Friday, May 22, 2009

ख्वाब टूटे न कोई

देखो,
आहिस्ता चलो
और भी आहिस्ता जरा
देखना, सोच समझकर
जरा पांव रखना
जोर से बज न उठे
पैरों की आवाज कहीं
कांच के ख्वाब हैं
बिखरे हुए तनहाई में
ख्वाब टूटे न कोई
जाग न जाये देखो
जाग जायेगा कोई ख्वाब
तो मर जायेगा....
- गुलज़ार

2 comments:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

गुलज़ार वाकई स्वप्निल कवि हैं.

abhivyakti said...

कांच के ख्वाब हैं
बिखरे हुए तनहाई में
ख्वाब टूटे न कोई
जाग न जाये देखो

सपनो का बहुत अच्छे ढंग से मानवीकरण किया है
बधाई