Tuesday, September 9, 2014

रब सा ऊंचा इश्क़....


छोटा पेड़ - सुनो, आसमान के इत्ते पास पहुंचकर कैसा लगता है?
बड़ा पेड़ - तुझे कैसे पता कि मैं आसमान के पास हूँ?

छोटा पेड़- देखकर लगता है.
बड़ा पेड़- (हा हा  हा) जिस रोज देखे हुए को सच मानने से मुक्त होगे, उस रोज मिल जायेगा तुम्हें अपने सवाल का जवाब भी. 

छोटा पेड़- (अनमना होकर ) मत बताओ। लेकिन ज्ञान मत दो. हुँहहहह

बड़ा पेड़- अच्छा सुनो, मैं आसमान के पास नहीं गया. एक रोज मेरे कानो से होकर गुजरा एक शब्द 'इश्क़' उसी रोज ये आसमान झुककर मेरे करीब आ गया.…
ऊँचाई क़द की नहीं इश्क़ की होती है....समझे ?
छोटा पेड़- (सर खुजाते हुए) पता नहीं, हाँ शायद, नहीं शायद 
बड़ा पेड़- हा हा हा.…

(कमबख्त इश्क़ )


7 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सुन्दर प्रस्तुति।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सुन्दर प्रस्तुति।

abhi said...

अहा! बहुत सुन्दर
ऊँचाई क़द की नहीं इश्क़ की होती है.. :)

Digamber Naswa said...

इश्क की गुफ्तगू ... शायद वाही सबसे बड़ा है ...

वाणी गीत said...

ऊंचाई कद से नहीं होती !
सत्य ही !

Onkar said...

सही कहा

Sanju said...

बहुत ही शानदार और सराहनीय प्रस्तुति....
बधाई मेरी

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पर भी पधारेँ।