Friday, January 31, 2014

जिसे जीना बाक़ी है...

सब कुछ हो रहा है,
हर शाम एक टीस का उठना,
सब कुछ होने मैं शामिल रहता है।

किस्म-किस्म की कहानियाँ, आँखो के सामने चलती रहती है।
कुछ पड़ता हूँ ... कुछ गढ़ता रहता हूँ।

दिन में आसमान दखता हूँ।

जो तारा रात में दखते हुए छोडा था...वो दिन में ढूँढता हूँ।
सपने दिन के तारों जैसे है।
जो दिखते नही हैं... ढूढने पड़ते हैं।

रात में सपने नहीं आते....
सपनों की शक्ल का एक आदमी आता है।
ये बचा हुआ आदमी है।
जो दिन के 'सब कुछ होने में'- सरकता रहता है,
और शाम की टीस के साथ अंदर आता है।
ये दिन की कहानी में शामिल नहीं होता....

इसकी अपनी अलग कहानी हैं...
जिसे जीना बाक़ी है.… 

- मानव कौल 

(मानव की अन्य कविताओं को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें -http://manavaranya.blogspot.in/)

Wednesday, January 29, 2014

वह भर पेट संगीत नहीं लिख पाता है...


क्या तुमने वह संगीत सुना है,
जिसे कोई भूख के लिए बजा रहा होता है?

बंधे-बंधाए सुर के बीच में कहीं उसकी उंग्लिया गलती से कांप जाती है।
कहते हैं, जब दूर देश से उसकी प्रेमिका का खत उसे मिलता था..
तो वह उस ख़त में प्रेम नहीं.... पैसे तलाशता था।

सुना तुमने.... सुनो...
भूख के लिए उसकी उंग्लिया फिर कांप गई।
लोग उससे कहते हैं कि वह बहुत अच्छा संगीत लिखता है।
तो वह कहता है कि... मैं नहीं लिखता, लिखता तो कोई ओर है...
मैं तो बस उसे सहता हूँ।

संगीत उसकी धमनियों में नहीं है...
वह उसके पेट निकलता है।
हर उंग्लियों की गलती पर उसके संगीत में आत्मा प्रवेश करती है।
कहते है... वह भर पेट संगीत नहीं लिख पाता है...
उसके लिए उसे भूखा रहना पड़ता है।

भूख...
भूख एक आदत है.... बुरी आदत।
जो उस व्यक्ति को लगी हुई है...
जिसे वह लगातार सहता है।

- मानव कौल 

Monday, January 27, 2014

अब वह सपने में हैं...


थोड़ी देर तक उसका नाम लेने से वह सपनों में चली आती है। देर तक मुझपर हंसकर वह मेरे पास बैठना चाहती है। जगह की कमी हम दोनों महसूस करते हैं... दुनिया कितनी बड़ी है... वह कहती है। मैं अपनी जगह् से भटक जाता हूँ। किंगफिशर सामने के पेड़ पर आकर मेरी ख़ाली बाल्कनी देखता रहता है। मैं देर तक बाल्कनी को भर देने की कोशिश करता हूँ..।

हम एक दूसरे की ख़ाली जगह भर सकते थे... मैं तुम्हारे साथ बूढ़ा होना चाहता हूँ... मैंने अपनी गर्म सांसो में लपेटकर कई बार यह बात उसके पैरों के पास रखी थी। जीवन बहुत सरल था और हम फिर चालाक निकले....।

हमने अपने बड़े होने के सबूत दिये.. खेल हमेशा बचकाना था। अब वह सपने में हैं... कहानी ख़ाली पड़ी है..।

बाल्कनी में झूला लगाने की ज़िद्द जीवन मांगती है। और हम दोनों जीवन को चुन लेते हैं। सपने में वह कहती है.... और मैं सपनों में उसे जी लेता हूँ।

- मानव कौल

(जारी)

Saturday, January 25, 2014

मानव कौल- उम्मीदों का आसमान


वक़्त कैसा भी हो, मन कितनी भी मनमानियां कर रहा हो, कुछ ठीहे ऐसे होते हैं जहाँ पल भर ठहरना सुकून देता है.… 'मौन में बात' ऐसा ही एक ठिकाना है.

मौन में बात करने वाले मानव जब बोलते हैं तो चीज़ों के अर्थ बदलने लगते हैं. उनकी कहानियां, कवितायेँ, नाटक और अब फ़िल्में भी. वो एक गहरा एब्स्ट्रैक्ट रचते हैं, जो जिंदगी के रंगों से भरपूर होता है. हालाँकि ये मानव ही हैं जो रंगों को उनके खोल से मुक्त कर देते हैं, सुरों को आजाद कर देते हैं. उनकी दुनिया में कुछ कहने के लिए चुप हो जाना होता है, सांस-सांस सुनना होता है मौन, लम्हा लम्हा पलकों में भरनी होती हैं जिंदगी, उम्मीदें, ख्वाब।

जीवन, मृत्यु, प्रेम, रंग, आस पास की दुनिया की उठा पटक सब उनके यहाँ एक ठहराव के साथ दाखिल होती है, गहरा असर छोड़ते हुए. वो चीज़ों पर फौरी प्रतिक्रिया देने वाले लेखक, कलाकार नहीं हैं बल्कि वो तमाम झंझावातों को ज़ज्ब करते हैं. बचपन जिस तरह मानव की दुनिया में जगह पाता है उसमें नयी दुनिया का सपना पलते देखा जा सकता है. उनकी कवितायों पर, कहानियों पर, नाटकों पर, फिल्मों पर, और इन सबसे इतर उनकी डायरी के पन्नों पर ढेर सारी बात होनी चाहिए। ज़रूर होनी चाहिए। लेकिन इस वक़्त जिसका कहा जाना मुझे सबसे ज्यादा ज़रूरी लगता है वो है मानव का खुद से, अपने काम से आसक्त न होना। अपने मैं से मुक्त होना।

मानव का कोरे पन्ने के आगे किसी मासूम बच्चे की तरह बैठ जाना विस्मित भी करता है और उनके व्यक्तित्व के कई पहलू भी खोलता है. अपनी रचनाओं से, सफलताओं से, प्रशंसाओं से वो जिस तरह खुद को विरत रखते हैं वो इस बात की उम्मीद बचा लेता है कि कहीं कोई है जो अपने मैं से आज़ाद है.… आज जब हर कोई अपने अपने मैं को पालने पोसने में, अभिभूत होने में व्यस्त है ये शख्श किसी जंगल, किसी पहाड़ी पर कुछ नया तलाश रहा होता है. उन्हें अपने किये जा चुके काम के बारे में बात करने में खास दिलचस्पी नहीं। वो बेहद रचनात्मक होते हुए भी किसी भी किस्म की रेस से बहुत दूर हैं. उनके मौन के पास मुझे उन तमाम सवालों के जवाब अक्सर मिलते हैं जो ढेर सारे शोर, बतकहियों में नहीं मिलते।

बाद मुद्दत एक रोज उनसे पूछती हूँ उनके न होने का ठिकाना और वो चुपचाप हथेलियों पर एक टुकड़ा ख्वाब का रख जाते हैं.… ख्वाब जिसका नाम है कलर ब्लाइंड। 

उनके बारे में कुछ भी लिखना या कहना असल में लिखना है अपने लिए ही.…शुक्रिया मानव! नाउम्मीदियों से भरी इस दुनिया में उम्मीद को बचाये रखने के लिए.…

कलर ब्लाइंड -  http://vimeo.com/81892333

(इस सप्ताह मानव की रचनाएं जारी.... )

इस आशिक़ी में जान से जाना बहुत हुआ


उसको जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ
अब क्या कहें ये क़िस्सा पुराना बहुत हुआ

ढलती न थी किसी भी जतन से शब-ए-फ़िराक़
ऐ मर्ग-ए-नागहाँ तेरा आना बहुत हुआ

हम ख़ुल्द से निकल तो गये हैं पर ऐ ख़ुदा
इतने से वाक़ये का फ़साना बहुत हुआ

अब हम हैं और सारे ज़माने की दुश्मनी
उससे ज़रा रब्त बढ़ाना बहुत हुआ

अब क्यों न ज़िन्दगी पे मुहब्बत को वार दें
इस आशिक़ी में जान से जाना बहुत हुआ

अब तक तो दिल का दिल से तार्रुफ़ न हो सका
माना कि उससे मिलना मिलाना बहुत हुआ

क्या-क्या न हम ख़राब हुए हैं मगर ये दिल
ऐ याद-ए-यार तेरा ठिकाना बहुत हुआ

कहता था नासेहों से मेरे मुँह न आईओ
फिर क्या था एक हू का बहाना बहुत हुआ

लो फिर तेरे लबों पे उसी बेवफ़ा का ज़िक्र
अहद "फ़राज़" तुझसे कहा ना बहुत हुआ...

( वॉन गॉग की पेंटिंग, आभार गूगल )

Thursday, January 23, 2014

फूल पत्ते तेरी यादों में बिछा दें यादें....



आज फिर दिल ने कहा आओ भुला दें यादें
ज़िंदगी बीत गई और वही यादें-यादें

जिस तरह आज ही बिछड़े हों बिछड़ने वाले
जैसे इक उम्र के दुःख याद दिला दें यादें

काश मुमकिन हो कि इक काग़ज़ी कश्ती की तरह
ख़ुदफरामोशी के दरिया में बहा दें यादें

वो भी रुत आए कि ऐ ज़ूद-फ़रामोश मेरे
फूल पत्ते तेरी यादों में बिछा दें यादें

जैसे चाहत भी कोई जुर्म हो और जुर्म भी वो
जिसकी पादाश में ताउम्र सज़ा दें यादें

भूल जाना भी तो इक तरह की नेअमत है ‘फ़राज़’
वरना इंसान को पागल न बना दें यादें....


Wednesday, January 22, 2014

कितना आसाँ था तेरे हिज्र में मरना जाना...


सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते-जाते
वरना इतने तो मरासिम थे कि आते-जाते

शिकवा-ए-जुल्मते-शब से तो कहीं बेहतर था
अपने हिस्से की कोई शमअ जलाते जाते

कितना आसाँ था तेरे हिज्र में मरना जाना
फिर भी इक उम्र लगी जान से जाते-जाते

जश्न-ए-मक़्तल ही न बरपा हुआ वरना हम भी
पा बजोलां ही सहीं नाचते-गाते जाते

उसकी वो जाने, उसे पास-ए-वफ़ा था कि न था
तुम 'फ़राज़' अपनी तरफ से तो निभाते जाते...



Tuesday, January 21, 2014

ये सूरज बदल दो यारो


दूर पहाड़ियों पर
गिरती है बर्फ
हर बरस

पिघलती है बर्फ
हर बरस

कहीं कुछ है
जो सदियों से नहीं पिघला

ये सूरज बदल दो यारो
कि इसकी हरारत
जरा कम सी है.…


Sunday, January 12, 2014

आईना आँख चुराता क्यों है?



जबसे पहनी है अपने होने की महक
आईना आँख चुराता क्यों है?

तेरे आने और तेरे जाने का
फर्क मिटता सा नज़र आता क्यों है?

कोई आहट नहीं कहीं फिर भी
दिल इस तरह मुस्कुराता क्यों है

जिस तरह टूटा किये हैं ख्वाब मिरे
फिर नया ख्वाब चला आता क्यों है....


Wednesday, January 8, 2014

हरा अब हरा नहीं रहा...



ये रंगों के रंग बदलने के दिन हैं। हरे को हरा हुए बहुत दिन हो गए थे तो उसने अंगड़ाई लेकर कत्थई होने का मन बना लिया। भूरा या लाल होने के बारे में उसने सोचा नहीं। पीले के बारे में उसने सोचा जरूर था लेकिन पीले रंग पर रुकने का उसका मन नहीं किया।

आसमान से रोज एक दिन टपकता है और रंगों के आंचल में जाकर टंक जाता है....कोई दिन गुलाबी रंग का उगता है तो कोई धानी रंग का। कोई दिन सुर्ख लाल तो कोई दिन सतरंगी भी होता है....कभी-कभी कोई दिन बेरंग भी होता है। पर इधर कुछ रोज से खिले रंगों वाले दिन आसमान से उतर रहे हैं।

वैसे ये रंगों के रूप बदलने के दिन भी हैं। वो लाल, पीले, हरे, नीले नहीं रहे वो संख्या होने लगे हैं। 300, 400, 500, 600...जब से रंग संख्या होने लगे हैं तबसे संख्याओं से प्यार होने लगा है। अब संख्या में रंग दिखने लगे हैं। शाखों पर अंक मुस्कुराते हैं। कैनवास पर दौड़ लगाते फिरते हैं दिल लुभाने वाले रंग....

अरे हां, मैं बताना ही भूल ही गई पिछले कुछ दिनों से रंगों ने सुरों से दोस्ती कर ली है। रियाज के वक्त रंग बजते हैं इन दिनों। सुर चुपचाप कभी कैनवास पर सजते है तो कभी शाखों पर झूमते नजर आते हैं...वो आकृतियां भी धारण करते हैं। कभी चांद बन जाते हैं तो कभी सूरज, कायनात के हर अक्स में ढलते हैं रंग  बस एक इंद्रधनुष ही कबसे खाली पड़ा है.  रंग सब भागते फिरते हैं यहां-वहां। ये रंगों की शरारतों के दिन हैं।

उफ्फ,  ये रंगों को क्या हो गया है इन दिनों देखो तो कैसे नन्ही किलकारियों में जा छुपे हैं, गालों पे ठहरता कोई रंग तो कोई आंखों में जाकर बैठा है। कोई रंग चुप की चादर ओढ़कर सर्द रातों के लिहाफ में जा दुबका है तो कोई रंग आवाजों के दरीचों से झांकता फिरता है...सर्द रातों में फुटपाथों पर सिकुड़े हुए करवटें बदलता है एक स्याह रंग तभी चुपके से बंद आंखों में जाकर छुप जाता है उम्मीद का खुशनुमा सा रंग...

ये क्या हो गया है इन दिनों रंगों को कि सब के सब उठकर चल दिये हैं अपने आशियाने से। वो कहीं भी मिलते हैं हमसे बस कि वहीं नहीं मिलते जहां उन्हें हम ढूंढने जाते हैं...

सुनो...हरा अब हरा नहीं रहा...कुछ शब्द टकराते हैं कानों से...सुर्ख रंग के शब्द...