Saturday, January 17, 2009

महका मन


आजकल खूब पढ़ रही हूँ, खूब म्यूजिक सुन रही हूँ,

थोड़ा बहुत लिख भी रही हूँ सचमुच लगता है की जी

रही हूँ। मुझे पता है काम करना मेरी कितनी बड़ी

जरूरत है। अगर सिरहाने किताबों का ढेर न हो,

म्यूजिक न हो, तो लगता है जिंदगी रुक गई है।

लेकिन इन दो दोस्तों के अलावा भी जिंदगी में कुछ

चीजें बड़ी जरूरी होती है। दोस्त जिनसे आप अपनी

फीलिंग्स को शेयर का सकें। वो कमी हमेशा से

मेरी डायरी ने पूरी की। बड़े दिनों बाद ये रुका

हुआ सिलसिला फ़िर शुरू हुआ है। सचमुच इतना अच्छा

लग रहा है की शायद पहली बार अपने ब्लॉग पर अपने

बारे में लिख रही हूँ।

1 comment:

Dr. Mukul Srivastava said...

aapke blog ko padh kar wakai mera man mehak gaya man ko mehkanee kee ye prakriya jaaree rahege kaash aap jaisa likh pata lekin vada hai aapne aap se ek din jaroor likhunga