Sunday, February 26, 2012

चोंच में अटका अंत...


- प्रतिभा कटियार

'फिर क्या हुआ?' चिडिय़ा ने पूछा...
'फिर...?' चिड़ा खामोशी के सिरहाने पर सर टिकाते हुआ बोला...'फिर क्या होना था.'
'अच्छा तुम्हारे हिसाब से क्या होना चाहिए फिर...?' चिड़े ने करवट बदली और कहानी का सिरा चिडिय़ा की चोंच में टांग दिया. घड़ी की सुइयों में जो वक्त था उसे मौसम ने मात दे रखी थी. शाम के चार बजे शाम छह बजे का सा मंजर मालूम होता था. ओस कंधों पर बैठती जा रही थी. शाम की उदासी को चिड़ा अपनी कहानी से तोडऩे की जुगत में था. लेकिन कहानी के अंत तक पहुंचते-पहुंचते उसे लगने लगा कि भीगते हुए मौसम में उसने गलत कहानी का चुनाव कर लिया है. इस कहानी का अंत तो दु:ख की ओर जा रहा है. चिडिय़ा कहानी सुनते-सुनते उदास हो चली है.

चिड़ा कहानी को बदल देना चाहता था. इसलिए उसने कहानी को रोक दिया. चिडिय़ा की आंख से लगातार आंसू बह रहे थे. वो जानना चाहती थी कि आखिर उस किसान की लड़की का हुआ क्या. चिड़े ने जब कहानी का अंत उसके हिस्से में लटकाया तो चिडिय़ा ने चिड़े की तरफ से नजरें घुमा लीं. उसने देखा दूर कहीं झोपड़ से रोशनी की खुशबू आ रही थी. आग जलने के बाद चूल्हे से उठने वाली भीनी-भीनी सी खुशबू. चिडिय़ा को इस खुशबू के साथ ही वो कहानी याद आई, जब उसके ही पूर्वजों ने राजकुमार की भूख मिटाने के लिए आग में कूदकर जान दे दी थी. भावों से भरी चिडिय़ा के मन में भी ऐसा ही ख्याल आया कि वो आग की खुशबू की दिशा में उड़ चले और अपनी जान देकर किसान की बेटी की जिंदगी को बचा सके. लेकिन राजकुमार की भूख पेट की भूख तो थी नहीं. चिडिय़ा ने अपने सर चिड़े के कंधे पर टिका दिया.' फिर क्या हुआ बताओ ना?'
उसने अपनी भीगी सी आवाज में इसरार किया. 

'छोड़ो न फिर कभी ये कहानी पूरी करेंगे. आज तो तुम मेरे लिए कुछ बढिय़ा बनाओ. बड़ी भूख लगी है. ये बरसती ओस के मौसम में मुआ पेट फैलकर जाने कैसे चौड़ा हो जाता है.' चिडिय़ा कुछ भी बनाने के मूड में नहीं थी. 'फिर क्या हुआ बताओ ना?' उसने चिड़े के कंधे पर सर रखे रखे ही कहा.
'तुम नहीं मानोगी?' उसने पूछा.
'ऊंहू...' चिडिय़ा ने ना में सर हिलाया.
'अच्छा वादा करो कहानी का अंत सुनकर रोओगी नहीं.'
'ये वादा मैं नहीं कर सकती.'
'तो मैं कहानी नहीं सुना सकता' चिड़ा भी ऐंठ गया. चिडिय़ा गुस्से में उड़कर दूसरी डाल पर जा बैठी. तिरछी आंखों से चिड़े की ओर देखती रही. चिड़े की जिद से वो वाकिफ थी सो उड़कर वापिस उसी डाल से आ लगी. 'अच्छा चलो नहीं रोऊंगी अब तो बताओ न क्या हुआ.'
'रोओगी नहीं पक्का?' चिड़े ने वादे को पक्का करना चाहा. वो नहीं चाहता था कि अच्छी खासी शाम का मजा किसी कहानी के कारण खराब हो. चिड़ा काफी रोमैन्टिक मूड में था. चिडिय़ा ने जब पक्का वादा किया कि वो नहीं रोएगी तो चिड़े ने कहानी के अंत का सिरा पकड़ा.

फिर राजा ने हुक्म दिया कि उस लड़की को खोज निकाला जाए जिसकी मोहब्बत ने उनके राजकुमार को बर्बाद कर रखा है. जिसकी याद में राजकुमार न खाता है न पीता है. दीवाना हो रखा.
'फिर?' चिडिय़ा ने पूछा.'
'फिर क्या, उस लड़की को पकडऩा राजा के हरकारों के लिए कौन सा मुश्किल काम था. वो लड़की को राजमहल ले आए. राजा और रानी दोनों खुश हुए कि चलो अब राजकुमार खुश हो जायेगा. लड़की डरी सहमी राजा के दरबार में खड़ी थी. जाने क्या गुनाह हुआ उससे, क्या दंड मिलने वाला है.
तभी राजकुमार दरबार में आया और उसने लड़की की ओर देखा. राजकुमार की आंखों में आंसू भर आये...राजा रानी को जो भी समझ में आया उन्होंने राजकुमार का ब्याह उस लड़की से करने का फैसला किया. ब्याह के रोज राजकुमार ने लड़की से पूछा, 'तुम्हारी वो सहेली कहां है, जो उस रोज कुएं पर तुम्हारे साथ पानी भरने आई थी'. लड़की को मामला समझते देर न लगी कि राजकुमार उसके नहीं उसकी दोस्त के प्यार में पागल है. लेकिन उस दोस्त की तो शादी हो चुकी थी.'

 किसान की लड़की समझदार थी. उसने राजकुमार से कहा, 'आप मुझसे शादी कर लीजिए फिर मैं उसके बारे में आपको बताऊंगी.' राजकुमार की उस लड़की से शादी हो गई. राजकुमार रोज उस लड़की के बारे में पूछता और लड़की रोज टाल देती.एक रोज जब राजकुमार ज्यादा ही जिद करने लगा तो लड़की ने कहा, 'एक वादा करिए कि यह जानने के बाद वो लड़की कौन है और कहां है, आप उसे पाने की जिद नहीं करेंगे.' राजकुमार की तृष्णा इतनी बड़ी थी कि उसने झट से 'हां' कह दी. लड़की ने कहा कि 'अगर आपने वादा तोड़ा, तो मैं जलकर राख हो जाऊंगी.' राजकुमार ने कहा, 'मेरा वादा पक्का है.'

लड़की ने राजकुमार को बता दिया कि उसकी सहेली पड़ोस के गांव के एक लड़के को ब्याही है और उसका जीवन सुख से चल रहा है...इतना कहने के बाद चिड़े ने महसूस किया कि ठंड काफी बढ़ गई है सो उसने चिडिय़ा से थोड़ी आग जलाने को कहा. चिडिय़ा को कहानी का अंत जानने की ऐसी जिज्ञासा थी कि वो चिड़े की हर बात झट से मान लेती. आग की तपिश से ठिठुरते पंखों को जरा जुंबिश मिली और चिड़े ने घोसले में  पसरते हुए टांगे सीधी कीं.
चिडिय़ा उसकी ओर देख रही थी.
'फिर क्या, राजकुमार ने अपना वादा तोड़ दिया और उस लड़की को पकड़ लाने के लिए हरकारे भेज दिए. किसान की लड़की ने सारा माजरा राजा को जा सुनाया कि किसी तरह उसकी सहेली की जिंदगी बर्बाद होने से बच सके. राजा उल्टे उस पर नाराज हुआ, 'पागल लड़की जब तुझे पता था कि वो तुझसे नहीं तेरी सहेली से प्यार करता है तो तूने पहले क्यों नहीं बताया. तेरी जिंदगी तो बच जाती.'  'मैंने अपनी जिंदगी अपनी दोस्त और उसके परिवार को बचाने के लिए दांव पर लगाई. लेकिन मालूम होता है कि मेरा ऐसा करना व्यर्थ ही गया.' 'यकीनन'. राजा ने कहा. राजा के हरकारे उस लड़की को राजमहल में ले आये और राजकुमार से उसकी शादी की तैयारियां होने लगीं. शादी वाली रात दोनों सहेलियां मिलीं और खूब रोईं. फिर रोते-रोते दोनों आग में कूद गईं...'.
अब चिड़ा चिडिय़ा की ओर देखने लगा. 'देखो तुमने कहा था कि तुम नहीं रोओगी.' चिड़े ने प्यार से अपने पंखों में चिडिय़ा को समेटते हुए कहा.
'नहीं मैं रो नहीं रही हूं. सोच रही हूं.' चिडिय़ा ने कहा.
'क्या सोच रही हो?'
'यही कि राजकुमार का  प्रेम क्या सचमुच प्रेम था?'
चिड़ा चुप रहा.
'क्या प्रेमी को हासिल करके उस पर अपना कब्जा करना ही प्रेम होता है. नहीं ये प्रेम  कहानी नहीं है.'
चिडिय़ा बोली.
'तो मैंने कब कहा कि ये प्रेम कहानी है. ये एक कहानी है जिसमें प्रेम है.' चिड़े ने स्पष्ट किया.
'नहीं, इसमें प्रेम भी नहीं है. प्रेम होता तो राजकुमार इस तरह हासिल करने की तड़प से न गुजर रहा होता. बल्कि अपने प्रेमी का सुख देखकर सुख महसूस कर रहा होता.'
' चुप रहो, ऐसा कुछ नहीं होता. हम जिसे प्रेम करते हैं, उसे अपने करीब चाहते ही हैं.' चिड़े ने कहा.
'भले ही प्रेमी की मर्जी हो या न हो?' चिडिय़ा को अब गुस्सा आने लगा था. चिड़ा समझ गया था कि शाम की ऐसी-तैसी कर ली है उसने एक गलत कहानी सुनाकर.

'अरे सुनो तो, कहानी का अंत तो अभी बाकी ही है और तुम बीच में ही शुरू हो गईं.'
'अच्छा, मुझे लगा कहानी खत्म हो गई.'  चिड़िया ने कहा.
'नहीं', चिड़ा काफी तेज दिमाग था. उसने झट से कहानी को आगे बढ़ाया और उसे सुखद अंजाम दे डाला.
'फिर राजकुमार ने जब देखा कि दोनों लड़कियों ने आग लगा ली है तो वो भी उस आग में कूद गया. उसने अग्नि से कहा कि हम तीनों में से जिसका प्रेम सच्चा हो उसे बचा लेना. आग की लपटें राजमहल की दीवारें पार करने लगी थीं. राजकुमार और दोनों लड़कियां आग के भीतर थे. राजमहल में चीखो-पुकार मची थी. लेकिन जब आग ठंडी हुई तो लोगों ने देखा कि तीनों लोग जिंदा हैं. किसी का बाल भी बांका नहीं हुआ है.'

'अरे, ये कैसे.' वो नहीं समझ पा रही थी कि चिड़ा कहानी को अब किस तरह उड़ाता फिर रह है.
'फिर?' चिडिय़ा ने उत्सुकतावश पूछा.'
' फिर क्या था तीनों बच गये, यानी तीनों का प्रेम सच्चा था. किसान लड़की का अपनी दोस्त के प्रति, उसकी दोस्त का अपने पति के प्रति और राजकुमार का उस लड़की के प्रति. इसलिए अग्नि ने तीनों को सुरक्षित बचा लिया. राजकुमार को समझ में आ गया कि वो लड़की जिसे वो प्यार करता है वो किसी और के साथ खुश रहेगी इसलिए उसे ढेर सारे उपहारों के साथ विदा किया. अपनी दोस्त के लिए बलिदान देने वाली अपनी पत्नी के प्रेम से राजकुमार मुग्ध हो उठा. राजमहल उनके प्रेम की खुशबू से महकने लगा.'

अब चिड़े ने लंबी सांस ली.
चिडिय़ा की भरी-भरी सी आंखों में मुस्कान उतर आई. वो प्रेम से भर उठी और चिड़े के पंखों में दुबक गई. चिड़ा मन ही मन अपने कौशल पर इतरा रहा था. हालाँकि चिड़िया को पता था कि कहानी तो काफी पहले ही ख़त्म हो चुकी थी...ये अंत तो चिड़े ने जानबूझकर उसकी चोंच में अटकाया है. 

(आज 26 फ़रवरी को जन्संदेश टाइम्स में प्रकाशित थी.) 

Wednesday, February 22, 2012

कहने को तो बहुत रहा - विनोद कुमार शुक्ल


कहने को तो बहुत रहा
इतने दिनों
कि अभी तक

उसका कभी आना
याद नहीं
और उसका जाना
बार- बार याद आता है
कि अभी उसका जाना हुआ

उससे सब कहने को
कहने को तो कह दिया
जो उसके पीछे चला गया
पर उसे पुकारना रह गया

वह हमेशा
मेरे साथ
यहीं, दहलीज़ पर रह गया.

(शुक्रवार से साभार)

Sunday, February 19, 2012

सांसों का भार कितना अधिक होता है...


हमारे भीतर एक दुनिया होती है. जहां रास्ते भी होते हैं और मंजिलें भी. जहां मौसम भी होते हैं और आरजुएं भी. जहां, नदियां भी होती हैं और पठार भी...वो सब कुछ जो हमें बाहर दिखता है, वो दरअसल हमारे भीतर ही कहीं होता है. हरियाली का कोई एक टुकड़ा हमें हाथ पकड़कर जंगल में ले जाता है और हम उसमें गुम हो जाते हैं. फिर कोई आवाज का सूरज उगता है और हमें जंगल से बाहर निकाल लाता है. 

वो ऐसी ही एक शाम थी. न शब्द बचे थे, न मौन...उतरती शाम के साथ ढेर सारी उदासी भी उतर रही थी. अकेले होने के लिए किसी जंगल जाने में जाने की कोई जरूरत नहीं होती. हम इंसानों से, रिश्ते नातों से भरे जंगल में भी अकेले हो सकते हैं. कभी भी, कहीं भी...उस रोज कोई आवाज नहीं पहनी थी कानों में. आंखों में किसी के नाम का कोई काजल नहीं, पैरों में सितारों की पाजेब नहीं...ढेर सारी जगह घेरता खालीपन. तेज रोशनियां उगलते खंभे और दिन भर की उबासियों से ऊबे लोग सड़कों पर गाडिय़ां दौड़ाकर उस ऊब से पीछा छुड़ा रहे थे. जाहिर है कि अगर सड़क पर निकल ही पड़े हैं तो कहीं तो पहुंच ही जायेंगे. हालांकि मेरे साथ अक्सर ऐसा नहीं होता. कितना भी चलूं घूमफिर कर उसी बिंदु पर वापस आ जाती हूं जहां से चली थी. यानी अपने ही पास, अपने ही भीतर. शायद अभी उन रास्तों की तलाश पूरी नहीं हुई जिन पर चलकर कहीं पहुंचा जाता है, शायद मंजिल जैसी कोई चीज होती ही नहीं...कि बस सफर ही होता है सब कुछ और उस सफर के कुछ ठहराव होते हैं. जहां रुककर हम पानी पीते हैं, चाय पीते हैं, कमर सीधी करते हैं और फिर निकल पड़ते हैं. 

एक रोज एक दोस्त से मजाक ही मजाक में शमशान में मुलाकात तय हुई थी. जो अचानक मुल्तवी कर दी गई थी, किन्हीं कारणों से. मैं तबसे कफन पहने घूम रही थी. सो पहली फुरसत और अकेलापन पाते ही सोचा गोली मारो दोस्त को अकेले ही चलते हैं. यूं भी हम हर सफर में अकेले ही तो होते हैं. कुछ हमसफर मिलते हैं ऐसा आभास सा होता है लेकिन उनके बिछड़ते ही हम और अकेले हो जाते हैं. यानी शाश्वत है अकेला होना ही. तो क्यों न अकेले ही चलूं...यूं भी अपने इस खूबसूरत ठीहे पर मैं हमेशा से अकेले ही जाती रही हूं. कंधों पर उतरती शाम अब रात में तब्दील हो चुकी थी...और रोशनी के खंभों से पार एक नदी बह रही थी. 

भूगोल के नक्शे में इस नदी का नाम गोमती है लेकिन मुझे सारी नदियां जिंदगी की वो नदी लगती हैं जिसके उस पार जाने का अर्थ जीवन से मुक्त होना है...शायद इसका एक कारण ये हो कि मुझे तैरना नहीं आता. उस्ताद तैराक मेरे इस भ्रम को तोडऩे को काफी हैं फिर भी मैं तो अपनी ही दुनिया की बात करूंगी ना...तो जिंदगी की नदी के इसी पार अंधेरा था. मुर्दों को जलाने के लिए लकड़ी की अट्टालिकाएं थी. कहीं किसी के स्मृतिचिन्ह किसी पत्थर के रूप में दर्ज थे. और थोड़ी थोड़ी दूरी पर आग थी. जीवन भर की थकी हुई देहों को विश्राम देती आग. कहीं आग बस बुझने को थी, कहीं धू-धूकर जल रही थी. कहीं मंथर गति से जल रही थी मानो अपनी ही गति पर मुग्ध हो. बनारस के मणिकर्णिका घाट की तरह यहां मृत्यु का कोई उत्सव नहीं मनाया जा रहा था लेकिन मौन भी उत्सव का ही एक रंग है. सबसे अजीब और प्यारी बात ये थी कि ढेर सारी जलती हुई उन चिताओं में से किसी के पास कोई नहीं था. आए तो बहुत सारे लोग होंगे. न जाने कितने रोए होंगे. न जाने कितने कब तक रोयेंगे. लेकिन यहां कोई नहीं था. 

कितना दिव्य सत्य है यह कि सारा मोह हमारी आत्मा से था देह से नहीं. देह तो वही मिट्टी का धेला ही थी हमेशा से. सांस का साथ छूटते ही शरीर अपवित्र हो जाता है. उसे जल्द से जल्द ले जाये जाने के उपक्रम होते हैं और उनसे जुड़ी स्मृतियों के उत्सव की तैयारी होती है. मैंने पहली बार यह दिव्य सच तब जाना जब मेरा एक करीबी नौजवान लड़का जो मेरे प्रति बेहद प्रेम से भरा था और भाभी कहता था, जो कभी भी किसी भी वक्त मुझे परेशान करना अपना हक समझता था और जिसने मुझे एक छोटे भाई से ज्यादा प्यार किया वो चला गया. सुबह घर से निकली तो उसने बालकनी से बाय किया और वापस लौटने पर मुझे उसकी मां को बहन को भाई को संभालना था. रोने की मोहलत नहीं थी. उसके शरीर को उसके ही उस कमरे में क्यों नहीं लाया गया, जहां उसका गिटार रखा था. वो कुर्सी जिस पर वो बैठा करता था, वो खिड़की जहां उसने पौधे बोये थे और वो कार्ड जो उसने दीवार पर सजाये थे...उसकी देह को उस रसोई में भी नहीं लाया गया जहां वो मां से झगड़ा करता था कि आज गोभी के पकौड़े ही खाऊंगा...न जाने कितने सालों तक उसका मुस्कुराता चेहरा नजर आता रहा, उसकी आवाज कानों में पड़ती रही, भाभी अभी चाय पीनी है आपके हाथ की. ऐसा लाड़ उसका कि कोई भी काम छोड़कर मैं उठ जाती थी.

फिर मेरी मासी गयीं. उनके ही उस घर में जिसकी बुनियाद से लेकर घर की दीवारों, छत को उन्होंने अपने सामने बनवाया. घर के पर्दे, फर्नीचर पेंटिंग्स सब चुन-चुन कर लाईं, एक सुंदर बगिया बनाई...उसी घर में उन्हें नहीं लाया गया. बाहर ही रखा गया. मेरे हाथ जाने कैसे संकोच में रुके रहे कि उनकी ही बगिया का एक फूल तोड़कर उन पर नहीं चढ़ा पाई. स्मृतियों में वे अब भी मुस्कुराती हैं क्योंकि मैंने किसी का भी अंतिम समय का चेहरा नहीं देखा. जानबूझकर. जीवन क्या है...शरीर? 
नहीं, सांस. 
क्योंकि सांस जब तक रहती है हमारा शरीर पानी में डूब जाता है और सांस के न रहते ही ये उतराने लगता है. अपनी सांस को छूकर देखती हूं. सांसों का भार कितना अधिक होता है. रात घिरती ही जा रही थी. घुप्प अंधेरे में चिताओं की रोशनी भर थी. चिताएं भी लगभग जल चुकने हो आई थीं. अंधेरे में चीजें ज्यादा साफ न$जर आती हैं...हम क्या चाहते हैं, क्यों चाहते हैं...जीवन हमें कैसा चाहिए ये सारे सवाल उन जलती हुई चिताओं में आहुति के तौर पर डालने को जी चाहा. जी चाहा कुछ लकडिय़ां उठाकर किसी चिता की लौ पकड़कर उसमें प्रवेश कर जाऊं अपने सारे सवालों के साथ और ढेर सारे खालीपन के साथ...पर आह जीवन...

कहीं से आवाज आई...गुडिय़ा...तुम यहां क्या कर रही हो. ये मेरे पापा की आवाज थी. सच कहूं उस वक्त वो आवाज अच्छी नहीं लगी. मैं हमेशा की तरह बात मानने वाली अच्छी बच्ची की तरह सर झुकाये उनके साथ घर की ओर लौट पड़ी...पापा से विनती की मां से कुछ मत कहना और पापा ने शर्त लगा दी कि तुम फिर कभी ऐसा मत करना...हम दोनों जानते हैं कि हम दोनों ही ये शर्त तोड़ेंगे जरूर. कब पता नहीं...रात को नींद की गोलियां खाते हुई शिम्र्बोस्का से जलन हुई, शहरयार जी से भी सब सो गये गहरी नींद और हम एक कतरा नींद को तरस रहे हैं...


Friday, February 17, 2012

बोलो ना शिम्बोर्स्का...तुम हो ना?



- प्रतिभा कटियार

कविता मुझ तक पहले आई या मै कविता तक पहले जा पहुंची याद नहीं लेकिन विस्साव शिम्बोर्स्का के आँचल तले बैठते ही सुकून आ गया था ये अच्छी तरह याद है. उनके जाने की खबर भी मानो उसी तरह चुपके से आई जैसे उनकी कवितायेँ आती थीं और चुपचाप सटकर बैठ जातीं थीं. कविताओं की मुझे कितनी समझ है ये तो नहीं पता लेकिन शिम्बोस्रका को पढ़ते हुए हमेशा अपने भीतर कुछ पिघलता हुआ महसूस हुआ. उनकी कविताओं की आंच जैसे भावों को मजबूत बनाती हो और नर्म छुअन संवेदना के तरल तंतुओं को गूंध देते हों. नोबेल प्राइज विनर शिम्बोस्रका की मृत्यु की खबर भी मानो किसी कविता की तरह रची गयी हो. 

कोई कैसे जा सकता है इतनी ख़ामोशी से....ऐसे भी कोई जाता है क्या. ऐसे तो आया जाता है ना...चुपचाप और बना लिया जाता है किसी को बेहद अपना. घेर ली जाती है थोड़ी सी जगह और उसे प्रेम से, कविताओं से, अपने ओज से भर दिया जाता है चुपचाप. फिर ये थोड़ी सी जगह बढाती जाती है अपना दायरा और भौगोलिक सीमाओं को तहस नहस करते हुए लोगों के दिलों तक सेंध लेती है चुपचाप...ऐसे ही तो आया जाता है ना शिम्बोर्स्का? ऐसे ही तो तुम आई थीं टीन एज में किसी जन्मदिन पर सौगात में मिलीं थीं तुम्हारी कवितायेँ और तुम...बीतती सदी में...कैसे चुपचाप तुम दाखिल हुईं मेरे जीवन में. मेरे जन्मदिन के दिन...तुम्हें आना ही आता था प्रिये तुम्हें जाना क्यों नहीं आया. क्यों नहीं जान पायीं तुम कि जिस तरह तुमने आना सीखा था उसमें जाने का कोई नियम नहीं था. हर कविता के साथ तुम अपने ना जाने की नियति पर मुहर लगा रही थीं. देखो तो कैसी खबर आई है कि लोग कह रहे हैं तुम नहीं रहीं...तुम तो हो ना अभी. हमेशा रहोगी ना? 

कह दो ना इन दुनिया वालों से की मै कहीं नहीं गयी. ये मेरी नयी कविता का नया ढब है. एक दिन अचानक तुम सब पलट रहे होगे पन्ने...रेंग रही होंगी दुनिया की तमाम भाषाएँ मुझे अनुवाद करने में, कहीं किसी की चाय की प्यालियों के बीच जिक्र हो रहा होगा मेरा या कोई प्रेमिका अपने प्रेमी को सुना रही होगी मेरी कविता 'पहली नज़र का प्यार....' इसी बीच तुम चुपचाप ले लोगी एक आखिरी सांस. अचानक तुम्हारी कवितायेँ उड़ने लगेंगी हवाओं में और स्पंदित होने लगेंगे वो तमाम लोग जो इनसे गुज़र चुके हैं...जिन्हें तुमने बताया कि 'बायोडाटा जितने छोटे हों उतने ही अच्छे होते हैं' और ये भी कि 'सौगात में कुछ भी नहीं मिलता,' ' ना ही दोहराया जाता है कुछ भी...' ओह...तुम सचमुच कमाल की स्त्री थीं शिम्बोर्स्का की तुमने पहले ही चुन लीं थीं मरतु की आहटें जैसे हर लेखक चुन लेता है...अपने मरने से कई साल पहले. ना जाने किसने दर्ज कर दिया की तुम पोलैंड की रहने वाली थीं...चलो मान लिया तो वो कौन थी जो हमारे दिल में रहती थी. मै तो पोलैंड नहीं गयी कभी. 

अपने घर की देहरियों पर धूप की आवाजाही से खेलते हुए अपनी छोटी सी स्कर्ट में तुम्हारी कवितायेँ बटोरने का खेल मुझे बहुत पसंद था. सच कहती हूँ मेरी प्रिय कवित्री मेरा बायोडाटा कभी भी लम्बा चौड़ा नहीं हो सका कि वक्त रहते सीख ली थी मैंने तुमसे ये बात की जितने छोटे होते हैं बायोडाटा उतना ही अच्छा होता है खुद को बता पाना. मानो हम जितना चुप हम रहेंगे, उतना ही सुना जायेगा हमें. मुझे नहीं जानना तुम्हारा इतिहास पर नोबेल प्राईज़ लेते वक़्त तुमने जो भी कहा वो ध्यान लगाकर सुना था मैंने...जाने क्यों मुझे लगता था कि तुम मेरे सामने बैठकर बतिया रही हो मुझसे. नोबेल प्राईज़ समिति के लोगों ने तुम्हें कविता का मोजार्ट कहा था, तुम्हें याद है ना...कितना हँसे थे हम और तुम उस रोज. मेरे कमरे में टहलते हुए तुमने अपनी हंसी से सचमुच मोजार्ट की कोई धुन रची थी..

नहीं तुम्हारे इतिहास में कोई रूचि नहीं मुझे, बस तुममें है कि मैंने बस तुमसे ही तो प्यार किया था...कह दो ना कि ये तुम्हारी कविता की कोई नयी शैली है...लेकिन जाने क्यों आज तुम्हारी ही एक कविता का शीर्षक बार बार खुल रहा है...' दोहराया कुछ भी नहीं जाता...' ओह शिम्बोर्स्का! मैं नहीं मानती ऐसी किसी खबर को सच फिर भी क्यों मेरी आँखें नम हैं...बोलो ना शिम्बोर्स्का क्यों मेरी आँखें नम हैं...
('आज समाज' में 9 फ़रवरी को प्रकाशित)

Thursday, February 16, 2012

शहरयार- आरज़ू उनके तसव्वुर की रखी ही रही

- प्रतिभा कटियार

वो झरते कोहरे की एक शाम थी. चाय की प्यालियों में कोहरे की खुशबू भी घुल जाती थी. शहरयार साब एक मुशायरे में आये थे. उनका बार-बार फोन आ रहा था और मै कहीं और व्यस्त थी. आखिर निकल ही पड़ी. मुद्दतों से होती बातें और ये मुलाकात. वो मंच पे थे. उन्हें ही सुनने गयी थी मै तो. लेकिन मुशायरे वाले काफी तेज़ दिमाग होते हैं. असली हीरा आखिरी के लिए बचाकर रखते हैं. किसी की अनगढ़ शायरी से ऊबती मेरी सूरत उन्होंने ताड़ ली. वो मंच से उतारकर आये और मेरे पास वाली खाली पड़ी कुर्सी पर बैठ गए. कुछ देर खुसुर-फुसुर सी आवाज में बात करने के बाद  उन्होंने  कहा कि 'तुम जाओ अब, मुलाकात हो गयी.' मैंने कहा 'मैं आपको सुने बिना चली जाऊं.?' तो बोले 'मैं तुम्हें अलग से सुना दूंगा. मेरा इंतजार करोगी तो देर हो जाएगी. ये लोग हमें आखीर में बुलाएँगे.'  न चाहते हुए भी मै वापस आ गयी...

उनकी न जाने कितनी गजलों का पहला ड्राफ्ट मेरे कानो में दर्ज है...सुबह-सुबह कानों में फोन लगाये दौड़ती भागती मै उन्हें सुनती रहती. आज सोचती हूँ कि हम कितने स्वार्थी लोग हैं..मैंने उन्हें जब भी फ़ोन किया... किसी न किसी काम से किया. चाहे वो अहमद फराज के जाने पर या रेखा के बारे में कुछ लिखते हुए...या जिन्दगी से मायूस होने पर जिन्दगी पर कुछ शेर मांगते हुए. उन्हें फ़ोन करते ही ' ये क्या जगह है दोस्तों' की धुन सुनाई देती. ऐसा लगता कि दिन बन गया. आज ये सोचकर आँख नम है कि मै उनकी एक शिकायत कभी दूर नहीं कर पाई कि कभी यूँ भी फ़ोन कर लिया करो खैरियत ही ले लिया करो.

आखिरी बार उनसे कब बात हुई थी याद नहीं लेकिन ज्ञानपीठ मिलने के बाद की बात है. उन्हें बात करने में काफी दिक्कत हो रही थी फिर भी उन्होंने एक शेर सुनाया, 
'किया इरादा बारहा तुझे भुलाने का
मिला न उज़्र ही कोई मगर ठिकाने का'
....और आखिर में कहा 'तुम्हारे लिए.' मैं झेंप गयी. बुजुर्गों के प्रेम की तासीर इतनी गाढ़ी होती है की वो हममे जज्ब हो जाती है. जाने क्यों मै उन्हें 'उमराव जान', 'गमन', 'आहिस्ता-आहिस्ता' जैसी फिल्मों के खूबसूरत गानों और उनकी ढेर सारी हर दिल अज़ीज़ शायरी के ही रु-ब-रु नहीं देख पाती. उनकी नेकदिली, उनकी खुशमिजाजी, थोड़ी सी तुनक, और जिन्दगी से बेपनाह करने वाले शख्श के रूप में उनकी शायरी के रंग मिलाते ही देख पाती हूँ. उन्हें जब अवार्ड मिलने की घोषणा हुई तो वो हिंदुस्तान में नहीं थी. मै फोन करके बधाई देने चाहती थी लेकिन फोन न लगे...इसी उलझन में थी की उनका फोन आ गया. कुछ खबर मिली है अभी-अभी की ज्ञानपीठ वाले सम्मानित करना चाहते हैं...वो बता रहे थे या ये पूछ रहे थे कि मुझे पता है कि नहीं पर उनकी आवाज में ख़ुशी थी. मैंने बहुत खुश होकर उन्हें मुबारकबाद दी..जिसे उन्होंने शाइसतगी से रख लिया. उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान आकर बात करता हूँ. और यकीनन अलीगढ पहुंचते ही उन्होंने बात की. एक गजल सुनाई, वो लोग बहुत खुशकिस्मत थे
जो इश्क को काम समझते थे
या काम से आशिकी करते थे
हम जीते जी मसरूफ़ रहे
कुछ इश्क़ किया, कुछ काम किया.
काम इश्क़ के आड़े आता रहा
और इश्क़ से काम उलझता रहा
फिर आखिऱ तंग आकर हमने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया..
फैज़ की ग़ज़ल. बोले, 'तुमने इसे सुना तो खूब होगा पर आज मेरा मन है सुनाने हुआ.' सचमुच उस दिन उनसे सुनने के बाद गजल और भी खूबसूरत हो गयी थी. मैंने कहा 'गजल तो पहले ही खूबसूरत थी आपकी आवाज में ढलकर और सुन्दर हो गयी...' ठठाकर हँसे और एक किस्सा सुनाया. 'फैज़ बहुत अच्छे शायर थे लेकिन वो पढ़ते बहुत बुरा थे. उनसे किसी ने पुछा कि जितना अच्छा आप लिखते हैं उतना ही अच्छा पढ़ते क्यों नहीं. तो फैज़ ने जवाब दिया, अरे साहब...लिखें भी हमीं अच्छा और पढ़ें भी हमीं अच्छा ये क्या बात हुई...' हम दोनों देर तक इस बात पर हँसते रहे.

उनके कभी भी आये फोन पर कही गयी लाइनें न जाने कहाँ-कहाँ नोट हैं. एक तो कैलेण्डर पर ही दर्ज है. उन्हें नयी पीढ़ी की भाषा से शिकायत थी. ये भी कि ये लोग पढ़ते नहीं हैं. बस जल्दी में रहते हैं...रेखा की तारीफ में उन्होंने कहा था की उमराव जान के गाने लिखते वक़्त रेखा का तसव्वुर होता था. वो बहुत ही खूबसूरत अदाकारा हैं.

आज उनकी हर बात याद आ रही है और ये गम बढ़ता ही जाता है कि हम उनकी शिकायत अब कभी दूर नहीं कर पाएंगे...उनके अलीगढ आने के दावतनामे अब तक संभालकर रखे हुए हैं...शहरयार साहब, इतना शिकवा भी किसी से क्या करना कि बिन कहे कुछ भी चले जाना..आप तक मेरी आवाज पहुंचे न पहुंचे मेरी हिचकियाँ ज़रूर पहुंचेंगे...आपके लिखे में ढूँढा करेंगे आपको....
(प्रभात खबर के सम्पादकीय पेज पर 15 फ़रवरी को प्रकाशित )

Monday, February 13, 2012

प्रेम पत्र



प्रेम पत्रों में रौशनी होती है
और एक गहन अंधेरा भी
चमकती हुई पीड़ा होती है
तो पपड़ाए होंठो पर रखी
मुस्कान भी

अठखेलियां होती हैं कहीं
तो उबासियां लेती है गहन उदासी भी
सहराओं में साहिलों की तलाश
होती है प्रेम पत्रों में
और चांद तारों को ठुकरा देने की
चाह भी कम नहीं होती

पड़ोसी की बातें खूब विस्तार से
सहेली के किस्से भी पूरे प्यार से
सहेली के प्रेमी का जुगराफिया
और उसका विश्लेषण पूरा
हां, बस अपना ही किस्सा अधूरा...

लिखी होती है
देर रात बिल्लियों की रोती हुई
आवाजों में लिपटी दु:खद
आगत की आशंका
साथ ही देश के हालात की चिंता भी
नयी दुनिया बनाने का सपना होता है
तो ख्वाब
किसी की दुनिया बन जाने का भी

वो जो खबर थी न अख़बार में
प्रेमियों की हत्या वाली
उससे दहल भी गया है प्रेम पत्र
ताकीद है पढ़कर फाड़ देने की

वादा एक-दूसरे का नाम भी न लेने का
हिदायत अपना ख्याल रखने की
और भूल जाने की उन आँखों को
जिन्हें देखे जमाना हुआ...

दूर देश के मौसम को टटोलते हुए
खींचकर उसे ओढ़ लेने की हसरत
नहीं लिखी है प्रेम पत्र में
बचपन के किस्सों में न जाने कब
जुड़ गया था तुम्हारा भी हिस्सा
रह गया यह जिक्र आते-आते

आंखों में न जाने क्यों
सीलन सी रहती है इन दिनों
बड़े दिन हुए मन की मरम्मत कराये
लिखते-लिखते रुक गये थे हाथ
कांपते हाथों ने बस इतना लिखा था
वो लगाया था न जो पौधा पिछले महीने
तुम्हें लिखा था, जिसके बारे में
आज फूल आया है उसमें...

लिखा है प्रेम पत्र में यह भी
सुनो, आज सपने में
मैंने चट्टान को रोते देखा
देखा लोहे को पिघलते हुए
बंदूक की मुहाने पर
एक फूल रखा देखा
बंजर जमीन पर अश्कों को
लहलहाते देखा...

लिखा है प्रेम पत्र में कि
इन दिनों कलेजा छलनी नहीं होता
किसी तलवार से
न जाने कैसे छूट गया लिखना कि
मेरे दु:ख को मत छूना
वर्ना कट जायेगा तुम्हारा हाथ
प्रेम पत्रों में लिखा होता है सब कुछ
बस नहीं लिखा होता है प्रेम

क्योंकि प्रेम लिखने से पहले
एक मौन की नदी गुजरती है
और बहा ले जाती है समूचा पत्र
लौट आते हैं प्रेमी अपनी ही दुनिया में
जुट जाते हैं कोशिश में
खुद के खांचे में फिट होने की...
अधूरे ही रह जाते हैं प्रेम पत्र अक्सर
जैसे अधूरी रह जाती हैं प्रेम की दास्तानें...

( दैनिक जागरण में आज १३ फ़रवरी को प्रकाशित)

Wednesday, February 8, 2012

ख्वाहिशो की कुछ ना कहो...


तेरे होने पर सूरज गुलाम था मेरा
रास्ते मेरा कहा मानते थे

चाँद बिछा रहता था राहों में
और मैं दुबक जाती थी बहारों के आँचल में
कभी धूप में भीग जाती थी
कभी बूँदें सुखा भी देती थीं,

बसंत मोहताज नहीं था कैलेण्डर का
जेठ की तपती दोपहरों में भी
धूल के बगूले उड़ाते हुए
घनघोर तपिश के बीच
वो आ धमकता था
कभी सर्दियों में आग तापने बैठ जाता था
मेरे एकदम करीब सटकर

पेड़ों पर कभी भी खिल उठते थे पलाश
और खेतों में कभी भी लहरा उठती थी सरसों

तुम थे तो ठहर ही जाते थे पल
और भागता फिरता था मन
मुस्कुरा उठता था धरती का ज़र्रा-ज़र्रा
और खिल उठती थीं कलियाँ
बिना बोये गए बीजों में ही कहीं

मौसम किसी पाजेब से बंध जाते थे पैरों में
और पैर थिरकते फिरते थे जहाँ-तहां
कैसी दीवानगी थी फिर भी
लोग मुझे दीवाना नहीं कहते थे
बस मुस्कुरा दिया करते थे

और अब तुम नहीं हो तो
कुछ भी नहीं होता, सच
बच्चे मुंह लटकाए जाते हैं स्कूल
लौट आते हैं वैसे ही

शाम को गायें लौटती हैं ज़रूर वापस
लेकिन नहीं बजती कहीं बांसुरी
शाम उदासी लिए आती है
और समन्दर की सत्ताईसवीं लहर में
छुप जाती है कहीं

मृत्यु नहीं आती आह्वान करने पर भी
और जीवन दूर कहीं जा खड़ा हुआ है
मंदिरों से गायब हो गए हैं भगवान
खाली पड़े हैं चर्च
सजदे में झुके सर
अचानक इतने भारी हो गए कि उठते ही नहीं

न जाने कौन सी नदी आँखों में उतर आई है
जिसे कोई समन्दर नसीब होता ही नहीं
तुम्हारे जिस्म की खुशबू नहीं है कहीं
फिर हवा क्या उडाये फिरती है भला
क्या मालूम

लौट आओगे एक रोज तुम
जैसे लौटे थे बुध्ध
जैसे लौट आये थे लछमन
जैसे रख दिए थे सम्राट अशोक ने
हथियार
वैसे ही तुम भी रख दोगे अपने विरह को दूर कहीं

लेकिन उन पलों का क्या होगा
जो निगल रहे हैं हर सांस को

कैसे बदलेगा यशोधरा और उर्मिला का अतीत
कैसे नर्मदा अपने होने पर अभिमान करेगी
तुम्हारा आना कैसे दे पायेगा उन पलों का हिसाब
जिन्हें ना जीवन में जगह मिली
न मृत्यु में

सूरज अब भी कहा मानने को बेताब है
लेकिन क्या करूं कि कुछ कहने का
जी नहीं करता
मौसम अब भी तकते हैं टुकुर-टुकुर
लेकिन उनकी खिलखिलाहटों से
अब नहीं सजता जीवन

एक झलक देख लूं तो जी जाऊं
पलक में झांप लूं सारे ख्वाब
रोक लूं जीवन का पहिया और लौटा लाऊँ
वो सोने से दिन और चांदी सी रातें

हाँ, मैं कर सकती हूँ ये भी
लेकिन विसाल- ए- आरज़ू तुम्हें भी तो हो
तुम्हारे सीने में भी तो हो एक बेचैन दिल
जीवन किसी सजायाफ्ता मुजरिम सा लगे
और बेकल हों तुम्हारी भी बाहें
इक उदास जंगल को अपनी आगोश में लेने को

मेरी ख्वाहिशो की अब कुछ ना कहो
कि अब ख्वाब उतरते ही नहीं नींद के गाँव
पाश की कविता का पन्ना खुला रहता है हरदम
फिर भी नहीं बचा पाती हूँ सपनों का मर जाना
क्या तुम्हारी जेब में कोई उम्मीद बाकी है
क्या तुम्हें यकीन है कि
जिन्दगी से बढ़कर कुछ भी नहीं
और ये भी कि जिन्दगी बस तुम्हारे होने से है

क्या सचमुच तुम्हें इस धरती की कोई फ़िक्र नहीं
नहीं फ़िक्र मौसमों की आवारगी की
नहीं समझते कि क्यों हो रही हैं
बेमौसम बरसातें
और क्यों पूर्णमशियाँ होने लगी है
अमावास से भी काली

कि ढाई अछर कितने खाली-खाली से हो गए हैं
लाल गुलाबों में खुशबू नहीं बची
नदियों में कोई आकुलता नहीं
पहाड़ ऊंघते से रहते हैं
समंदर चुप की चादर में सिमटा भर है

कोई अब रास्तों को नहीं रौंदता
कोई नहीं बैठता नदियों के किनारे
कहीं से नहीं उठता धुंआ और
नहीं आती रोटी के पकने की खुशबू

तुम कौन हो आखिर कि जिसके जाने से
इस कायनात ने सांस लेना बंद कर दिया
क्या तुम खुदा हो या प्रेमी कोई...

Sunday, February 5, 2012

रूहे सुखन के लिए !



ना जाने कौन सा पन्ना खुला था उस वक़्त. शायद वर्जिनिया वुल्फ के कमरे में थी मैं या दोस्तोवस्की के गलियारों में...ठीक से कुछ याद नहीं बस इतना याद है कि तेज हवा का झोंका भीतर तक उतरता चला गया था...कुछ पानी के छींटें भी. हालाँकि मौसम एकदम साफ़ था. चमकता हुआ. एक दोस्त ने मुझे एक लिंक दिया था या शायद जिक्र किया था. वो जिक्र था या कुछ और लेकिन जैसे ही मैंने उस जिक्र पर दस्तक दी मानो किसी गिरफ्त में कैद हो गयी. कविताओं में इतना ओज कि पढ़ते हुए प्रेम से भर उठी...वो एक आवारा रूह थी...खानाबदोश...मै भी एक आवारा रूह थी...किसी ठिकाने की तलाश में भटकती.

हम दोनों ने एक दुसरे को पहली ही बार में पहचान लिया. मै लोगों को अपने आस पास चुनने में काफी सतर्क रहती हूँ लेकिन इस गिरफ्त में कैद होना कितना सुखद था. हमने एक झटके में खुद को एक-दूसरे को सौंप दिया. हम एक-दूसरे के पढ़े-लिखे के जरिये दिलों तक पहुंचे और यकीन हुआ कि ये सालों की नहीं, सदियों की पहचान है. फोन पर बात की तो उसकी आवाज से प्यार हो गया. उसने आते ही मुझे दोनों हाथों से थाम लिया. मै तो जाने कब से यूँ थामे जाने को बेकरार थी. वो ठीक वही सुर मुझे भेजती, जिन पर मेरी जान अटकी होती थी...मै उसे कहती 'ये तो मेरा...' 'फेवरेट है....' बात को वो पूरा करती. 'जानती हूँ. सब जानती हूँ. कुछ मत बताओ...मैं तुम्हारी माँ हूँ.'

न जाने कितने मौसम उसके शहर की दहलीज छूकर मुझ तक पहुँचते रहे, न जाने कितनी रातें हमने सड़कों पर एक साथ आवारगी की, न जाने कितने कॉफ़ी के कप भरे के भरे ही रह गए कि हम दिल खाली करने में मसरूफ रह गए. अब तो मानो उसके अहसास के बगैर न सुबह होने को राजी है ना शाम आने को...हमें पता होता है कि किसने किस दिन एक सांस कम ली या किस दिन एक सांस ज्यादा...वो मल्लिका है दिलों की. उसे राज करना आता है लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि उसे प्रेम की गुलामी करने में बहुत सुख मिलता है. दुनिया पर अपनी हुकूमत करने वाली ये मल्लिका इतनी शर्मीली है कि सामने आने पर आँख तक नहीं उठा पाती और इसलिए झट से बाँहों में छुप जाती है. उसकी कवितायेँ सीधे दिलों में उतरती हैं, वार करती हैं, प्यार करती हैं और बेकरार भी करती हैं. उसका जादू सा चलता है. 

आज मेरी उस आवारा रूहे सुखन का जन्मदिन है. उसकी माँ मेरी दोस्त है और वो मेरी माँ. कभी मैं भी उसकी माँ हो जाती हूँ...ना जाने कैसा घालमेल है, पर जो भी है बहुत अच्छा है...जबलपुर में रहने वाली उस मल्लिका को (जिसे दुनिया बाबुशा कोहली के नाम से जानती है) जो निजाम की दीवानी है, प्रेम जिसकी रगों में लहू की जगह दौड़ता है, जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनायें देते हुए खुश हूँ कि मै उस मल्लिका के दिल पर राज करती हूँ और वो मुझ पर. मेरी प्यारी बाबुशा, तेरे लिए गुलाबी कुर्ती की तलाश जारी है...लेकिन मुझे पता है कि इस समय दुनिया का सबसे सुन्दर गुलाबी रंग तुम्हारे गालों पर जा बैठा है...ढेर सारा प्यार मेरी जान...हैप्पी बर्थ डे! 

Thursday, February 2, 2012

आओ तोड़ दें ये कारा...


दोस्तोवस्की को पलटते हुए न जाने क्यों मन कहीं ठहर सा गया. ये वो जगह थी जब दोस्तोवस्की जेल में थे और उन्होंने अपने भाई माइकल को पत्र लिखा था, 'न मैं चीखा, न चिल्लाया और न ही साहस खोया. जीवन सर्वत्र है. जीवन हमारे भीतर है न कि बाहर...लोग हमारे निकट होंगे और उन लोगों के बीच में इंसान बनना आवश्यक होगा. यह विचार मेरी देह और रक्त का हिस्सा बन गया है. हां, यह पूरी तरह सच है कि जो जीवन की उच्चतम कला में जीता हो और जो आत्मा की उच्चतम आकांक्षाओं का अभ्यस्त हो...वह मस्तिष्क मेरे स्कंध से कट गया है. संभव है कि मैं मुझे कभी पेन न मिले...? अगर ऐसा हुआ तो बहुत संभव है कि मर जाऊं क्योंकि बिना लिखे जी पाना मेरे लिए असंभव ही होगा. कारावास की कोठरी के काले पंद्रह सालों से मुझे शिकायत नहीं बस कि मुझे पेन मिल जाए. मैं खुद को दुनिया की हर उस चीज से अलग करता हूं जो मुझे प्रिय है. व्यतीत से यह विदाई दुखदाई है जैसे अपनी आत्मा को दो अलग-अलग हिस्सों में बांटना.'

न लिख पाने की पीड़ा कितनी बड़ी होती होगी कि जेल के काले पंद्रह सालों से शिकायत नहीं, बस कि लिखने की मनाही से डर था उसे. भगतसिंह की डायरी समेत उन तमाम राजनैतिक कैदियों की याद ताजा हो उठी, जिन्होंने जेल में न लिख पाने की पीड़ा को भोगा और कइयों ने तो नाखूनों से कुरेद कुरेद कर जेल की दीवारों पर लिखा. रिल्के जब न लिख पाने की असह्य पीड़ा का जिक्र करते हैं, तो इन लेखकों के चेहरे उभरते हैं.

हम सब कितने सुंदर समय में जी रहे हैं. अभिव्यक्ति के सारे दरवाजे हमारे हैं. हम जब चाहे, जैसा चाहें लिखने को स्वतंत्र हैं. वी आर लिविंग इन अ कंफर्ट जोन ऑफ एक्सप्रेशन. फिर भी...?

न, सवाल करने का मुझे कोई हक नहीं. बस कि जेल की उन दीवारों को चूम लेने का जी चाहता है, जहां इन भटकती आत्माओं को कैद किया गया था. मुझे लगता है कि मुझे जेलों से एक किस्म का लगाव है. अपने जीवन की पहली किताब के रूप में जिसकी याद दर्ज है उसका नाम 'भारतीय जेलों में पांच वर्ष' था. मेरे पत्रकारिता के जीवन का पहला असाइनमेंट लखनऊ जेल में महिलाओं के जीवन पर था. जेलयाफ्ता लेखकों ने हमेशा आकर्षित किया.

सवाल जेल का है नहीं शायद, उन बंधनों का है जिनमें हम बेकल हो उठते हैं. हैरान...कि क्या करें...कैसे जिएं. अचानक सर से आसमान गायब हो जाए और जेल की बैरकों में ठूंस दिया जाए तो कैसा लगता होगा. प्रकाशवती पाल (यशपाल जी की पत्नी) के साथ उनके घर के लॉन में ऐसी ही सर्दियों की धूप में न जाने कितने जेल जाने के और जेल से भागने के किस्से सुने थे.

सोचती हूं कि हमें कितना सरल और सहज जीवन मिला है. चारों ओर एक कंफर्ट जोन है. हर कदम सुविधाओं से भरा हुआ. यह भी एक तरह का कारावास ही तो है. इस कंफर्ट जोन को तोडऩा भी कोई कम मुश्किल काम नहीं. छोड़कर चले जाना सारे सुख और बीन लेना किसी के पैर की बिंवाई और किसी के आंख का आंसू...

जीने के लिए मरना ही होता हर किसी को न जाने कितनी बार. जीवन की इस कारा के कैदियों आओ, तोड़ दें सभी दीवारें और छीन लें अपने हिस्से का समूचा आसमान. बहुत हुआ मर-मर के जीना, आओ इतना जियें कि मर जाएं.
(4 फरवरी को हिंदुस्तान में प्रकाशित )