Thursday, May 19, 2011

तब पहचानोगे क्या..?



'बहुत घुटी घुटी रहती हो
बस खुलती नहीं हो तुम'
खुलने के लिए जानते हो 
बहुत से साल पीछे जाना होगा
जहाँ से कंधे पर बस्ता उठाकर 
स्कूल जाना शुरू किया था
इस जेहन को बदलकर 
कोई नया जेहन लगवाना होगा
और इस सबके बाद जिस रोज 
खुलकर
खिलखिलाकर 
ठहाका लगाकर 
किसी बात पे जब हसूंगी
तब पहचानोगे क्या..?
- दीप्ति नवल 

7 comments:

pallavi trivedi said...

badhiya... loved it.

रश्मि प्रभा... said...

इस सबके बाद जिस रोज खुलकरखिलखिलाकर ठहाका लगाकर किसी बात पे जब हसूंगीतब पहचानोगे क्या..?-bahut jahin swaal dipti naval ji ki rachnayen bahut achhi lagti hain

प्रवीण पाण्डेय said...

कितनी वर्फ गिर गयी है हमारे उत्साह में।

दर्शन कौर धनोए said...

खुलने के लिए जानते हो बहुत से साल पीछे जाना होगा जहाँ से कंधे पर बस्ता उठाकर स्कुल जाना शुरू किया था
बेहद संजीदा रचना प्रतिभा जी

बाबुषा said...

maine to taange huye hain baste kandhon pe ab bhi jaaneman ! pata to hai tumhein..! maza aata hai.. ! aao tum bhi taang lo ! :-)

Pratibha Katiyar said...

@ Babusha- Janti hoon sab. aa rahi hoon main bhi jara basta sambhal loon...kafi bhari hai yaar!

संजय भास्कर said...

बहुत ही खुबसुरत रचना, धन्यवाद