Friday, January 23, 2009

लवलीन की याद में

दिल धक् से रह गया जब एक ब्लॉग की इस पोस्ट पर नजर पड़ी की लवलीन नहीं रहीं। न जाने क्या क्या आंखों में तैर गया। आंसुओं का अर्घ्य लवलीन जैसी जीवट महिला के लिए बहुत कम है। लवलीन उन स्त्रियों में
से हैं जिन्हें मेरी स्म्रतियों में ख़ास जगह मिली है। मैं उनसे बस एक बार ही मिली हूँ। धनबाद में। शायद १९९९ की बात है। संगमन था साहित्यकारों का। मै badi सहमी सहमी सी रहा करती थी, सारे सवाल अन्दर ही अन्दर बुनते हुए। लवलीन मेरी जिंदगी की पहली mahila थीं जिन्हें मैंने बिंदास सिगरेट और शराब पीते देखा था। मेरे घर में ya aas paas मैंने कभी किसी को पान tak खाते नहीं देखा था मेरे लिए बड़ा अजीब अनुभव था। लेकिन na jane kyon मुझे ख़राब बिल्कुल नहीं लगा। मैंने देखा मेरी ही तरह वे भी कुछ कुछ खामोश सी ही रहती हैं। मैं उन्हें ओब्सेर्वे
करती रही और उनकी कहनियों से उन्हें मिलाती रही। एक रात उन्होंने अपने कमरे में बुलाया। मै गई। सिगरेट के धुँए से मुझे परेशानी हो रही थी जिसे मै जाहिर नही होने देना चाहती थी। वे अपना ड्रिंक बना चुकी थीं। जाने क्या था की मैंने उनसे कोई सवाल नहीं किया। काफी देर तक खामोशी हमारे बीच डोलती रही फ़िर वे बोलीं, प्रतिभा इस दुनिया में जीने के लिए कठोर बनना। झुकना नहीं। मै खामोश रही। वे भी कम ही bolti thi पर बहुत कुछ कह रही हैं। उन्होंने आशीर्वाद दिया था न मानने का और लगातार लिखने का। रात के दो बजे तक हम बातें करते रहे। unhonne जयपुर aane की दावतk भी di। अगले दिन धनबाद घूमने निकले। कोयले की khanon ke andar jane ke लिए राजेंद्र यादव जी हों या संजीव, priyamvad hon ya देवेन्द्र सब के सब उत्सुक थे। हम सबने जाने कितनी सहितियिक चर्चाएँ की पर उस खामोश और सिगरेट की तलब की तलबगार लवलीन का चेहरा ज्यादातर खामोश ही था।
वापस आने के बाद उनका एक khat आया ढेरों आशीषों भरा। लिखने की राह में कोई रोड़ा न आए लिखते हुए उन्होंने अपनी कुछ कहानिया भी भेजी थीं जिनका मैंने आग्रह किया था। फ़िर हमारा khato किताबत का सिलसिला चला जो आगे जाकर रुक गया। अपने व्यस्तताओं पत्रकारिता के झमेले और हम पास होते हुए दूर हो गए। जब कभी उनका लिखा कुछ पढ़ती अपने अन्दर एक हौसला महसूस होता। आज उन्हें इस रूप में याद करना सचमुच बहुत बुरा लग रहा है। लवलीन ने संघर्ष का जीवन जिया और कभी किसी से कोई शिकायत नहीं की। लवलीन, आज अपने आपसे ये वादा दोहराती हूँ
की रहूंगी और बिना समझोतों के अपना रास्ता तय करूंगीआप हमेश याद आएँगी लवलीन.

1 comment:

Krishna Kumar Mishra said...

महादेव लवलीन जी आत्मा को शान्ति दे!
आप का आबजर्बेसन बहुत उम्दा है आप ज़हन से देखती है चीजो को.............
संगमन में देवेन्द्र जी का जिक्र पड़ा तो और अच्छा लगा ........