Saturday, February 21, 2009

ek mulakat gulzar sahab se


गुलज़ार साहब फिल्मों से गुजरना, उनकी शायरी से रु-ब-रु होना होना हमेशा एक बेजोड़ अनुभव होता है। रूहानी शायरी को रचने वाले इस शायर से रु-ब -रु होना, maano वक़्त का उन लम्हों में ठहर जाना था। सफ़ेद लिबास में बैठे उस शख्श ने जिंदगी के हर रंग को जिस खूबसूरती से रचा वो बेमिसाल है। कैसे कर लेते हैं वे shabdon की ऐसी बाजीगरी, कैसे वे अल्फाजों को धडकना सिखाते हैं, कौन सा वो जादू है जिससे वे अपने सुनने वालों को, पढने वालों को थाम लेते हैं? उनसे मिलकर जब जानने चाहे इन सवालों के जवाब तो पता चला की इस शायर के पास तो पहले से ही काफी सवाल हैं, जिन्हें वे कभी नज्मों में, कभी फिल्मों में उड़ेलते रहते हैं।

अवार्ड और आर्टिस्ट
आर्टिस्ट कोई भी हो, कैसा भी हो, कभी भी अवार्ड्स से बड़ा नहीं होता। कोई लाख कहे की वो अवार्ड का मुन्तजिर नहीं है लेकिन असल में हम कहीं न कहीं अवार्ड से जुड़े होते हैं। अवार्ड्स हमारे काम का रिकोग्निशन होते है। आज पूरा देश एक ऑस्कर की आस में है, मैं भी हूँ। हम कितना भी कहें की हमें हॉलीवुड के अवार्ड्स से कोई मतलब नहीं, उनके हमारे लिए कोई मायने नहीं हैं लेकिन असल में हम सब कहीं न कहीं ऑस्कर का इंतज़ार कर रहे हैं। इसमें ग़लत भी क्या है?

स्लाम्दोग मिलेनिओर, देनी बोयल और रहमान
क्या हिंदुस्तान स्लम्स का ही देश है? विदेशी आकर हमारे देश में वही सब क्यों देखते हैं? क्या यह फ़िल्म ऑस्कर में इसलिए गई क्योंकि इसे एक विदेशी ने बनाया ? इन सारे सवालों का जवाब फ़िल्म ख़ुद है। फ़िल्म देखने के बाद किसी सवाल की कोई गुंजाईश नहीं बचती। वैसे हम इन सवालों में घिरने के bajay अगर फ़िल्म की खूबियों पर बात करें तो बेहतर होगा। इस फ़िल्म मेंरहमान ने जो जादू किया है उस पर बात करना लाजिमी है। मुझे नई पीढी पर, उसके काम पर भरोसा है इसलिय मैं नोस्टेल्जिया n जीने के bajay विशाल भरद्वाज, रहमान, प्रसून जोशी, स्वानंद किरकिरे लोगों पर भरोसा करता हूँ।

मन से लिखता हूँ
फ़िल्म के गीतों का चेहरा अलग होता है कविताओं से। कवितायें, नज्में, मैं दिल से लिखता हूँ, सिर्फ़ दिल से जबकि फ़िल्म के गीत फ़िल्म का चेहरा होते हैं। गाने फ़िल्म की patkatha , उसके किरदार, धुन, निर्देशक की मांग इन saaree चीजों को ध्यान में रखकर लिखने होते हैं। एक प्रोफेसन है और दूसरा paisan, अभिव्यक्ति दोनों में है, फील दोनों में है। तो जिसे काम को इतने सारे दबावों से , आग्रहों से होकर gujrana होता है वह काम ज्यादा मुश्किल लगता है मुझे, लेकिन उसका अपना मजा भी है।

भाषा तो बदलेगी
वक़्त के साथ भाषा क्यों नहीं बदलेगी? आज के दौर में स्क्रिप्ट बदल गई है, किरदार बदल गए हैं, हीरो हर दूसरे वाक्य में अंग्रेजी बोलता हैअब युवराज का सलमान हो या सत्य का भीखू मात्र या फ़िर bnti और बबली इन किरदारों के साथ इनकी भाषा भी पकड़नी ही होती है। भीखू मात्र तो गोली मार भेजे में....भेजा शोर करता है...यही न बोलेगा। वो दिल ढूंढता है फ़िर वही फुर्सत के रात दिन...तो नहीं ही gayega न.

चाँद मेरा है
चाँद तो बस मेरा है।हाँ, चाँद पर मेरा कॉपी राइट है। वो मुझे फैसीनेट करता है। उसकी हरकतें ही कुछ ऐसी हैं। जब देखता हूँ कुछ अलग ही शरारत, अलग ही मूड में दिखता है। यही वजह है की मेरी कविताओं में वो कुछ ज्यादा ही नजर आता है।
रात के पेड़ पे कल ही देखा था
चाँद, बस पक के गिरने वाला था
सूरज आया था, जरा उसकी तलाशी लेना...
सवाल ख़ुद जवाब
मैं एक शायर हूँ। मेरे पास ख़ुद बहुत सारे सवाल है जिन्हें मैं अपनी शायरी में पिरोता हूँ। लोगों को वो सवाल अपने लगते हैं, वो दर्द, तकलीफ, रोमांस उन्हें अपना लगता है तो यह अच्छी बात है लेकिन कोई भी शायर किसी के लिए कुछ सोचकर नहीं लिखता। उस पर जो गुजरती है वही लिखता है। मैं भी वही लिखता हूँ। मेरी शायरी में भी कई सवाल हैं, जिनके जवाब मैं khoj रहा हूँ। कई बार सवाल ख़ुद जवाब बनकर सामने आते है और कई बार वे सवाल और बड़े होते जाते है...
मुझको भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे
मैंने तो एक बार बुना था एक ही रिश्ता
लेकिन उसकी सारी गिरहें
saaf नजर आती हैं मेरे यार जुलाहे...
तो देखिये न सवाल ही तो है जिसके जवाब हम सब खोज रहे हैं।

मैं पढता हूँ इन्हें
मैं बहुत सारे लेखकों का फेन हूँ। जैसे स्पेनिश लेखक मर्रिन सोरोसकी, वाल्ट वित्मन, पाब्लो नेरुदा, फराज, फैज, कुसुम अग्र्ज्ज, वृंदा करिन्द्कर, शक्ति दा इन सबको पढता हूँ, इन्सेसीखता हूँ। ग़ालिब तो हैं ही मेरे फेवरेट। टैगोर पहले कवि है जिन्हें पढने के बाद मेरा जीवन ही बदल गया। देखा जाए तो वहीँ से कविता के बीज पड़े मेरे अन्दर। आठ बरस की उम्र में उन्हें पढ़ा और उनका दीवाना हो गया। यहाँ तक की लिब्रेरी से निकलवाई गई वह किताब उसका नाम गार्डनर था चुराकर मैंने जिंदगी की पहली चोरी की।

जो किया सो किया
मुझे अपने किसी काम को लेकर कोई संकोच कभी नहीं हुआ। कोई गिला नहीं हुआ। मैंने जब भी जो काम किया, उसे पूरे दिल से किया। अच्छा हुआ, बुरा हुआ लोगों ने पसंद किया, napasand kiya यह अलग बात है लेकिन मैंने अपने हर काम को दिल से किया, उसे पूरा जिया। जब भी मुझे लगा की मज़ा नहीं आ रहा है मैंने अपने आपको उस काम से अलग कर लिया। हाल ही में मैंने बिल्लू baarbar के दो गाने लिखने के बाद ख़ुद को फ़िल्म से अलग कर लिया शायद मुझे मजा नहीं आ रहा था। तो मैं जो करता हूँ उसे पूरे दिल से करता हूँ वरना नहीं करता हूँ।

प्यार जिंदगी है...
बस एक छोटा सा संदेश (sharaart se muskurate hue ) love thy neighbour as thyself including thy neighbor's girl....यानि प्यार लुटाते चलो...दुनिया mahkaate चलो...

शब्द सब कुछ नही कहते, काफ़ी कुछ छूट जाता है, कहने से, सुनने से। ऐसे में खामोशी के अर्थ और गहरे हो जाते हैं। गुलज़ार साहब की नज्में सुनते हुए हमेशा लगता है की कुछ और चाहिए अभी...वे एक प्यास जगाकर छोड़ देते हैं और हौले से मुस्कुराते हैं। जिसे तरह कागज पर फैला खाली स्पेस मुंह chidhata है, उसी तरह उनकी खामोशी unke बारे में और जानने की उत्सकुता पैदा करती है। यही फर्क है दूर से सुनने में और करीब जाकर महसूस करने में।वो जो शायर था चुप चुप सा रहता थाबहकी बहकी सी बातें करता था....वो जो न जाने कितनों के दिलों के करीब है वो आज सचमुच करीब था और ये कोई ख्वाब नहीं था.....
-pratibha



Labels: paratibha

1 comment:

Manoj dwivedi said...

GULZAR SAHAB NE OSCAR JIT LIYA HAI. PURE DESH KA SAMMAN AUR GULZAR NE KIYA INDIA KO GULZAR. MADAM APKE IS PRAYAS KA BAHUT BAHUT DHANYABAD. ITIHAS ME DARZ HO RAHE GULZAR KO BADHAI AUR APKO BHI..