचल में बिना बताये मुस्कुराहटें बाँध देने की तुम्हारी इच्छा, बिना कुछ भी कहे तुम्हें समझ लिए जाने की तुम्हारी इच्छा, मेरी तुम्हारे साथ होने की इच्छा से कितनी ज्यादा बड़ी और पाक़ है.…
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यह इस दिन का आखिरी ख़त है. असल में आखिरी शब्द मुझे बहुत चुभता है. आखिरी शब्द का इस्तेमाल सिर्फ दुःख के दिनों, दर्द के, संघर्षों के ख़त्म होने के सन्दर्भ ही होना चाहिए। आखिरी बार। कि एक बार इसका इस्तेमाल होने के बाद इस शब्द की ज़रुरत ही न बचे. जब भी मैं आखिरी लिखता हूँ मैं अपने भीतर व्याकुलता महसूस करता हूँ. जैसे जिद सी जागती है आखिरी न होने देने की.

सुनो, तुम नाराज मत होना लेकिन मैंने उस रोज तुम्हारी बात नहीं मानी और मैं भीगता रहा. देर रात सड़क पर भीगते हुए पैदल चलते हुए मैं तुम्हारा अपने पास होना महसूस करता हूँ.

इस वक़्त मैं बुखार में हूँ.… मुस्कुरा रही हो न तुम?

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मेरे ऑफिस के सामने एक सड़क है जिसका जिक्र मैं तुमसे अक्सर करता हूँ, उस सड़क के पार कोई बिल्डिंग बन रही है. वहाँ काम करने वाले मजदूरों के बच्चों से दोस्ती हो चली है मेरी। हम दूर से एक दूसरे को देखकर मुस्कुराते हैं. आज सुबह मैं जब चाय पीते हुए उनसे आँख का खेल खेल रहा था न जो मैंने तुमसे सीखा है तो वो पास में पड़े डंडे को गाड़ी बनाकर खेलने लगा. वो इतना खुश था, क्या कहूँ, उसका वो बार-बार मुड़कर मेरी ओर देखना। मुझे जब भी कोई सुख का लम्हा छूता है तो महसूस होता है कि तुमने मेरी बांह थाम ली है, या कंधे पर सर रखकर मुस्कुरा रही हो. बहुत दूर, बहुत पास.

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अब बस भी करो बरसना, बहुत हुआ. मुझे नींद आ रही है और जब तक तुम यूँ बरसती रहोगी मैं सो न सकूंगा। ये वक़्त आसमान से बरसने का नहीं ख्वाब बनकर आँखों में झरने का है..... सुना तुमने

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