Saturday, May 26, 2012

यमन की सी मिठास गंगा की शान्ति



उसे रंगों से बहुत प्यार था. कुदरत के हर रंग को वो अपने ऊपर पहनती थी. उसका बासंती आंचल लहराता तो बसंत आ जाता. चारों ओर पीले फूलों की बहार छा जाती. वो हरे रंग की ओढनी ओढती तो सब कहते सावन आ गया है. उसका मन भीगता जब भी तो बादल आकर पूरी धरती को बूंदों के आंचल में समेट लेते. सावन लहराने लगता. उसकी उदासियां काली बदलियों में और उसका अवसाद भीषण तूफान में जज्ब हो जाता. वो लाल रंग पहनती कभी-कभी. वो सुर्ख शरद के दिन हुआ करते थे. धूप अच्छी लगने लगती और नजर की आखिरी हद तक सुर्ख फूलों की कतार सज जाती. यहां तक कि उसके गालों पर भी गुलाब उतर आते. उसकी नाराजगी के दिनों को गर्मियों का नाम दिया लोगों ने. हालांकि वो जानती थी कि ये नाराजगी उसकी खुद से है और इससे किसी को नुकसान नहीं होना चाहिए. ऐसे में उसकी आंखें छलक पडतीं और तेज गर्मियों में बारिश की कुछ बरस पडतीं. वो मुस्कुराती और दुनिया को तेज गर्मियों से राहत मिलती. असल में उसे जिंदगी से प्यार था. जिंदगी के हर रंग से, हर खुशबू से.

वो रोज खुशबुओं के गुच्छे उतारकर लाती और उन्हें घर के हर कोने में लटका देती. खुशबुओं के उन गुच्छों को हर रोज एक नया रंग देती. कभी गुलाबी रंग वाला गुच्छा बाहर वाले कमरे के ठीक सामने टांग देती और बैंगनी रंग का गुच्छा रसोई में. सफेद रंग की खुशबू वो अपने सोने के कमरे में ले जाती और और दीवारों से लेकर छत तक, खिडकियों से लेकर फर्श तक बिखरा देती. सोने के कमरे में कोई बिस्तर नहीं था...सफेद फूलों की खुशबू जमीन पर बिखराकर वो खुद भी जमीन पर बिखर जाती....कभी-कभी खुशबुएं अपना रंग बदलतीं, जगह बदलतीं. हवाओं में हलचल होती और वे उठकर एक कमरे से उठकर दूसरे कमरे की ओर चल पडतीं. सुर्ख रंग की खुशबू अमूमन दरवाजे पर टंगी होती थी और बडी हसरत से सफेद खुशबू वाले कमरे की ओर देखती थी.

एक रोज लडकी सारी खुशबुओं को समेटकर बैठी थी. सुर्ख भी, सफेद भी, गुलाबी भी, नारंगी भी....उसने खुशबुओं के चेहरों पर अपना हाथ फिराया और पल भर में उनकी पहचान गुम हो गई. सारी खुशबुएं उसकी हथेलियों में उतर आईं और रंग वहीं बेजान से पडे रहे...लड़की वक्त के दरख्त पर पीले रंग की खुशबू तलाश रही थी...वो खुशबू जिसमें राग यमन की सी मिठास होती थी और गंगा की लहरों सी शान्ति. वो तलाशती रही....उसकी आंखों में गंगा यमुना, ब्रहृमपुत्र, गोदावरी, कावेरी सब की सब उतर आईं. अपनी खुशबू भरी हथेलियों से उसने उन नदियों को साधना चाहा लेकिन नहीं साध पाई...उसकी हथेली में सिमटी हुई सारी खुशबुएं नदियों में बह गईं...हर नदी का पानी महकने लगा...लेकिन लडकी की हथेलियां भी सूनी हो गईं, आखें भी और घर भी....

लडकी का मन हल्का हो रहा था. अपनी आंखों से प्रवाहित होने वाली नदियों में उसने समस्त इच्छाओं का तर्पण जो कर दिया था...नदियों के पानी में उसके अवसाद का नीला रंग घुल गया. खुशबू के साथ अवसाद के नीले रंग का मेल किसी नई कंपोजिशन सा मालूम होता.

बिना खुशबू वाले उस घर से उस रोज पहली बार चंदन की खुशबू आती लोगों ने महसूस की...लडकी फिर कभी नहीं दिखी ऐसा लोग कहते हैं, हालाँकि खुशबू और नदियां हमेशा उसके होने का ऐलान करती हैं...

Wednesday, May 23, 2012

नहीं, इतना एकांत काफी नहीं...



दूर-दूर तक फैला एकांत का विस्तार और उसमें चहलकदमी करती खामोशी. एक पांव की आहट दूसरे को सुनाई नहीं देेती. एकांत का हर हिस्सा अंधकार मे डूबा हुआ. इतना घना अंधेरा कि सब कुछ एकदम साफ नजर आ रहा है...सचमुच अंधेरे में चीजें साफ नजर आती हैं. जिंदगी का हर लम्हा बिखरा पडा है.
एकांत के विस्तार में जिंदगी भर का कोलाहल गुम हो गया है. असीम शांति का अनुभव हो रहा है. मानो युगों से ऐसी ही नीरव शांति की कामना में थी. क्या यही वो शांति है जिसकी तलाश में संतजन निकल पडते थे...क्या यही वो शांति है जिसके बाद जिंदगी की कोई भी अभिलाषा बाकी नहीं रहती. क्या यही वो शांति है जिसका हाथ थामकर दूर कहीं निकल जाने को जी बेताब था.

नहीं, ये वो शांति नहीं है. अभी इसमें अपने होने का अहसास बाकी है. मैं जिन्दा है कहीं और उसके साथ जुडा है अहंकार भी. अभी इसे मेरी शांति कह रही हूं. जब तक ये मेरी है, ये शांति नहीं हो सकती. इसके लिए मेरा को अपना स्थान छोडना होगा. लेकिन होश संभालने के साथ जिस मैं ने हाथ पकड लिया हो वो कैसे छूटेगा भला. ये मैंने लिखा, ये मैंने नहीं लिखा, मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ...ये मैं तो मुझसे भी बडा हो गया है. एकांत के विस्तार में भी मैं नहीं छूट रहा. न ही छूट रही है सांसों की रफतार...न नब्ज रुकी है अभी और न बंद हुआ है दिल का धडकना...कितना शोर है चारों तरफ. कितनी तेज है सांसों की रफतार...नहीं, इतना एकांत काफी नहीं है मेरे लिए अभी इसका विस्तार होना बाकी है इतना विस्तार कि वहां किसी की याद न आए, अतीत से कोई आवाज न आए, आने वल कल की कोई उम्मीद भी नहीं बस अंधेरे को चीरती एक सफेद चादर हो. शफफाक....सफेद फूलों का काफिला हो. गालिब का दीवान सिरहाने रखा हो और युगों की यात्रा कर मेरी आंखों में लौटी नींद हो....सदियों की नींद सदियों तक.

अभी इतना एकांत नहीं भरा जीवन में. कल शाम रियाज के वक्त झन्ननननन से टूट गया था सितार का तार...न जीवन का रियाज ही हुआ ढंग से न मत्यु का. कितनी कमअक्ल विद्यार्थी निकली मै जिंदगी की पाठशाला की. कोई ग्रेसमार्क भी नहीं.