Wednesday, December 31, 2014

आ रे …



फिर एक कैलेण्डर उतर गया. हर बरस की तरह इस बार फिर उम्मीदों के बीज टटोलती हूँ. नए बरस की जमीन पर उन बीजों को बोने की तैयारी  फिर से. कभी-कभी सोचती हूँ कि उम्मीद भी अफीम की तरह है. हम उसे ढूंढने के बहाने और ठिकाने ढूंढते रहते हैं. गहन से गहन दुःख में भी तलाशते रहते हैं उम्मीद की कोई वजह कई बार बेवजह ही. ऐसी ही वजहें तलाशते वक़्त हम हर आने वाले लम्हे के कोमल कन्धों पर बीते लम्हों का भार रख देते हैं. कि जो हो न सका अब तक वो अब आने वाले लम्हों में होगा. मैं नए कैलेण्डर को किसी मासूम शिशु की तरह देखती हूँ. उस पर कोई बोझ नहीं डालना चाहती। उसे दुलरा लेना चाहती हूँ. कि वो बेख़ौफ़ आये, मुस्कुराये और गुनगुनाये।

आ  रे …

Wednesday, December 17, 2014

उदास इरेज़र


अपने बच्चो को कलेजे से ज़ोर से चिपकाते वक़्त उन माओं का ख्याल आता है जिनकी आँखों के आंसू जर्द हो चुके हैं. वो माएं जिन्हें कई दिन से टल रही नन्ही फरमाइशें जिंदगी भर रुलायेंगी. याद आएगा उनके लिए आखिरी बार टिफिन बनाना, आखिरी बार लाड करना, कहना कि लौट के आने पर बना मिलेगा पसंद का खाना, दूध नहीं पियोगे तो बड़े कैसे होगे कहकर रोज दूध का गिलास मुंह से लगा देना और ख़त्म होने पर कहना शाबास!, ख्वाब में बच्चों का आना और पूछना कि, अम्मी मैं तो रोज दूध पीता था फिर भी बड़ा क्यों नहीं हुआ, पूछना उन मासूम रूहों का कि क्या दुनिया का कोई इरेज़र ये दिन मिटा नहीं सकता?
उनके बस्तों में रखे सारे इरेज़र उदास हैं.…

Monday, December 15, 2014

रू-ब-रू जिंदगी है...


दिन रात लम्हों की खपत के बाद एक पूरी उम्र गुजार देने के बाद जिंदगी को ढूंढना...उसे बीते हुए लम्हों में तलाशना। वो लम्हा जिसमें हमारे होने की खुशबू दर्ज है, जो अब तक जेहन के किसी कोने में वैसा ही ताजा है...उसी तरह मुस्कुरा रहा है जैसे उस वक्त मुस्कुराया था। जब वो आसमान से उतरकर हमारे शानों पर आ बैठा था...उतनी सी...बस उतनी सी ही थी जिंदगी....मीठी सी जिंदगी...उस एक मुक्कम्मल लम्हे में सांस लेती जिंदगी...

ऐसे ही लम्हों को समेटकर, बटोरकर इन दिनों एक जगह पर इक्ट्ठा कर दिया गया है और नाम रखा गया है जिंदगी। हां, ये जिंदगी चैनल की ही बात है। बाद मुद्दत शामों को कोई ठौर मिला। बाद मुद्दत लोगों को लगा कि कम से कम किसी ने तो उनकी समझ पर यकीन किया और उन्हें कुछ बेहतर दिया। बाद मुद्दत एक सीन पर कलर से ग्रे होते पांच से दस लोगों के स्टिल पोज दिखाकर कुछ आश्चर्यजनक, सनसनीखेज होने का संकेत नहीं है। सालहा बिना वजह बस चलते चले जा रहे सिलसिले को विराम मिला। जिंदगी चैनल ने इसे महिलाओं का चैनल होने से बचाया है। इसके दर्शकों में महिलाएं व पुरुष दोनों हैं।
'जिंदगी गुलज़ार है' से हिंदुस्तान के दर्शकों को अपनी ओर खींचने वाले इस शो का रिपीट टेलीकास्ट भी काफी पसंद किया गया। इसके बाद तो काफी धारावाहिकों ने दर्शकों को अपना बनाया। एपिसोड डाउनलोड हो रहे हैं। हर एपिसोड के बाद लोग ट्वीट कर रहे हैं...फेसबुक स्टेटस अपडेट कर रहे हैं। अपने सीरियल के खत्म हो जाने पर उसे, उनके किरदारों को मिस कर रहे हैं। यह सब देखते हुए मुझे मेरे बचपन के वो दिन याद आते हैं, जब एक ही चैनल आता था वो भी चंद घंटों के लिए। हम लोग, बुनियाद, ये जो है जिंदगी, कच्ची धूप, आशा पूर्णा देवी और शरतचंद्र की कहानियांे का दौर था। चित्रहार, रंगोली का समय, दादा दादी की कहानियां, किस्सा-ए-विक्रम वेताल, रामायण, महाभारत का समय। जब सब एक साथ होते थे। फिर जी टीवी सारेगामा, सेलर, अस्तित्व एक प्रेम कहानी, रिश्ते ने भी लोगों का प्यार हासिल किया। इन सबमें कहीं कोई मेलोड्रामा नहीं था। सास-बहू का झंझट नहीं था। यहां स्त्रियां षडयंत्र करती और पुरुष डमी किरदार की तरह खड़े नहीं होते थे। न ही स्त्रियां 
आदर्शवादिता की वेदी पर अपनी बलि देते हुए आदर्श बहू का तमगा पाने को बेकरार होती थीं। 

जैसे-जैसे चैनल्स बढ़ते गये, न जाने कहां गुमने लगे मुंगेरी लाल के हसीन सपने, मालगुडी डेज, मैला आंचल...एक बहू अपने महंगे जेवरात और साडि़यों में, आदर्श बनने की होड़ में लगातार सहते जाने की सीमाओं कों लांघते हुए या फिर षडयंत्र रचते हुए, लंबे नाखून, गहरी लिपिस्टिक, किलो भर मेकअप, कुंटल भर की साड़ी अथाह साजिशों के साथ लोगों को लुभाने लगी। मानो स्त्रियां या तो षडयंत्रकारी होती हैं या बलिदानी। ओपेन सोसायटी के नाम विवाहेतर संबंधों की बाढ़ आ गई। जैसे रिश्तों से बाहर निकलना ही आजादी हो...। यह सब जिस तरह परोसा जाने लगा कि एक छोटा ही सही पर टीवी को शौक से देखने वाला वर्ग टीवी से दूर होने लगा। सेंसबिलिटी लगातार नदारद रहे तो कोई कब तक साडि़यां, गहने और साजिशें देखते रह सकता है। प्रोडक्शन हाउसेज ने पब्लिक डिमांड के नाम पर सास बहू और साजिश की अफीम परोसनी शुरू कर दी। जाहिर है नशा तो होना ही था। लेकिन इस नशे को अपनी जीत समझने वालों के लिए कोई जवाब नहीं था किसी के पास। अगर सब टीवी को छोड़ दें तो अमूमन सभी चैनल लगभग एक ही सुर में सुर मिलाते नजर आते हैं। जिन्होंने कुछ अलग करने की शुरुआत भी की उन्हें भी या तो बीच में ही अपना शटर डाउन करना पड़ा या फिर उसी सुर में सुर मिलाना पड़ा।
टीआरपी की दौड़ में भागते इन तमाम चैनलों में से किसी ने उस छोटे से वर्ग की नाराजगी की परवाह नहीं की जिसने खुद को चैनल्स की दुनिया से दूर कर लिया था। 22 वर्षों से जीटीवी इंटरटेनमेंट की दुनिया में है। उसने उन दर्शकों का ख्याल किया और जिंदगी चैनल शुरू किया। रूमानियत, सहजता, सरलता से भरा चैनल जिसकी कहानियां दो से तीन महीनों में खत्म हो जाती हैं। जिंदगी की आॅडियंस के बारे में चैनल के चीफ कंटेंट एंड क्रिएटिव आॅफिसर भरत रंगा के अनुसार इस चैनल को देखने वाले नौकरीपेशा लोग, वकील, डाॅक्टर, बिजनेसमैन, प्रोफेसर, हाउस वाइफ वगैरह हैं। ये चैनल टीआरपी की रेस से शुरू से ही दूर है। इसका लक्ष्य स्पष्ट था। इसका दर्शक वर्ग सीमित होगा यह भी पहले से पता था लेकिन यह इतनी तेजी से इतनी लोकप्रियता हासिल करेगा यह शायद उम्मीद किसी को नहीं थी।
पाकिस्तान में लोकप्रियता हासिल कर चुका धारावाहिक जिंदगी गुलजार है...के कशफ और जारून की प्रेम कहानी को लोग बार-बार देखना चाहते थे। इसके एपिसोड डाउनलोड होने लगे, टाइटल सांग डाउनलोड होने लगे। आम जिंदगी की सादा सी कहानियों को लेकर कितनी गिरहें बाकी हैं भी लोगों को पसंद आया।
इसके बाद एक के बाद 'मेरे कातिल मेरे दिलदार', 'थकन', 'मस्ताना माही', 'काश मैं तेरी बेटी न होती' ने भी दर्शकों को अपने पास रोकना शुरू किया। लेकिन 'जिंदगी गुलजार है' में जारून बने फवाद खान इस चैनल के चहेते कलाकार बन गए। वो जब हमसफर में फिर से नज़र आये तो लोगों ने अपनी धड़कनों को थामकर इस धारावाहिक को देखा। रिपीट टेलीकास्ट भी इसका सुपरहिट रहा। इन धारावाहिकों की कौन सी बात है जो दर्शकों को पसंद आ रही है यह जानना भी जरूरी है। लोगों का कहना है कि इसके नाटकों में नाटक कम होता है यानी नो ड्रामेबाजी। फिजूल का ग्लैमर नहीं। जिंदगी जैसी सादा सी होती है, जैसी उलझनें उसमें होती है, जैसे धूप होती है जिंदगी में है जैसी छांव या फिर जैसी बारिश वो सब वैसा का वैसा ही यहां नज़र आता है।
विषय नये हैं और पूरे जेहनी मरम्मत की कश्मकश के साथ आते हैं। बिना किसी झंडाबरदारी के यहां कहानियों में तमाम रूढि़यों के टूटने की आहटें सुनाई देती हैं। कोई बड़े-बड़े दावे किये बगैर इसकी कहानियां दिमाग में लग चुके जालों को साफ करती हैं। बावजूद तमाम तालीम के जो तरबियत हासिल नहीं हो पाई जो जेहन का अंधेरा दूर होने से रह गया उसे जिंदगी की कहानियां हटाने की कोशिश करती हैं।
पिछले दिनों मस्ताना माही की छोटी बहू अपनी सौतन से जो अपना शौहर बांटना नहीं चाहती और इस बात को लेकर काफी परेशान है से कहती है, कि हम कितनी छोटी चीजों में उलझे रहते हैं, शौहर शेयर नहीं करने को लेकर परेशान हैं जबकि हजारों लाखों लोगों के दिलों का दर्द शेयर किया जाना बाकी है जो बहुत जरूरी है उस पर ध्यान नही नहीं देते। जिस वक्त हम यह सोचते हैं कि आज खाने में इटैलियन खाएं या चाइनीज उसी वक्त कितने सारे लोगों कि चिंता होती है कि उनके बच्चों को खाना मिलेगा भी या नहीं। इसी धारावाहिक में धारावाहिक के नायक जो कि एक पाॅलिटिकल लीडर है के किडनैप होने पर किडनैपर जो मांग करता है वो पूरी दुनिया के सामंतवादी रवैये की कलई उतारता है। घर की औरतों को फोन करके किडनैपर कहता है कि हम उसे तब छोड़ेंगे जब तुम लोग स्कूल बंद करोगे, लोगांें को पढ़ाना लिखाना, उन्हें समझदार बनाना बंद करोगे। जाहिर है पूरी दुनिया की सत्ताएं लोगों की जाहिलियत, उनकी मजबूरियों, उनकी नासमझियों पर ही तो चल रही हैं। आपसी मतभेदों को भुलाकर घर की तीनों औरतें मां और दो पत्नियां एक सुर में कहती हैं, मार दो उसे...क्योंकि अगर उसके सपने मर गये तो वो वैसे भी मर ही जायेगा।
व्यक्ति का मरना मंजूर करके उसके सपने बचाने का माद्दा रखना सिखा गया एक छोटा सा एपिसोड। अपनों की फिक्र करना लेकिन बेजा बातों की मुखालफत करना भी जरूरी है। माॅडर्न होने का अर्थ सिर्फ खुले या ग्लैमरस कपडे़, मेकअप या अंगे्रजी नहीं है। सर पर दुपट्टा रखकर घर परिवार की सेवा करती औरतें वक्त आने पर जिस मजबूती से अपनी बात रखती हैं, अपने आत्मसम्मान को हर हाल में बचाये रखने की कोशिश करती हैं वो तारीफ के काबिल है।
एंटरटेनमेंट मीडिया पर भी जिम्मेदारी होती है, अपने दर्शकों के बौद्धिक विकास की वो जहां हैं, वहां से थोड़ा आगे बढ़कर सोचना शुरू करें...लंबी-चैड़ी टीआरपी के लिए मारामारी करने से बेहतर है कि कुछ बेहतर कर पाने की जद्दोजेहद। फिलहाल जिंदगी चैनल ने एक छोटी ही सही शुरुआत तो की है। पुराने दिनों की यादें भी ताजा की हैं। लेकिन दर्शकों के मन में कुछ शंकाएं भी हैं कि दो से तीन महीने में खत्म होने वाले इस चैनल पर कब तक बेहतर कहानियों का यह सिलसिला चल पायेगा। चैनल की कंटेट डिजाइनिंग टीम ने इस बाबत चैकन्नी लगती है। कंटेंट डिजाइनर्स की एक बेहतर टीम बनाने की उनकी योजना है। साथ ही एक क्रिएटिव पूल बनाने की भी जिसमें दुनिया भर के बेहतर साहित्य का शुमार होगा। भारत, पाकिस्तान, पश्चिम एशिया, यूके, टर्की वगैरह के परफाॅर्मिग टैलेंट पर भी इनकी नजर है। कहानियों के चुनाव का आधार सिर्फ एक होगा कि वो लोगों के दिलों को बांध सकें...उनके जेहन में अपनी विशेष उपस्थिति दर्ज कर सकें। इस सिलसिले में कुछ डेढ या दो घंटे की टेलीफिल्में भी शामिल होने की बात है।
बहरहाल, क्या दिखायेंगे, कहां से लायेंगे ये तो चैनल वाले ही जानें दर्शक फिलहाल इसी राहत में हैं कि उनके पास एक बेहतर आॅप्शन है जिंदगी। दिन भर की थकन उतारकर हाथ में एक प्याली चाय लेकर कुछ बेहतर कहानी, कुछ गज़ल और कुछ बेहतर संवाद सुनने के सुकून की उम्मीद में आ बैठना जिंदगी के रू-ब-रू।

Saturday, December 13, 2014

कोहरे की खुशबू में उसकी भी खुशबू है....


याद है तुमको
कैसे हम दोनों मिलकर
सारा कोहरा जी लेते थे
कॉफी के कप में
सारे लम्हे घोल-घोल के पी लेते थे

याद है तुमको
कोहरे की खुशबू कितना ललचाती थी
देर रात भीगी सड़कों पर
मैं कोहरे की सुरंग में
भागी जाती थी

याद है तुमको
कोहरे की चादर कितना कुछ ढँक लेती थी
दिल के कितने जख्मों पर फाहे रखती थी
दिन के टूटे बिखरे लम्हों को
अंजुरी में भर लेती थी

याद है तुमको
एक टूटे लम्हे को तुमने थाम लिया था
भीगी सी पलकों को रिश्ते का अंजाम दिया था
वो रिश्ता अब भी कोहरे की चादर में महफूज रखा है
कोहरे की खुशबू में अब उसकी भी खुशबू है....

Thursday, December 11, 2014

तुम्हारा होना...


तुम्हारा होना
जैसे चाय पीने की शदीद इच्छा होना
और घर में चायपत्ती का न होना

जैसे रास्तों पर दौड़ते जाने के इरादे से निकलना
और रास्तों के सीने पर टंगा होना बोर्ड
डेड इंड

जैसे बारिश में बेहिसाब भीगने की इच्छा
पर घोषित होना सूखा

जैसे एकांत की तलाश का जा मिलना
एक अनवरत् कोलाहल से

जैसे मृत्यु की कामना के बीच
बार-बार उगना जीवन की मजबूरियों का

तुम्हारा होना अक्सर 'हो' के बिना ही आता है
सिर्फ 'ना' बनकर रह जाता है...


Tuesday, December 9, 2014

दरारें दरारें हैं माथे पे मौला...


यह दुःख का समाज है, यहां सुख एक उत्सव की तरह सबसे उपरी पर्त पर अपनी भव्यता के साथ उपस्थित होकर भरमाता है। इसके सीने में अवसाद है जो आंसू बनकर टपप-टपप टपकता रहता है...जो आस्था बनकर किसी नाउम्मीद सी उम्मीद के पीछे दौड़ पड़ता है।

सामने अखबार की कुछ खबरें बिखरी हुई...टीवी चैनल्स पर दौड़ती तस्वीरें...आस्थाओं का समंदर फिर एक बार लहराता हुआ। फिर किसी बाबा का पाखंड उधड़ रहा है...फिर आस्थाओं में भूचाल आया हुआ है। फिर किसी तिलिस्मी दुनिया का दरवाजा सा खुलता है और न जाने कैसी-कैसी खबरें सामने आती हैं। मानो कोई किस्सागोई सी चल रही हो...कोई फैंटेसी। मानो पूस की रात में अलाव के गिर्द घेरा बनाकर बैठे लोग हों...और किस्सागो की भूमिका में उतरे चैनल्स।

लेकिन ये कोई किस्सागो का किस्सा नहीं...कोई फैंटेसी नहीं...यह किसी भी समाज की दुःखद तस्वीर है। तमाम आरोपों के बावजूद धर्म के इन तथाकथित फरमाबरदारों के भक्तों की आस्था में कोई कमी नहीं। वो अब भी उन्हें भगवान, कोई दूत, पैगम्बर, अवतार मानते हैं। वो नहीं मानते उन पर लगे किसी आरोप को। उनकी आस्थाएं अडिग हैं। अनगिनत आस्थाएं कब किसके पीछे चल पड़ें कहना मुश्किल है।

दुःख, पीड़ा, संघर्ष, शोषण और जाहिलियत की जड़ों से उपजी मासूम आस्थाएं। इन आस्थाओं में एक बड़ा वर्ग शोषित वर्ग का है। दुःख से डूबे लोगों का है। वो लोग जो अपनी परेशानियां अपने कंधों पर ढोते-ढोते बूढ़े होने लगते हैं। उनके कंधे पर हाथ रखकर जब कोई आत्मविश्वास से कहता है कि मैं हूं ना...मैं सब ठीक कर दूंगा...उसी वक्त आस्था का जन्म होता है। उस मैं हूं ना के प्रति आस्था....यह बात किसी एक धर्म या किसी एक घटना के बरअक्स पूरी नहीं होती। इसका कैनवास काफी बड़ा है और जिसकी जड़ों में अशिक्षा, सामाजिक जड़ता, वर्गभेद, लिंगभेद, असमानता, असंवेदनशाीलता से जाकर जुड़ती हैं।

जाहिर है इन आस्थाओं में, अंधविश्वास में स्त्रियों की संख्या ज्यादा है। किसी भी धर्म की बात हो, महिलाएं आमतौर पर ज्यादा संख्या में श्रद्धा में डूबी हुई पाई जाती हैं। क्यों न हो आखिर कि शोषित वर्ग में भी जो शोषित है वो स्त्री ही तो है। संवेदनाओं का, भावनाओं का बोझ जिसके कंधों पर है वो स्त्री है। जिसके हिस्से में अब तक शिक्षा की एक पूरी इबारत आना तो दूर कुछ अक्षर भी नहीं आये वो स्त्री है। वो भागती है ऐसे किसी तिलिस्म की ओर जहां से उसे सब ठीक होने के संकेत मिलते हैं....एक वहम उन्हें फुसलाता है...उनके कदम चल पड़ते हैं...वो सब करने को वो राजी होती जाती हैं जिसमें सब ठीक होने का आश्वासन होता है। पुरुष भी होते हैं, और पढ़े-लिखे लोग भी होते ही हैं इसमें शामिल लेकिन वो दूसरी बहस का मुद्दा है कि क्यों हमारी जो शिक्षा है वो वर्गभेद, संकीर्ण मानसिकता की जंजीरें नहीं तोड़ पाती, क्यों शिक्षित होने के बावजूद समता और समानता की जरूरत संविधान में तो शामिल हो गयी लेकिन जीवन में अब तक अपनी जगह नहीं बना पाया। लेकिन यहां बात स्त्रियों की भक्ति और आस्था की है।

मार्क्स कहते हैं कि जिसने भी जरा सा भी इतिहास पढ़ा है वो जानता है कि सामाजिक परिवर्तन महिलाओं के उत्थान के बिना संभव ही नहीं है। तो हमारे समाज की मौजूदा तस्वीर साफ बयान कर रही है, कि हमारा समाज कैसा है और यहां स्त्रियों की स्थिति कैसी है।

मुझे एक तीन बरस पुरानी एक घटना याद आ रही है। एटा जिले के आसपास की एक जगह थी। जून की भरी दोपहरी। वहां के स्थानीय बाबा का आवास। भक्तजनों की भीड़। और तकरीबन एक किलोमीटर पहले से पैदल चलकर आते भक्तजन। तपती हुई सख्त जमीन पर ये लंबा सफर उन्हें जला नहीं रहा था। मुझे वहां सारे चेहरे गमज़दा नज़र आये। सबके लब पर कोई दुआ थी। कोई ऐसा नहीं मिला जो कुछ मांगने न आया हो, जो खुश दिख रहा हो। झुके हुए जिस्मों पर जिंदगी का बोझ तारी थी। भक्तों में ज्यादा संख्या महिलाओं की थी। एक सत्रह बरस की लड़की बार-बार जमीन पर सर पटक रही थी। एक स्त्री बार-बार पानी भरकर आने जाने वालों के रास्ते में गिरा रही थी। एक स्त्री चीख-चीखकर रो रही थी। उसके आसपास कुछ स्त्रियां थीं लेकिन वो उसे चुप नहीं करा रही थीं। तभी एक स्त्री पर नज़र गई, करीब 50 या 55 बरस की एक महिला लगातार एक पेड़ के चक्कर लगा रही थी। तेज दोपहर...बिना खाये पिये...नंगे पैर बस रोती जाती और घूमती जाती। पता चला कि वो करीब डेढ़ महीने से यही कर रही है। उसका 21 बरस का बेटा मर गया है। और उसे ऐसा करने से आराम आता है। वो चक्कर लगाती है...बेहोश हो जाती है...उठती है फिर चक्कर लगाने लगती है। वो सर पटकने वाली सत्रह बरस की लड़की शादी वाले दिन ही विधवा हो गई थी। ऐसी न जाने कितनी दारुण कहानियां खेतों के बीचोबीच उगे उस आस्था के पेड़ पर टंगी हुई थीं।

उस वक्त वो सारी खबरें जेहन में दोबारा जाग उठीं जिनमें कोई महिला बेटा होने की आस में किसी तांत्रिक के कहने पर अपनी दुधमुंही बच्ची को छोड़कर चली आती है...कहीं कोई जमीन को गिरवी पर से छुड़ाने के लिए अपने बच्चे को जिंदा गाड़ देती है, कहीं कोई अपनी जीभ काटकर चढ़ा आती है।

यह हमारे समूचे समाज का करुण सच है। फौरी तौर पर किसी वर्ग विशेष के गले में जाहिलियत की पहचान टांग देने भर से बात नहीं बनने वाली। उसकी जड़ों की पड़ताल जरूरी है। यह जानना जरूरी है कि आखिर क्यों अचानक से आस्थाओं का भूचाल आ जाता है...क्यों इस तरह की बात करने वाले उन्हीें के हक में काम करने वालों को भी उन्हीें से माफी मांगनी पड़ती है। क्योंकि उनके दुःख ने एक खंभा पकड़ रखा है। उसे जोर से पकड़ने पर उन्हें राहत मिलती है। वहम ही सही पर इससे कुछ देर को उन्हें सुकून आता है...

कुछ लोगों ने इस दुःख से, भय से उपजी आस्थाओं को काबू करना शुरू किया। आस्था किसी उद्योग में तब्दील होने लगी। यूं ही मजाक ही मजाक में लोग कहने लगे कि बाबा होने में भी बढ़िया करियर हो सकता है...कोई कहता है जब नौकरी करने से उब जायेंगे तो बाबा बन जायेंगे...ये खाली वक्त के मजाक हो सकते हैं लेकिन इनमें हमारे समाज का विद्रूप चेहरा छुपा है। और कई सवाल भी छुपे हैं कि अगर ये मामला सिर्फ शोषित वर्ग से जुड़ा है, स्त्री वर्ग से जुड़ा है तो क्यों भला पढ़े-लिखे लोग भी, तमाम सेलिब्रिटी भी शामिल हैं इस सबमें।

कई परतें हैं...काफी जाले हैं...कई स्तर पर हैं...पढ़ भर लेना जो सब कुछ होता तो कबीर जैसा फकीर बिना कागज कलम हाथ से छुए कैसे वो तमाम पर्तें तोड़कर कह पाता कि कांकर पाथर जोड़ के मसजिद लिये बनाय...तां चढ़ि मुल्ला बांग दे क्या बहिरा हुआ खुदाय...उसी कबीर का नाम लेकर कोई लाखों के तिलिस्मी सिंहासन पर बैठकर खुद को कबीरपंथी कहता है और भोली-भाली जनता उसे सच मानने लगती है...यह विरोधाभास वो देख पाये इसके बीच उनके जीवन की दारुण कथायें आ जाती हैं।

यह दुःख का समाज है, यहां सुख एक उत्सव की तरह सबसे उपरी पर्त पर अपनी भव्यता के साथ उपस्थित होकर भरमाता है। इसके सीने में अवसाद है जो आंसू बनकर टपप-टपप टपकता रहता है...जो आस्था बनकर किसी नाउम्मीद सी उम्मीद के पीछे दौड़ पड़ता है। इस समाज के माथे पर ऐसी ही किसी दरार को देखकर शायद प्रसून जोशी ने लिखा था दरारें-दरारें हैं माथे पे मौला....
http://dailynewsnetwork.epapr.in/348410/khushboo/01-10-2014#page/1/1

(published)

Saturday, November 8, 2014

गुमशुदा नवम्बर...


नवंबर महीने में इतना एटीट्यूड क्यों होता है...पता नहीं...लेकिन उसका एटीट्यूड अक्सर जायज ही लगता है. उसके कंधों पर से गुनगुनी धूप उतार लेने का जी चाहता है...उसके कदमों की आहटों से खुशबुओं के खिलने का सिलसिला दिल लुभाता है...उसके सीने से लगकर सारा रूदन बहा देने को जी चाहता है...

पहली मोहब्बत के पहले मोड़ पर रखे पहले इंतजार सा नवंबर...आंखों में आंखें डालकर कहता है, मैं हूं ना...डरो मत...चल पड़ो...ऐसा कहते वक्त उसने ऐनक नहीं पहनी थी, कभी-कभी बेअदबी भी कितनी दिलफरेब होती है...

जाने कहां हरसिंगार खिले होंगे, कहां नहीं...लेकिन नवंबर की शाख का हर लम्हा हरसिंगार है...कहीं तो इंतजार का हरसिंगार...कहीं मिलन की मन मालती...कहीं ढेर सारी कामनाओं को सहेजती संभालती मनोकामनी...उफफफ किस कदर खुशबुओं से लबरेज है...

देव दीवाली की दीप कतारों को वो सर्द चादर में सहेजते हुए खुद से किया हुआ वादा दोहराता है कि 'उम्मीद भरी आंखों के दिये बुझने नहीं दूंगा...'

कहीं दूर देश से आवाज आती है बेडि़यां टूटने की...सलाखें चटखने की...

सर्द मौसम में अपने भीतर के ताप को सहेजे रहने की ताकीद करता नवंबर जिंदगी के लिए जूझने वालों के सजदे में झुककर और हसीन हो उठा है...

दीवार पर टंगे कैलेंडर से एक पन्ना गुम मिले तो हैरत मत करना... 


Thursday, November 6, 2014

ये चाँद बीते ज़मानों का आइना होगा...



करोगे याद तो हर बात याद आएगी
गुज़रते वक्त की हर मौज ठहर जाएगी

ये चाँद बीते ज़मानों का आइना होगा
भटकते अब्र में चेहरा कोई बना होगा,
उदास राह कोई दास्ताँ सुनाएगी

बरसता-भीगता मौसम धुआं-धुआं होगा
पिघलती शम्मों पे दिल का मेरे गुमां होगा,
हथेलियों की हिना याद कुछ दिलाएगी

गली के मोड़ पे सूना सा कोई दरवाज़ा
तरसती आँखों से रस्ता किसी का देखेगा,
निगाह दूर तलक जा के लौट आएगी...

-  बशर नवाज़ 

(चाँद पूरणमाशी का, तस्वीर हमारी )

Friday, October 31, 2014

गुलों में रंग भरे.… हैदर


कभी कभी चुप्पी का अपना सुख होता है… 'हैदर' फिल्म देखने के बाद एक लम्बी चुप में सिमट जाने को जी चाहता है… एक लम्बी चीख के बाद की थकन में कोई नशा सा महसूस होता है. बाकियों की तरह मैंने भी 'हैदर' रिलीज़ के साथ ही देख ली थी. अपनी चुप के साये में बैठे हुए फिल्म पर आने वाले लेख, प्रतिक्रिया, बातचीत को देखते हुए, सुनते हुए.…

बाद मुद्दत किसी हिंदी फिल्म पर इतनी बातचीत सुनी। फिल्म के बहाने न जाने कितनी बातें, कितने मुद्दे, कितनी नाराजगी। बहुत सारी रिव्यू,अनुभव. एक बात तो तय है कि सिनेमा हॉल से बाहर निकलने के साथ फिल्म ज़ेहन में खुलने लगती है. दर्शक हॉल से खाली हाथ बाहर नहीं आता. विशाल से उनके दर्शकों को बहुत उम्मीदें भी होती हैं, अपेछाचायें भी. जो कि विशाल की असल कमाई है और उस कमाई में दर्शकों की नाराजगी भी इज़ाफ़ा ही करती है.

विशाल के पास एक गहरा रूमान है…जो उनकी फिल्मों को अलग ही रंग देता है. किसी दोस्त (शायद अशोक) की एक लाइन भूलती नहीं कि अच्छे से अच्छे कवि को हैदर देखते हुए विशाल से ईर्ष्या हो सकती है. विशाल की कविताई फैज़ को सजदा करना नहीं भूलती। एक अच्छा फ़िल्मकार सिर्फ अच्छा रचता नहीं अच्छे रचे जा चुके को सलाम भी करता चलता है. विशाल अपने रूमान में जिंदगी की तल्खियाँ नज़रअंदाज नहीं करते। वो जानते हैं 'हंसी बड़ी महंगी' है, सो उस महंगे होने की कीमत चुकाने को वो तैयार रहते हैं. रंग उन्हें पसंद हैं लेकिन उन रंगों तक पहुँचने के लिए वो बेरंग रास्तों से गुजरने से परहेज नहीं करते। जिंदगी के ग्रे रंग से खेलते हुए, उसकी परतों को उधेड़ते हुए वो एक लाल सूरज उगाने की रूमानियत से लबरेज नज़र आते हैं. हर बार वो हिंदी सिनेमा को एक नया रंग देने की कोशिश करते हैं.

चूंकि मैं विशाल से मिली भी हूँ तो थोड़ा सा जानती हूँ शायद कि वो अपना काम प्यार से करते हैं, वो महत्तवकांछा से ग्रसित नहीं हैं न ही अपने बारे में कोई मुगालता है उन्हें. उनकी ईमानदारी उन्हें, संकोची और शर्मीला बनाती है…

होंगी उनकी तमाम फिल्मों में तमाम कमियां भी, लेकिन मुझे विशाल स्याह अंधेरों में से फूटती एक चमकती हुई उम्मीद की मानिंद लगते है. उनकी फिल्म पर बात करते हुए लोग झगड़ पड़ते हों, कश्मीर मुद्दे पर तमाम लेख पढ़े जाने लगे हों, किताबें खुलने लगी हों, तमाम पहलू सामने आने लगे हों,फिल्म लगातार अपने लिए स्वस्थ आलोचना कमा रही तो ये क्या कम है.… 

कश्मीर की वादियां, शाहिद, तब्बू और गुलज़ार साब के गीत तो बोनस से लगते हैं फिल्म में.

Wednesday, October 29, 2014

'मौत ज़िंदगी का अंत नहीं होती...' - रेहाना जब्बारी


(बना रहे बनारस से साभार)

रेहाना जब्बारी का माँ के नाम आख़िरी संदेश और वसीयत

रेहाना जब्बारी के बारे में दुनिया को पहली बार 2007 में पता चला. तब उनकी उम्र महज 19 साल थी. उन्हें हत्या के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था. रेहाना का कहना था कि ईरान के ख़ुफ़िया मामलों के मंत्रालय के पूर्व कर्मचारी 47 वर्षीय मुर्तज़ा अब्दुलाली सरबंदी ने उनका बलात्कार करने की कोशिश की और वो अपना बचाव भर कर रही थीं.
रेहाना को बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपील की गई. प्रयास किए गए. सोशल मीडिया पर उन्हें मौत की सज़ा से बचाने के लिए अभियान चलाया गया. लेकिन सब बेअसर रहा. ईरान सरकार पर इन सबका कोई असर नहीं पड़ा.

ईरान के क़िसास क़ानून के अनुसार जिस परिवार के व्यक्ति की हत्या हुई है वो चाहे तो हत्या के अभियुक्त की फांसी माफ़ कर सकता है. ऐसे में संबंधित व्यक्ति को कारावास की सज़ा होती है या अन्य प्रकार का हर्जाना देना होता है. मृतक के परिवार का मानना है कि रेहाना ने ये हत्या साजिशन की थी. ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयतुल्लाह ख़ुमैनी भी रेहाना का मृत्युदंड माफ कर सकते थे लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

2007 से 2014 तक चले इस मुक़दमे के बाद शनिवार, 25 अक्टूबर, 2014 को रेहाना को तेहरान की एक जेल में फांसी दे दी गई. माना जा रहा है कि रेहाना ने कुछ महीने पहले अपनी माँ के नाम एक ऑडियो संदेश भेजा था जिसे उन्होंने अपनी वसीयत भी बताया था. नेशनल काउंसिल ऑफ़ रेज़िसटेंस ऑफ ईरान ने उस संदेश का अंग्रेज़ी अनुवाद उपलब्ध कराया है. यह हिन्दी अनुवाद उसी के आधार पर किया गया है.

पढ़ें, रेहाना जब्बारी का संदेश उनकी माँ के नाम

प्यारी शोले

मुझे आज पता चला कि अब मेरी क़िसास की बारी है. मुझे इस बात कि दुख है कि आपने मुझे यह क्यों नहीं बताया कि मैं अपनी ज़िंदगी की किताब के आख़िरी पन्ने तक पहुँच चुकी हूँ. आपको नहीं लगता कि मुझे ये जानना चाहिए था? आप जानती हैं कि मैं इस बात से कितनी शर्मिन्दा हूँ कि आप दुखी हैं. आपने मुझे आपका और अब्बा का हाथ चूमने का मौक़ा क्यों नहीं दिया?

दुनिया ने मुझे 19 बरस जीने का मौक़ा दिया. उस अभागी रात को मेरी हत्या हो जानी चाहिए थी. उसके बाद मेरे जिस्म को शहर के किसी कोने में फेंक दिया जाता, और कुछ दिनों बाद पुलिस आपको मेरी लाश की पहचान करने के लिए मुर्दाघर ले जाती और वहाँ आपको पता चलता है कि मेरे साथ बलात्कार भी हुआ था. मेरा हत्यारा कभी पकड़ा नहीं जाता क्योंकि हमारे पास उसके जितनी दौलत और ताक़त नहीं है. उसके बाद आप अपनी बाक़ी ज़िंदगी ग़म और शर्मिंदगी में गुज़ारतीं और कुछ सालों बाद इस पीड़ा से घुट-घुट कर मर गई होतीं और ये भी एक हत्या ही होती.

लेकिन उस मनहूस हादसे के बाद कहानी बदल गयी. मेरे शरीर को शहर के किसी कोने में नहीं बल्कि कब्र जैसी एविन जेल, उसके सॉलिटरी वार्ड और अब शहर-ए-रे की जेल जैसी कब्र में फेंका जाएगा. लेकिन आप इस नियति को स्वीकार कर लें और कोई शिकायत न करें. आप मुझसे बेहतर जानती हैं कि मौत ज़िंदगी का अंत नहीं होती.

आपने मुझे सिखाया है कि हर इंसान इस दुनिया में तजुर्बा हासिल करने और सबक सीखने आता है. हर जन्म के साथ हमारे कंधे पर एक ज़िम्मेदारी आयद होती है. मैंने जाना है कि कई बार हमें लड़ना होता है. मुझे अच्छी तरह याद है कि आपने मुझे बताया था कि बघ्घी वाले ने उस आदमी का विरोध किया था जो मुझपर कोड़े बरसा रहा था लेकिन कोड़ेवाले ने उसके सिर और चेहरे पर ऐसी चोट की जिसकी वजह से अंततः उसकी मौत हो गयी. आपने मुझसे कहा था कि इंसान को अपने उसूलों को जान देकर भी बचाना चाहिेए.

जब हम स्कूल जाते थे तो आप हमें सिखाती थीं कि झगड़े और शिकायत के वक़्त भी हमें एक भद्र महिला की तरह पेश आना चाहिए. क्या आपको याद है कि आपने हमारे बरताव को कितना प्रभावित किया है? आपके अनुभव ग़लत थे. जब ये हादसा हुआ तो मेरी सीखी हुई बातें काम नहीं आयीं. अदालत में हा़ज़िर होते वक़्त ऐसा लगता है जैसे मैं कोई क्रूर हत्यारा और बेरहम अपराधी हूँ. मैं ज़रा भी आँसू नहीं बहाती. मैं गिड़गिड़ाती भी नहीं. मैं रोई-धोई नहीं क्योंकि मुझे क़ानून पर भरोसा था.

लेकिन मुझ पर ये आरोप लगाया गया कि मैं जुर्म होते वक़्त तटस्थ बनी रही. आप जानती हैं कि मैंने कभी एक मच्छर तक नहीं मारा और मैं तिलचट्टों को भी उनके सिर की मूँछों से पकड़कर बाहर फेंकती थी. अब मैं एक साजिशन हत्या करने वाली कही जाती हूँ. जानवरों के संग मेरे बरताव की व्याख्या मेरे लड़का बनने की ख़्वाहिश के तौर पर देखा गया. जज ने ये देखना भी गंवारा नहीं किया कि घटना के वक़्त मेरे नाख़ून लंबे थे और उनपर नेलपालिश लगी हुई थी.

जजों से न्याय की उम्मीद करने वाले लोग कितने आशावदी होते हैं! किसी जज ने कभी इस बात पर सवाल नहीं उठाया कि मेरे हाथ खेल से जुड़ी महिलाओं की तरह सख्त नहीं हैं,ख़ासतौर पर एक मुक्कबाज़ लड़कियों के हाथों की तरह. और ये देश जिसके लिए आपने मेरे दिल में मुहब्बत भरी थी, वो मुझे कभी नहीं चाहता था. जब अदालत में मेरे ऊपर सवाल-जवाब का वज्र टूट रहा था और मैं रो रही थी और अपनी ज़िंदगी के सबसे गंदे अल्फ़ाज़ सुन रही थी तब मेरी मदद के लिए कोई आगे नहीं आया. जब मैंने अपनी ख़ूबसूरती की आख़िरी पहचान अपने बालों से छुटकारा पा लिया तो मुझे उसके बदले 11 दिन तक तन्हा-कालकोठरी में रहने का इनाम मिला.

प्यारी शोले, आप जो सुन रही हैं उसे सुनकर रोइएगा नहीं. पुलिस थाने में पहले ही दिन एक बूढ़े अविवाहित पुलिस एजेंट ने मेरे नाखूनों के लिए मुझे ठेस पहुँचायी. मैं समझ गयी कि इस दौर में सुंदरता नहीं चाहिए. सूरत की ख़ूबसूरती, ख़्यालों और ख़्वाबों की ख़ूबसूरती, ख़ूबसूरत लिखावट, आँखों और नज़रिए की ख़ूबसूरती और यहाँ तक कि किसी प्यारी आवाज़ की ख़ूबसूरती भी किसी को नहीं चाहिए.

मेरी प्यारी माँ, मेरे विचार बदल चुके हैं और इसके लिए आप ज़िम्मेदार नहीं है. मेरी बात कभी ख़त्म नहीं होने वाली और मैंने इसे किसी को पूरी तरह दे दिया है ताकि जब आपकी मौजूदगी और जानकारी के बिना मुझे मृत्युदंड दे दिया जाए तो उसके बाद इसे आपको दे दिया जाए. मैं आपके पास अपने हाथों से लिखी इबारत धरोहर के रूप में छोड़ी है.

हालाँकि, मेरी मौत से पहले मैं आपसे कुछ माँगना चाहती हूँ, जिसे आपको अपनी पूरी ताक़त और कोशिश से मुझे देना है. दरअसल बस यही एक चीज़ है जो अब मैं इस दुनिया से, इस देश से और आपसे माँगना चाहती हूँ. मुझे पता है आपको इसके लिए वक़्त की ज़रूरत होगी. इसलिए मैं आपको अपनी वसीयत का हिस्सा जल्द बताऊँगी. आप रोएँ नहीं और इसे सुनें. मैं चाहती हूँ कि आप अदालत जाएँ और उनसे मेरी दरख़्वास्त कहें. मैं जेल के अंदर से ऐसा ख़त नहीं लिख सकती जिसे जेल प्रमुख की इजाज़त मिल जाए, इसलिए एक बार फिर आपको मेरी वजह से दुख सहना पड़ेगा. मैंने आपको कई बार कहा है कि मुझे मौत की सज़ा से बचाने के लिए आप किसी से भीख मत माँगिएगा लेकिन यह एक ऐसी ख़्वाहिश है जिसके लिए अगर आपको भीख माँगनी पड़े तो भी मुझे बुरा नहीं लगेगा.

मेरी अच्छी माँ, प्यारी शोले, मेरी ज़िंदगी से भी प्यारी, मैं ज़मीन के अंदर सड़ना नहीं चाहती. मैं नहीं चाहती कि मेरी आँखे और मेरा नौजवान दिल मिट्टी में मिल जाए. इसलिए मैं भीख माँगती हूँ कि मुझे फांसी पर लटकाए जाने के तुरंत बाद मेरे दिल, किडनी, आँखें, हड्ड्याँ और बाक़ी जिस भी अंग का प्रतिरोपण हो सके उन्हें मेरे शरीर से निकाल लिया जाए और किसी ज़रूरतमंद इंसान को तोहफे के तौर पर दे दिया जाए. मैं नहीं चाहती कि जिसे मेरे अंग मिलें उसे मेरा नाम पता चले, वो मेरे लिए फूल ख़रीदे या मेरे लिए दुआ करे. मैं सच्चे दिल से आपसे कहना चाहती हूँ कि मैं अपने लिए कब्र भी नहीं चाहतीं, जहाँ आप आएँ, मातम मनाएँ और ग़म सहें. मैं नहीं चाहती कि आप मेरे लिए काला लिबास पहनें. मेरे मुश्किल दिनों को भूल जाने की आप पूरी कोशिश करें. मुझे हवाओं में मिल जाने दें.

दुनिया हमें प्यार नहीं करती. इसे मेरी ज़रूरत नहीं थी. और अब मैं इसे उसी के लिए छोड़ कर मौत को गले लगा रही हूँ. क्योंकि ख़ुदा की अदालत में मैं इंस्पेक्टरों पर मुक़दमा चलावाऊँगी, मैं इंस्पेक्टर शामलू पर मुक़दमा चलवाऊँगी, मैं जजों पर मुक़दमा चलवाऊँगी और देश के सुप्रीम कोर्ट की अदालत के जजों पर भी मुक़दमा चलवाऊँगी जिन्होंने ज़िंदा रहते हुए मुझे मारा और मेरा उत्पीड़न करने से परहेज नहीं किया. दुनिया बनाने वाली की अदालत में मैं डॉक्टर फरवंदी पर मुक़दमा चलवाऊँगी, मैं क़ासिम शाबानी पर मुक़दमा चलवाऊँगी और उन सब पर जिन्होंने अनजाने में या जानबूझकर मेरे संग ग़लत किया और मेरे हक़ को कुचला और इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि कई बार जो चीज़ सच नज़र आती है वो सच होती नहीं.

प्यारी नर्म दिल शोले, दूसरी दुनिया में मैं और आप मुक़दमा चलाएंगे और दूसरे लोग अभियुक्त होंगे. देखिए, ख़ुदा क्या चाहते हैं. ..मैं तब तक आपको गले लगाए रखना चाहती हूँ जब तक मेरी जान न निकल जाए. मैं आपसे बहुत प्यार करती हूँ.

रेहाना
01, अप्रैल, 2014

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Saturday, October 11, 2014

जंगल से उठती धुन और चीड़ों पर चौदहवीं का चांद...


 





एक सर्पीली सी राह थी...पगडंडडियों का सफर...चीड़ों का जंगल और सर पर चौदहवीं का चांद. चांदनी छलकने को बेताब...चांद इतना करीब...कि मानो हाथ बढ़ाने भर की देर...आगोश में उतरने को बेताब...आप चौदहवीं के चांद को गौर से देखिएगा, उसमें एक अलग सा ही एटीट्यूड होता है...वो पूनम के चांद में नहीं होता। तेरस के चांद में भी नहीं...सिर्फ चौदहवीं के चांद में।

निर्मल वर्मा की जानिब से चीड़ों पर चांदनी को इस कदर बूंद-बूंद पिया है कि उन घने चीड़ के जंगलों में जब चांद को देखा तो निर्मल वर्मा को आवाज देने का जी चाहा। कदमों की आहट से भी चीड़ों के जंगल में पसरी नीरवता...महकते सन्नाटे को भंग करना किसी हिमाकत सा मालूम होता।

न...कोई बात नहीं...सिर्फ मौन....एक गहरा मौन...शायद इसीलिए उन वादियों में, उस घने जंगल में न कोई नेटवर्क था और न उसकी कोई चाह। अपनी देह पर रेंगती चांदनी और मन के भीतर चहलकदमी करते मौन के साथ सुकून उतर आया था। आत्मिक...ऐन्द्रिक...सुख।

कोई नदी आंखों के कोटरों में करवट लेती है...चांद इतने करीब मैंने कभी नहीं देखा था, उसे अपने इतने करीब कभी महसूस नहीं किया था। जाने क्यों लगा कि ये चांद 'सिर्फ' मेरे लिए ही उगा है...'सिर्फ मेरे लिए...' ये 'सिर्फ' कितनी मुश्किलें पैदा करता है इस बात से नावाकिफ नहीं हूं....इसके जोखिम इतने घने हैं कि अक्सर उनमें पूरी उम्र उलझ जाती है...फिर भी बार-बार इस 'सिर्फ' में उलझने से बच नहीं पाती...

जंगल से कोई धुन उठती है...एक खुशबू....आगोश में लेने को तत्पर...कि बचने की कोई गुंजाइश भी नहीं...और ख्वाहिश भी नहीं...खुद को उस समूचे मंज़र के हवाले करते वक्त कितना हल्का महसूस हुआ था...जीवन की वो तमाम दुश्वारियां जिनके लिए बिसूरते-बिसूरते सूरतें खराब कर लीं, कितनी दयनीय हो चली थीं।

खुद को दोशाले में समेटकर मद्धम कदमों से निशब्द की ओर बढ़ना...

न बोलने वाला मौन नहीं...न होने वाला मौन...कोई आंतरिक संवाद भी नहीं...ऐसे मौन परिमार्जन होते हैं...मन के कमरे में जमी खर-पतवार को उखाड़ फेंकते हैं। मेरा 'मैं'....उस जंगल में विलीन हो चुका था...और वो जंगल अपनी तमाम खुशबू और समूचे चांद के साथ व्यक्तित्व में पैबस्त था।

एक गाढ़ा रूदन उभरता है...बहुत गहरा...बाहें पसारने का जी चाहता है...चाँद को छू लेने का जी चाहता है. चांद को छू लेने की इच्छा को मुक्त करते हुए उस रूदन के कांधे से टिकना मुफीद लगता है। इच्छाओं को मुक्त करना ही श्रेष्ठतम है...लेकिन श्रेष्ठतम जानते हुए भी इच्छाओं में उलझते रहते हैं...बार-बार...आंखों की नदी गालों को पार करते हुए गर्दन को सहलाने लगती है.

इच्छा...मुक्ति...इच्छा...मुक्ति...इच्छा...मुक्ति...स्क्रीन पर उभरती छवियों की तरह उभरते हैं और गुम होते हैं...फिर उभरते हैं फिर गुम होते हैं...दर्शक दीर्घा में मैं और वो चौदहवीं का चांद....

तभी कंधे पर किसी का हाथ महसूस होता है....चौंक के मुड़ती हूं...देखती हूं...वो कोई स्मृति थी....मुस्कुराती हुई सी...इच्छा से मुक्ति का अभी वक्त नहीं आया है शायद...अभी आसक्तियों के महासागर में और हिचकोले खाने हैं...समझ जाती हूं...चांद मुस्कुरा रहा है... करीब बैठा हुआ....मैं हाथ बढ़ाकर उसे छू लेने की इच्छा को मुक्त नहीं कर पायी आखिर...उसे छूने को हाथ बढ़ाती हूं तो वादियों से कोई मीठी धुन उठती है...

आधी रात को उस घने बियाबान में अपनी इच्छा को जोर से भींच लेती हूं...मुक्त नहीं कर पाती...चांद जो आसमान से उतरकर चीड़ों पर टंगा हुआ था हथेलियों में सिमट आता है...मैं ओस की चादर लपेटे हथेलियों में चौदहवीं का चांद लिए सो जाती हूं....

(तस्वीरें- सुभाष रावत )


Thursday, October 9, 2014

जिंदगी खुलकर खिलती है, मुस्कुराती है...


बड़े सादा हैं तेरे लफज कि इन लफजों में
जिंदगी खुलकर खिलती है, मुस्कुराती है....

बड़े से कोरे कागज पर ढेर सारे अक्षरों का ढेर जमा है। बड़ा सा ढेर। एक-एक कर अक्षरों को गिराने का खेल सुंदर लगता है। काफी अरसे से ऐसा मालूम होता है कि अक्षर जैसे ही शब्द बनेंगे, किसी न किसी अर्थ का लिबास ओढ़ेंगे और बहुत भारी हो जायेंगे। इतने भारी कि उनका बोझ जीवन के कंधों पर उठाना मुश्किल होगा। कागज की सादगी दिल लुभाती है। जीवन के विस्तार सा फैला कागज, एकदम साफ, सुथरा, सादा कागज...कोरे कागज की सादगी पे जां निसार करने का जी चाहता है। सारे अक्षर एक-एक कर लुढ़क चुके हैं बस कि तीन अक्षर दो मात्राओं के साथ मुस्कुरा रहे हैं...सा द गी...कोरे कागज की सादगी....उन अक्षरों में समा गई और वो अक्षर शब्द बनकर मुस्कुराते हैं। जीवन के कोरे कैनवास पर सादगी के रंग बिखरते हैं...

सादगी कितना आकर्षण है इसमें। कितनी पाकी़ज़गी। सादगी फूलों की, नदियों की, पहाड़ों की, फिजाओं की, जंगलों की, खेतों की, खलिहानों की, मेहनत की, संघर्ष की...सादगी बच्चों की मासूम मुस्कुराहटों की, शरारतों की, सादगी दुआ में उठे हाथों और सजदे में झुकी पलकों की... उफफफ...किस कदर जादू है इन तीन लफजों में...कि जिंदगी इनके हवाले से ही जिंदगी मालूम होती है बाकी तो सब गढ़ा हुआ कोई खेल सा लगता है।

एक रोज यूं ही नदी किनारे टहलते हुए खुद से पूछा था ये सवाल कि क्या है जो हमारे हर सवाल का जवाब कुदरत के पास मौजूद होता है? हर जख़्म का मरहम? क्यों हर रोज उगने वाला सूरज, चांद, हवायें, चिडि़यों की चहचहाआहट हमें बोर नहीं करती। जवाब था सादगी, स्वाभाविकता। हम जितने स्वाभाविक हैं उतने ही सादा हैं। और सादगी कभी बोर नहीं करती। काट-छांटकर तैयार किये गये पार्क हों या मेकअप की धज में रचे व्यक्तित्व...सब जगह एक ऊब है, लेकिन तेज धूप में हल चलाते किसान हों, खेतों में धान रोपती स्त्रियां, झुर्रियों वाली बूढ़ी दादी की मुस्कुराहट हो या किल्लोल करते बच्चे...सब हमें लुभाते हैं... क्योंकि यहां सौंदर्य अपनी सादगी के साथ आता है। ठहरता है।

सब जानते हुए भी जाने कब कैसे समय की गति के साथ तालमेल करते-करते हम सादगी से दूर निकल आये। हम रच बैठे एक झूठी बेमानी दुनिया। मुखौटों से सजी हुई। जहां मुस्कुराहटें भी ड्यूटी पर तैनात एयरहोस्टेस जैसी मालूम होती हैं और विनम्रता भी मैनजेमेंट के स्कूलों के सेलेबस का कोई पाठ लगती है। शब्द अर्थ से भरे लेकिन भाव से खाली और इन सबका हश्र यह है बावजूद तमाम कम्युनिकेशन मीडियम के, हजार फोन, फेसबुक, व्हाटसएप्प, वेबसाइट्स, हजारों दोस्तों, मोटे पैकेजेस, लंबी गाडि़यों के बावजूद लोग लगातार अकेलेपन से जूझ रहे हैं।

हो सकता है कि किसी को यह नाॅस्टैल्जिक फीवर यानी अतीत प्रेम का बुखार मालूम हो लेकिन सच में अक्सर अपनी बेचैनियों में बचपन की स्मृतियों को खंगालती हूं तो कुएं की जगत पर चाचियों, मामियों की खिलखिलाहटों में घूंघट का सौंदर्य जाग उठता था। सर्द रातों में अलाव के गिर्द जमा मजमा बिना किसी साइकोलाॅजिस्ट की काउंसलिंग के मन पर जमी तमाम काली पर्तों को उखाड़ फेंकता था। वो जीवन की सादगी भरे लम्हे थे, उनमें ताकत थी, हमें संभाल पाने की। लेकिन जाने किस सफर के मुसाफिर निकले हम कि सादगी भरी पगडंडियों के सफर को छोड़ फलाई ओवर्स पर भागने लगे।

ये सिर्फ बाहरी भागमभाग का मुआमला नहीं, ये विकास से किसी बैर की बात भी नहीं लेकिन इस सब के बीच खुद से छूट जाने की बात हो। जो सादगी हमारा गहना थी, जिसके सौंदर्य से हम खिल जाते थे, जिस सादगी के साये में हमारा व्यक्तित्व लगातार निखरता था, जिसकी आंच में हम सिंककर हम मजबूत होते थे अनजाने ही वो सादगी हमसे दूर होने लगी।

आज न जाने कितने उपाय ढूंढते फिरते हैं मन की शांति के...कितने ठीहे, कितने योग, कितने पैकेज लेकिन ये कस्तूरी को वन में ढूंढने जैसा ही है।

हमने सबसे सुंदर पहाड़ काटे वहां अपना सीमेंट का घर बनाने को, सबसे सुंदर जंगल काटे घर के अंदर नकली जंगल उगाने को। जीवन में एक नकलीपन भर लिया...लेकिन इन सबसे दूर...धूप अब भी अपने सौंदर्य पर इठलाती है, गुलाबी हवाओं की रूमानियत अब भी इश्क की रंगत बढ़ाती है...सादगी अब भी मिलती है किसी अल्हड़ मुस्कुराहट में।
कुम्हार की माटी सी सादगी...मौसम की करवट सी सादगी...मोहब्बत के आंसू सी सादगी...नन्हे के हाथों की आड़ी-टेढ़ी लकीरों सी सादगी...जीवन इनसे दूर कहीं नहीं है...मत जाओ काबा, मत जाओ गिरजा...इबादत बस इतनी कि अपने भीतर की सादगी पे आंच न आने देना...
सादा होना, सरल होना...। इतना कठिन भी नहीं सरल होना, इतना जटिल भी नहीं सादा होना, बस कि उस जरूरत को महससूना जरूरी है। मौसम अंगड़ाइयां ले रहा है...सुबहें पलकों में ढेर सारे ख्वाब सजा के जाती हैं, नन्ही ओस की बूंदें शाम को आॅफिस से घर जाते वक्त कांधों पे सवार होकर गुनगुनाती हैं...कितने बरसों से वो बूढ़ा उसी मोड़ पर बांसुरी बजाता मिलता है...दिन भर की अकराहट को उठाकर फेंकने को रास्ते में बिखरी जिंदगी की तमाम सादगियां इस कदर काफी हैं कि और कोई चाहत भी नहीं।

हां, उसी मोड़ पर फिर ठिठकते हैं कदम जहां महबूब से हाथ छूटा था...उस लम्हे की सादगी में इश्क की पाक़ीज़गी अब तक सांस लेती है... किसी कैफेटेरिया में नहीं, किसी सिनेमा हाॅल में नहीं, किसी आलीशान पार्क में भी नहीं यूं ही भीड़ भरी सड़क पर एक रोज दो दिलों की आहटें टकरा गई थीं...वो लम्हे अब भी उन्हीं सड़कों पर मुस्कुराते हुए दौड़ते फिरते हैं...ये उन लम्हों की सादगी की तासीर ही है कि सौंदर्य का फलसफा कभी ब्यूटी पार्लर के बाहर टिका ही नहीं...वो तो उस अनमोल सी सांवली सूरत पे अटका हुआ है, जिसने बिना कोई जतन किये अपने भीतर की सादगी को महफूज रखा है...न जाने क्या है इस सादगी में....कैसा आकर्षण....कैसा खिंचाव...कि जीवन के कोरे कागज से जब सारे अक्षर झाड़ कर गिरा दिये तब भी ये तीन अक्षर वहां रह ही गये...मुस्कुरारते...गुनगुनाते...जिंदगी का कोरा कागज....खिलखिला दिया...जिंदगी की इस सादादिली पे कौन न फिदा हो जाये भला...

(प्रकाशित)


Monday, September 29, 2014

और पलको पे उजाले से झुके रहते हैं....


हम ने देखी है उन आखों की महकती खुशबू
हाथ से छूके इसे रिश्तो का इल्जाम ना दो 
सिर्फ एहसास है ये रूह से महसूस करो 
प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम ना दो 

प्यार कोई बोल नहीं, प्यार आवाज नहीं 
एक खामोशी है सुनती है कहा करती है
 न ये बुझती है, न रुकती है, न ठहरी है कही 
नूर की बूँद है, सदियों से बहा करती है 

मुस्कराहट सी खिली रहती है आँखों में कही
और पलको पे उजाले से झुके रहते हैं 
होंठ कुछ कहते नहीं, कापते होठों पे मगर
कितने खामोश से अफसाने रुके रहते हैं...



Sunday, September 28, 2014

स्त्रियां सुनती नहीं हैं हमारी...




स्त्रियां सुनती नहीं हैं हमारी...जब
बेटे की शादी में मांगना होता है दहेज

जब, प्रताडि़त करना होता है
घर की बहू को मायके से
और ज्यादा पैसे लाने के लिए

जब, बेटा पैदा करने की जिद में
करवाना होता है गर्भपात

जब, रखने होते हैं निर्जला व्रत
छूने होते हैं हमारे पैर
और वो बनाती हैं हमें परमेश्वर

स्त्रियां सुनती नहीं हैं...हमारी
वो हमारी एक नहीं सुनतीं

और इन सबके अलावा 
'हम उनकी एक नहीं सुनते...'

यह बात जानबूझकर नहीं कहते वो....

(पेंटिंग- देविका, साभार- गूगल)

Saturday, September 20, 2014

कश्मीर- महफ़ूज़, शब्द कितना महफूज़ बचा है अब?



पुरानी किसी एल्बम से झांकते हैं
दुआ में उठे कुछ हाथ,
इस्तेकबाल में आगे बढे कदम
सीने में उड़ेल दिया गया प्यार
और दिल फरेब मेहमाननवाजी

पुरानी किसी एल्बम से झांकती हैं
पोशीदा मुस्कुराहटें
शरारतें

किसी नाज़नीन की तरह
बाद तमाम नखरों के अपने प्रेमी
के सीने में दुबक जाने की मानिंद
हवा में देर तक गोल चक्कर लगाने के बाद
धरती के सीने में चुपचाप टिकते
पत्ते चिनारों के

पुरानी किसी एल्बम से
एक ठंडी हवा का झोंका
दाखिल होता है कमरे में
ऊब, उमस और निराशाओं के कुहासे
ताज़ी खुशनुमा हवा के झोंको में
तब्दील होने लगते हैं

कहवे की खुशबू
उड़ा ले जाती है चिनारों के साये में

डल झील के एकदम बीचोबीच
देखा गया वो ढलता हुआ सूरज
आँखें मलता हुआ
झांकता होगा न जाने कितनी
पुरानी एल्बमों से

अनंतनाग, गुलमर्ग, पहलगाम
मुस्कुराते हैं पुरानी एल्बम में
सेब के बागान और उनकी मिठास से लबरेज
वहां के लोगों की ज़बान
केसर के खेत
अखरोट के बाग़

यहाँ वहां चौकन्ने सिपाहियों की आँखें
अचानक मदद को आगे बढ़ते हाथ
जो यक ब यक तो डराते हैं
फिर दोस्त बनकर हाथ हिलाते हैं
गुम गए रास्ते ढूंढकर पांव में पहनाते हैं

कश्मीर यूनिवर्सिटी की खूबसूरती झांकती है
पुरानी एल्बम से
समूचा श्री नगर मुस्कुराता है
उतरती शामों को कन्धों पर समेटते हुए लाल चौक से
मुख्य बाजार तक टहलते हुए जाना
और लौटते समय याद में रह जाना
लोगों का दिल जीत लेने का हुनर

पुरानी डायरी में दर्ज है कहीं कि
कश्मीर सिर्फ अपनी कुदरती खूबसूरती के कारण
नहीं बल्कि
यहाँ के लोगों की नेक नियति
मोहब्बत और दिलों में भरी मिठास के कारण
भी ख़ास है…

सियासतदानों के खेल के चलते
सरहद पर खिंची लकीरें
दिलों पे भी उभरने लगीं
नहीं ये पुरानी एल्बम में कहीं दर्ज नहीं

हाँ, दर्ज हैं ढेर सारे सैनिक
रात दिन धरती के सबसे सुन्दर टुकड़े की हिफाज़त में तैनात

बर्फ से ढंकी वादियों में जब लाल छींटें उड़ते हैं
तब समूचे देश की नींद की चादर
उड़ गयी हो ऐसा दर्ज नहीं है
न डायरी में न पुरानी एल्बम में

कुछ बेशर्म बयान दर्ज हैं
अख़बारों में, कुछ बेहूदा तर्क
मगरूर चैनलों में

नहीं दर्ज है मासूमों का खौफ,
न, सेना की मुश्किलें
और कहीं नहीं दर्ज है दोनों के
बीच खाई तैयार करने वालों के स्याह इरादे

आज फिर संकट में है धरती का स्वर्ग
फ़ोन पर आती है एक घबराई हुई आवाज
सब बह गया, सब बह गया
अल्लाह का शुक्र है
मेरा परिवार महफूज है
अल्लाह का शुक्र है.…

उफ्फ्फ्फ़, महफ़ूज़, शब्द कितना महफूज़ बचा है अब?


Tuesday, September 9, 2014

रब सा ऊंचा इश्क़....


छोटा पेड़ - सुनो, आसमान के इत्ते पास पहुंचकर कैसा लगता है?
बड़ा पेड़ - तुझे कैसे पता कि मैं आसमान के पास हूँ?

छोटा पेड़- देखकर लगता है.
बड़ा पेड़- (हा हा  हा) जिस रोज देखे हुए को सच मानने से मुक्त होगे, उस रोज मिल जायेगा तुम्हें अपने सवाल का जवाब भी. 

छोटा पेड़- (अनमना होकर ) मत बताओ। लेकिन ज्ञान मत दो. हुँहहहह

बड़ा पेड़- अच्छा सुनो, मैं आसमान के पास नहीं गया. एक रोज मेरे कानो से होकर गुजरा एक शब्द 'इश्क़' उसी रोज ये आसमान झुककर मेरे करीब आ गया.…
ऊँचाई क़द की नहीं इश्क़ की होती है....समझे ?
छोटा पेड़- (सर खुजाते हुए) पता नहीं, हाँ शायद, नहीं शायद 
बड़ा पेड़- हा हा हा.…

(कमबख्त इश्क़ )


Friday, September 5, 2014

जीने की इच्छा का ताप...




गणित के पास नहीं है
जीवन के सवालों के हल
इसलिए अपने सवालों के साथ
बैठना किसी नदी के किनारे
या खो जाना किसी रेवड़ में

बीच सड़क पे नाचने में भी कोई उज़्र नहीं
न जुर्म है आधी रात को
जोर से चिल्लाकर सोये हुए शहर की
नींद उखाड़ फेंकने में

बस कि खुद को पल पल मरते हुए
मत देखना चुपचाप
अपना हाथ थामना ज़ोर से
और जिंदगी के सीने पे रख देना
जीने की इच्छा का ताप

जिंदगी धमनियों में बहने लगेगी
आहिस्ता आहिस्ता,,,


Wednesday, August 27, 2014

नेह के पानी में भी जी लेती हैं कुछ मछलियां...


सुनो, शहर में दाखिल मत होना...शहर को अपने भीतर दाखिल होने देना...वो हाथ पकड़कर तुम्हें पहले इधर-उधर के रास्तों पर भटकायेगा...तुम घबराना मत...मुस्कुरा देना। भले ही शहर के रेलवे स्टेशन पर लिखा नहीं मिलेगा कि मुस्कुराइये कि आप इस शहर में हैं फिर भी मैं तुम्हें चुपके से बता रही हूं कि मेरे शहर को मुस्कुराहटें बहुत पसंद है। तुम बस मुस्कुराते हुए शहर की उंगली थामे भटकते रहना।

मेरे शहर से ज्यादा मुझे कोई नहीं जानता...इस शहर के हर कोने, हर सड़क हर गली, हर पेड़ हर डाल को मेरी आवारगी की खबर है...बिना भटका हुआ मुसाफिर मेरे घर तक आ ही नहीं सकता। शहर तुम्हें भटकायेगा जैसे अब तक जीवन ने भटकाया है....तुम बस हरी दीवारों में मेरी छुअन को पकड़ते जाना, रास्तों में मेरी रहन। हवाओं में समाई खामोशियों में मेरी कहन।

अरे हां, पत्तियों पर ठहरी हुई ओस की बूंदों को सलाम करना मत भूलना।

फिर एक जगह ले जाकर शहर तुम्हारा हाथ छोड़ देगा। वो तुम्हें ढेर सारे रास्ते देकर गुम हो जायेगा। एक बादलों भरा रास्ता तुम्हारा हाथ पकड़कर खींचेगा...तुम्हें मुग्ध करेगा...बादलों की ठिठोलियां तुम्हारा हाथ थामने को बेचैन होंगी। एक रास्ता ढेर सारे सुरों वाला होगा। जहां पहाड़ी धुनें, ढपली की थाप, पैरों की रिद्म कमसिन लड़कियों की खिलखिलाहटें होंगी....कोई रहस्य सा होगा वो रास्ता रहस्य जिसे तुरंत जानने को मन व्याकुल हो जाता है। एक रास्ता होगा किसी हरी सुरंग सा...अभिमंत्रित करता....तुम पलकें उठाओगे तो झुकाना भूल जाओगे....अप्रतिम सौंदर्य तुम्हें अपनी बाहों में घेरने को उत्सुक होगा, एक रास्ता झरनों और नदियों की कलकल लिये खड़ा होगा...जीवन के सफर की तमाम थकन धोने को वो झरने पुकारेंगे...वो नदियां अपना आंचल पसारेंगी...। एक रास्ता मिलेगा...गुमसुम वीरान...उबड़ खााबड़...उस रास्ते से कोई पुकार नहीं आयेगी...उस रास्ते पर कोई मुसाफिर जाता नहीं दिखेगा, कोई हलचल भी नहीं...

ओ जिंदगी के भटके हुए मुसाफिर तुम उसी गुमसुम रास्तों पर अपनी मुस्कुराते कदम रख देना... ये रास्ते कबसे तुम्हारी राह देख रहे हैं। उनकी ये मायूसी तुम्हारे इंतजार से हैं। उजड़ी सी वीरान दीवारों पर अब भी उम्मीदों का ढेर सारा हरा उगा हुआ मिलेगा...तुम उस तमाम हरे को अकोर लेना...उन दीवारों को हथेलियों से हौले से छूते हुए चले जाना...वो दीवारें तुम्हें तरह तरह के रंग बिरंगे गुलाबों के बागीचे में ले जायेगी...उसी बगीचे से होकर उपर जाती हुई चंद सीढि़यां मिलेंगी....मछलियां मिलेंगी उन सीढि़यों पर। जिंदा मुस्कुराती मछलियां...नेह के पानी में भी जी लेती हैं कुछ मछलियां...

जहां सारी सीढि़यां खत्म होंगी वहां लिखा होगा ख्वाहिश...

जिन रास्तों को तुम छोड़ आये थे वो सारे रास्ते यहीं से होकर जाते हैं....

(मेरे घर आना....जिंदगी - रास्ता )

Thursday, July 31, 2014

हरा अब हरा ही है...बेपनाह हरा....




ये कौन चित्रकार है जिसने समूची धरती को हरे रंग में रंग दिया है। चारों तरफ हरा ही हरा। कम हरा, ज्यादा हरा...गाढ़ा हरा, हल्का हर. बस कि हरा ही हरा... हरे दरवाजे...हरी खिड़कियां... हरी दीवारें...हरे रास्ते...हरी मुस्कुराहटें...

दूर पहाड़ी पर बादलों का खेल जारी है। हम चुप्पियों को वादियों में उछालते हैं और वो संगीत बनकर हमारे पास लौटती हंै। सांसों के जरिये कोई संगीत भीतर उतरता है। उठती गिरती सांस...चुप्पियां और असीम हरा...शब्द कितने निरीह होते हैं चुप्पियों के आगे कि चुप्पियां जब अपना आकार लेती हैं तो दुनिया के सारे शब्दकोश, सारी भाषाएं सिमटने लगती हैं।

वादियों में बिखरा हरा और मौन का संगीत। धड़कन की ताल पर मौन के सुर...ये कौन सा राग है...? बादल का कोई टुकड़ा प्रश्न बनकर कंधे पर लुढ़क सा जाता है। उसके इस तरह कंधे से टिकने पर एक ख्याल जागता है कि अगर इन वादियों को बूंदों की ओढ़नी ओढ़ा दी जाए तो? मैं कंधे पर टिके बादल को हाथ लगाती हूं...वो एकदम ठंडा है...वो शायद ऊंघ रहा था। मेरी हरारत से वो चैंककर जाग उठता है। आंखें मलता है....मैं मुस्कुरा देती हूं। उसे थपकी देकर सुला देती हूं...बूंदों की ओढ़नी से वादियों को ढंकने की इच्छा को भी। हरे की संगत पर मौन राग आलाप लेता है... भीतर की वादियां भी हरी हैं...कुछ जख्म भी...मुस्कुराहटों के आसपास एक नमी का अहसास...

कुदरत के पास इतना हरा है फिर भी धरती के कुछ हिस्से कितने सूखे और ध्ूासर हैं। कुछ तो हम में ही कमी होगी कि हम कुदरत का दिया ले नहीं पाते...

कैलेंडर कहता है कि ये सावन का हरा है...मैं कहती हूं ये जीवन का हरा है। इस हरे की शिद्दत तो देखिए कि इंद्रधनुष से उतरकर एक-एक कर रंग हरे में ढलते जा रहे हैं... अंदर बाहर सब हरा ही हरा है...अप्रतिम हरा....

हाथ बेसाख्ता दुआ में उठते हैं कि काश! पूरी धरती पर प्रेम का हरा बरस जाए....सुकून का हरा...

नन्हे बच्चों का एक झुंड गुजरता है....उनके कोलाहल से वादियों में गूंजते मौन राग में नया ही सुर लगता मालूम होता है। मानो दो रागों को मिलाकर नये राग का जन्म हो रहा है...मौन राग में कोलाहल...

मैं एक टुकड़ा हरा बालों में टांकती हूं और एक टुकड़ा हरा हथेलियों पर रखती हूं। बादल का वो टुकड़ा मेरी हथेलियों को टुकुर-टुकुर देखता है...उसे कुछ समझ नही आता...लेकिन मेरी हथेलियों पर एक बूंद टपक जाती है। वादियों में बिखरे हरे को बूंदों की ओढ़नी से ढंक देने की ख्वाहिश अब मैं रोक नहीं पाती। बादलों की ओर हाथ बढ़ाती हूं और वो तो मानो बरसने को बेताब ही थे।

जाने क्या-क्या बरसा...बरसता रहा...जाने क्या-क्या भीगा...भीगता ही रहा...कुछ बारिशें उम्र भर को ठहर जाती हैं, कभी-कभी जीवन के सारे रंग हरे में ढलकर ही खुश होते हैं...

Sunday, July 13, 2014

जैसे बरसता है सावन...



खिलना ओ जीवन !
जैसे खिलती है सरसों 
जैसे खिलती हैं बसंत की शाख 
जैसे भूख के पेट में खिलती है रोटी 
जैसे खिलता है मातृत्व 
जैसे खिलता है, महबूब का इंतज़ार 
जैसे पहली बारिश में खिलता है रोम-रोम 

महकना ओ जीवन !
जैसे महकती है कोयल की कूक 
जैसे महकती हैं गेहूं की बालियां 
जैसे महकता है मजदूर का पसीना 
जैसे महकता है इश्क़ का इत्र 
जैसे महकती है उम्मीद की आमद 
जैसे महकते हैं ख्वाब 

बरसना ओ जीवन !
जैसे चूल्हे में बरसती है आग 
जैसे कमसिन उम्र पर बरसती है अल्हड़ता 
जैसे सदियों से सहते हुए लबों पर 
बरसता है प्रतिकार का स्वर 
जैसे पूरणमाशी की रात बरसती है चांदनी 
जैसे इंतज़ार के रेगिस्तान में 
बरसता है महबूब से मिलन 
जैसे बरसता है सावन...

Thursday, July 3, 2014

ईजा की हंसी जो बह गयी...



घर सुनते हीे गिरने लगती हैं दीवारें
ढहने लगती हैं छतें
आने लगती हैं आवाजें खिड़कियों के जोर से गिरने की
उतरने लगती हैं कानों में मां की सिसकियां
पिता की आवाजें कि बाहर चलो, जल्दी...

घर सुनते ही पानी का वेग नजर आता है,
उसमें डूबता हमारा घर, रसोई, बर्तन, बस्ते, खिलौने सब कुछ
घर सुनते ही याद आती है गाय जो बह गई पानी में
वो अनाज जिसके लिए अब हर रोज भटकते हैं
लगते हैं लंबी लाइनों में
वो बिस्तर जिसमें दुबककर
गुनगुनी नींद में डूबकर देखते थे न जाने कितने सपने

घर सुनते ही याद आती है
ईजा की हंसी जो बह गयी पानी के संग
घर सुनते ही याद आती हैं तमाम चीखो-पुकार
तमाम मदद के वायदे
घोषित मुआवजे
मदद के नाम पर सीना चौड़ा करके घूमने वालों की
इश्तिहार सी छपी तस्वीरें,

घर सुनते ही सब कुछ नजर आता है
सिवाय एक छत और चार दीवारों के....

(उत्तराखंड आपदा के एक वर्ष बाद )


Friday, June 27, 2014

कौन पढ़ पाता है खुशबू यहाँ...

(Pic- Anna Aden, courtesy- Google)


अँधेरा सिर्फ तब नहीं घिरता जब दिन अपना सामान समेटता है, अँधेरा सूरज से आँख मिलाते हुए भी उग सकता है. ठीक ऐसा ही रौशनी के साथ भी है. रौशनी, मैं बार बार रौशनी दोहराती हूँ. चारों तरफ घुप्प अँधेरा है और मैं किसी मन्त्र की तरह रौशनी उच्चारती हूँ. जैसे-जैसे अँधेरा बढ़ता है मैं अपनी दाहिनी हाथ की कलाई से बायीं हाथ की कलाई को थाम लेती हूँ. साँसों की बढ़ती हुई रफ़्तार पर धीरे से कान रख देती हूँ. आँखों को मूंदते हुए रौशनी....रौशनी....रौशनी....पुकारती हूँ. अँधेरा ठहाके मारकर हँसता है. मैं कान मूँद लेती हूँ. अपनी आवाज से अपने कानों के कुँए को भर लेना चाहती हूँ.

कोई झिंझोड़ के कहता है इतनी रौशनी तो है, इतना ढेर उजाला, तुम्हें क्या चाहिए? पर मुझे तो उजाला नहीं दीखता अँधेरा ही दीखता है, गहन अँधेरा, एकदम स्याह मानो लील लेगा सब कुछ. मैं खामोश हो जाती हूँ.

मेरी हथेलियों से फिसलकर मेरे शब्द अपने अर्थ समेत कहीं गुम गए हैं. उनके भाव चिपके हुए हैं हथेलियों में, अपनी तमाम खुशबू के साथ. कौन पढ़ पाता है खुशबू यहाँ। ये शब्दों की दुनिया है. मैं शब्दों को टटोलती हूँ, मिलते नही. जिस भाषा में मैं कुछ कहती हूँ वो शब्द विहीन है. लोग मुझे अजीब ढंग से देखते हैं. मैं उन्हें. मैं इस दुनिया से भाषा में भी बिछड़ गयी. मेरी हथेलियों पर चिपकी गुम गए शब्दों की खुशबू मुझे बेचारगी से देखती है.

रात मुझे घूरकर देखती है. मैं सहम जाती हूँ. खुद को समेटकर एक कोने में रख देती हूँ. काली चाय पीने की इच्छा को भी समेट देती हूँ. तभी एक चिड़िया मेरी मेज पर आकर सर टिकाती है. मैं उसे अपने पास से उड़ा देना चाहती हूँ कि कहीं ये अँधेरे का नश्तर उसे चुभ न जाये. वो मुझे खिड़की के बाहर देखने को कहती है.…उसके चहचहाने में रौशनी का सन्देश है. उसके सन्देश से झरती हैं कुछ बूँदें. पलकों पर नमी महसूस होती है.एक ये कमबख्त मन का मानसून है कि थमता नहीं और एक ये मौसम वाला मानसून है आने का नाम नहीं ले रहा. सच है जिसका इंतज़ार करो बस वही नहीं आता बाकी सब मुंह उठाये चले आते हैं.

उस नन्ही चिड़िया का हाथ थाम लेती हूँ. मेरे खो गए शब्दों में से कुछ मुझसे टकराते हैं. जो आवाज कानों में टपकती है वो ये है 'सुनो, तुम चली तो न जाओगी.... रहोगी न साथ हमेशा?' चिड़िया चुपचाप सर हिला देती है.... खिड़की के बाहर गुम गए शब्दों का ढेर है. अब मेरी उनमे कोई दिलचस्पी नही.

हल्का महसूस हो रहा है. कहने और सुनने से मुक्ति है....


Wednesday, June 25, 2014

बड़ी बात नहीं है मोहब्बत करना...




सुनो, बड़ी बात नहीं है मोहब्बत करना, बड़ी बात तो है मोहब्बत को सांस-सांस सहना। 

बड़ी बात नहीं है अपने आंचल की खुशियों को किसी के नाम कर देना, बड़ी बात है कि फिर उन खुशियों के लिए न तो बिसूरना और न उनका जिक्र करना, खुद से भी नहीं। 

बड़ी बात नहीं है अपनी आंखों में उगा लेना ढेर सारे ख्वाब, बड़ी बात है उन ख्वाबों की मजबूत परवरिश करना। 
बड़ी बात नहीं है यूं ही किसी बीहड़, अनजाने सफर पर निकल पड़ना, बड़ी बात तो है उस सफर को जीवन का सबसे खुशनुमा सफर बना लेना। 

कोई बड़ी बात नहीं है हथेलियों पर सूरज उगा लेना, बड़ी बात है सूरज की रोशनी को धरती के अंतिम अंधेरे तक पहुंचा पाना। 

बड़ी बात नहीं है किसी का दिल जीत लेना, बड़ी बात है जीते हुए दिल पे अपनी जान हार जाना। 

बड़ी बात नहीं विनम्रता की चादर ओढ़ अपने लिए गढ़वा लेना अच्छे होने की इबारतें, बड़ी बात है तमाम रूखेपन, अक्खड़ता, बीहड़ता के बावजूद किसी की आंख का आंसू किसी के दिल की धड़कन बन पाना।

(अगड़म बगड़म )

Thursday, June 12, 2014

मुरझाई नींदों का सबब ....


मेरा भी अजीब हिसाब है। पहले खुद हर रोज नींदों की तह बनाकर सिरहाने रख लेती हूं, फिर खाली आंखों से नींद तलाशती हूं। छत, दीवार, दीवार पर लगी घड़ी, पेंटिंग, पर्दे, रैक में लगी किताबें, उलझे पड़े अखबार...दीवार पर पड़े सीलन के निशान, वो छोटा सा निशान जहां पहले शायद कील रही होगी और कील के न रहने से वो खाली पड़ा है जैसी और न जाने कितनी चीजों से गुजरती हैं आंखें। लेकिन नींद नहीं मिलती। ज्यों-ज्यों रात गहराती है कमरे की चीजें और जीवन के बीते लम्हे और भी ज्यादा साफ नजर आने लगते हैं। आंखें इन चीजों में स्मृतियों के पन्नों में ऐसे उलझती हैं कि नींद का ख्याल भी गुम हो जाता है।

सुबह को सूरज जब आंखों की तलाशी लेता है तो नींद उसे वहां मिलती नहीं। वो कमरे की तलाशी लेता है और सिरहाने से नींद बरामद करके मुस्कुराता है।' पगली ...तेरी आंखों के ठीक नीचे थी नींद और तू...? तूने रात का नियम तोड़ा है....रात में सोने का नियम...सजा तो मिलेगी?' सूरज कहता है। सजा वाली बात पर मेरा ध्यान नहीं जाता, बस नियम तोड़ने वाली बात पर जाता है। यह बात मुझे अच्छी लगती है। सूरज तलाशी लेकर जा चुका था। उसने मेरे लिए किस सजा का ऐलान किया मैंने सुना ही नहीं लेकिन अब मेरे पास मेरी रात की खोई हुई समूची नींद थी और एक प्याला चाय भी। मैंने नींद से माफी मांगी और सामने वाले आम के पेड़ पर चल रहा चिड़ियों का खेल देखने लगी।

आज चिड़ियों के खेल में रवानगी नहीं थी। उनमें वो चंचलता नहीं, शोखी नहीं, एक उदासी थी। आज उन्होंने ठीक से दाना भी नहीं खाया। एक उदास चिड़िया अपनी सहेली से कह रही थी, 'जिन पेड़ों पर हमारा आशियाना होता है, जिस पर हम चहकते हैं, उछलते हैं, खेलते हैं जिस पर हम मौसमों के गीत गाते हैं उन्हें भी इंसानों ने शमशान घाट बना डाला। किससे पूछकर वो हमारे आशियाने पर अपनी वहशियत की निशानियां टांग जाते हैं।'' पेड़ों की हर शाख उदास है इन दिनों,' उसकी सहेली ने कहा। 'सबको छाया, फल देने वाले पेड़ों की शाखों को हैवानियत का बोझ उठाना पड़ रहा है। '

'क्या हम कुछ कर नहीं सकते,' छोटी चिड़िया ने बड़ी चिड़िया से पूछा। बड़ी चिड़िया चुप रही। ' बता न  माई, सुना है संसद में सुनवाई होने पर सब ठीक हो सकता है...क्या हम सारी चिड़िया मिलकर संसद में नहीं जा सकतीं? क्या हम उनसे कह नहीं सकती कि बाद में बनाना बड़े-बड़े पुल, बाद में बनाना बड़े मॉल, बाद में लाना बड़ी कंपनियां, सबसे पहले इस धरती पर बहने वाली रक्त की धार को तो रोको, इंसानियत की चीखों को तो रोको...और अगर नहीं रोक सकते तो आओ हमारे साथ, हम मिलकर उन शिकारियों की आंखें नोच लेंगे...'

बड़ी चिड़िया दाना चुगने में लग गई लेकिन उसका दाना खाने का मन नहीं किया, फिर उसने पानी में चोंच डाली लेकिन शायद उसकी प्यास भी मर गई थी.....

मैंने वापस कमरे में जाकर देखा कि मैं नींद की जिस डाल को सहेजकर आई थी, वो अब मुरझाने लगी थी....

Tuesday, June 10, 2014

एक तुम्हारी याद....



एक तुम्हारी याद
पूर देती है जख्म सारे

जेबों में भर देती है
खुशियों की ढेर सारी आहटें

जिंदगी के कैनवास पर रचती है
उम्मीदों की मासूम लकीरें

मायूसियों को विदा कहते हुए
मुस्कुराती है
पलकें झपकाती है, गुनगुनाती है

एक तुम्हारी याद
क्या से क्या कर देती है
बंजर सी धरती पर
बारिश बो देती है…

Sunday, June 8, 2014

यह किसका प्रेम है बोलो तो?


लड़का- 'तुम इस धरती पर कब आईं....?'
लड़की-' धरती पर नदियों के आने से भी पहले, खेतों में पहली फसल की खुशबू उगने से बहुत पहले, मौसम की पहली अंगड़ाई लेने से भी पहले....'

लड़का- 'इतनी सदियों से धरती पर आकर तुमने क्या किया?'
लड़की- इंतज़ार
लड़का- 'किसका?'
लड़की- 'तुम्हारा नहीं....'
कहकर लड़की खिलखिला कर हंस पड़ी। ज्यों-ज्यों वो हंसती जाती नदियों का कोलाहल बढ़ता जाता, फूलों की गमक बढ़ती जाती, बादलों की धमक बढ़ती जाती। सूरज का ताप बढ़ता जाता.....
लड़की ने लड़के की पीठ से अपनी पीठ टिकाते हुए कहा, 'सुनो ये धरती पर नदियों के जन्म से पूर्व की कथा है। ये किसी भी राजा या रानी के अस्तित्व में आने से पूर्व की कथा है। यह बुद्ध के ज्ञान और ईसा के क्रूस पर लटकाये जाने से भी बहुत पहले की बात है। धरती एकदम खाली थी। खुशी से भी, गम से भी। तभी एक लड़की ने धरती पर पांव रखा। धरती को मानो प्राण मिले। अकेली धरती, कबसे अपनी धुरी पर घूमते-घूमते उकता चुकी थी। उसका न कोई साथी, न सहेली।

लड़की आई तो धरती ने उसे सीने से लगाया। खूबसूरत मौसम जो न जाने कबसे बिना किसी भाव के बस आते-जाते रहते थे। धरती ने उन मौसमों की चूनर में आकाश के सारे तारे टांककर एक सुंदर ओढ़नी बनाई। उसे लड़की को ओढ़ाया। लड़की मुस्कुरा उठी। यह धरती पर लड़की की पहली मुस्कुराहट थी। उसके मुस्कुराते ही मौसम भी मुस्कुरा उठे। लड़की और धरती अब सखियां थीं। लड़की कभी-कभी धरती से कहती लाओ अपना बोझ मुझे दे दो, तुम थोड़ा आराम कर लो, थक गई होगी....अपनी परिधि पर लगातार घूमना आसान है क्या...और सचमुच धरती कुछ दिन लड़की के पहलू में सिमटकर सो जाती, उन दिनों सूर्य के चारों ओर धरती नहीं, लड़की चक्कर लगाती थी। सृष्टि के कारोबार में कोई विघ्न डाले बगैर यह दोस्ती गाढ़ी हो रही थी। 

सुनो तम्हें एक राज की बात बताती हूं, लड़की अब भी कभी-कभी धरती हो जाती है, धरती कभी-कभी लड़की। 

एक रोज जब आसमान में खूब घने बादल थे....धरती भी रात के तीसरे पहर में ऊंघते हुए सफर कर रही थी लड़की की आंख से पहला आंसू टपका। वो आंसू धरती पर गिरा तो धरती पर नदियां बहने लगीं....धरती ऊंघते से जाग उठी। इसके पहले कि धरती कुछ समझ पाती धरती पर मीठे पानी का सोता फूट पड़ा। पानी ही पानी। झरने फूट पड़े। मीठे पानी वाले झरने। धरती ने उस पानी को चखा ये समंदर के पानी सा खारा नहीं था। इस पानी की मिठास ही अलग थी।
एक रोज धरती ने लड़की का हाथ पकड़ लिया और पूछा,' तू क्यों उदास रहती है? क्या तलाश रही है तू? '
लड़की खामोश...हवाएं शांत...चांद चुप, तारे टकटकी लगाये उसे सुनने को बेताब। 'मैं धरती पर किसी को तलाशते हुए आई हूं....कोई ऐसा जो मेरे होने को विस्मृत करे, कोई जिसे देखते ही आंखें तृप्त हों, जिसे सुनकर लगे कि सुना सबसे मीठा संगीत, कोई आत्मा के तमाम बंधनों से मुक्त करे...कोई जो होने को होना करे और जिसके साथ मिलकर धरती पर प्रेम रचा जा सके....

धरती ने ठंडी आह भरी...आकाश की ओर देखा, आकाश मौन रहा...उसने सिर्फ पलकें झपकायीं....'ओह...प्रेम की तलाश...?' संपूर्ण सृष्टि ने कहा, 'यानी दुःख की अभिलाषा....धरती बुदबुदाई...लड़की जा चुकी थी...दूर कहीं एक और नदी जन्म ले रही थी। ये लड़की के भीतर का प्रेम था, जिसकी चंद बूंदें भर छलकने से धरती पर नदियों का जन्म हुआ...यह धरती पर नदियों के आने की कथा है...कोई भागीरथी नहीं लाया था किसी की जटाओं से मुक्त कराकर कोई नदी, दरअसल, स़्त्री के प्रेम से जन्मी हैं सारी नदियां....कुछ समझे बुद्धू...'
लड़की ने कहानी के आखिरी सिरे में गांठ लगाते हुए कहा।
लड़का- तुम फिर शुरू हो गई? तुम और तुम्हारी कहानियां। दुनिया में हजार परेशानियां है और तुम्हारी कहानियां...जाने किस दुनिया से आती हैं। 

लड़का अचानक उठ खड़ा हुआ। उसके इस तरह अचानक उठकर खड़े होने लड़की जो उसकी पीठ पर पीठ टिकाये थी लुढ़क गई। लड़की बिना संभले हुए ही मुस्कुरा उठी। 'तुम चिढ़ गए हो ना?' वो अपनी मुस्कुराहट को चुपके से चबा रही थी।
लड़का- 'मैं क्यों चिढूंगा? क्यों चिढूंगा मैं बोलो?' ऐसा कहते हुए लड़का झुंझला रहा था।
लड़की- 'क्योंकि मेरी कहानी में इस बार तुम नहीं हो। कहीं नहीं हो....इसलिए...' लड़की ने सामने बहती नदी में कंकड़ उछालते हुए कहा। 

लड़का उठकर चल दिया। यूपीएससी के फॉर्म जमा करने की आखिरी तारीख है। उसे याद आया। वो जनता था कि लड़की से इस बारे में कुछ भी कहने का कोई अर्थ नहीं। वो फॉर्म के टुकड़े करके हवा में उछाल सकती है।
लड़की अपनी ही धुन में थी।

'बोलो चिढ़ गये न तुम....?' अब लड़के ने मुस्कुराहटें चबाईं....उसने लड़की की लंबी चोटी खींचकर उसे अपने करीब कर लिया। शरारतें गुम हो गईं सारी...सिर्फ सांसें बचीं...

'वो जो लड़की की आंख का पहला आंसू गिरा था धरती पर वो किसके लिए था बोलो तो...इन नदियों में पानी नहीं प्रेम बहता है...पता है ना? यह किसका प्रेम है बोलो तो? लड़की चुप....लड़का चुप...धरती चुप....आसमान चुप...'
कुछ देर बाद वहां न लड़का न लड़की सिर्फ नदी की चौड़ी धार बहती दिखी....जिसके किनारों पर अल्हड़ खिलखिलाहटों का जमावड़ा था, जिसके किनारे पंछियों की चहचआहट थी, फसलों की खुशबू, जिंदगी नदी के किनारों पे महक रही थी....

Monday, June 2, 2014

हत्यारे की आंख का आंसू और तुम्हारा चुंबन


सुनो,
बहुत तेज आंधियां हैं
इतनी तेज कि अगर
ये जिस्म को छूकर भी गुजर जाएं
तो जख्मी होना लाजिमी हैं
और वो जिस्मों को ही नहीं
समूची जिंदगियों को छूकर निकल रही हैं
उन्हें निगल रही हैं

ना....रोशनी का एक टुकड़ा भी
धरती तक नहीं पहुंच रहा
सिसकती धरती के आंचल पर सूरज की रोशनी का
एक छींटा भी नहीं गिरता

मायूसियों के पहाड़ ज्यादा बड़े हैं
या जंगल ज्यादा घने कहना मुश्किल है

जिंदगी के पांव में पड़ी बिंवाइयों ने रिस-रिस कर
धरती का सीना लाल कर दिया है
और उम्मीदों की पीठ पर पड़ी दरारें
अब मखमली कुर्ती में छुपती ही नहीं

हत्यारे का जुनून और उसकी आंखों की चमक
बढ़ती ही जा रही है
इन दिनों उसने अपनी आंखों में
आंसू पहनना शुरू कर दिया है
आंसुओं की पीछे वाले आले में वो अपने अट्टहास रखता है
और होठों पर चंद भीगे हुए शब्दों के फाहे
जिन्हें वो अपने खंजर से किये घावों पर
बेशर्मी से रखता है

सुनो, तुम्हें अजीब लगेगा सुनकर
लेकिन कुछ दिनों से भ्रूण हत्याएं
सुखकर लगने लगी हैं
जी चाहता है ताकीद कर दूं तमाम कोखों को
कि मत जनना कोई शिशु जब तक
हत्यारों का अट्टहास विलाप न बन जाए
जब तक रात के अंधेरों में इंसानियत के उजाले न घुल जाएं
बेटियों, तुम सुरक्षित हो मांओं की ख्वाबगाह में ही
तुम्हारी चीखों के जन्म लेने से पहले
तुम्हें मार देने का फैसला, उफफ....

सुनो, तुम तो कहते थे कि हम बर्बर समाज का अंत करेंगे
अंधेरों के आगे उजालों को घुटने नहीं टेकने देंगे

प्रिय, तुम तो कहते थे कि एक रोज यह धरती
हमारे ख्वाबों की ताबीर होगी
हमारी बेटियां ठठाकर मुस्कुराएंगी,,,,
इतनी तेज कि हत्यारे की आंखों के झूठे आंसू झर जायेंगे
और उसके कांपते हाथों से गिर पड़ेंगे हथियार

एक रोज तेज आंधियों के सीने पर हम
उम्मीदों का दिया रोशन करेंगे...
और आंधियां खुद बेकल हो उठेंगी
उस दिये को बचाने के लिए

प्रिय, आज जब हवाओं का रुख इस कदर टेढ़ा है
तुम कहां हो
इस बुरे वक्त में सिर्फ हमारा प्र्रेम ही तो एक उम्मीद है

आओ मेरी हथेलियों को अपनी चौड़ी हथेलियों में ढांप लो
आओ मेरा माथा अपने चुम्बनों से भर दो
तुम्हारा वो चुंबन
इस काले वक्त और भद्दे समाज का प्रतिरोध होगा
तुम्हारा वो चुंबन हत्यारे के अट्टास को पिघलायेगा
वो जिंदगी के पांव की बिंवाइयों का मरहम होगा
और धरती के नम आंचल में रोशनी का टुकड़ा

सुनो, सिर्फ मुझे नहीं
समूची कायनात को तुम्हारा इंतजार है
कहां हो तुम....

Wednesday, May 21, 2014

देखना खुद को इस तरह...


देखना खुद को इस तरह
जिस तरह देखता है कोई
खिड़की से झांकती हुई सड़क को
सड़क पे दौड़ती हुई गाड़ियों को
पड़ोसी के बगीचे में खिलते फूल को
या रास्ते में पड़े पत्थर को

देखना खुद को इस तरह जैसे
दूर से कोई देखता है नदी
उफक पे ढलता हुआ सूरज
या कैनवास पर बनी अधूरी कलाकृति

देखना खुद को इस तरह
जैसे दीवार पर टंगी कोई तस्वीर
कमरे में रखा हुआ सोफा
टेबल पर रखी हुई चाय
खिड़कियों पर पड़े पर्दे

देखना खुद को इस तरह जैसे
देखना ईश्वर को तमाम सवालों के साथ....


Saturday, May 17, 2014

देश और समाज के खिलाफ प्रेम


उफ्फ्फ्फ़  ये झरझर झरती बेसबब मुस्कुराहटें
जब देखो खिलखिल खिलखिल
न इन्हें चिलचिलाती धूप की फिकर
न किसी तूफान का डर
न रात का पता न दिन की खबर
कहां से आ गये हैं ये लोग
किस दुनिया के हैं ये आखिर
इनका एजेंडा क्या है
इनकी राजनीति क्या है
सिर्फ एक-दूसरे को प्यार करना़?

क्या इन्हें नहीं पता कि
मोहब्बत जैसी फिजूल सी चीज में उलझने का वक्त नहीं है
क्या इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि
कि देश की तरक्की के मानक बदल रहे हैं
क्या इन्हें खेतों में उगी फसल
के खो जाने का डर नहीं है
जमीनों को जोर से पकड़ लेने को
बेताब क्यों नहीं हैं ये
हर वक्त हाथों में हाथ लिए
गंाव-गली मोहल्ले की सड़कें नापते रहते हैं

कोई पूछे इनसे कि क्या इन्हें भूख नहीं लगती
प्यास नहीं लगती
नींद नहीं सताती
थकते नहीं ये हंसते हुए
क्यों इनके जेहन से वेतन का कम होना
या इंक्रीमेंट की चिंता गायब है

ये तो समाज बागी लोग हैं
बेहद खतरनाक
इस तरह हंसते मुस्कुराते खिलखिलाते हुए
कितने लोगों को चिंता में डाल दिया है इन्होंने

कल तक ये हम जैसे ही थे
बात-बात पर चिढ़ने वाले
हर बात के लिए सरकार को, राजनीति को कोसने वाले
चाय की दुकानों पर बौद्धिकता झाड़ने वाले

और आज ये इन सबसे कितनी दूर हैं
बस अपनी ही दुनिया में खोये ये लोग
कभी आसमान में उड़ते हैं तो
कभी चांद पे जा बैठते हैं
समंदरों को इन्होंने हथेलियों में थाम रखा है
और मौसम...वो तो कबसे इनका साथ दे रहा है

ऐसे गुस्ताख लोगों की दुनिया को भला क्या जरूरत
जो अपनी ही दुनिया में खोए रहते हैं
और बाकी सबकी जलन का ईर्ष्या का कारण बने हुए हैं
ऐसे लोगों के बारे में या तो गंभीरता से सोचे जाने की जरूरत है
या उनके जैसा ही हो जाने की....


दो प्रेमी दुनिया के लिए...


प्रेमियों से बड़ा खतरा इस दुनिया को किसी से नहीं
इनकी मुस्कुराहटें चुनौती देती हैं दुनिया की तमाम सत्ताओं को
इनका आत्मविश्वास चूलें हिला कर रख देता है समाज की

इनका ये ख्वाब कि समूची धरती पर
प्रेम की फसल लहलहा उठे
और विश्व में वासना की नहीं प्रेम की संतानों का जन्म हो
कितना खतरनाक है जरा सोचिए

इनका ये यकीन कि एक रोज हर व्यक्ति
मानवता, इंसानियत, संवेदनाओं से छलक रहा होगा
एक-दूसरे का सम्मान और एक दूसरे से प्रेम करना
यही तरक्की के नये मानक होेंगे
ये कोई रूमानी यकीन नहीं है
इसमें राजनैतिक गंध है

इनके एजेंडे में है दुनिया की राजनीति की शक्ल बदल देना
तरक्की को पुलों और मॉल की संख्या से नहीं
समाज के हर व्यक्ति की थाली की रोटी
और चेहरे की मुस्कान से आंकना

इनके रूमान की खुशबू ने
न जाने कितनी विजयी पताकाओं को दरकिनार किया है
असलहों से लैस किसी आतंकवादी से ज्यादा खतरनाक है
आत्मविश्वास और मुस्कुराहटों से लबरेज प्रेमी

सत्ताएं जानती हैं ये सच सदियों से
इसलिए कटवाई जाती रही प्रेमियों की गर्दनें हर दौर में

लेकिन फीनिक्स की तरह हर बार अपनी ही राख से
दोबारा उग आने वाले ये प्रेमी
हमेशा कमजर्फ समाज के सामने चुनौती बनकर खड़े होते रहे...

Wednesday, May 14, 2014

तुम भी बस.…



गुलमोहर- सुनो…कविता सुनोगे?
अमलताश- रहने दो, बस तुम साथ रहो कुछ देर.....

गुलमोहर- (शरमाते हुए) तुम भी बस.…

------------------------------------------

गुलमोहर- अच्छा बताओ तो ये एग्जिट पोल जो कह रहे हैं वो कितना सच है ?
अमलताश- पता नहीं

गुलमोहर- अच्छा नयी सरकार मे फूलों को महकने की आजादी तो होगी न?
अमलताश- (अनमना सा) पता नहीं

गुलमोहर- तुम नाराज हो क्या?
अमलताश- पता नहीं

गुलमोहर- हम्म्म, अच्छा कविता सुनोगे?
अमलताश- (शांत होते हुए) ठीक है.… सुनाओ

गुलमोहर- (खिलखिलाते हुए) 'तुम'
अमलताश- हा हा हा.… अच्छी कविता है. मेरे पास भी एक कविता है. सुनाऊँ?
गुलमोहर- हाँ
अमलताश- 'हम.…'
गुलमोहर- (शरमाते हुए) तुम भी बस.....

(दहकती दोपहरों की महकती बातें, शहर लखनऊ)

तस्वीर- मोबाइल क्लिक 

Wednesday, May 7, 2014

लौटना, दरअसल सिर्फ उसका प्रेम था.....


उसे जाने दिया क्योंकि यकीन था कि
वो जायेगा नहीं
या यूँ कहें कि
जा पायेगा ही नहीं
इस जाने देने में अहंकार था
जिसे प्रेम का नाम दिया

उसके पीठ फेरते ही मुस्कुराकर
धुएं के कुछ छल्ले
आसमान की ओर उछाले
ठंडी हवाओं को
अपने फेफड़ों में भरा
शांत होकर ढलते सूरज
और उगते चाँद पर नज़र टिकाई

कान लगातार
दरवाजे पर ही लगे थे
वो तलाश रहे थे आहटें
उसके लौट आने की
हालाँकि ये बात सिर्फ दिल को पता थी

बीते दिनों के बिना पढ़े गए अख़बारों को खंगाला
न्यूज़ चैनलों को बदलते हुए
झूठी ख़बरों में से सच को तलाशने की
नाकाम सी कोशिश की
एक कप और काली गाढ़ी कॉफी पीने की इच्छा को
रसोई में जगह दी
और के एल सहगल की आवाज से
कॉफी के स्वाद में और इज़ाफ़ा किया

लेकिन जो आहटें टटोलने को कान दरवाजे पर टंगे थे
वो नदारद ही थीं
अब उन आहटों की तलाश में
आँखें भी निकल पड़ीं
कदम भी, दिमाग भी
वो जा तो नहीं सकता छोड़कर
वो मेरा प्यार है. मेरा प्यार
मेरा गाढ़ा प्यार

साऊथ अफ्रीका के जंगलो से घना
सहारा के रेगिस्तान से ज्यादा विस्तृत
हिन्द महासागर की गहराइयों से गहरा
मेरा प्यार
इससे दूर कोई जा भी कैसे पायेगा
ये प्रेम का अहंकार था

दरवाजे पर उसके आने की आहटें बीनते कानों की मायूसी
एक युद्ध हारने सा था
उसके न होने पर बहे आंसू
दुःख के नहीं
शिकस्त के आंसू थे

एक रोज लहू लुहान क़दमों से वो लौटा
थका, बोझिल,  उदास
उसके लौटने की आहटों से अहंकार का बाग़ खिल उठा
कि देखो मैंने कहा था न,
उसे लौटना ही था
उसे लौट ही आना था आखिर .…

इन सबसे दूर भीगी हुई सिसकियों के बीच
दिल से बस इतनी सी आवाज आई
धन्यवाद किस्मत
तुम्हें मालूम है
प्रेम की अहमियत

उसका लौटना दरअसल सिर्फ उसका प्रेम था.....

Monday, April 14, 2014

इन सपनों को कौन गाएगा...अजेय


बाद मुद्दत कुछ पन्नों को पलटते हुए नदी की कल-कल की आवाज सुनाई दी...। बाद मुद्दत 'गांव' सिर्फ शब्द की तरह नहीं गुजरा आंखों के सामने से, खुलने लगा अपनी पगडंडियों, झरती हुई ओस, लड़कियों के झुंड उनकी मुस्कुराहटों, मौसम के घटते-बढ़ते ताप के साथ...। बाद मुद्दत अंजुरी में कुछ जिंदा शब्द आये...अजेय की कविताओं के जरिये। उनका कविता संग्रह इन सपनों को कौन गाएगा...भोली कामनाओं, मजबूत इरादों, समय के साथ मुठभेड़ करने की ताकत, अपने समय की तमाम खूबसूरत चीजों को सहेज लेने की इच्छा और जीवन को सहजता में महसूस करना सिखाता है। अगर बहुत दिनों से जिंदगी की आपाधापी से मुक्त होकर किसी नदी के किनारे, खुली हवा में सांस लेने की इच्छा हो तो इन कविताओं का हाथ थामना बनता है।

संग्रह की पहली कविता में कवि ईश्वर को बीड़ी ऑफर करता है...और यहीं से कवि का खिलंदड़ा अंदाज, उसकी सहजता और समय से टकराने का माद्दा नज़र आता है। पूरे संग्रह से गुजरते हुए कहीं भी जबरन उकेरे गए बिम्ब, भाषा का अनूठा लालित्य गढ़़ने की कोशिश, कविता के नये पुराने मापदंडों की परवाह नहीं नज़र आती और यही इस संग्रह को सौम्य, सुंदर और ग्राह्य बनाता है।

अजेय संवेदनाओं को रीसेंसटाइज (पुर्नसंवेदित) करने की बात करते हैं...लेकिन मुझे तो उससे आगे जाकर यह संवेदनाओं को जन्म देने वाली बात भी नजर आती है। कि चीजों को महसूस करना हमने अभी ठीक से सीखा ही कहां है। किसी फिल्म में नायिका जब कहती है कि मेरा सपना है कि दूर कहीं पहाड़ी पर मेरा एक छोटा सा घर हो, तुम भेड़ें चराओ और मैं तुम्हारे लिए खाना पकाउं....तो सिनेमा के बड़े पर्दे से उतरता हुए एक रूमान हमारे जेहन में भी शामिल होता है...लेकिन पहाड़ पर घर होना महज एक रूमान नहीं एक संघर्ष भी है...अजेय की कविताओं में पहाड़ अपने डिफरेंट शेड्स के साथ आता है....'रंग-बिरंगे पहाड़,/रूह न रागस/ढोर न डंगर/ न बदन पे जंगल/ अलफ नंगे पहाड/ सांय-सांय करती ठंड में/ देखो तो कैसे ठुक से खड़े हैं/ ढीठ बिसरमे पहाड़...' या फिर पहाड़ी खानाबदोशों के गीत को गुनगुनाते हुए हथेलियों पर पहाड़ की खुशबू उगती हुई महसूस होती है...रोहतांग पर शोधार्थियों के साथ पदयात्रा करते हुए साथ चल पड़ती है एक और कविता कि 'पहाड़ के पीछे छिपा होगा इसका इतिहास...मुझसे क्या पूछते हो, इस दर्रे की बीहड़ हवाएं बताएंगी तुम्हें, इस देश का इतिहास...'

गाढ़े रूमान में रची-बसी ये कविताएं उतने ही गहरे संघर्ष में भी हैं। उन संघंर्षों से जन्मते हैं कई सवाल, 'मैत्रेय क्या तुम भी राजा की तरह आओगे...' दलाई लामा के आने पर किये जाने वाले इंताजामात के मद्देनजर कवि के अंतस में कुछ वाजिब से सवाल इस कविता में उगे हैं...जो मौजूदा हालात के न जाने कितने प्रसंगों, घटनाओं और लोगों से जुड़ते हैं। एक बुद्ध कविता में करुणा ढूंढ रहा है....'एक ढहता हुआ बुद्ध हूं मैं अधलेटा...' एक कविता में न जाने कितनी कविताएं गढ़ने वाला यह कवि कविता में ही सांस लेता मालूम होता है...

कविताओं के बारे में कविताएं लिखते हुए वो इस धरती को कविताओं से भर देना चाहता है। साथ ही वो यह भी कहता है कि 'मुझे नहीं मालूम था कि हवा से पैदा होती हैं कविताएं...या हवा के सामने कविता की क्या बिसात...हवा चाहे तो कविता में आग भर दे/ हवा चाहे तो कविता को राख कर दे/हवा के पास ढेर सारे डाॅलर हैं/ आज हवा ने कविता को खरीद लिया है', जबकि एक बुद्ध कविता में करुणा ढूंढ रहा है...

यूं उनकी तमाम कविताओं को बार-बार पढ़ते हुए हर कविता के संग अलग-अलग समय में घंटों रहने का जी चाहता है लेकिन संग्रह की दो कविताएं एक नदी जिसे हम पीना चाहते हैं और चूक गए कितनी ही नदियां...देर तक अपने किनारों पर जमे रहने का इसरार करती हैं. 'हमें चाहिए एक नदी/ एकमुश्त अभी/ इस चिलचिलाते समय में/ कि पीते रहें उसे किस्तों में/ ताउम्र/ आहिस्ता-आहिस्ता...' 'कितनी ही नदियां कितनी-कितनी बार हमसे/ कितनी तरह से जुड़ती रहीं/ और हमारा अथाह खारापन/ चूक गया हर बार/ उन सबकी ताज़गी.../ हर बार चूक गए हम एक मुकम्मल नदी...'

अजेय को चिंता है कि मासूम आँखों के इन सपनों को कौन गायेगा, जवाब इसी संग्रह की कविताओं में है कि धरती एक दिन कविताओं से भर उठेगी और हर कोई गायेगा इन सपनों को.…


इसी संग्रह से कुछ टुकड़े -

सुविधाएं फुसला नहीं सकतीं
इन कवियों को
जो बहुत गहरे में नरम और खरे हैं...

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महसूस करो
वह शीतल विरल वनैली छुअन
कहो
कह ही डालो
वह सबसे कठिन कनकनी बात...
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(आदिवासी बहनों के लिए)

हम ब्यूंस की टहनियां हैं
रोप दी गई रूखे पहाड़ों पर
छोड़ दी गई बेरहम हवाओं के सुपुर्द...

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मुझे तुम्हारी सबसे भीतर वाली जेब से
चुराना है एक दहकता सूरज...
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कि कविताएं 
पुस्तकालयों की अल्मारियां तोड़ भागतीं
धूल झाड़तीं
गलियों, नुक्कड़ों, अड्डों और ढाबों में
घूमती बतियाती नज़र आएं...
चुनावी पर्चों की जगह बंटे कविताएं ही
चिपक जाएं कस्बों की दीवारों पर
गांव की किवाड़ों पर
और उड़ें कागज के जहाज बनकर
हवा और बारिश में
संवेदना की महक बिखेरें...
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बरफ की डलियां तोड़ों
डैहला के हार पहनो
शीत देवता
अपने ठौर जाओ
बेजुबानों को छोड़ो
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सारा खेल वक्त का है
वक्त सूरज तय करता है
सूरज हवाएं पैदा करता है
हवा समुद्र को छेड़ता है
समुद्र ने बर्फ को तोड़ना शुरू कर दिया है
बर्फ पिघलते ही हरी काई के फीते तैरने लग जाएंगे...
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आज प्रार्थना नहीं सुनी जाएगी
ईश्वर व्यस्त है...
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उन दिनों मैंने तुम्हें घूंट-घूंट पिया
दारू की तरह
और तुम्हारा दिया अल्सर
आज भी सुलग रहा हे
मेरे जिस्म के भीतर

Monday, April 7, 2014

धरती मुस्कुरा रही है इन दिनों....


ये कौन अपनी नींदें यहाँ भूल के चला गया है. ये कौन है जिसने शहर को पीले फूलों वाला गुलदस्ता बना दिया है. ये कौन है जिसने सड़कों को रंग-बिरंगे फूलों से भर दिया है, किसने  बादलों के कानों में मोहब्बत का राग छेड़ दिया है, ये कौन है जिसने हवाओं के पैरों में खुश्बुओं की पाज़ेब बाँध दी है, किसने सपनों को पंख लगाकर उन्हें आसमान में ऊंचा उड़ने को छोड़ दिया है, कहाँ से आ गयी हैं इतनी खिलखिलाहटें कि उदासियाँ घबराने लगी हैं....उफ्फ्फ !

दूर कहीं बज रही है एक पहाड़ी धुन. एक लड़की पहाड़ से नीचे उतर रही है, एक पहाड़ उसके भीतर उतर रहा है, धरती की सारी नदियां उसकी आँखों में समायी हैं और वो अपनी आँखों की मशक से छिड़क रही है मोहब्बत के सूखे दिलों पर प्रेम का जल....धरती मुस्कुरा रही है इन दिनों, सुना तुमने!


Thursday, April 3, 2014

ईश्वर उदास है....


कितनी सुबहें दहलीज पर रखे-रखे मुरझाने को हुई हैं....कि वो वक्त पे आती हैं....मुस्कुराती हैं...हाथ आगे बढ़ाती हैं....लेकिन जल्द ही उन्हें समझ में आ जाता है कि उनकी सुनने वाला कोई नहीं. किसी को अब सुबहों का इंतजार नहीं....रातें जब तक विदा नहीं होतीं सुबहों का कोई अर्थ नहीं...मुट्ठी भर उजास को सुबह मानने का वक्त अब जा चुका...अब तो रोशनी का समंदर चाहिए...

सुबहों की रातों से जंग है इन दिनों...इधर रातें अपना आंचल फैलाती जाती हैं उधर सुबहें थोड़ा और तनकर खड़ी होती हैं. एक न जाने की जिद में है और दूसरी आकर मानने की जिद में। इनके इस जिद के खेल से दूर मौसमों की ओढ़नी ओढ़े वो शहरों शहर भटकती फिरती है....

उसने कदमों में बांध लिया है सफर और कंधे पर रखी है हमसफर की याद...आंखों में पहना है उदासियों का काजल....झरते हुए पत्तों में, छूटते हुए सफर में, राह में मिलनी वाली मुस्कुराहटों में, अंजुरी भर उम्मीदों, पेड़ों पर उगती कोपलों, पहाड़ों पर झरती बर्फ, रेत के धोरों, समंदर की लहरों के बीच अपने भीतर के घने बियाबान को लिये घूमते-घूमते उसे एक दरवेश मिला...वो मुस्कुराई...दरवेश खामोश रहा...

जा तू भटकती ही रहे हमेशा....ऐसा कहकर दरवेश ने अपनी आंखें फिरा लीं...वो जानती थी कि यह दुआ देते हुए दरवेश की आंखों में भी एक नदी उतर आई थी...उसने दरवेश की दुआ को पलकों पर उठाया और चल पड़ी नये सफर पर....

आसमान से लम्हे टूट-टूटकर उसके कांधों पर बरसते रहे...वो अपनी खामोशी की ओढ़नी में उन लम्हों को समेटती रही...चलती रही...

उसे ये तो पता है कि मरने के लिए जीना जरूरी है...लेकिन जीने के लिए...?

दूर कहीं कोई क्रान्ति की बात कर रहा है, और वो नम मुस्कुराहटों से धरती पर लिख रही है प्रेम...जिसे पढ़ते हुए ईश्वर उदास है....

Tuesday, March 18, 2014

चूंकि मैं ये सवाल उठाता हूँ ....


वे चाँद पर जायेंगे
और उससे भी आगे उन ऊंचाइयों तक
जिन्हें दूरबीनें भी नहीं पकड़ सकतीं

लेकिन ज़मीन पर
आख़िरकार कब कोई भी भूखा नहीं होगा
या किसी से ख़ौफ़ नहीं खायेगा
या कब लोग यहाँ-वहाँ धक्के नहीं खायेंगे
दुत्कारे नहीं जायेंगे
उनके हक़ मारे नहीं जायेंगे?
चूंकि मैं ये सवाल उठाता हूँ
कम्युनिस्ट कहा जाता हूँ

- नाज़िम हिक़मत