Monday, February 17, 2014

जीवन संगीत


चलो बैठते हैं किसी नदी के किनारे

सरगम की मद्धम आंच पर
चढ़ाते हैं दुनिया के रंज़ो ग़म

तुम अपनी बोलियों की बालियां उतार देना
और मैं अपनी चुप

मिलकर रचेंगे हम जीवन संगीत
जिसे सुनने को
सृष्टि कबसे बेचैन है.…

(सेल्फ इमेज )


6 comments:

राजीव कुमार झा said...

बहुत सुन्दर .
नई पोस्ट : दर्द सहा नहीं जाता

Digvijay Agrawal said...

आपकी लिखी रचना बुधवार 19/02/2014 को लिंक की जाएगी...............
http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

राजेंद्र कुमार said...

बहुत ही सुन्दर और सार्थक अभिव्यक्ति।

abhi said...

Beautiful!!!!

Kaushal Lal said...

सुन्दर.....

Onkar said...

वाह, बहुत सुन्दर