Friday, December 19, 2008

एक तुम्हारा होना


एक तुम्हारा होना

क्या से क्या कर देता है

बेजुबान छत दीवारों को

घर कर देता है

खाली शब्दों में

आता है

ऐसा अर्थ पिरोना

गीत बन गया सा

लगता है

घर का कोना कोना

एक तुम्हारा होना

सपनों को स्वर देता है

आरोहों अवरोहों से

समझाने

लगती है

तुमसे जुड़कर

चीज़ें भी

बतियाने लगाती है

एक तुम्हारा होना

अपनापन भर देता है

एक तुम्हारा होना

क्या से क्या कर देता है

..... ...... ........ ........ .............

Saturday, December 13, 2008

आप उसे फोन करें

“आप उसे फोन करें
तो कोई ज़रूरी नहीं

कि उसका फोन खाली हो

हो सकता है उस वक्त वह

चाँद से बतिया रही हो

या तारों को फोन लगा रही हो
वह थोड़ा धीरे बोल रही है सम्भव

है इस वक्त वह किसी भौंरे से

कह रही हो अपना संदेश

हो सकता है वह लम्बी, बहुत लम्बी

बातों में मशगूल हो

हो सकता है एक कटा पेड़

कटने पर होने वाले

अपने दुखों का उससे कर रहा हो बयान
बाणों से विंधा पखेरू मरने के पूर्व

उससे अपनी अंतिम बात कह रहा हो
आप फोन करें तो हो सकता है

एक मोहक गीत आपको थोड़ी देर

चकमा दे और थोड़ी देर बाद में

नेटवर्क बिजी बताने लगे

यह भी हो सकता है

एक छली उसके मोबाइल पर

फेंक रहा हो छल का पासा
पर यह भी हो सकता है कि

एक फूल उससे कांटे से होने वाली

अपनी रोज रोज की लड़ाई के बारे में

बतिया रहा हो या कि रामगिरी पर्वत से चल

कोई हवा उसके फोन से होकर आ रही हो

या कि चातक, चकवा, चकोर

उसे बार बार फोन कर रहे हों
यह भी सम्भव है कि कोई गृहणी

रोटी बनाते वक़्त भी उससे बातें करने का

लोभ संवरणन कर पाये

और आपके फोन से

उसका फोन टकराये

आपका फोन कट जाये
हो सकता है उसका फोन

आपसे ज़्यादा उस बच्चे के लिए ज़रूरी हो

जो उसके साथ हंस हंसमलय नील में

बदल जाना चाहता हो

वह गा रही हो किसी साहिल का गीत

या हो सकता है कोई साहिल

उसकेफोन पर, गा रहा हो उसके लिए प्रेमगीत
या कि कोई पपीहाकर रहा हो

उसके फोन परपीऊ पीऊ

आप फोन करें तो कोई ज़रूरी नहीं

कि उसका फोन खाली हो।”

डाक्टर बद्री नारायण की यह कविता मैंने
सुनी थी उनसे ही। लखनऊ के प्रेस क्लब
में उनहोंने कई कवितायें सुनाई थीं यह मेरे
साथ हो ली। इसका एक कारन यह भी
हो सकता है की इसे मैं पूरा नोट कर पाई थी।
डॉ बद्री ऐसी कवि हैं जिन्हें बिना ज्यादा पढ़े ही
मैं उनकी फैन हूँ ....

Friday, December 12, 2008

शुक्रिया


शुक्रिया मैं कितनी अहसानमंद हूँ

उनकीजिन्हें मुहब्बत नहीं करती।

यह मान लेने में भी कितना सुकून है

की उनकी किसी और

को मुझसे ज्यादा जरूरत है

और कितना चैन है यह

सोचकर की मैंने भेड़िया

बनकर किसी की bhedon

पर कब्जा नहीं किया

कितनी शान्ति, कितनी आजादी

जिसे न मुहब्बत छीन सकती है

न दे सकती है

अब मुझे किसी का इंतज़ार नहीं

खिड़कियों और दरवाजे के दरमिया

कोई चहलकदमी नहीं

सूरज-घड़ी को भी मात दे रहा है मेरा सब्र।

main समझ गई हूँ जो प्यार नहीं समझ सकता,

मैं माफ़ कर सकती हूँ

जो प्यार नहीं कर सकता।

मुलाकात और ख़त के बीच

अब होते हैं चंद दिन-ज्यादा-से-ज्यादा

चंद हफ्ते कोई युगांतर नहीं होता

जिन्हें मुहब्बत नहीं करती

उनके साथ यातरायें

कितनी सीधी-सरल होती है

उनके साथ किसी संगीत समारोह में

चले जाओ या गिरजाघर में

और जब हमारे बीच होते है

सात पहाड़ और सात नदिया

तो उन पहाडों और नदियों के फासले

किसी भी नक्शे में देखे जा सकते है

आज मैं एक संगीतहीन समतल समय में

एक यथार्थ छितिज से घिरी हुई

सलीम और साबुत हूँ तो

यह उन्हीं की बदुलत है

शायद वे ख़ुद नहीं जानतेकी

उनके खाली हाथों में कितना कुछ है

लेकिन मैंने तो उनसे कुछ भी नहीं पाया

प्यार के पास इसके सिवा भला क्या जवाब होगा

इस सवाल का.....

Thursday, December 4, 2008

इस बार नहीं


इस बार जब वो छोटी सी बच्ची

मेरे पास अपनी खरोंच के लेकर आएगी

मैं उसे फू-फू कर नहीं बहलाऊंगा

पनपने दूँगा उसकी टीस को

इस बार नहीं,
इस बार जब मैं चेहरों पर दर्द लिखा देखूँगा

नहीं गाऊंगा गीत पीड़ा भुला देने वाले

दर्द को रिसने दूँगा, उतरने दूँगा अन्दर

इस बार नहीं,
इस बार मैं न मरहम लगाऊँगा

न ही उठाऊँगा रूई के फाहे

और न ही कहूँगा की तुम आँखें बंद कर लो,

गर्दन उधर कर लो, मैं दवा लगता हूँ

देखने दूँगा सबको खुले नंगे घाव

इस बार नहीं ....

इस बार जब उलझनें देखूँगा, छात्पताहत देखूँगा

नहीं दौडूंगा उलझी दूर लपेटने

उलझने दूँगा जब तक उलझ सके

इस बार नहीं

इस बार कर्म के हवाला देकर नहीं उठाऊँगा औजार

नहीं करूंगा फिर से एक नयी शुरुआत,

नहीं बनूँगा मिसाल एक कर्मयोगी की

नहीं आने दूँगा ज़िन्दगी को आसानी से पटरी पर

उतरने दूँगा उसे कीचड में , टेढे मेधे रास्तों पे

नहीं सूखने दूँगा दीवारों पर लगा खून

हल्का नहीं पड़ने दूँगा उसका रंग

इस बार नहीं ....

बनने दूँगा उसे इतना लाचार की पान की पीक

और खून का फर्क ही ख़त्म हो जाए

इस बार नहीं.....
इस बार घावों को देखना है गौर से थोड़ा लंबे वक्त तक

कुछ फैसले और उसके बाद हौसले

कहीं तो शुरुआत करनी ही होगी इस बार

यही तय किया है
... प्रसून जोशी