Wednesday, January 27, 2010

टोहते

पारुल की दुनिया में गयी तो कुछ लाइनों में अटक ही गयी...
सो उस अटकन से निकलने के लिए पारुल के ब्लॉग से कुछ
बूँदें ले आई अपनी दुनिया में...मांगकर...शुक्रिया पारुल!


चाहें तो
रुख कर लें
अपनी-अपनी देहरियों का
चाहे तो
भटकन ही बना लें
शेष जीवन का उद्देश्य
जो भी हो,
जो भी
पर तय कर लें
कर लें सुनिश्चित
क्योंकि जीवन में
इत्मीनान बहुत $जरूरी है...
......
....
...
बरसों बाद खुद को टोहते
अपने निपट
एकाकीपन में जाना कि
तुम्हारे साथ
तुम्हारे बिना जीने से
अधिक प्रीतिकर रहा
तुम्हारे बिना तुम्हारे साथ जीना...
-पारुल

पारुल के ब्लॉग का लिंक-
http://parulchaandpukhraajkaa.blogspot.com/

Saturday, January 23, 2010

कुछ याद उन्हें भी कर लो


सुभाष चंद्र बोस. ये तीन शब्द किसी व्यक्ति का नाम भर नहीं हैं. इन तीन शब्दों को दोहराते हुए रगों में दौड़ते लहू की रफ्तार थोड़ी और बढ़ जाती है. देशभक्ति का सैलाब आंखों में उमड़ आता है. ऊर्जा, शक्ति, सोच का कभी न थमने वाला सिलसिला है सुभाष चंद्र बोस का नाम. आज उनका जन्मदिन है. उनका जन्मदिन कुछ खास ही मायने रखता है यूथ के लिए. शायद ही कोई युवा हो जो सुभाष के जज़्बे का कायल न हो. ये उनके नाम का ही असर है कि जो उनसे एक बार भी मिला उम्र फिर उसे कभी बूढ़ा न कर सकी.
मुझे याद है सन् 1999 का वो दिन. नवंबर के ही दिन थे. हल्की ठंड के उस मौसम में कैप्टन रामसिंह से मिलने की ख़्वाहिश लिये मैंने उनके घर पर दस्तक दी थी. वही आजाद हिंद फौज के सिपाही कैप्टन रामसिंह जिनकी जोशीली धुन पर सिपाही मार्च करते थे. आंखों में वही 'कदम-कदम बढ़ाये जा...Ó की धुन बजाते चमकती आंखों वाले कैप्टन रामसिंह की छवि थी. कैप्टन रामसिंह आये. वे बूढ़े हो चुके थे. बीमार भी थे. वे जो बोल रहे थे, उसे समझने में खासी मशक्कत करनी पड़ रही थी. लेकिन वो जो नहीं बोल रहे थे, वो साफ सुनाई दे रहा था. नेता जी का नाम सुनते ही उनकी आंखें चमकने लगीं. जैसे अभी चल ही देंगे बस. उनका रोम-रोम न जाने कितनी कहानियां बयान कर रहा था. ये है जादू सुभाष के नाम का.
ये जादू कभी कम नहीं होगा. कभी भी नहीं. मुझे याद है कि अमर चित्रकथा में पहली बार पढ़ा था, सुभाष चंद्र बोस को. छ:-सात साल की उम्र रही होगी शायद. वो उनके विराट व्यक्तित्व का ही असर था शायद कि कुछ ही सालों में उनकी आत्मकथा ढूंढ निकाली थी. हर पेज से गुजरते हुए सिहरन सी महसूस होती थी. उस नन्ही उम्र में बहुत कुछ समझ की जद से यकीनन छूट ही गया होगा लेकिन फिर भी बहुत कुछ था जो साथ रह गया. कॉलेज पहुंचते-पहुंचते यही अहसास मैंने अपने दूसरे साथियों में भी महसूस किया. 'कदम-कदम बढ़ाये जा...Ó की धुन अंदर कहीं बजने लगती है उनका नाम लेते ही.
कॉलेज की कैंटीन हो या डिबेट के लिए तैयार किया गया डायस सुभाष अब भी हर जगह मौजूद हैं. हर युवा में वे ऊर्जा बनकर, हौसला बनकर दौड़ रहे हैं. धर्म, जाति, प्रांत की सरहदों से परे सिर्फ एक जज़्बा. पिछले दिनों एक परिवार से मुलाकात हुई. ऐसा परिवार जो पिछले तीन दिनों से 23 जनवरी का इंत$जार कर रहा है डिलीवरी के लिए. वे अपना बच्चा (जो कि सिजेरियन होना है) 23 जनवरी को ही दुनिया में लाना चाहते हैं. ये है सुभाष चंद्र बोस का असर. कश्मीर से कन्याकुमारी तक. एक और बात सुभाष चंद्र बोस के बारे में बेहद दिलचस्प लगती है कि वो इकलौते ऐसे फ्रीडम लीडर हैं, जो कभी भी नहीं मरेंगे. उनकी मौत से जुड़ी जितनी कहानियां हैं, उससे ज्यादा बड़ी हैं उनके होने को लेकर आस्थाएं. इतिहास में कहीं उनकी मृत्यु का प्रमाण नहीं. अपने प्रिय नेता को हमेशा जिंदा रखने का इससे अच्छा बहाना भला और क्या हो सकता है. जब-तब उनके होने को लेकर, उनके जैसे किसी शख्स के होने को लेकर खबरें आती रहती हैं कि शायद वे सुभाष हैं...सुभाष कभी नहीं मरेंगे क्योंकि सुभाष कभी नहीं मरते.
हम सबमें ऊर्जा का प्रवाह भरने वाले सुभाष के जन्मदिन पर आज पूरा देश गौरवान्वित है. आज 23 जनवरी को जन्मे ढेर सारे बच्चों में से कुछ बच्चे भी अगर सुभाष हो जायें तो...ये एक ख़्वाब है. लेकिन ऐसा हो भी तो सकता है. हो रहा भी तो है. हर यूथ में कहीं न कहीं सुभाष सांस ले ही रहे हैं. जब भी कुछ गलत होता देखते हैं, तो मन बेचैन हो उठता है. पूरे सिस्टम को उखाड़ फेंकने का, नया सिस्टम बनाने का जी चाहता है. यही तो है सुभाष होना. मंजूनाथ में भी सुभाष ही तो थे, चंद्रशेखर में भी...हर उस अवेयर यूथ में सुभाष ही तो हैं, जो समझौतों में बिलीव नहीं करता. जो खारिज कर देता है मिडियॉकर होने को. जो जिंदगी को अपनी शर्तों पर, अपनी तरह से जीना चाहता है. जो अपने लक्ष्य और राहों को लेकर क्लियर है. सुभाष हैं...हमेशा रहेंगे. जब भी मन निराशा से भर उठे और अंदर से आवाज आये कदम-कदम बढ़ाये जा...तो समझ लीजिए की सुभाष हैं. यहीं कहीं.

- Pratibha

Tuesday, January 19, 2010

बुद्धू सा एक मन, कुछ आहटें और बसंत


कबसे महसूस हो रहा था कि कोई है जो पीछे चल रहा है. कोई आहट सी थी जो लगातार पीछे महसूस हो रही थी. पलटकर देखा तो कोई नहीं...कोई भी नहीं. ध्यान हटाया, कुछ और सोचने का मन बनाया. लेकिन चंद कदम चलते ही फिर आहटें पीछा करने लगी. मुस्कुरा पड़ी मैं. बुढ़ा गई हूं...कान बजने लगे हैं. कोई नहीं है...सचमुच कोई भी तो नहीं. सब अपनी जगह पर स्थिर...सब अपनी गति से चलते हुए. रास्ते वही...फासले वही. कोई भी तो नहीं. कहीं नहीं. क्यों लगता है कि कोई पीछे-पीछे चल रहा है. अब आंखें, कान, नाक, दिमाग चौकन्ना होने लगा था. जासूसी फिल्मों का सा सीन बन रहा था. कदम आगे बढ़ाते हुए और ध्यान पीछे लगाते हुए. जब तक ध्यान पीछे रहता कोई आहट नहीं आती और जैसे ही ध्यान हटता किसी के कदमों की चाप सुनाई देती. एकदम साफ सुनाई देती. मुझे लगा अब डॉक्टर के पास जाना होगा शायद. किसी को बताया तो बिना मेडिकल सर्टिफिकेशन के ही पागल मानने वालों की कमी नहीं है.
लेकिन ये आहटें लगातार बेचैन कर रही थीं. कोई तो है जो मुझे दिक कर रहा है. ऐसे मौकों पर रास्ते भी फैलकर और लम्बे हो जाते हैं. खत्म ही नहीं होते. सारी दुनिया किस कदर खुश है. किसी उत्सव में मगन है और मुझे न जाने कौन सी बीमारी लग गई सुबह-सुबह. बैठ ही जाती हूं सीढिय़ों पर. मुस्कुराती हूं. देखती हूं कहां हैं आहटें. कब तक मुंह छुपायेगा यूं पीछे चलने वाला. जानती हूं कोई नहीं फिर भी चाहती हूं कि कहीं कोई हो...ये आहटें भ्रम न हों. चल देती हूं ताकि चलती रहें आहटें पीछे-पीछे. भ्रम ही सही कि कहीं कोई है जो हर पल साथ है. शरारत ही सही. ये जीवन शरारतों के नाम ही सही. पूरे वक्त उन आहटों के बारे में सोचती रही. किसके होने का इंत$जार है ये सोचती रही. काम...व्यस्तताएं...परेशानियां...सब नाकाम. आहटों की कैद में रहना अच्छा भी लग रहा था. जैसे घनघोर ठंड में कोहरे को बूंद-बूंद पीना, गर्म कॉफी के घूंट की तरह...तेज बारिशों के साथ खुद भी एक धार हो जाना. ओह...कैसा हो जाता है जीवन. कैसी-कैसी आदतें लग जाती हैं. और ये आहटें...अब गुस्सा नहीं आ रहा. अगर ये भ्रम है, तो भ्रम ही सही. घर के करीब पहुंचने पर महसूस हुआ कि कोई दुपट्टे का कोना खींच रहा है धीरे-धीेरे. पलटती हूं तो कोई नहीं...एक झोंका...तेज हवा का... नहला कर जाता है सर से पांव तक. सिहरन सी महसूस होती है. मेरे ही भीतर से आवाज आती है बसंत मुबारक...ओह तो ये बसंत था जो साथ चल रहा था...उसकी आहटें थीं जिन्हें पहचान नहीं पा रही थी. मैं भी कैसी बुद्धू हूं...खैर, आप सबको बसंत मुबारक!

- प्रतिभा

Friday, January 15, 2010

ये मेरे चाँद की जीत है...

दिन दहाड़े चाँद ने सूरज को छुपा लिया....
किसी ने कुछ कहा..किसी ने कुछ देखा...
हमने देखा अपने चाँद को मुस्कुराते हुए...
सूरज पर कब्ज़ा जमाते हुए...
(फोटो- अतुल हुंडू)

Thursday, January 14, 2010

एक दुःख पुकारता है..

दबे पांव आता है दु:ख। बेहद खामोशी के साथ. हर पल, हर क्षण दु:ख से झरती है एक उम्मीद, उस दु:ख से पार निकल पाने की. ऐसे वक्त में जब दु:ख स्थाई हो चले हों. जब दुखों ने मुस्कुराहटों तक को न बख्शा हो और वहां भी बना लिया हो ठिकाना, तब बुद्ध याद आते हैं. बार-बार याद आते हैं. बुद्ध को याद करते हुए आलोक श्रीवास्तव की कविताएं पढऩा दु:ख के सुख को महसूस करने जैसा भी है. उनका नया संग्रह दु:ख का देश और बुद्ध बस आने को है. इसी संग्रह से आइये पढ़ते हैं कुछ कविताएं...
एक दु:ख पुकारता है
ये करुणा
आवा$ज देती है
एक दु:ख पुकारता है...
लहरों में सिर्फ दीप नहीं
जल में घुले आंसू भी हैं
इतिहास की बहती सरिता के तट पर
उन्हें किसी ने निहारा था
वह कह सकता था...
मैं लौटूंगा
जब भी धर्म की हानि होगी
मैं मुक्त करूंगा तुम्हें
पर उसने कहा
दु:ख से निष्कृति
दुख से भागने से नहीं है
उसने कहा...
अपना दीपक आप बनो
तप और ज्ञान नहीं
बहुत सारी रातों में रोने के बाद
वह अच्छी तरह जानता था
आंसुओं के बारे में।
उसकी डबडबाई आंखें
अब भी दिखती हैं
इतिहासों के पार...
कहां से आता है यह दु:ख
हजार-हजार पंखों पर सवार
चेतना को ग्रसता
छा जाता जीवन पर
इंसान जान भी नहीं पाता
स्रोत दु:ख के
थकता-टूटता हारता
फिर भी पूजता, नवाता
शीष दु:ख के ही निर्माताओं के सम्मुख
कैसी है यह दु:ख की कारा
लोहे से मजबूत
पर शक्तिहीन सूखी टहनी सी....

Thursday, January 7, 2010

तेरे इश्क में

कई बार लिखे हुए को पढऩा नहीं सुनना ज्यादा अच्छा लगता है कोई सुनाए अगर प्यार से. ठीक उसे तरह कभी-कभी सुने हुए को पढऩा भी बहुत अच्छा लगता है, धुनों को महसूस करते हुए हर लफ्ज पर उंगलियां रखते हुए आगे बढ़ते जाना...आज इश्क की नब्ज़ पर हथेलियां रख देने को जी चाहा...
तेरे इश्क में... तेरे इश्क में...
राख से रूखी
कोयले से काली...
रात कटे ना हिज्राँ वाली
तेरे इश्क में...हाय,
तेरे इश्क में...
तेरी जुस्तजू करते रहे
मरते रहे
तेरे इश्क में...
तेरे रू-ब-रू,
बैठे हुए मरते रहे
तेरे इश्क में
तेरे रू-ब-रू, तेरी जुस्तजू
हाय ...तेरे इश्क में...
बादल धुने...मौसम बुने
सदियाँ गिनीं
लम्हे चुने
लम्हे चुने मौसम बुने
कुछ गर्म थे कुछ गुनगुने
तेरे इश्क में...
बादल धुनें मौसम बुने
तेरे इश्क में...तेरे इश्क में...
तेरे इश्क में..हाय... तेरे इश्क में
तेरे इश्क में तनहाईयाँ ...
तनहाईयाँ तेरे इश्क में
हमने बहुत बहलाईयाँ
तन्हाइयां ...तेरे इश्क में
रूसे कभी
मनवाईयां... तनहाईयां...
तेरे इश्क में
मुझे टोह कर
कोई दिन गया
मूझे छेड़कर कोई शब गयी
मैंने रख ली सारी आहटें
कब आई थी शब् कब गयी
तेरे इश्क में,
कब दिन गया शब् कब गई...
तेरे इश्क में...तेरे इश्क में...
हाय... तेरे इश्क में
राख से रूखी...कोयले से काली
रात कटे ना हिज्रां वाली
दिल जो किये...हम चल दिये
जहां ले चला
तेरे इश्क में
हम चल दिए
तेरे इश्क में
हाय...तेरे इश्क में
मैं आसमान
मैं ही ज़मीं,
गीली ज़मीं ,
सीली ज़मीं,
जब लब जले पी ली ज़मीं
गीली ज़मीं तेरे इश्क में...
शब्द- गुलज़ार
आवाज़ - (जो यहां है नहीं) रेखा भारद्वाज
अल्बम - इश्का-इश्का

Sunday, January 3, 2010

प्रेम का मौसम

वेरा उन सपनों की कथा कहो (1996) से कविताओं का सफर शुरू करने वाले आलोक श्रीवास्तव के दो कविता संग्रह आने को हैं. पहला दिखना तुम सांझ तारे को और दूसरा दु:ख का देश और बुद्ध. इस बीच उनके दो कविता संग्रह और आये. जब भी वसंत के फूल खिलेंगे (2004) और यह धरती हमारा ही स्वप्न है (2006).वेरा की कविताओं ने एक पूरी पीढ़ी पर जादुई असर किया था. उन लोगों पर भी इन कविताओं का पूरा असर हुआ, जिन्हें कविताओं में खास रुचि नहीं थी. ये प्रेम में पगी हुई कविताएं थीं. प्रेम की परिभाषा का विस्तार देते हुए इन कविताओं में न मिलन की आस थी, न विछोह की पीड़ा या शिकायत, न मनुहार कोई. इनकी अलग दुनिया थी. जो प्रेम के साथ पूरा एक नया संसार रच रही थीं. इतिहास की यात्राएं करते हुए ये कविताएं भविष्य पर न$जर टिकाये थीं. ये प्रेम कविताएं समाज और मन दोनों पर बराबर पकड़ बनाये चलती हैं. यहां जो प्रेम के अर्थ खुले तो पूरा समाज भी खुला, वो कुहासे भी खुले, जिन्होंने मन के मासूम कोने को ढंाक रखा था. वेरा के बाद दिखना तुम सांझ तारे को पढऩा एक अलग ही अनुभव है. ये कविताएं नयी भूमि पर रची गयी महत्वपूर्ण कविताएं हैं. आलोक को बधाई देते हुए आइये पढ़ते हैं इसी संग्रह से दो कविताएं-

मैं नहीं कहता तुम्हें प्यार करताहूँ
मैं तो बस वह मौसम होना चाहता हूँ
तुम्हारे केशों को बिखरा दे तुम्हारे चेहरे पर
वह आवाजजो जंजीर बन जाए तुम्हारे पांवों में
और तुम एक दृश्य बन खड़ी रह जाओ
शाम का आसमान जिसे कौतुक से देखे
मैं तो वह रंग होना चाहता हूँ
जो तुम्हारी अंाख और पलक में
सपना बनकर घुलता जाए...
---------------------------------
तुम मुझे भूल भी जाओ
तो भी मैं सपना बन झांकूंगा
तुम्हारी आंख से
जहाँ भी तुम जाओगी
जो भी तुम करोगी
मई उसमें शामिल होऊंगादूर-दूर तक
मैं कहीं नहीं होऊंगा
पर तुम्हारी आंख
मुझे निहारेगीसूने किसी वन में
एकांत किसी राह पर
वीरान किसी मौसम में
तुम पत्तों में सुनोगी मेरी आवा$ज
हो सकता हैकिन्हीं पंखुरियों में
मुझे छुओ भी तुम
मैं तुम्हारा प्रेमी नहीं था
मैं तो बस एक मौसम था
तुम्हारी राह से गुजरा...

Saturday, January 2, 2010

किसी एक फूल का नाम लो !

- प्रवीण शेखर
तो क्या जिंदगी फिर उसी धुरी पर घूमेगी, गोल-गोल, जहां पिछली शाम तक थी? आधी रात को कैलेंडर धीरे से फडफ़ड़ाया और इतिहास के माथे पर एक साल और लटक गया है. अब न वो घर, न वो शाम का तारा, अब न वो रात, न वो सपना. पिछली रात की तेज और सर्द हवा में आधी रात के बाद कैलेंडर का कागज बोल रहा था-गये दिनों का सुराग लेकर किधर से आया किधर गया वो, अजीब मानूस अजनबी था, मुझे तो हैरां कर गया वो.आगे साल भर का स$फर. तीन सौ पैंसठ दिनों और इतनी रातों का सफर. इसी सफर की किसी गली में मिलेगा वो बेनवां रात का मुसाफिर जिसे गये रात तेरी गली तक तो हमने देखा था, फिर न जाने किधर गया वो. वही मुसाफिर हमें पहुंचायेगा नये साल की आखिरी शाम तक, रात तक।

नये साल के पहले अंधेरे में वो भी कुरकुरेव गांव के पहले अध्यापक, पहले कम्युनिस्ट दूइशिन जैसा लगा था और देर रात सवाल साथ-साथ चलते रहे कि संघर्षों, तरह-तरह के भाग्यों, इंसानी आवेगों से भरी जिंदगी क्या रंगों में ढाली जा सकती है? कैसे किया जाये कि भावनाओं का यह जाम छलके नहीं और आप तक पहुंच जाये? कैसे किया जाये कि मेरी सोच, मेरे दिल का दर्द आपके दिल का दर्द बन जाये? लेकिन बहुत सी बातें अमली शक्ल ले पाती हों यह जरूरी तो नहीं, फिर भी इतना तो तय है कि रास्ता इसी के बीच से बनेगा. नए साल की सुबह सपने पालने, बुनने और रास्तों को जन्म देने के लिए सबसे सही वक्त है, शायद. इसी समय धूप सबसे करीने के सात रंगों में फैलती है आंखों पर. रात का सपना होठों पर आता है और सबसे बड़ी बात यह कि इस वक्त रोशनी नहीं बुझती या नहीं हो तो भी. बीती शाम अपना हैंगओवर धुंध, कुहासे, बदली की शक्ल में आये तो भी।

परवीन शाकिर एक मंत्र देती हैं रास्ता काटने के लिए-निकले हैं तो रास्ते में कहीं शाम भी होगी, सूरज भी मगर आयेगा इस राहगु$जर से.अच्छा किसी एक फूल का नाम लो. उसका रंग कैसा है? खुशबू कैसी है? उसकी शक्ल कैसी है? यह शक्ल किससे मिलती है? किसी बच्चे का चेहरा ही याद कर लें, उसके बालों की छुअन को महसूस लें. या फिर उस ख़त को याद कर लें जिसे आपने पहली बार किसी को लिखा था या फिर किसी ने आपको आखिरी बार लिखा था. उन अक्षरों को पढ़ लें, उसके मानी एक बार और समझ लें जैसा वह लिखा गया था. आज नहीं तो ये सारे सवाल कल के लिए सहेज कर रख लें, फिर पूछें. कल नहीं तो परसों या फिर उसके बाद कभी. या फिर बार-बार नहीं तो साल भर. आपको नहीं लगता कि भविष्य में भरोसा, आस्था और जिंदगी की गहन अंदरूनी खूबसूरती की कहानी, उसकी चमक ऐसे ही हल्के -फुल्के और बेतुके भी सवालों उसके जवाबों में छिपी है।

यह समय अजीब है. बदन में चुपके से धंस जाने वाली किरचें हैं. धूल है, शूल है, खुशबू है, रंग है, सुर है वो आंखें हैं, जहां खुदा पनाह लेता है. अब घात या बेवफाई पर टूटकर बिखर जाने, नशे में गर्क होकर मर जाने का रिवाज नहीं है. अब कमजोरियों और दारुण स्थितियों से लडऩे और जीतने का समय है. जीवन की सक्रियता में डूबने का समय है जो किसी नशे में नहीं मिलता. यह छोटी-छोटी बातों में लिपटे बड़े सुखों से लिपटने का समय है.पीटर स्क्रीवन की कठपुतलियों में सुपरस्टार था सामी. 25 सेंटीमीटर के चेहरे पर अचरज के भाव थे. तीखी नाक, माथे पर लाल रंग के बालों के बीच झूलती लट थी जिसे बार-बार संवारने की जरूरत महसूस होती. सामी लोगों का लोकप्रिय पात्र था. उसे लेकर पीटर ने साहस और रोमांच के कई नाटक बनाये. हर कहानी में वह विकट परिस्थितियों में फंसता लेकिन असंभव ढंग से बच निकलता. समुद्री जहाज टूटने पर वह ऑक्टोपस से लड़ा और मत्स्य कन्या ने उसकी जान बचाई. वह हमेशा भचकती चाल से चलता, वजह थी उसके घुटनों के जोड़ सरके हुए थे और उन्हें ठीक करना बड़े-बड़े सर्जन के बस की बात नहीं थी. हर शो के बाद सामी दर्शकों के बीच बैठ बच्चों से अभिवादन करता. थियेटर से बाहर निकलते बच्चे उदास हो जाते कि अब सामी से कब मुलाकात होगी?

उस दिन पीटर हैमिल्टन में शो के बाद सामी को चुन्नटदार थैले में रख रहे थे कि एक बच्ची झिझकती हुई आयी. उसे ठंड लग जायेगी, यह थैला तो झीना है. उसने सामी की ओर संकेत करते हुए कहा. बच्ची ने पीटर की हथेलियों पर कुछ रखते हुए फिर कहा, यह सामी के लिए है, मैंने इसे खुद बुना है, अब इसे सर्दी नहीं लगेगी. वह बड़ी खूबसूरती से तह किया हुआ स्वेटर था. स्वेटर पर नीले रंग की कढ़ाई कर एस अंकित था यानी सामी के नाम का पहला अक्षर. तकरीबन बीस साल बाद न्यू ईयर के मेले में चल रहे शो के बाद पीटर सामी को थैले में रख रहे थे कि आवाज आई, इतनी मुद्दत बाद भी इस पर उम्र का असर नहीं हुआ. कठपुतलियां कभी बूढ़ी नहीं होतीं? पीटर ने मुड़कर देखा तो 30 के ऊपर की एक औरत 10-11 साल की बच्ची का हाथ थामे खड़ी थी.वह कुछ देर सामी के सिर पर थपकियां देती रही. फिर उसकी उंगलियां सामी के चेहरे पर गले से फिसलती हुई पुराने बदरंग स्वेटर पर रुक गई. आंसू छलछला आये. वह पीटर से बोली, आप मुझे पहचानते नहीं हैं. आपके मुझे एक ऐसी अनमोल निधि दी है जिसे मैंने हमेशा संजोकर रखा है. मेरी जिंदगी ऊबड़-खाबड़ रही. घोर दु:ख के दिनों में भी मैं सामी को भूली नहीं और कोई न कोई कहानी बुनकर अपनी बेटी को सुनाती रही. फिर वह बेटी से बोली, यह है सामी. पीटर ने उस बच्ची को गोद में उठा लिया और एक और नन्ही बच्ची की कहानी सुनाई, जिसने अरसा पहले एक कठपुतली के लिए स्वेटर बुनकर काठ से बने तन-मन को बहुत राहत पहुंचाई थी. नए साल में किसी सामी से दोस्ती भी तो हो सकती है. ऊबड़-खाबड़ जिंदगी में कहानी बुनने के लिए और किसी को राहत पहुंचाने के लिए।
अरे हां, आपको नया साल मुबारक!
(लेखक इलाहाबाद के सक्रिय रंगकर्मी हैं. उनका अपना थियेटर ग्रुप बैकस्टेज है)