Thursday, March 31, 2011

प्रेम की रटंत में प्रेम कहां...


'यह तुम्हारे लिए एकदम स्वाभाविक है कि तुम न समझो. मैं एक हजार वर्ष और उससे भी अधिक जी चुकी हूं. जो कुछ मैं आज हूं, वह एक हजार वर्ष के अनुभव का परिणाम है. तुम्हारा भूतकाल कुछ नहीं है. तुम्हारे पास वर्तमान ही है और शायद भविष्य भी. मैं शायद इसलिए नहीं कहती कि मुझे इसमें कुछ संदेह है, बल्कि इसलिए कि भविष्य के बारे में निश्चयात्मक रूप से कुछ कहा ही नहीं जा सकता.'  नोरा बोली.
ले. लेविस बेचैन होकर बोला- 'अत्यधिक रहस्यवाद.'

'मि. लेविस, देखो,' नोरा बोली. 'पेटरार्च, गेटे, बायरन, पुश्किन और त्रायन से प्रेम की बातें सुनने के बाद रीतिकालीन कवियों से प्रेम के गीत सुनने और उन्हें जैसे ईश्वर के सामने वैसे ही अपने सामने घुटने टेके देखने के बाद वैलरे, रिल्के, दातुनजियो और इलियट से प्रेम के शब्द सुनने के बाद मैं तुम्हारे किसी भी प्रस्ताव पर गंभीरतापूर्वक कैसे विचार कर सकती हूं, जिसे तुम सिगरेट के धुएं के साथ मेरे मुंह पर मारे दे रहे हो.'

'क्या मुझे शादी का प्रस्ताव करने के लिए गेटे, बायरन या पेटरार्च बनना होगा?'

'नहीं, मि. लेविस.' नोरा बोली, 'तुम्हें पुश्किन और रिल्के भी नहीं बनना होगा. लेकिन जिस औरत से तुम शादी करना चाहते हो उससे तुम्हें प्रेम करना होगा.' 
'स्वीकार है.' लेविस बोला. 'तुम्हें किसने कहा कि मैं तुम्हें प्यार नहीं करता.'
नोरा मुस्कुरा दी.

'मि. लेविस, प्रेम एक तीव्र भावना है. हो सकता है, तुमने यह बात कहीं सुनी हो, अथवा पढ़ी हो.'
'मैं पूर्णतया सहमत हूं,' वह बोला, 'प्रेम एक तीव्र भावना है. लेकिन तुम किसी भी तीव्र अनुभूति के अयोग्य हो.' नोरा बोली, 'और अकेले तुम्हीं नहीं, तुम्हारी सभ्यता में कोई भी आदमी तीव्र भावना का अर्थ नहीं समझता. प्रेम जैसी सर्वोपरि भावना के लिए केवल ऐसे ही संसार में स्थान हो सकता है, जहां मानव के अनुपम मूल्य में विश्वास किया जा सकता है. तुम्हारा समाज मानता है कि आदमी का स्थान आदमी ले सकता है. तुम्हारी दृष्टि में मानव और इसलिए वह स्त्री भी, जिससे तुम प्रेम करने की बात करते हो, परमात्मा अथवा प्रकृति द्वारा निर्मित एक विशेष व्यक्तित्व नहीं है. एक असाधारण कृति. तुम्हारे लिए हर व्यक्ति एक परंपरा की एक इकाई है, और कोई भी एक औरत दूसरों के समान एक इकाई है. जीवन का यह दृष्टिकोण प्रेम की जड़ काटता है.'

'मेरे संसार के प्रेमी जानते हैं कि यदि वे उस स्त्री को नहीं पा सकते, जिससे वे प्रेम करते हैं तो पृथ्वी पर कोई दूसरी चीज उसी कमी को पूर्ण नहीं कर सकती. यही कारण है कि वे उसके लिए प्राय: अपनी जान दे देते हैं. कोई दूसरी चीज उनके प्रेम की स्थानापन्न नहीं हो सकती. यदि कोई आदमी मुझसे वास्तव में प्रेम करता है तो वह मुझे इस बात का विश्वास दिला देगा कि अकेली मैं ही उसे प्रसन्न कर सकती हूं. संसार भर में एकमात्र मैं अकेली. वह मुझे सिद्ध कर देगा कि मैं अनुपम हूं, संसार में मेरे सदृश और कोई है ही नहीं. एक आदमी जो मुझे यह विश्वास नहीं दिला सकता कि मैं असाधारण, अनुपम हूं, मेरा प्रेमी नहीं है. एक स्त्री जिसे अपने प्रेमी से यह आश्वासन नहीं मिलता, वास्तव में उसकी कोई प्रेमिका नहीं है. जो आदमी मुझसे प्रेम नहीं करता, मैं उससे विवाह नहीं कर सकती.' 

'मि. लेविस, क्या तुम मुझमें यह भावना जगा सकते हो? क्या तुम ईमानदारी से यह विश्वास करते हो कि पृथ्वी पर मेरे सदृश कोई दूसरी औरत नहीं? क्या तुम्हें पक्का विश्वास है कि यदि तुम काफी कोशिश करो तब भी तुम्हें कोई मेरे स्थान पर नहीं मिल सकती? नहीं, तुम्हें पूरा भरोसा है कि यदि मैं अस्वीकार कर दूं तो तुम्हें अपनी पत्नी बनाने के लिए कोई दूसरी औरत मिल जायेगी और यदि वह भी अस्वीकार कर दे, तो तीसरी मिल जायेगी. क्या मैं ठीक नहीं कह रही हूं? '

(आलोक श्रीवास्तव के कविता संग्रह 'दिखना तुम सांझ तारे को ' की भूमिका से)




Sunday, March 27, 2011

प्यारी शिम्बोर्स्का की याद में


आज विश्व रंगमंच दिवस है. हर बार की तरह इस बार भी शिम्बोर्स्का की यह कविता जेहन में दौड़ रही है. दुनिया के इस नाटक में हम अपने चेहरों पर न जाने कितने चेहरे लगाये, न जाने कितनी भूमिकाओं में हैं. इन नाटकों के दुखांत या सुखांत भी हम तय नहीं कर पाते . काश कि कर पाते...आइये अपनी भूमिकाओं में लौटते हुए अपने चेहरों पर मुखौटों को तरतीब से सजाते हुए पढ़ते हैं मेरी प्यारी शिम्बोर्स्का की यह कविता-


 दुखांत 

मेरे लिए दुखांत नाटक का सबसे मार्मिक हिस्सा
इसका छठा अंक है
जब मंच के रणक्षेत्र में मुर्दे उठ खड़े होते हैं
अपने बालों का टोपा संभालते हुए
लबादों को ठीक करते हुए 
जब जानवरों के पेट में घोंपे हुए छुरे निकाले जाते हैं
और फांसी पर लटके हुए शहीद
अपनी गर्दनों से फंदे उतारकर 
एक बार फिर 
जिंदा लोगों की कतार में खड़े हो जाते हैं
दर्शकों का अभिवादन करने.

वे सभी दर्शकों का अभिवादन करते हैं
अकेले और इकट्ठे 
पीला हाथ उठता है जख्मी दिल की तरह
चला आ रहा है वह जिसने अभी-अभी खुदकुशी की थी
सम्मान में झुक जाता है
एक कटा हुआ सिर.

वे सभी झुकते हैं
जोडिय़ों में
ज़ालिम मज़लूम की बाहों में बांहें डाले
बुजदिल बहादुर को थामे हुए
नायक खलनायक के साथ मुस्कुराते हुए

एक स्वर्ण पादुका के अंगूठे तले शाश्वतता कुचल दी जाती है
मानवीय मूल्यों का संघर्ष छिप जाता है एक चौड़े हैट के नीचे.
कल फिर शुरू करने की पश्चातापहीन लालसा.

और अब चला आ रहा है वह मेहमान
जो तीसरे या चौथे अंक या बदलते हुए दृश्यों के बीच
कहीं मर गया था
लौट आए हैं
बिना नाम-ओ-निशान छोड़े खो जाने वाले पात्र
नाटक के सभी संवादों से ज्यादा दर्दनाक है यह सोचना
कि ये बेचारे
बिना मेकअप या चमकीली वेशभूषा उतारे
कब से मंच के पीछे खड़े इंतजार कर रहे थे.

सचमुच नाटक को सबसे ज्यादा नाटक बनाता है 
पर्दों का गिरना
वे बातें जो गिरते हुए पर्दे की पीछे होती हैं
कोई हाथ किसी फूल की तरफ बढ़ता है, 
कोई उठाता है टूटी हुई तलवार
उस समय, सिर्फ उस समय
मैं अपनी गर्दन पर महसूस करती हूं
एक अदृश्य हाथ,
एक ठंडा स्पर्श.

- विस्साव शिम्बोर्स्का 
अनुवाद- विजय  अहलूवालिया 



Thursday, March 24, 2011

ले चल अपने संग मुझे लहर बावरी...





समंदर के किनारे गीली रेत के छोटे-छोटे बेहद खूबसूरत से गोले बनाना लड़की को बहुत पसंद था. वो अपने नन्हे-नन्हे हाथों से समंदर की गीली रेत को समेटती. उन्हें सुंदर सा गोल-गोल आकार देती. अपने जीवन की सारी कलाएं, सारा कौशल वो उन रेत के गोलों को बनाने में लगा देती. शिल्प और मूर्तिकला के तमाम नये आयाम यहां गढ़े जाते प्रतीत होते. अजंता और कोणार्क भी इन नये कला आयामों को देखने को आतुर हो उठते. फिर लड़की अपना मुंह उन गोलों के करीब ले जाती. मानो कुछ कह रही हो. जब वो अपना मुंह रेत के गोलों के करीब ले जाती, तो सूरज की किरन सीधे उसके  माथे पर होती थीं. उसका माथा चमक उठता. पसीने की बूंदों पर सूरज की छेड़खानी सौंदर्य की नई परिभाषाएं गढऩे लगती. लड़की के खुले हुए लंबे बाल उसके आधे गालों को ढंक लेते थे. रेत के गोलों के करीब जाते हुए उसकी आंखों में गजब की चमक आती थी. मानो उसे अपने जीवन का सबसे बड़ा सुख मिल गया हो. तभी समंदर की कोई लहर आती और लड़की के हाथ से बने उस रेत के गोले का बहाकर अपने साथ ले जाती. लड़की उस लहर को प्यार से देखती. मानो कह रही हो कि मुझे भी बहा ले चलो ना?

वो फिर से नया गोला बनाती. फिर अपना मुंह गोले के करीब ले जाती और उसकी आंखों में फिर से चमक आ जाती. फिर कोई लहर उसे बहाकर ले जाती. लड़का उसे यह सब करते हुए रोज देखता था. लेकिन उसने उससे इस बारे में कभी पूछा नहीं. उसे लड़की को यूं देखना इतना अच्छा लगता था कि वो कुछ भी सवाल करके उसकी तन्मयता को तोडऩा नहीं चाहता था. वो बस उसके खुले बालों के बीच से झांकते आधे चेहरे पर पड़ती सूरज की किरणों को देखकर असीमित सुख महसूस करता था.

लड़की अक्सर खूब बोला करती थी. दिन भर उसके पास कहने को कुछ न कुछ होता था. लड़का हमेशा उसे सुना नहीं करता था. वो उसके बोले हुए को देखा करता था. उसके शब्दों से बेपरवाह लड़का बस उसके भावों की छुअन को महसूस करता था. 

लड़की दुनिया जहान की बातें करती थी लड़के से. उसका बचपन, उसकी सखियां, उसके प्यारे से अधूरे ख्वाब, मां से कहासुनी, ऑफिस के झमेले न जाने क्या-क्या. लड़का सचमुच सुनता नहीं था सब. बस देखता था. मन ही मन सोचता था लड़कियां इतना बोलती क्यों हैं? लड़की इन सबसे बेफिकर बस बोलती ही जाती थी. लेकिन जब वो समंदर के किनारे रेत के गोले बना रही होती थी, तो वो कुछ भी नहीं बोलती थी. एक शब्द भी नहीं. लड़के ने एक दिन उससे पूछा सारा दिन इतना बोलती हो, यहां आकर क्यों मौन हो जाती हो. कोई जादू टोना का चक्कर है क्या. लड़की मुस्कुराई. 
हां, जादू ही तो है. तुम नहीं समझोगे?
लड़का सचमुच नहीं समझा. वो समझना भी नहीं चाहता था.


वो रोज जैसी ही एक शाम थी. उस दिन सूरज ने हाफ डे ले लिया था. आसमान पर बादलों की ड्यूटी लग गई थी. लड़की गोले बना रही थी. आज उसका चेहरा उदास था. उसकी आंखों में चमक नहीं थी. उसने अपने खुले बालों को समेटकर जूड़ा बना लिया था. वो रेत को समेट रही थी कि तभी बूंदों का हमला हो गया. लड़के ने लड़की से चलने को कहा. वो मानी नहीं. उसने अपनी भीगी पलकों से लड़के को देखा और कहा, आज बताती हूं तुम्हें उन गोलों के खेल का राज. उन रेत के गोलों के बीच मैं अपनी कोई अधूरी ख्वाहिश छुपा देती थी. उससे कान में कहती थी कि तू चल मैं आयी. तुम कभी नहीं जान पाये कि मैंने अपनी कितनी खामोशियों को बोल-बोलकर छुपाया है. वो सारी खामोशियां, सारे ख्वाब, सारी ख्वाहिशें सब मैं समंदर की लहरों को सौंप चुकी हूं. वे अब सदा के लिए इस समंदर में सुरक्षित हैं. मैं अपने मन का यह बोझ तुम्हें नहीं देना चाहती थी. लड़का हैरत से लड़की को सुन रहा था. इतने सालों से जिस लड़की को जानता था, वो इस कदर अनजानी लग रही थी उसे. उसकी आंखें छलक पड़ीं. तभी उसने एक बड़ी सी लहर को करीब आते देखा. लड़की अब वहां नहीं थी. एक बड़ा सा रेत का गोला था. उस पर कोई मोती चमक रहा था. वो लड़के की आंख का आंसू था. लहर उस गोले को बहाकर ले गई. 

समंदर में अब भी न जाने कितने चमकते हुए मोती छुपे हैं. न जाने कितने शंख, सीपी. कुछ लड़के के आंसू, कुछ लड़की की ख्वाहिशें...ये लहरें अब भी हर प्रेमी जोड़े को लुभाती हैं...

Friday, March 18, 2011

आसमान से रंग बरस रहे हैं बेहिसाब...



आसमान से रंग बरस रहे हैं. बेहिसाब रंग. खुशी के रंग, प्यार के रंग, किसी की याद के रंग, इकरार के रंग, इनकार के रंग, मिलन के रंग, विरह के रंग...रंग ही रंग. न जाने कैसा मौसम है कि रंगों ने सबको सराबोर कर रखा है. कहते हैं यह पॉलिनेशन पीरियड है. परागकणों के उत्सर्जन का समय. प्रकृति अपनी उदात्तता  पर होती है इन दिनों. जाहिर है हमारा मन भी. क्योंकि चाहे न चाहे हम प्रकृति से संचालित होते ही हैं. इन दिनों हमारी समस्त इंद्रियां काफी सक्रिय होती हैं. हमारे सोचने, महसूस करने की क्षमताएं कई गुना बढ़ी हुई हैं. हर कोई जेहनी हलचल का शिकार है. कोई प्रेम के सुर्ख रंग में रंगा जा रहा है तो कोई अवसाद के स्याह रंग को लिए बैठा है. रंगा हर कोई है इसमें कोई शक नहीं है. 

कहीं प्रेम का फूल बस एक नज़र देख लेने भर से खिल उठा है. कहीं जरा सी बात पर दिल टूट गया है किसी का. किसी की याद का मौसम किसी के पूरे वजूद पर बिखरा पड़ा है. पलाश के फूल उसे मुंह चिढ़ाते नज़र  आ रहे हैं. मौसम की सरगोशियां दिल में चुभ रही हैं. कोई नई नवेली दुल्हन अपनी पहली होली पर मायके जाने वाली है लेकिन पति का साथ भी छोडऩा नहीं चाहती. घंटों फोन पर जुगत लगाती है कि कैसे बन जायें दोनों काम. कोई विरही प्रेमिका फोन पर बार-बार नंबर डायल करके काट देती है जिद में कि मैं ही क्यों करूं फोन हर बार. उसे भी तो मेरी याद आनी चाहिए. कोई भौंरा उसके करीब से गुजरता है, तो वो भीगी आंखों से मुस्कुराती है. न जाने कैसे रंग बरस रहे हैं आसमान से कि हर कोई बस भीगा ही जा रहा है. 

जापान में सुनामी आया है. एक पल में कितने लोग 'है' से 'थे' हो गये. समूचा विश्व स्तब्ध है. ऐसे में एक दोस्त का फोन आता है, सुनो जापान का हाल देखकर मैंने कुछ डिसाइड किया है. मैंने पूछा क्या, यार जिंदगी जी भर के जीनी है बस. कल का क्या पता, क्या हो. कल के चक्कर में हम आज के, अभी के पलों को सैक्रिफाइस क्यों करें? जो भी है बस यही इक पल है...वो गुनगुनाती है. उसने तय कर लिया है अब वो इंतजार नहीं करेगी. आज ही निकल जायेगी अपने रूठे प्रेमी को मनाने उसके पास. उसकी गुनगुनाने की आवाज में प्रेम की मीठी सी छुअन है, जो पांच सौ किलोमीटर दूर बैठे हुए भी मुझे छू जाती है. 

तभी देखती हूं कोई मेरे इंतजार में बैठा है. फोन रखती हूं, मैं जानती हूं उसे. उससे मुखातिब होती हूं. 
हां बोलो? 
तुम्हें कौन सा रंग पसंद है? वो मुझसे पूछता है. 
क्यों? मैं सवाल करती हूं. 
तुम्हें तुम्हारी पसंद के रंग के अलावा सारे रंगों से रंगना है. 
ये क्या बात हुई? हां, अपनी पसंद के रंग तो तुम खुद अपनी जिंदगी में सजाकर रखती ही होगी ना? इस होली उन रंगों में खुदकर रंग कर देखो, जिन पर तुम्हारी अब तक न$जर ही नहीं गई. 
मैं हंसती हूं. ये मौसम है. हमेशा मुझसे ऐसे ही अठखेलियां करता है. 
लेकिन मुझे तो कुदरत के सारे रंग पसंद हैं...बहुत पसंद...तो अब मुझे कौन से रंग से  रंगोगे तुम?
वो चुप हो जाता है. तुम्हें रंगने की क्या जरूरत है. तुम तो पहले ही सर से पांव तक सराबोर हो कुदरत के रंगों से...तुम्हारे लिए तो हमेशा ही होली है. मैं मुस्कुराती हूं. लेकिन मैं इस बार होली खेलूंगी तुम्हारे साथ...
मौसम हैरत से मुस्कुराता है. अच्छा? 
तुम अपने सारे फूल मुझ पर बरसाना, मैं अपना सारा प्यार तुम पर बरसाऊंगी...तुम मेरे जीवन में ठहर जाना, मैं तुम्हारी हर डाल सजाऊंगी. 

मैं तो कबसे इसी फिराक में था, मौसम शरारत से मुस्कुराता है. एक हवा का झोंका मुझे छूकर जाता है. कहीं से फूलों की खुशबू आती है. अरे, ये तो मेरे जूड़े में लगा फूल है, जो खिलखिला  रहा है. ड्योढ़ी पर मौसम मुझे बुला रहा है. मैं तो जा रही हूं खेलने होली...आप भी अपनी झोली में भर लीजिये जिंदगी के सारे रंग. आसमान से बहुत सारे रंग बरस रहे हैं इस बार...आप सबको होली मुबारक

Wednesday, March 16, 2011

इस होली...


चलो, दुःख को नहला दें
खुशियों के रंग से,

चलो, भूख पर
उलीच दें
रोटी की खुशबू,

चलो, हताशाओं को
सराबोर करें
उम्मीदों के गाढ़े रंग से,

चलो फिरकापरस्ती को दबोचकर
शांति के रंग में डुबो ही दें

चलो, विरह के गालों पर मलें
मिलन का रंग सुनहरी
इस होली...

Sunday, March 13, 2011

एक ख़त

अवसाद के घने अंधेरों के बीच एक मित्र का एक ख़त रौशनी बनकर उभरता है. सोचती हूँ क्यों न उसे साझा किया जाये. 

प्रिय मित्र, 

मैंने हमेशा से यह महसूस किया है कि वह जो हमारे भीतर बैठा एक और ’मैं’ है...। जिसका जन्म हमारे जीते जी बीच में कहीं हो गया था। उसके साथ हमारे संवादों ने, जिसे हम अपना सारा लिखा हुआ कह सकते हैं, उस ’मैं’ को इतना पानी दिया है वह एक हरा भरा पेड़ बन चुका है। जिसकी छांव में हम खुद को इतना सुरक्षित महसूस करते हैं जितनी सुरक्षा शायद हमने अपनी माँ की कोख़ में महसूस की थी। पर इन संवादों में हमारा लगातार उसके साथ एक द्वंद चल रह होता है। वह दरख़त जितना बड़ा होता जाता है कि हमारा जीना उसके सामने एकदम ही निर्थक जान पड़ता है। सार्थकता की लड़ाई जो उस दरख़त के और हमारे बीच चल रही होती है वह हमारे कर्म में जीवंत्त्ता बनाए रखती है। 

जहाँ से मेरी समस्या शुरु होती है वह है... शांति.. उस दरख़्त और मेरे बीच की। जब हम ’सम...’ पर बहुत समय तक बने रहते है। जहाँ वह मुझे और मैं उसे स्वीकार कर लेता हूँ। 
जैसा कि मैंने पहले कहीं लिखा है... कि “लिखता मैं नहीं हूँ लिखता तो कोई ओर है. मैं तो बस उसे सहता हूँ।“
हमें हमारे एकांत से बहुत अपेक्षाएं हैं..। शायद इसी वजह से जब हम अपने एकांत में प्रवेश करते हैं तो वह, हमारा एकांत, हमसे क्या अपेक्षा रखता है? इसे हम सुन भी नहीं पाते। हम अपने एकांत में अपनी पूरी गंदगी लिए प्रवेश करते हैं और अपेक्षा करते हैं कि हमारा एकांत हमारे सारे पाप धो देगा.... और अंत में जब हम इससे बाहर आएगें तो हमारे पास नए विचार... और किसी नई कृति की शुरुआत होगी। शायद यह अपेक्षाएं ही      है जिसके कारण हमारा एकांत भी हमें हमारी निजी समस्याओं से भरा लगता है..हम बहुत देर वहाँ भी ठहर नहीं पाते...। हमारी अपेक्षा, चाहे हमारे एकांत से हो, चाहे वह हमारी पीड़ाओं से हो, या चाहे हमारे अवसादों से.... वह सबका एक जैसा स्वाद कर देती है।
और क्या हम सोच-समझकर किसी भी बात को कह सकते हैं...। हम शायद एक स्थिति पर रहते हैं.. बरसों... और बहुत समय बाद वह बात हमारे भीतर से कहीं निकलती है और हमें लगता है कि वाह! क्या बात कह दी मैंने ही। पर उस बहुत समय तक एक स्थिति पर रहने की पीड़ा का क्या? वह तो हमें ही भोगना है और इसलिए नहीं कि वह बहुत असहनीय है, ना... वह बहुत सुंदर स्थिति है...। यह वह ही स्थिति है जिससे हम काई के नीचे की झील को महसूस कर पाते हैं। जैसे हमें जब बुखार आता है तो हम कहते हैं कि मेरी तबियत खराब है... जबकि सत्य यह है कि शरीर भीतर लड़ रहा है... वह भीतर पल रहे रोगों को खत्म करने की कोशिश में है। सो बुखार आने की स्थिति को मैं स्वस्थ कहूंगा... अस्वस्थ नहीं।

जब अवसाद, खालीपन.. और असहजता के दिन चल रहे होते हैं तो हम उस वक़्त उस काई को हटाने की कोशिश में लगे होते है जिससे हमें शांत नीला पानी दिखे...। 

फिर मिलते हैं
- मानव

उतरती शाम की उदासी और कॉफी



न जाने कितने दिन हुए कमरे में बुहारी हुए. गर्द की पर्तों के बीच बैठने का भी अपना ही मजा है. उसकी भी एक खुशबू है जो अपनी सी लगती है. किताबों का बेतरतीब सा ढेर चारों ओर. अखबार के बिखरे हुए से पन्ने. कॉफी के  खूब सारे मग. कोई यहां, कोई वहां. एक सितार जिसे अपने छुए जाने का न जाने कब से है इंतजार. कुछ फूल सूखे से, बारिश की बूंदें जो सूखने के बाद अपने निशान देकर वापस लौट गई हैं. कुछ मिस कॉल्स हैं, जिन्हें मिस करने का सुकून है. कुछ मैसेज, जिन्हें पढऩे का कोई चाव नहीं.

अधूरी देखी हुई फिल्मों की लंबी लिस्ट. आधी रची हुई कहानियों का जंगल, कविता...ओह वो तो मुझसे सधती ही नहीं. किताबें देखकर खिल उठता था चेहरा कभी. इन दिनों किताबों ने रास्ता देना बंद कर दिया है. एक साथ कई किताबों पर से गुजरते हुए लगता है कहीं नहीं पहुंच रही. लौट आती हूं अपने सम पर. ढूंढती हूं अपना ही कोई सिरा कि वो सधे तो सधे जीवन भी.

छोड़ो, ये सब नहीं होता मुझसे. उतरती शाम की उदासी ही पीते हैं आज कॉफी के साथ. दोनों का स्वाद काफी मिलता जुलता सा है...

उम्र की तमाम
उदासियों को
फेंटकर,
उबालकर देर तक
आंख का पानी
तैयार की थी
बिना शक्कर और दूध वाली
वो जहर सी कड़वी कॉफी
कि शायद इसे पीकर
कम ही लगे
कड़वाहट जमाने की...

Thursday, March 10, 2011

उस जंगल में प्रेम का डेरा


जंगल में घूमना, दरख्तों से बातें करना, जुगनुओं के पीछे भागना लड़की को बेहद पसंद था. अमावस की रातें उसे इसीलिए खूब भाती थीं. इन रातों में उसकी उदासी अपने उत्कर्ष पर होती थी और उदासी को साझा करने के लिए उसके पास पूरा एक जंगल था. 

चांद छुट्टी पर होता था इसलिए जुगनुओं की चांदी हो जाती. वे खुद को चांद समझने लगते. सब के सब हीरो हो जाते. लड़की खुद को चांद समझने वाले जुगनुओं के पीछे दौड़ती. उन्हें पकड़कर अपने जूड़े में टिका लेती. मानो कह रही हो कि समझे बच्चू, आई अक्ल ठिकाने. जुगनुओं को भी यूं लड़की से पकड़ाये जाने में बड़ा मजा आता था. 

जंगल के सारे जुगनुओं से लड़की की दोस्ती हो गई थी. वो उन जुगनुओं में अपना संसार खोजती थी. उनसे बातें करती थी. सारे जंगल में जुगनुओं की दिप दिप और लड़की की खिलखिलाहट गूंजती थी. कभी-कभी उसकी खिलखिलाहट में आद्र्रता शामिल हो जाती, तो कभी शोखी. लड़की रोती नहीं थी. कभी भी नहीं. उसने अपने मन के भीगे कोनों को भी खिलखिलाहटों में समेट दिया था. यह उसके लिए एक मोहक खेल था. जिसमें वो पारंगत हो चुकी थी. 

लड़की जुगनुओं को गाना सिखाती थी. सबको एक साथ बिठाकर जब वो सुर लगाती, तो सारे जुगनुओं की दिप दिप में एक रिद्म शामिल हो जाती. सारे जुगनू लड़की की बात मानते थे. अगर कोई शरारती जुगनू मटरगश्ती करता तो लड़की उसे उठाकर अपने जूड़े में लगा लेती. उसकी शरारत पर जुल्फों की ये कैद जुगनू को भी खूब भाती थी. वो बाकी जुगनुओं को देखकर मुस्कुराता था. लड़की भी मुस्कुराती थी. 

लड़की को जुगनुओं से खुद को सजाना अच्छा लगता था. वो जुगनुओं को पकड़-पकड़कर उनसे खुद को सजाया करती थी. काली अंधेरी रात में जंगल में दिप दिप करती हुई एक लड़की घूमती थी. वो अदुभुत न$जारा होता था. हवाओं का संगीत और जुगनुओं से दमकती लड़की. खुदा भी इस नजारे को देखने के लिए अमावस की रातों का बेसब्री से इंतजार करता था. लड़की जुगनुओं से सजी होती थी. वो कुछ गुनगुनाती थी. उसके सुरों की लौ के साथ जुगनुओं की दिप दिप की रिद्म भी मिलती थी. 
वो अमावस की ऐसी ही एक रात थी. 

उस रोज लड़की जुगनुओं के पीछे नहीं भागी. उसने दरख्तों से कोई बात नहीं की. उसने हवाओं से उसे अपने संग उड़ा ले चलने का इसरार भी नहीं किया. फूलों की तरफ पलटकर देखा भी नहीं. उसकी आंखों में जुगनुओं का अब कोई चाव नहीं था. जंगल उदास हो गया. इतने सालों से जंगल और लड़की इस कदर इकसार हो चले थे कि दोनों का वजूद एक-दूसरे में शामिल हो गया था. जुगनुओं के पीछे लड़की नहीं भाग रही थी, सो वे चुपचाप जहां-तहां बैठकर लड़की का चेहरा तकने लगे. हवाओं ने लड़की की देह को सहलाया लेकिन वहां कोई जुंबिश नहीं थी. दरख्तों ने झुककर उसके चेहरे को करीब से देखा, वहां गाढ़ी उदासी थी. अमावस की काली रात से भी गहरी उदासी. 

सारे मौसम लड़की को ताक रहे थे. अगर लड़की यूं उदास रही तो मौसमों के वजूद का क्या होगा. कौन अपने माथे पर बसंत सजायेगा. कौन पलाश को अपने आंचल में भरेगा. कैसे जंगल में प्रेम का संगीत गंूजेगा. सबकी आंखों में ढेरों सवाल थे. लड़की हर सवाल से बेखबर थी. उसकी आंखों में प्रेम के जुगनू चमक रहे थे...उसका चेहरा उदास था. खुदा लड़की के सजदे में था. 

Tuesday, March 8, 2011

साहिर लुधियानवी के जन्मदिन पर


आज मेरे महबूब शायर साहिर लुधियानवी का जन्मदिन है. अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस भी. जबरन चुरायी गयी फुर्सत के चंद लम्हों में साहिर को पढ़ते हुए खुद को महसूस किया... 


आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते
वरना ये रात आज के संगीन दौर की
डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिल
ता-उम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें

गो हम से भागती रही ये तेज़-गाम उम्र
ख़्वाबों के आसरे पे कटी है तमाम उम्र

ज़ुल्फ़ों के ख़्वाब, होंठों के ख़्वाब, और बदन के ख़्वाब
मेराज-ए-फ़न के ख़्वाब, कमाल-ए-सुख़न के ख़्वाब

तहज़ीब-ए-ज़िन्दगी के, फ़रोग़-ए-वतन के ख़्वाब
ज़िन्दाँ के ख़्वाब, कूचा-ए-दार-ओ-रसन के ख़्वाब

ये ख़्वाब ही तो अपनी जवानी के पास थे
ये ख़्वाब ही तो अपने अमल के असास थे
ये ख़्वाब मर गये हैं तो बे-रंग है हयात
यूँ है कि जैसे दस्त-ए-तह-ए-सन्ग  है हयात

आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते
वरना ये रात आज के संगीन दौर की
डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिल
ता-उम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें.

Saturday, March 5, 2011

कमरे में कोई ऐश ट्रे भी नहीं...



वो उतरती शाम का धुंधलका था
शायद गोधूलि की बेला

बैलों की गले में बंधी घंटियों की रिद्म
उनके लौटते हुए सुस्त कदम और
दिन भर की थकान उतारने को आतुर सूरज
कितने बेफिक्र से तुम लेटे हुए
उतरती शाम की खामोशी को
पी रहे थे
जी रहे थे.

तुम शाम देख रहे थे
मैं तुम्हें...
तुम्हारी सिगरेट के मुहाने पर
राख जमा हो चुकी थी.
कभी भी झड़ सकती थी वो
बैलों की घंटियों की आवाज से भी
हवाओं में व्याप्त सुर लहरियों से भी
मैं उस राख को एकटक देख रही थी

तुम बेफिक्र थे इससे कि
वो जो राख है सिगरेट के मुहाने पर
असल में मैं ही हूं
तुम्हारे प्यार की आग में जली-बुझी सी

कमरे में कोई ऐश ट्रे भी नहीं...

(अमृता और मरीना की याद में)

Friday, March 4, 2011


रात दर्जिन थी कोई
सीती थी दिन के पैरहन
के फटे हिस्से...

वो जाने कैसा लम्हा था
धागे उलझ गए सारे
सुईयां भी गिरकर खो गईं.

दिन का लिबास
उधड़ा ही रहेगा अब...