Friday, July 24, 2009

इंतजार


नदियों ने छोड़ दिये रास्ते,
पहाड़ों ने मंजूर कर लिया पीछे हटना,
फूलों ने सीख लिया टहनियों पर ठहरना,
हवाओं में दाखिल हो गई शाइस्तगी
सेहरा सारे पानियों से भर गये,
आंखों में उतर आये अनगिनत सपने,
मेरी ही तरह इन सबको भी हुआ है
वहम उनके आने का...

6 comments:

मीत said...

वहम !! उन के आने का ??

कोई उम्मीद बार नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती

अच्छा है ...

Parul said...

bahut acchha hai!

mehek said...

आंखों में उतर आये अनगिनत सपने,
मेरी ही तरह इन सबको भी हुआ है
वहम उनके आने का...
aji kya baat hai,ye ada bhi bahut raas aayi,bahut sunder

सुशीला पुरी said...

सुना है रात भर बरसा है बादल,
मगर वह शहर जो प्यासा रहा है .

Kishore Choudhary said...

आँखों में उतर आये अनगिनत सपने

जैसे...
सपने ही हो गए हैं आँखें !

प्रवीण जाखड़ said...

मेरी ही तरह इन सबको भी हुआ है
वहम उनके आने का...

सुंदर रचना। प्रतिभा जी आपका ब्लॉग आज पहली बार देखा, बेहद सुंदर बुनावट है आपके शब्दों की।