Saturday, April 30, 2011

खुश्बू दीवार पे नहीं है...



कहते हैं कि हमारा एकान्त हमें मांजता है. परिमार्जित करता है. एक समय में मैंने इस एकान्त को खूब-खूब जिया है. इतना कि मेरा 'मैं' मेरे सामने किसी नन्हे बच्चे की तरह अनावृत पड़ा होता था. अच्छा, बुरा सब स्पष्ट. अवसाद के ढेर सारे टुकड़ों ने उस 'मैं' को छलनी कर रखा था. वो लहूलुहान सा कातर सा सामने पड़ा होता था और मेरे पास उसे देखकर रो देने के सिवा कोई उपाय नहीं होता था. हम दोनों खुलकर गले मिलते. लंबी सिसकियां अक्सर सीने में छुप जातीं. जल्दी ही हमने एक-दूसरे की मजबूरियां समझ लीं और एक-दूसरे को जैसे हम थे, अपना लिया.

फिर एकान्त से भागने का सिलसिला  शुरू हुआ. तूफान की तरह काम को अपने जीवन में आने दिया और उसमें खुद को डुबो दिया. अब उस घायल 'मैं' को देखती नहीं थी. उससे नजरें चुराकर खुश थी कि चलो, सब ठीक ही है. लेकिन अचानक काम की रफ्तार के बीच कभी सीने में दर्द उठता तो लगता कि ये दर्द जाना पहचाना है.

हम अपने अतीत से भागकर अपना वर्तमान या भविष्य नहीं बना सकते. अतीत को अपनाकर उसे समझकर और उससे खुद को मुक्त करके जरूर आगे बढ़ सकते हैं. इसी जद्दोजहद में नींद से रिश्ता टूट चुका था. उसे मनाने की सारी कोशिशें थकी हारी कमरे में बिखरी पड़ी रहतीं. बस कुछ दवाइयों के रैपर ही अपनी जीत पर मुस्कुराते.

आज ऐसी ही उधार की एक नींद के बाद घंटों दीवार के उस खाली पड़े कोने को ताकते हुए जिस पर कभी सोचा था कि वॉन गॉग की पेंटिंग लगाऊंगी...अतीत के न जाने कितने टुकड़े सिनेमा की रील की तरह खुलने लगे . शुरुआत में अतीत के वे टुकड़े डरे-सहमे से पलकों की ओट से झांकते कि कहीं डांटकर भगा न दिए जाएं. फिर हिम्मत कर सबके सब कमरे में धमाचौकड़ी करने लगते. कोई टुकड़ा दीवार पर जाकर चिपक जाता और खुलना शुरू हो जाता.

वो भी क्या दिन थे जब कॉलेज से छूटकर अक्सर श्मशान घाट के किनारे घंटों बैठा करती थी. जीवन का अंतिम पड़ाव देखने का जाने कैसा मोह था.. कई बार डांटकर भगाई भी गई. फिर भी जाना जारी रहा...एक बार बहुत बारिश हो रही थी और एक गरीब मां सूखी लकडिय़ों के लिए एक मोटे आदमी के सामने गिड़गिड़ा रही थी. उस रोज उसके बच्चे के मरने के दु:ख पर सूखी लकडिय़ों के लिए तरसने का दुख भारी हो आया था.

आज दीवार पर न जाने क्या-क्या दर्ज हो रहा है. भीतर का गहरा खालीपन अतीत के टुकड़ों को डपटता है तो मैं उसे मना करती हूं. सब अपना ही तो हिस्सा है. रिल्के को याद करती हूं. हंस देती हूं. 'अगर तुम्हारे भीतर अब तक के अवसाद से बड़ा अवसाद जन्म ले रहा है तो समझो कि जीवन ने तुम्हें बिसारा नहीं है. वो तुम्हारा हाथ थामे चल रहा है.' रिल्के भी ना कसम से क्या-क्या लिखते हैं, कभी मिलें तो पूछूं कि ये जो इतना अवसाद है इसे रखें कहां यह भी तो बताइये. और जो न होना चाहूं जीवन में, बस सांस लेना चाहूं बहुत सारे लोगों की तरह तो..जीवन आसान न हो जाए...नहीं, प्रतिभा तुम अभिशापित हो जीवन में होने को. कोई आवाज आती है. मैं अवसाद से समझौता कर लेती हूं. उसका स्वाद मीठा सा लगता है.

दीवार के उस खाली कैनवास पर अतीत की तमाम डॉक्यूमेंट्रीज चल रही हैं. उधार की अधूरी सी नींद आंखें मल रही है. गंगा की लहरों में खुद को मुक्त करने की इच्छा...मणिकर्णिका घाट पर उठती ऊंची लपटों में एक उत्सव की तरह लुभाती मृत्यु. ठीक उसी वक्त प्रकाश की आवाज उभरती है... जिंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं, मैं तो मरके भी मेरी जान तुम्हें चाहूंगा...प्रकाश की आवाज गंगा की लहरों से धुली हुई मालूम होती है. गंगा आरती की आवाज बहुत पीछे छूट गई है कहीं...दीवार पर आसमान तक ऊंची उठती लपटें हैं, गंगा की लहरें हैं और प्रेम की असीम कामना लिए एक आवाज...अरे हां, मोगरे के फूलों की खुशबू भी है कहीं आसपास...वो दीवार पे नहीं है...

9 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

यदि प्रकृति आपको जीवन में उलझाना नहीं चाहती हैं तो मानकर चलिये कि वह आपसे कुछ गुरुतर कार्य कराने को व्यग्र है।

priya said...

रुला दिया आपने

nidhi said...

ye khushbuyen chugne ka silsila hai ...hum ek ek kiran chug chug kr jeevan men sjayenge...aisa hi hai n bnaras!

jyoti nishant said...

banaras main mili mogre ki khushboo mubarak ho.sambhal kar rakhna.yah banaras main sabko nahi milta waha to log jaate hai.......

sm said...

emotional nice story

sandhya said...

बार - बार पढने के बाद भी लग रहा है अब कुछ बाकी है , बहुत कुछ बाकी है . हर व्यक्ति के अंदर कुछ न कुछ चल रहा होता है किसी को पता चल जाता है और किसी को नहीं पर इतना अवसाद लेकर कोई कोई ही मन के तूफान को समझ पता है .

Ajayendra Rajan said...

kabil-e-tareef...shaandar...वो भी क्या दिन थे जब कॉलेज से छूटकर अक्सर श्मशान घाट के किनारे घंटों बैठा करती थी. जीवन का अंतिम पड़ाव देखने का जाने कैसा मोह था...pratibhaji apne mujhe mera kanpur me bitaya waqt yaad dila diya...

मनोज पटेल said...

ओह...

mere vichar said...

अच्छी रचना.