Sunday, May 3, 2009

सौगात में कुछ नहीं मिलता- शिम्बोर्स्का

सौगात में कुछ नहीं मिलता
जो भी है कर्ज है.
सिर से पैर तक कर्ज में डूबे हैं हम।
अपने अस्तित्व का कर्ज चुकाना है
सव्त्व देकर
िजंदगी के लिए जान देनी होगी।

यहां यही व्यवस्था है
दिल लौटाना और जिगर भी
हाथ पैर की उंगलियां तक
वापस चली जाएंगी।

अब तुम चाहो तो भी
यह करारनामा
फाड़कर फेंक नहीं सकते
चुकाने ही होंगे यह कर्ज
चाहे अपनी खाल बेचकर चुकाओ।

कर्जदारों की भीड़ में मैं
इस ग्रह परभटकने के लिए छोड़ दी गई हूँ
कोई अपने परों के कर्ज से लदा है
तो कोई परवाज की
कुछ ऐसे भी हैं, जिन्हें चाहे-अनचाहे
एक -एक फूल, एक-एक पत्ते का कर्ज चुकाना है।

हमारा रेशा-रेशा उधार है
एक कण भी नहीं बचाया जा सकता।

यह फेहरिस्त
कभी न खत्म होने वाली फेहरिस्त बताती है
की हमें खाली हाथ ही नहीं
बिना हाथों के लौटना है।

अब कुछ याद नहीं
की मैंने कब, कहां, क्यों और किसे
अपने नाम पर यह उधार-खाता खोलने दिया।

हम इसके खिलाफ आवाज उठाते हैं
शायद यह आवाज ही आत्मा है
हमारी एकमात्र चीज
जो इस फेहरिस्त में शामिल नहीं।

4 comments:

ALOK PURANIK said...

सत्य वचन
सौगात में कुछ नही मिलता
सौगात तक सौगात में नहीं मिलती
कुछ खेल होता है
स्वार्थों का मेल होता है

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सत्य को दर्शाती गवेषणात्मक कविता बहुत अच्छी हैं।
बधायी स्वीकार करें।

अरविन्द श्रीवास्तव said...

बेहतरीन रचना के लिये बधाई व शुभकामनाएं ।

Alok Nandan said...

हम इसके खिलाफ आवाज उठाते हैं
शायद यह आवाज ही आत्मा है
हमारी एकमात्र चीज
जो इस फेहरिस्त में शामिल नहीं, और हो भी नहीं सकती