Tuesday, April 14, 2009

दुनिया के मशहूर प्रेम पत्र- १२ आम आदमी

22.8. ७६
प्रिय ....
ऐसा पहली दफा हो रहा है कि मैं अपने शहर को छोड़कर किसी और तथा अजनबी शहर को छोड़कर किसी और अजनबी शहर की बारिश में हूं। वहां की बारिशें इतनी अधिक प्यारी और पुरख्लुस हो रही हैं कि मेरे ज़ेहन में उसका अक्स ताजिंदगी बना रहेगा। वहां की बारिश में भीगना, छोटी सी पहाड़ी का बादलों से घिर जाना, रात में बारिश की बौछारों की धुंधलाती बत्तियों का जो नूर होता है-वह सब मेरे साथ चलता रहता है। यहां भी. आज भी पहले की तरह चाहा यही tha कि हल्की-फुल्की बारिश में नहाते और हवा की जाने किन-किन बातों पर सिर हिलाते दरख्तों की कतारों के बीच से गुजरती गीली सड़क पर पीली बत्तियों की रोशनियों के रिफलेक्शंस, देखूंगा और इसी बहाने अपने भीतर के छूटे शहर को जी लिया जायेगा. यह एक छोटा सा मगर बहुत अजीज सा सुख था, जिसे अंधेरे में अकेले चलते हुए चुपचाप जीना चाहता और यकीनन उसे मैंने जिया भी.लेकिन आखिरकार उस सुख ने अपनी कीमत मांग ही ली. दरअसल, रात को दफ्तर से अपने कमरे तक पहुंचने के लिए मैंने कार नहीं ली. पैदल चलना चुना. मगर, थोड़ी देर में मैंने पाया कि एक शदीद बारिश के बीच में हूं. गालिबन बारिश ने मुझे इतना अकेला देखकर घेरने की ठान ली हो. घर (?) तक के रास्ते के बीच मैं नहा-नहा गया. कमरे में देह सुखाने के लिए पंखा चलाया और देर रात तक खिड़की से पलंग सटाकर बारिश को आसमान से घटते एक जादू की तरह देखता रहा. बारिश को देखना और सुनना दोनों ही मेरे लिए एक चमत्कार था.इसी की वजह है कि आज दिन भर से धीमी-धीमी आंच में तप रही है अपनी देह. जैसे जूड़ी ताप में भीतर ही भीतर से सुलगता जान पड़ता है शरीर. इस समय पूरे शरीर को चारों तरफ से लपेटकर लेटे-लेटे, तुम्हें यह खत लिख रहा हूं. खत लिखते हुए काफ्का की याद हो आयी. वह जीवन भर हल्के-हल्के बुखार में तपता रहा था. अपनी ही देह की धीमी आंच में तपते हुए उसने लिखे थे अपनी मिलेना को खत. तुम ही सोचो, काफ्का को कहां पता होगा कि उसके द्वारा बुखार में लिखे गये खतों से एक दिन समूचा वल्र्ड लिट्रेचर उसी तरह धीमी-धीमी आंच में तप उठेगा. दरअसल, आज सारे विश्व साहित्य को काफ्का का बुखार चढ़ चुका है. माक्र्सवादी लेखक चाहे इसे न मानें लेकिन काफ्का ने जो अपने अकेलेपन की आंच से अभिशप्त रहकर लिखा, वह कालातीत है. वह इतना डूबकर लिखता था कि उसे पढ़ते हुए अपनी आत्मा भी तपने लगती है. मुझे ऐसी ठिठुरन से भरी बारिश की रात में उसे पढऩा, उसे छूने की तरह जान पड़ता है.जब वह खत लिखता था तो शायद उसे इस बात का यकीन रहता होगा कि वह उसकी मित्र मिलेना को मिले या न भी मिले. मुझे तो लगता है उसका नाम ही उसके न मिलने का संकेत था. वह हिन्दी जानता होता तो अपनी मिलेना के नाम का अर्थ निकाल लेता. अर्थात जो मिले-ना वही मिलेना. मैं तुम्हें उसी मिलेना के बरअक्स रखकर अकसर सोचता हूं. तुम्हारा नाम आगे से ....के बजाय मिलेना ही लिखा करूंगा. कभी-कभी इच्छा होती है कि तुम्हें काफ्का की सारी किताबें भेंट कर दूं. तुम्हारे जन्मदिन पर ताकि तुम जान पाओ कि आत्मा के भीतर भी बुखार होता है, उसे नापने के लिए अभी कोई थर्मामीटर नहीं बना है. शायद मिलेना ही उस थर्मामीटर की तरह थी, जिसमें वह अपना बुखार देखा करता था. मुझे अकसर ही एक सवाल कौंध-कौंध कर कोंचता रहता है कि वस्तुत: काफ्का मिलेना को क्या देना चाहता था? अपना प्यार या कि अपना बुखार? वह देना चाहता था या कुछ लेना चाहता था? कहीं ऐसा तो नहीं कि उसे जो बुखार था वह मिलेना का ही बुखार था? और क्या मैं तुम्हें मिलेना के बरअक्स रखकर अपना बुखार देने की हिमाकत तो नहीं कर डालूंगा? और यह देह इसी तरह धीमी-धीमी आंच को लपट में लिपटी देह के चारों ओर खामोश खड़े लोग देखते रहेंगे कि कैसे सब कुछ किस तरह राख बनता है. घेरकर खड़ी भीड़ को पता भी नहीं चलेगा कि कौन सी वह चिंगारी थी, जिसने किसी लमहे में लपट का रूप ले लिया. मैं जब यहां के घने जंगलों से गुजरता हूं तो लगता है, ये सारे हरे-भरे पेड़ एक दावानल के बीच हैं. वह दावानल मेरे भीतर है-मैं वाकई उस जंगल को स्वाहा कर देना चाहता हूं, जो मेरे भीतर है और भटका रहा है.वह हरा नहीं, सूखा जंगल है. एक चिंगारी मेरे भीतर है जो कभी भी लपट बन सकती है. पर यह भी तय है कि जब जंगल ही नहीं मैं भी स्वाहा हो जाऊंगा। हो सकता है कभी वह हरा हो उठे लेकिन बारिश बाहर होती रहती है। वह शहर को भिगोती है, मकान को भी भिगोती है, देह को भी लेकिन आत्मा को नहीं। वह उसी तरह धीमी-धीमी आंच में तपती रहती है। शायद लेखक बनने और बने रहने के लिए यह जरूरी भी है। जरूरी है कि वह अपनी आत्मा में इसी तरह झुलसता रहे। जले नहीं, सिर्फ झुलसता रहे। मैं चाहता हूं कि तुम जान सको झुलसना क्या होता है। और उसके बगैर लेखक होना संभव हो सकता है?...मरते हुए भी मरने से बचे रहना लेखक बनना है क्योंकि मर जाना तो मुक्त हो जाना है लेखक सिर्फ मरने की यातना के भीतर जाने को बाध्य है। वह निरंतर एक दावानल में और दावानल के साथ है। काफ्का इसका सबसे बढिय़ा उदाहरण है। काफ्का का मृत्युबोध मिलेना का भय था। लेकिन वह काफ्का की ताकत। यह कैसी विचित्र बात थी कि कि प्यार करने वालों के बीच मृत्यु और उसका बोध एक सूत्र बनाये हुए था. मुझे हमेशा लगता है कि एक दिन तुम मेरे मृत्युबोध से डर जाओगी और पीछे रह जाओगी और मैं मृत्यु से भिड़ता हुआ, मृत्यु से आ जाऊंगा. हम दोनों के बीच फिर भी एक अनाम से सेतु बना रहेगा. मैं तुम्हें ढूंढता रहूंगा. जो मिलेना वही होगी तुम. एक अलभ्य और एक अप्राप्य. पता नहीं क्यों ऐसा होता है कि ज्यों ही रात होती है-मैं मृत्यु पर बहुत बेकली से सोचने लगता हूं. क्या ऐसा तो नहीं कि सचमुच ही मृत्यु कहीं मेरी प्रतीक्षा नहीं कर रही हो. या ऐसा भी हो कि मैं मृत्यु के साथ ही रह रहा होऊं इस कमरे में. मैं उसे धक्का देकर बाहर नहीं कर सकता, इस कमरे से.मृत्यु को धक्का देकर बाहर कर दूं तो निश्चय ही वह मेरी तरहभीगेगी और बाद इसके, मेरी ही तरह एक धीमी आंच में तपने लगेगी. पश्चिम के लिए मृत्यु एक ठंडापन है. एक बर्फ सी ठंडी चीज, जिसमें सब कुछ जम जाता है. मगर भारतीयों के लिए मृत्यु को धक्का देकर बाहर कर दूं तो निश्चय ही वह भी मेरी ही तरह एक धीमी आंच में तपने लगेगी. पश्चिम के लिए मृत्यु एक ठंडापन है. एक बर्फ सी ठंडी चीज, जिसमें सब कुछ जम जाता है. मगर, भारतीयों के लिए मृत्यु एक आग है. स्वाहा हो जाना है. हां, उस भीतर के सूखे जंगल को भी, जो मेरे भीतर है. हरा हो जाने की प्रतीक्षा में और हरियाली का अर्थ है, मिलेना.हरियाली का अर्थ क्या वाकई मिलेना है? क्या वह हमेशा मिलेना ही रहती है? काफ्का की मिलेना की तरह. मेरे ख्याल से बाहर की बारिश, भीतर होने लगे तो हरियाली आ सकती है. पर बारिश है कि हो तो रही है और सिर्फ बाहर भर हो रही है....
तुम्हारा
.............
सिलसिला जारी..........

6 comments:

मोहन वशिष्‍ठ said...

अच्‍छा पत्र लिखा है मजेदार आगे का इंतजार

रंजना [रंजू भाटिया] said...

पत्र है कि दिल की बात कहने का अनूठा रूमानी तरीका ..एक एक लफ्ज़ जैसे दिल में उतरा गया ..बहुत रोचक ..अगली कड़ियों का बेसब्री से इन्तजार .आम आदमी ki दिल की बात जानने की उत्सुकता रहेगी ..

महामंत्री - तस्लीम said...

अरे ये तो कमाल हो गया। प्रतिभा जी आप ब्लॉग जगत में सक्रिय हैं, और मुझे खबर ही नहीं। खैर देर आए, दुरूस्त आए।
इन प्रेमपत्रों को साझा करने के लिए आभार।
जाकिर अली रजनीश
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तस्‍लीम
साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

pratibha said...

अरे, रजनीश तुम अभी हो इस दुनिया में.बाल साहित्यकार. कहां हो इन दिनों, क्या कर रहे हो? अच्छा लगा तुम्हें अपने ब्लॉग पर देखकर.

Nikhil Srivastava said...

Kafi dino se prem patra ke baare me soch raha tha. Khud se kai baar sawal kia ki tumne aaj tak prem patra kyu nahi likha. Uske alawa har cheez likhi. Fir ek jawab mila...Kabhi zindagi se ki hui baat ko shabdon me piroya hai!!!

praveen dwivedi's BLOG said...

निश्चित तौर पर इन पत्रों को पड़ना सुखद अनुभूति है इन मर्म्स्परासी पत्रों ने प्रेम और भावों को एक नयी परिभासा प्रस्तुत की , हम सभी तक इनको इस सलीके से पहुचाने के लिये कोटिशः धनिवाद