Thursday, January 23, 2014

फूल पत्ते तेरी यादों में बिछा दें यादें....



आज फिर दिल ने कहा आओ भुला दें यादें
ज़िंदगी बीत गई और वही यादें-यादें

जिस तरह आज ही बिछड़े हों बिछड़ने वाले
जैसे इक उम्र के दुःख याद दिला दें यादें

काश मुमकिन हो कि इक काग़ज़ी कश्ती की तरह
ख़ुदफरामोशी के दरिया में बहा दें यादें

वो भी रुत आए कि ऐ ज़ूद-फ़रामोश मेरे
फूल पत्ते तेरी यादों में बिछा दें यादें

जैसे चाहत भी कोई जुर्म हो और जुर्म भी वो
जिसकी पादाश में ताउम्र सज़ा दें यादें

भूल जाना भी तो इक तरह की नेअमत है ‘फ़राज़’
वरना इंसान को पागल न बना दें यादें....


5 comments:

siddheshwar singh said...

वाह..
अपने प्रिय कवि का लिखा यह भी याद आया..

रोते हो एक जजीरा-ए-जाँ को 'फ़राज़' तुम
देखो तो कितने शहर समंदर के हो गये ।

राजीव कुमार झा said...

बहुत सुंदर.

राजीव कुमार झा said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (25-1-2014) "क़दमों के निशां" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1503 पर होगी.
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
सादर...!

dr.mahendrag said...

जिस तरह आज ही बिछड़े हों बिछड़ने वाले
जैसे इक उम्र के दुःख याद दिला दें यादें
खूबसूरत प्रस्तुति.

कालीपद प्रसाद said...

बहुत सुन्दर प्रसूति !
नई पोस्ट मेरी प्रियतमा आ !
नई पोस्ट मौसम (शीत काल )